बुलडोज़र से घर ढहाना क़ानूनी है या फिर ग़ैर क़ानूनी?

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रयागराज हिंसा मामले में मुख्य अभियुक्त बनाए गए जावेद मोहम्मद के घर को बीते रविवार ज़मींदोज कर दिया है.
इस दो मंजिले घर में जावेद मोहम्मद अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ रहते थे.
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों और वरिष्ठ वकीलों ने योगी सरकार के इस कदम पर सवाल उठाते हुए सर्वोच्च अदालत से मामले पर स्वत: संज्ञान लेने की अपील की है.
वहीं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट करके लिखा है कि 'अपराधियों/माफ़ियाओं के विरुद्ध बुलडोज़र की कार्रवाई सतत जारी रहेगी.'
ऐसे में सवाल उठता है कि बुलडोज़र से घर ढहाए जाने की कार्रवाई क़ानूनी है या ग़ैर-क़ानूनी है.
क्या कहती है सरकार?
योगी आदित्यनाथ ने प्रयागराज में जावेद मोहम्मद का घर ढहाए जाने से ठीक एक दिन पहले ट्वीट करके लिखा था -
"अपराधियों/माफ़ियाओं के विरुद्ध बुलडोज़र की कार्रवाई सतत जारी रहेगी. किसी ग़रीब के घर पर ग़लती से भी कोई कार्रवाई नहीं होगी. यदि किसी ग़रीब/असहाय व्यक्ति ने कतिपय कारणों से अनुपयुक्त स्थान पर आवास निर्माण करा लिया है, तो पहले स्थानीय प्रशासन द्वारा उसका समुचित व्यवस्थापन किया जाएगा."

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इससे पहले, 26 मई को उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने विधानसभा में कहा है कि "किसी ग़रीब के घर पर बुलडोज़र नहीं चलेगा लेकिन गुंडा बख़्शा नहीं जाएगा."
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अपराधियों के ख़िलाफ़ त्वरित कार्रवाई के नाम पर उत्तर प्रदेश के बाद मध्य प्रदेश में भी बुलडोज़र का इस्तेमाल शुरू हो चुका है.
अब तक चार बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में कहा था - "गुंडे, बदमाश, और दबंग को छोड़ने वाला नहीं हूं, चकनाचूर करके मिट्टी में मिलाकर रहेंगे हम, और बेटी की तरफ़ अगर ग़लत नज़र उठी तो ज़मींदोज कर दिए जाएंगे, मकानों का पता नहीं चलेगा, दुकानों का पता नहीं चलेगा. ऐसे बदमाशों पर बुलडोज़र चलेगा."
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शिवराज सिंह चौहान की सरकार में गृह मंत्री नरोत्तम मिश्र ने भी खरगोन में हुई हिंसा के बाद भी कुछ ऐसा ही बयान दिया था.
मिश्र ने कहा था - "जिन घरों से पत्थर आए हैं, उन घरों को पत्थर का ढेर बनाएंगे."
इस बयान के बाद खरगोन ज़िले में प्रशासन ने कई लोगों के घर गिरा दिए.
बीजेपी नेता योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं.
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ऐसे में ये माना जा सकता है कि इन नेताओं ने बुलडोज़र से घर गिराए जाने से जुड़े जो बयान दिए हैं, वो संविधान सम्मत होने चाहिए.
क्योंकि इन नेताओं ने जो कहा है, सरल शब्दों में उसका मतलब ये है कि "किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किसी अपराध की सज़ा के रूप में उसका घर गिराया जा सकता है."
लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या भारत का क़ानून ऐसा कदम उठाने की इजाज़त देता है.
क्या कहते हैं क़ानून विशेषज्ञ?

