राजस्थान में वसुंधरा राजे अगर नहीं तो फिर मुख्यमंत्री पद के लिए बीजेपी का चेहरा कौन?

वसुंधरा राजे सिंधिया

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    • Author, त्रिभुवन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

बीजेपी की नेता और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने झालावाड़ में एक जनसभा में अपने सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह के भाषण और उस पर जनता के रिस्पांस की तारीफ़ें करते हुए कहा, 'झालावाड़ ने सांसद दुष्यंत सिंह को इतना सिखा दिया है कि अब मैं रिटायर हो सकती हूँ.'

उनके भाषण में इतनी सी बात सुनकर बीजेपी के भीतर काफ़ी हलचल होने लगी और उनका यह बयान वायरल हो गया.

लेकिन वसुंधरा राजे ने अगले दिन झालारापाटन से नामांकन दाख़िल करने के दौरान कहा, ''मैं रिटायर होने वाली नहीं हूँ. सेवा का कर्म जारी रहेगा. मैंने सांसद दुष्यंत सिंह की राजनीतिक परिपक्वता से खु़श होकर माँ के नाते कहा कि वे झालावाड़-बारां में अच्छा काम कर रहे हैं.''

लेकिन यह सवाल एक सहज जिज्ञासा के रूप में इस बार शुरू से ही पूछा जा रहा है, यह बताइए, अगर वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं होती हैं तो फिर कौन?

वजह ये कि इस बार पार्टी हाईकमान ने उन्हें चेहरा घोषित नहीं किया है. उनके बारे में उठ रहे इस सवाल पर सामने वाला शख़्स जवाब देता है: आपने फ़ैज़ की वह ग़ज़ल का वह शेर सुना है?

कौन सा?

अब किसी लैला को भी इकरारे-महबूबी नहीं,

इन दिनों बदनाम है, हर एक दीवाने का नाम.

वाक़ई यह बहुत सटीक उपमा है उस परिस्थिति के लिए, जो इन दिनों राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को अंदर ही अंदर मथ रही है. ऐसा कोई दिन और भूभाग नहीं, जहाँ यह प्रश्न न पूछा जा रहा हो.

अब लगभग पूरे टिकट बँट चुके हैं और बिसात बिछ चुकी है; लेकिन यह तय नहीं है कि बीजेपी की सरकार बनेगी या कांग्रेस की. यह भी तय नहीं कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा?

इसके बावजूद "मुख्यमंत्री कौन' वाला प्रश्न मानो हर रिंद, हर साकी, हर खुम, हर पैमाने और हर मयखाने का सवाल हो गया है.

और मज़ेदार क़िस्सा ये है कि अब छोटे-बड़े हर नेता के आसपास के लोग इलाक़ों में चुनाव जीतने का ज़ोर लगाते हुए कहने लगे हैं, ‘आप ज़ोर लगाओ. इस बार साहब या मैम का नंबर आ सकता है!’

और इस तरह इस दौड़ में बहुत से चेहरे दिखाई देते हैं. सुंधरा राजे के चेहरा घोषित होते ही जो बहुत नेता हाशिए पर दिखाई देते थे, अब उनके लिए बहारों के इम्कान बहुत रौशन हैं.

हमने पार्टी के कुछ मज़बूत और संभावित माने जा रहे चेहरों पर नज़र दौड़ाई तो राजस्थान की नई जम्हूरियत का जुग़राफ़िया कुछ यों सामने आया.

ओम बिड़ला : क्वांटम लीप वाले नेता

ओम बिड़ला

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ओम बिड़ला अभी लोकसभा स्पीकर हैं. कोटा से हैं. उम्र 60 साल है. सहकारिता के आंदोलन से निकले. पहली बार 2003 में कोटा दक्षिण से विधायक बने और कांग्रेस के दिग्गज नेता शांति धारीवाल को हराया.

इस समय वे विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ रहे; लेकिन राजनीतिक प्रेक्षक उन्हें "ब्लैक होर्स' या छुपा रुस्तम मान रहे हैं.

कोटा के कॉमर्स कॉलेज से वाणिज्य में पीजी हैं. दो बेटियों के पिता हैं. वे 2003 से 2008 के दौरान वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री काल में संसदीय सचिव रहे.

बिड़ला 2008 और 2013 में फिर विधायक बने. लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में राजे ने उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया.

2014 में उन्हें लोकसभा का टिकट मिला तो वे सांसद निर्वाचित हुए. वे 2019 के चुनाव में फिर चुने गए.

साल 2019 में उन्हें लोकसभा का स्पीकर चुना गया तो न केवल अन्य दलों के नेताओं, बल्कि बीजेपी के अंदरूनी हलकों में भारी हैरानी महसूस की गई. यह उनके लिए एक तरह क्वांटम लीप जैसा मामला था.

बीजेपी के बड़े नेताओं से लेकर संघ के भीतर तक उनकी बहुत अच्छी पैठ है और वे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भरोसेमंद हैं.

वे ऊपर से सामान्य भले दिखें, लेकिन गहरे नेता हैं और ज़मीनी पैठ और पकड़ वर्टिकली और हॉरिजेंटली मज़बूत है.

