अग्निपथ योजना: क्यों चिंता में हैं 23 साल के जवान से लेकर रिटायर्ड जवान तक

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
"मेरे पापा दिल्ली में एक कंपनी में काम करते हैं. मैं उनसे पिछले सात साल से नहीं मिला. मम्मी से भी साल में एक बार मिलने जाता हूं ताकि मेरी रोज़ाना सुबह की दौड़ (प्रैक्टिस) छूट नहीं जाए. लेकिन अब तो मेरा भविष्य सीधे सीधे अंधेरे में है. आर्मी का तो सपना टूट ही गया."
दुबले-पतले, गठीले शरीर वाले 23 साल के अमित पाल हैरान, परेशान हैं. वे बिहार के आरा शहर के एच डी जैन कॉलेज में अपने हमउम्र साथियों के सामने हाथ पांव के संतुलन से होने वाले व्यायाम का प्रदर्शन तो कर रहे हैं लेकिन उनका दिमाग़ उनके साथ नहीं है.

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'मैं कहीं का ना रहूंगा'
अमित की परेशानी की वजह है केन्द्र की अग्निपथ योजना जिसने उन जैसे नौजवानों को सेना की बहाली से लगभग बाहर का रास्ता दिखा दिया है.
मूल रूप से बिहार से सटे उत्तरप्रदेश के गाज़ीपुर के रहने वाले अमित कहते हैं, "मैं अब कहीं का नहीं रहूंगा. मेरा सपना था देश सेवा का, लेकिन अब वो तो ख़त्म हो गया. साल 2019 में जब मैंने प्रक्टिस करना शुरू किया था तो 21 साल का था आज मेरी उम्र 23 साल पार कर गई. कोरोना को वक्त में दूसरे सारे एग्ज़ाम करा दिए गए लेकिन सेना की परीक्षा नहीं हुई. मैं मेडिकल और फ़िज़िकल पास करके बैठा हूं और अब तो एग्ज़ाम ही रद्द हो गया."
तीन छोटी बहनों में बड़े अमित बताते हैं, "मेरी एक बहन विकलांग है. सबसे छोटी बहन चौथी कक्षा में पढ़ती है. मेरी मम्मी-पापा सब उम्मीद करते हैं कि मैं अपनी बहनों की ज़िम्मेदारी उठाऊं, लेकिन सरकार ने तो मेरा सपना पूरा होने के क़रीब लाकर तोड़ दिया. और ये सिर्फ़ मेरी कहानी नहीं है, मेरे जैसे हज़ारों नौजवानों की है."

अग्निपथ योजना की ख़ास बातें

- 14 जून 2022 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 'अग्निपथ' योजना की घोषणा की.
- इसके तहत 90 दिनों के भीतर 46 हजार युवकों का चयन किया जाएगा. अगले चार से पांच साल में ये संख्या 50 से 60 हज़ार होगी. उसके बाद ये आंकड़ा 90 हज़ार से लेकर 1.25 लाख तक बढ़ाया जाएगा.
- भर्ती होने की उम्र 17.5 साल से 21 साल के बीच होनी चाहिए और शैक्षणिक योग्यता 10वीं या 12वीं पास.
- युवाओं के विरोध के बाद योजना के पहले बैच के लिए अधिकतम आयु सीमा दो साल बढ़ाई गई है.
- जिनका चयन होगा उन्हें 6 महीने की ट्रेनिंग दी जाएगी.
- पहले साल की सैलरी प्रति महीने 30 हज़ार रुपये होगी और चौथे साल 40 हज़ार रुपये प्रति महीने मिलेंगे.
- स्कीम के तहत भर्तीचार सालों के लिए होगी. उसके बाद सेवाकाल में प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन होगा और 25 प्रतिशत लोगों को नियमित किया जाएगा.
- जल सेना ने कहा है कि वो इसके तहत महिलाओं की भी नियुक्ति करेगी.


