ओलंपिक खेलों में महिलाओं की भागीदारी कितनी बेहतर हुई, भारत का क्या है हाल

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, शारदा उगरा
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय निशानेबाज़ मनु भाकर पेरिस ओलंपिक में भले पदकों की हैट्रिक नहीं जमा सकीं, लेकिन उन्होंने महज़ तीन दिनों के अंदर दो पदक जीत कर इतिहास बनाया.
उन्होंने जब पहला पदक जीता तो इस बात की खूब चर्चा हुई कि बीते तीन ओलंपिक से भारत के लिए पदकों का खाता महिला खिलाड़ी खोल रही हैं.
साल 2016 के रियो ओलंपिक में साक्षी मलिक, टोक्यो ओलंपिक में मीरा बाई चानू और पेरिस ओलंपिक में मानु भाकर ने ये करिश्मा दिखाया.
यहां इस बात की चर्चा भी ज़रूरी है कि भारत के आख़िरी 17 ओलंपिक मेडल में से आठ यानी लगभग आधे पदक महिला खिलाड़ियों ने जीते हैं.
ओलंपिक जैसी शीर्ष खेल प्रतियोगिता में दुनिया भर की महिलाओं की सशक्त मौजूदगी महसूस की जा सकती है.
ओलंपिक खेल इतिहास में पेरिस जेंडर के हिसाब से सबसे बराबरी वाला आयोजन है.
ओपनिंग सेरेमनी में प्रत्येक देश के लिए पुरुष और महिला- दो फ्लैग बियरर का चलन इसी ओलंपिक से शुरू हुआ है.
हालांकि अल्ज़ीरियाई मुक्केबाज़ ईमान ख़लीफ़ के जेंडर को लेकर विवाद भी सुर्खियों में रहा है.

इमेज स्रोत, BBC

पेरिस ओलंपिक खेलों की आयोजन समिति की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक़- 32 में 28 खेलों में पुरुष और महिला खिलाड़ियों की भागीदारी लगभग बराबर रही है.
इस ओलंपिक में महिला खिलाड़ियों के लिए 152 मेडल इवेंट हैं जबकि पुरुषों के लिए 157 मेडल इवेंट होने हैं और 20 मिक्स्ड जेंडर इवेंट हैं.
आंकड़ों के हिसाब से यह भागीदारी 50:50 तो नहीं है लेकिन बीते 128 साल के ओलंपिक इतिहास में यहां तक पहुंचना किसी उपलब्धि से कम नहीं है. इस दिशा में अहम प्रगति बीते 24 सालों में हुई है.
दरअसल, 1992 में यह प्रावधान लागू किया गया कि अगर कोई नया खेल ओलंपिक में शामिल होता है तो उस खेल में महिलाओं की प्रतियोगिता भी होनी चाहिए.
हालांकि पुरानी खेल प्रतियोगिताओं को इस बात के लिए तैयार होने में थोड़ा ज़्यादा समय लगा.
1992 में जूडो खेल ओलंपिक में शामिल हुआ और इसमें महिलाओं के इवेंट थे. इसको छोड़ दें तो साल 2000 तक सशक्त माने जाने वाले खेलों में महिलाओं की प्रतियोगिताएं नहीं होती थीं.
ओलंपिक में वेटलिफ्टिंग, ताइक्वांडो, कुश्ती और मुक्केबाज़ी जैसे इवेंट में महिलाओं की भागीदारी साल 2000 के बाद शुरू हुईं. 2000 के ओलंपिक में ट्राइथेलन में महिलाओं की भागीदारी हुई.
2004 में सेबर फेंसिंग और 2008 में 3000 मीटर स्टीपलचेज़ में महिला एथलीटों को प्रवेश मिला.
सेबर फेंसिंग में तलवार की लंबाई बाक़ी के दो इवेंट इपी और फ्वाइल से कम होती है और तलवार के दोनों हिस्सों में ब्लेड होती है.
महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश

इमेज स्रोत, Getty Images
साल 1984 लॉस एंजिलिस ओलंपिक से पहले तक महिलाएं मैराथन में हिस्सा नहीं लेती थीं.
ओलंपिक खेलों में तैराकी की सबसे लंबी प्रतियोगिता 1500 मीटर की है, इसमें महिलाओं को टोक्यो ओलंपिक 2020 में भागीदारी मिली.
इससे पहले महिला तैराकी में सबसे बड़ी इवेंट 800 मीटर की प्रतियोगिता थी, जिसे पुरुषों के साथ ही शामिल किया गया था.
लंदन में खेले गए 2012 के ओलंपिक खेलों में महिला मुक्केबाज़ी को शामिल किया गया. इसी ओलंपिक में केवल पुरुषों वाले खेल बेसबॉल को ड्रॉप किया गया था.
एक सवाल ये भी है कि क्या पुरुष और महिला, हर खेल के सभी इवेंट में हिस्सा ले सकते हैं.
उदाहरण के लिए आर्टिस्टिक जिमनास्टिक में, महिलाएं अभी पैरलल बार, रोमन रिंग्स और पोमेल हाउस जैसे इवेंट में हिस्सा नहीं लेती हैं, वहीं पुरुष बैलेंस बीम और अनइवन बार में हिस्सा नहीं लेते.
लंदन ओलंपिक में पहली बार सभी दलों में महिला और पुरुष भागीदारी को अनिवार्य बनाया गया.
इस हिसाब से देखें तो ये बदलाव हाल फिलहाल के हैं और इसके बाद अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने इसे लगातार बढ़ावा दिया है.
आईओसी ने यह भी सुनिश्चित किया है कि खेल के इर्द गिर्द महिला खिलाड़ियों की चर्चा हो, ख़ासकर परंपरागत समाज में.
उदाहरण के लिए 2014 में, आईओसी के तत्कालीन अध्यक्ष थामस बाक इंचोअन एशियाई खेलों से 10 दिन पहले सऊदी अरब पहुंच गए.
वहां उन्होंने सऊदी अरब के ओलंपिक संघ प्रमुख से मिलकर यह जानना चाहा कि 199 खिलाड़ियों के मज़बूत दल में महिला खिलाड़ियों की भागीदारी क्यों नहीं है.
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने क्या किया?

