नए आपराधिक कानूनों में 6 बड़े और महत्वपूर्ण बदलाव क्या हैं?

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- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मंगलवार को केंद्र सरकार ने भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को फिर से पेश किया.
ये विधेयक भारत में मौजूदा भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (एविडेंस एक्ट) की जगह लेंगे.
ये बिल अगस्त में पेश किए गए, जिसके बाद इन्हें संसद की स्थायी समिति को भेज दिए गए थे.
स्थायी समिति द्वारा संदर्भित परिवर्तनों को शामिल करने के लिए इन विधेयकों को वापस ले लिया गया था.
अब गुरुवार को इन विधेयकों पर बहस होगी और संभावना है कि शुक्रवार को इन पर मतदान हो.
विधेयक में जो छह बदलाव किए गए हैं, आइए उस पर एक नज़र दौड़ाते हैंः-

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1) मॉब लिंचिंग और नफ़रती अपराधों के लिए सज़ा बढ़ी
बिल के पुराने संस्करण में मॉब लिंचिंग और नफ़रती अपराध के लिए न्यूनतम सात साल की सज़ा का प्रावधान था.
इसमें कहा गया है कि जब पांच या अधिक लोगों के एक समूह द्वारा सामूहिक रूप से जाति या समुदाय आदि के आधार पर हत्या करने के मामले में, हमलावर समूह के हर सदस्य को कम से कम सात साल की कैद की सजा दी जाएगी.
अब इस अवधि को सात साल से बढ़ाकर आजीवन कारावास कर दिया गया है.

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2) आतंकवादी गतिविधि की परिभाषा
आतंकवादी गतिविधियों को पहली बार भारतीय न्याय संहिता के तहत पेश किया गया था. पहले, इनके लिए विशिष्ट क़ानून थे.
इसमें एक बड़ा बदलाव यह है कि आर्थिक सुरक्षा को ख़तरा भी आतंकवादी गतिविधि के अंतर्गत आएगा.
तस्करी या नकली नोटों का उत्पादन करके वित्तीय स्थिरता को नुकसान पहुंचाना भी आतंकवादी अधिनियम के अंतर्गत आएगा.
इसमें यह भी कहा गया है कि विदेश में संपत्ति को नष्ट करना, जो भारत में रक्षा या किसी सरकारी उद्देश्य के लिए थी, यह भी एक आतंकवादी गतिविधि होगी.
अब भारत में सरकारों को कुछ भी करने पर मजबूर करने के लिए किसी व्यक्ति को हिरासत में लेना या अपहरण करना भी एक आतंकवादी गतिविधि होगी.

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3) मानसिक बीमार लोगों के अपराध की सज़ा
मौजूदा आईपीसी मानसिक रूप से बीमार लोगों को अपराध के लिए सज़ा से छूट देती है.
भारतीय न्याय संहिता के पुराने संस्करण में इसे "मानसिक बीमारी" शब्द से बदल दिया गया था. अब 'विक्षिप्त दिमाग' शब्द को वापस लाया गया है.
4) अदालती कार्यवाही प्रकाशित करने पर सज़ा
बिल के नए संस्करण में एक नया प्रावधान कहता है कि जो कोई भी बलात्कार के मामलों में अदालती कार्यवाही के संबंध में अदालत की अनुमति के बिना कुछ भी प्रकाशित करेगा, उसे 2 साल तक की जेल हो सकती है और जुर्माना लगाया जा सकता है.
5) छोटे संगठित अपराध की परिभाषा
पहले के विधेयक में संगठित आपराधिक समूहों द्वारा किए गए वाहनों की चोरी, जेबतराशी जैसे छोटे संगठित अपराध के लिए दंड का प्रावधान किया गया था, अगर इससे नागरिकों में सामान्य तौर पर असुरक्षा की भावना पैदा होती हो.
अब असुरक्षा की भावना की यह अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है.

6) सामुदायिक सेवा की परिभाषा
नई 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' सामुदायिक सेवा को परिभाषित करती है.
इसमें कहा गया है कि सामुदायिक सेवा एक ऐसी सज़ा होगी जो समुदाय के लिए फायदेमंद होगी और इसके लिए अपराधी को कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाएगा.
इन विधेयकों में छोटी-मोटी चोरी, नशे में धुत होकर परेशान करना और कई अन्य अपराधों के लिए सज़ा के रूप में सामुदायिक सेवा की शुरुआत की गई थी.
हालाँकि, पहले के संस्करणों में यह अपरिभाषित था.
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