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े

संजय हेगड़े इन कार्रवाइयों को ग़ैर-क़ानूनी और बदले की कार्रवाई बताते हैं.
वे कहते हैं, "मौजूदा क़ानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि किसी संदिग्ध के घर पर बुलडोज़र चलाया जाए. सरकार ये कहती है कि बुलडोज़र नगर निगम से जुड़े क़ानून के उल्लंघन के लिए चलाया गया है. अगर ऐसा है तो भी सरकार को नोटिस और नोटिस के बाद सुनवाई का मौका देना चाहिए.
यहां जो कुछ हो रहा है, वह नगर निगम के क़ानून के उल्लंघन की वजह से नहीं हो रहा है. ये किसी व्यक्ति के प्रोटेस्ट या अन्य किसी घटना में शामिल होने के संदेह होने पर की गई बदले की कार्रवाई है. ये सरासर ग़ैर-क़ानूनी है."
लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या क़ानून किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध होने पर उसका घर गिराने की इजाज़त देता है.
संजय हेगड़े इस सवाल के जवाब में कहते हैं, "भारतीय दंड संहिता में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि किसी व्यक्ति को दोषी पाए जाने पर उसका घर गिरा दिया जाए.
क़ानून में सिर्फ़ इतना प्रावधान है कि दोषी ठहराए गए व्यक्ति पर जुर्माना लगाया जा सकता है जिसे बाद में पीड़ित पक्ष को दिया जा सकता है. लेकिन आज तक कोई ऐसा क़ानून नहीं बना है जिसके आधार पर अगर कोई व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसका घर गिराया जाए."

उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर की राय

उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर भी इन कार्रवाइयों को संविधान सम्मत नहीं मानते हैं.
इसके साथ ही जस्टिस गोविंद माथुर कहते हैं कि अपराध रोकने के नाम पर क़ानून का उल्लंघन नहीं किया जा सकता.
वे कहते हैं, "अपराधों को रोकने के लिए प्रशासन का चुस्त होना ज़रूरी है, इसके लिए क़ानून को नहीं तोड़ा जा सकता है. ऐसा नहीं हो सकता कि अपराध रोकने के लिए सीआरपीसी, कोर्ट और क़ानून के राज को अनदेखा कर दिया जाए."
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ग़ैर-कानूनी कार्रवाई क्यों?
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर किसी अपराध की सज़ा के रूप में घर गिराया जाना ग़ैर-कानूनी है तो सरकारें लगातार बुलडोज़र से घर गिराकर उसे सही क्यों ठहरा रही हैं.
एक सवाल ये भी है कि राजनीतिक दलों को बुलडोज़र जैसी कार्रवाई से क्या हासिल होता है. इसका जवाब तलाशने के लिए हमें बुलडोज़र से घर गिराए जाने की घटनाओं को क़रीब से देखना होगा.
उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र से घर गिराए जाने की शुरुआत गैंगस्टर विकास दुबे के घर ढहने से शुरू हुई थी. इसे योगी आदित्यनाथ के अपराध के ख़िलाफ़ कड़े रुख की तरह देखा गया.
उत्तर प्रदेश के अन्य ज़िलों में भी बुलडोज़र से घर तोड़े जाने की घटनाएं देखी गयीं जिनका बीजेपी को राजनीतिक लाभ मिला.

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मध्य प्रदेश के खरगोन ज़िले में हिंसा के बाद प्रशासन ने बुलडोज़र से तमाम लोगों के घर एवं दुकानें तोड़ी गयीं.
जब स्थानीय ज़िलाधिकारी पी अनुग्रह से इसकी वजह पूछी गयी तो उन्होंने कहा कि "आप उन लोगों के घर चले जाइए, जिनके घर जले हैं. उन लोगों के बीच में इतना आक्रोश है, इस कार्रवाई से उनको लगता है कि प्रशासन कुछ कर रहा है, प्रशासन हमारे साथ है."
बुलडोज़र से घर-दुकान गिराने की घटनाएं गुजरात में भी नज़र आयीं. और फिर दिल्ली के जहांगीरपुरी में सांप्रदायिक हिंसा के बाद बुलडोज़र चलाने की कार्रवाई को अंजाम दिया गया.