इमेज स्रोत, Getty Images
सऊदी अरब ने लंदन ओलंपिक में दो महिला एथलीट भेजे. लेकिन फिर ऐसा लगा कि सऊदी अरब में यह अभियान पटरी से उतर गया क्योंकि उन्होंने नानजिंग यूथ ओलंपिक और एशियन गेम्स में कोई महिला एथलीट नहीं भेजा.
लेकिन पेरिस ओलंपिक में सऊदी अरब के नौ सदस्यीय दल में तीन महिला शामिल हैं और वे एथलेटिक्स, तैराकी और ताइक्वांडो में हिस्सा ले रही हैं.
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ना केवल खेल बल्कि अपने संगठन में भी महिलाओं को बराबरी के मौके देने के लिए अभियान चला रहा है.
महिला खिलाड़ियों के अलावा महिला कोच, महिला प्रशासक और महिला प्रसारकों की संख्या बढ़ाने के लिए काम किया गया है.
टोक्यो ओलंपिक 2020 में कुल एथलीटों में 48 प्रतिशत महिलाएं थीं, लेकिन महिला कोचों की संख्या महज 13 प्रतिशत थी.
इसे देखते हुए आईओसी ने वीमेन इन स्पोर्ट्स हाई परफॉर्मेंस पाथवे कार्यक्रम चलाया और इसके ज़रिए अब तक 100 महिला कोच तैयार किए गए हैं जिनमें 10 महिला कोच पेरिस ओलंपिक में अपनी ज़िम्मेदारी निभा रही हैं.
आईओसी संगठन के अंदर 2013 में महिलाओं की भागीदारी महज़ 21 प्रतिशत थी, जो 2023 में बढ़कर 42.3 प्रतिशत हो चुकी है.
आईओसी ने कहा है कि पेरिस ओलंपिक के बाद उनके निर्णायक बोर्ड में महिलाओं की हिस्सेदारी 46.7 प्रतिशत हो जाएगी. यह निर्धारित योजना और आईओसी की लगातार कोशिशों से संभव हो सकता है. हालांकि कई देशों में अभी भी वास्तविकता में हालात बहुत बेहतर नहीं हुए हैं.
महिला भागीदारी के मामले में भारत

इमेज स्रोत, Getty Images
भारत इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है. भारतीय महिलाओं की भागीदारी पिछले कुछ ओलंपिक में लगातार बढ़ी है.
2000 के सिडनी ओलंपिक में भारत की ओर से 21 महिला खिलाड़ी शामिल हुई थीं. 2004 के एथेंस ओलंपिक में 25, 2008 के बीजिंग ओलंपिक में 22 और 2012 के लंदन ओलंपिक में 23 महिलाओं ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था.
रियो और टोक्यो ओलंपिक में भारतीय महिला टीम हॉकी में शामिल हुई तो महिला खिलाड़ियों की संख्या क्रमश: 51 और 53 तक पहुंच गई. पेरिस में महिला हॉकी टीम हिस्सा नहीं ले रही है, इसके बावजूद भारतीय दल में 47 महिला खिलाड़ी शामिल थीं.
मनु भाकर एक ही ओलंपिक में दो मेडल जीतने वाली स्वतंत्र भारत की पहली खिलाड़ी बन गई हैं. उनकी कामयाबी ने भारत की बेटी और नारी शक्ति के नारे को सशक्त किया है.
सिर्फ भागीदारी बढ़ाने से नहीं चलेगा काम

इमेज स्रोत, Getty Images
पेरिस में मिलने वाली कामयाबी से इतर देश के अंदर महिला खिलाड़ियों की स्थिति में बहुत सुधार नहीं दिखता.
वैसे कहने को पीटी ऊषा भारतीय ओलंपिक संघ की प्रमुख हैं जबकि एमसी मैरीकॉम भारतीय ओलंपिक संघ एथलेटिक्स कमीशन की प्रभारी हैं.
भारतीय खेल जगत की दो दमदार एथलीटों का क़द पावर क्रम में उतना ऊंचा है नहीं, जितना हमलोग सोचते हैं.
जब भारत के पहलवान सड़कों पर विरोध प्रदर्शन के लिए उतरे थे, तो इन दोनों चैंपियन एथलीटों की प्रतिक्रिया डरी सहमी जैसी रहीं.
दोनों बोले मगर कुश्ती संघ के तत्कालीन अध्यक्ष के बचाव में बोले, जिनका बचाव सत्ता प्रतिष्ठानों की ओर से भी हो रहा था.
इस उदाहरण से भारतीय खेलों में महिलाओं की स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. इस स्थिति को बदलने के लिए कामयाबी और मेडल काफ़ी नहीं होंगे, इससे ज़्यादा ज़ोर लगाने की ज़रूरत है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