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'वही रहेंगे जो अफ़सर की चमचागिरी करेंगे'
आरा शहर के बड़े-बड़े मैदान इस गर्मी के मौसम में सुबह चार बजे से ही गुलज़ार हो जाते हैं.
शहर के महाराजा कॉलेज का मैदान, रमना मैदान में वीर कुंअर सिंह स्टेडियम, हवाई अड्डा मैदान में छात्र आपको सेना की बहाली के लिए कतारबद्ध होकर बेहद अनुशासित ढंग से प्रैक्टिस करते मिल जाएंगे.
पसीने से लथपथ इन हज़ारों नौजवानों में आरा के महाराणा प्रताप नगर के रोहित कुमार सिंह भी है.
वे कहते हैं, "लड़का चार साल जॉब करके करेगा क्या? जो 25 फ़ीसदी आप रिटेन करने की बात कर रहे हैं वो तो ऐसे ही लड़के होंगे जो अफ़सर की चमचागिरी करें. 75 फ़ीसदी वापस आकर करेंगे क्या? आप स्टेट गवर्नमेंट की नौकरी में ऐसे अभ्यर्थियों के लिए लो कटऑफ़ रखिए."
राजेश कुमार, सूरज कुमार और अमित कुमार ने भी नवंबर 2021 में मेडिकल और फिज़िकल परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी. ये परीक्षा पास होने की खुशी उन्हें हुई थी, अब उससे दोगुना दुख और निराशा उनके अंदर घर कर गई है.
एक साथ ये सभी बोल उठते हैं, "सरकार हमारे साथ मज़ाक़ कर रही है. हम लोग सालों प्रैक्टिस करके अपना देह गलाकर परीक्षा पास करते है और सरकार एसी कमरे में बैठकर फ़ैसला ले लेती है."

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पूर्व फौजियों की बात
ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ नौजवान छात्र जो सेना में जाने की इच्छा रखते थे, वहीं इस कश्मकश में है. कश्मकश में पूर्व फौजी भी है. खास तौर पर वो पूर्व फौजी जिनके यहां फौज में भर्ती होने की परंपरा रही है.
आरा शहर से तकरीबन पन्द्रह किलोमीटर दूर उदवन्तनगर प्रखंड के छोटा सासाराम नाम के गांव में तकरीबन हर घर में एक फौजी है.
गांव में वीर कुंअर सिंह नाम का पड़ाव है जिसके बारे में स्थानीय ग्रामीण अभय सिंह बताते हैं, "इस जगह पर 1857 के नायक वीर कुंअर सिंह की सेना ठहरी थी. यही वजह है कि हमारे गांव से आपको फौज में शुरू से ही लोग जाते हैं."
रिटायर फौजी सुरेश ठाकुर को 1971 की लड़ाई में बांग्लादेश में टंगाल नाम की जगह पर रोड ब्लॉक करने की ज़िम्मेदारी मिली थी. सात फौजियों वाले घर से आने वाले सुरेश के घर के तीन सदस्य अभी भी फौज में सेवारत हैं.
वो कहते हैं, "ये ठीक नहीं है. चार साल बाद सर्विस करके घर बैठेगा लड़का. अफ़सर को जैसे शार्ट सर्विस से लाया था वैसे ही अब सिपाही के साथ हो रहा है."

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वहीं सुरेश ठाकुर के बगल में बैठकर सुस्ता रहे कमलेश सिंह जो जनवरी 1980 में फौज में भर्ती हुए थे वो सवाल करते हैं, " सरकार चार साल के लिए सिपाही बहाल कर रही है, पांचवें साल अगर लड़ाई हो गई तो सरकार क्या करेगी? देश की फौज ऐसे चलती है क्या?"
हालांकि इन सबके बीच ऑनररी नायक सूबेदार से रिटायर हुए जय कुमार सिंह इस योजना के पक्ष में हैं.
वो कहते हैं, "लोगों के पास सीमित पैसा आएगा तो तिलक प्रथा में कमी आएगी. ज़मीन का रेट भी बहुत भाग गया है तो उस पर भी कंट्रोल आएगा."

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सेना देश का गौरव है
अग्निपथ को लेकर आ रही तमाम मीडिया रिपोर्टों में जो एक स्वर ग़ायब है वो महिलाओं का है.
अपने फौजी पति और बेटों से लंबे वक्त तक अलग रहने वाली स्त्रियां इस पर क्या सोचती है?
ये सवाल पूछने पर फौजी मनोज कुमार सिंह की पत्नी शीशमी देवी कहती हैं, "हमारा बाल बच्चा जो मेहनत कर रहा है वो सब तो बर्बाद हो जाएगा."
शीशमी देवी जिनका बेटा भी फौज में भर्ती होने की चाहत रखता है. वो कहती हैं, "सरकार को इसे वापस लेना चाहिए. हमारे पति कहते हैं और हम भी मानते हैं कि सेना देश का गौरव है. क्या इस गौरव को ही सरकार चार साल के ठेके पर डाल देगी?"
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