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हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद इसे रोक दिया गया.
कानपुर से लेकर खरगोन और जहांगीरपुरी से लेकर प्रयागराज तक बुलडोज़र से घर-दुकान गिराए जाने की घटनाओं में एक चीज कॉमन है - मीडिया का भारी जमावड़ा.
इसके साथ ही बुलडोज़र से घर-दुकान ढहाए जाने के बाद राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को मीम, सोशल मीडिया पोस्ट्स के ज़रिए अपने नेता की छवि मजबूत करने की कोशिश करते देखा जाता हैं.
इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री संजय राय के ट्वीट में नज़र आता है.
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इन सोशल मीडिया संदेशों से ये स्थापित करने की कोशिश की जाती है कि संबंधित नेता किसी से डरता नहीं है और अपराध के ख़िलाफ़ सख़्ती से पेश आता है और त्वरित कार्रवाई करता है.
कुछ साल पहले तक अपराध घटित होने के बाद कुछ घंटों में ही संदिग्धों की धर-पकड़ को त्वरित कार्रवाई माना जाता था. इसके बाद चार्ज-शीट और सुनवाई की न्यायिक प्रक्रिया शुरू होती थी.
लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद त्वरित कार्रवाई के रूप में बुलडोज़र के इस्तेमाल और हाफ़ एनकाउंटर आदि सामने आए जिन पर सिविल सोसाइटी की ओर से सवाल उठाए गए हैं.
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हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इसका फायदा भी मिला है. लेकिन सवाल ये उठता है कि इस सबकी ज़रूरत क्या है.
वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष भारद्वाज ने हाल ही में अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक में एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने इसकी विस्तार से व्याख्या की है.
भारद्वाज लिखते हैं, "इस विशालकाय मशीन को एक सख़्त नेता की छवि गढ़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. ये एक अर्बन लीजेंड जैसा है जो कि बुलडोज़र बाबा और बुलडोज़र मामा जैसे उपनामों से मजबूत होता है. मार्च में बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने अपने सरकारी आवास के बाहर कई बुलडोज़र खड़े करके उन पर विशालकाय होर्डिंग लगाए.
इनमें लिखा था कि 'बेटी की सुरक्षा में जो बनेगा रोड़ा, मामा का बुलडोज़र बनेगा हथौड़ा.' इसके कुछ दिन बाद शर्मा ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का 'बुलडोज़र मामा ज़िंदाबाद' के नारे से स्वागत किया. एक स्पष्ट रूप से ग़ैर-कानूनी कृत्य अब राजनीतिक रूप से लाभ देने वाला कृत्य बन चुका है.
ये भी ख़बरें आईं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हालिया चुनाव में 58 रैलियों में बुलडोज़र शब्द का इस्तेमाल किया, और पार्टी ने इन सभी सीटों पर जीत दर्ज की. इस मुद्दे पर योगी के प्रशसंकों की दावा ये है कि आगरा में कई युवाओं ने योगी की जीत के बाद बुलडोज़र और बुलडोज़र बाबा के नाम का टैटू बनवा लिया है."
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बुलडोज़र चलता रहा तो क्या होगा?
लेकिन बीजेपी बुलडोज़र की कार्रवाइयों का बचाव करते हुए इन्हें अपराध कम करने की दिशा में मददगार बताती है.
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर ग़ैर-कानूनी ढंग से बुलडोज़र से घर गिराए जाने की घटनाओं को सामान्य माना जाने लगा तो इसके दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे.
पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर कहते हैं, "डर पैदा करके अपराध रोकने की नीति (डिटरेंस) बीते युग की बात हो गयी है. अब हमारे यहां रिफॉर्मेटिव थ्योरी चलती है, डिटरेंस की नीति अब नहीं चलती है. अब इस युग के अंदर भी अगर हम 18वीं और 17वीं सदी की बात करेंगे तो वो ठीक नहीं है. बड़ी मुश्किल से, हम इस देश के अंदर रूल ऑफ़ लॉ यानी क़ानून का राज स्थापित कर पाए हैं. पिछले 75 साल से ये चलता भी रहा है. इसे और बेहतर बनाया जाना है, इसे तोड़ा नहीं जा सकता."
लेकिन अगर ऐसी घटनाएं आम हो जाती हैं तो उसका क्या परिणाम होगा.
संजय हेगड़े इसका जवाब देते हुए कहते हैं कि "अगर सरकारें ऐसे ही चलती रहीं तो या जनता डरकर बैठ जाएगी या आक्रोश और बढ़ जाएगा. ये आग से आग को बुझाने का काम है, जो कोई समझदारी वाली सरकार नहीं करती है."
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