दीयाकुमारी: सुबह फूटी तो आसमां पे तेरे

दीया कुमारी

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जयपुर के पूर्व राजपरिवार की बेटी. उम्र 52 साल. पिता ब्रिगेडियर भवानी सिंह, जो कांग्रेस से जुड़े रहे और उन्हें बीजेपी के गिरधारी लाल भार्गव ने हराया था.

जयपुर के आख़िरी महाराजा और आज़ाद भारत में राजस्थान के राज प्रमुख रहे मानसिंह द्वितीय की पोती और गायत्रीदेवी की पोती.

गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टी की नेता रहीं और इंदिरा गांधी से उनकी ख़ूब ठनी रही.

माँ पद्मिनी देवी और पिता भवानी सिंह प्रसिद्ध होटल व्यवसायी भी. वे जयपुर, दिल्ली और लंदन के बेहतरीन स्कूलों में पढ़ीं. तीन संतानों की माँ.

वे जयपुर के सिटी पैलेस में रहती हैं और आमेर के ऐतिहासिक जयगढ़ क़िले, महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय म्यूज़ियम ट्रस्ट और कई स्कूलों का संचालन करती हैं.

उन्होंने 2013 में बीजेपी की सदस्यता ली थी. वह दिन 10 सितंबर का था और जयपुर में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली थी.

उस दिन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर राजनाथ सिंह भी रैली में थे.

साल 2013 में उन्हें जयपुर के बजाय सवाई माधोपुर विधानसभा सीट से चुनाव में उतारा गया और उन्होंने बीजेपी से तब बाग़ी हुए डॉ. किरोड़ी लाल मीणा को हराया.

उस साल दीया का सवाई माधोपुर से टिकट चौंकाने वाला था.

दीयाकुमारी को दूसरी बार चौंकाते हुए उस राजसमंद लोकसभा सीट पर भेजा गया, जिसमें हल्दीघाटी का इलाक़ा आता है, जहाँ कभी जयपुर राजपरिवार के राजा मानसिंह अकबर के सेनापति के तौर पर महाराणा प्रताप को हराने के लिए गए थे.

लेकिन अब हल्दीघाटी वाले उस इलाक़े ने मेवाड़ के कांग्रेसी राजपूत गोपाल सिंह ईडवा के माथे के बजाय कच्छवाहा घराने की इस बेटी के माथे पर तिलक करना मुनासिब समझा.

यह उन लोगों को भी जवाब था, जो मानसिंह बनाम महाराणा प्रताप का मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे थे.

पार्टी ने इस बार उन्हें उस विद्याधर नगर से टिकट देकर चौंका दिया, जहाँ भैरोसिंह शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी तीन बार से लगातार विधायक बन रहे थे.

पार्टी के एक वरिष्ठ और पुराने नेता बताते हैं, वे इसलिए भी मुख्यमंत्री का चेहरा हो सकती हैं; क्योंकि महारानी को राजकुमारी से रिप्लेस करना कहीं मुफ़ीद रहेगा. ग्लोरी में समान और महिला को हटाने का प्रश्न भी नहीं.

बाबा बालकनाथ : धर्म का कमंडल और जाति का मंडल

बाबा बालकनाथ

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इमेज कैप्शन, चुनाव प्रचार के दौरान बाबा बालकनाथ

अलवर ज़िले की तिजारा सीट पर बीजेपी के प्रत्याशी. रोहतक स्थित अस्थल बोहर नाथ आश्रम के महंत. फ़िलहाल अलवर से सांसद. धर्म गुरु, लेकिन जाति से यादव यानी मूल ओबीसी.

कांग्रेस के दिग्गज नेता भंवर जितेंद्र सिंह को पराजित किया. वे बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी हैं. वे कई सौ साल पुराने अस्थल बोहर मठ के आठवें महंत हैं.

बीजेपी की राजनीति में बहुत तेज़ी से आगे बढ़ने वाले नेताओं में वे प्रमुख हैं.

वे महंत और तत्कालीन सांसद चांदनाथ के शिष्य हैं. महंत चांदनाथ ने अपनी मृत्यु से पहले ही उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था.

इस मौक़े पर हुए समारोह में योग गुरु बाबा रामदेव और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विशेष तौर पर मौजूद थे.

वे महज 39 साल के हैं ओर 2016 में ही राजनीति में आए हैं. वे बाबा रामदेव की तरह यादव हैं और मूल ओबीसी का प्रतिनिधित्व करते हैं.

वे कांग्रेस की ओर से बीजेपी के हिंदुत्व की काट के तौर पर फेंके गए रणनीतिक पासे जाति जनगणना के विकल्प की राजनीति में एकदम फ़िट हैं.

बाबा बालकनाथ अलवर ज़िले के बहरोड़ तहसील के कोहराना गाँव में 16 अप्रैल 1984 को सुभाष यादव और उर्मिला देवी के यहाँ पैदा हुए थे.

वे महज साढ़े छह साल की उम्र में संन्यासी हो गए थे. उनका नाम खेतानाथ ने ही बालकनाथ रखा था.

महंत ब्रह्मलीन हुए, तो सांसद महंत सोमनाथ ने गद्दी संभाली और उन्हें रोहतक आश्रम में शिक्षा के लिए भेज दिया गया. इसके बाद वे हनुमानगढ़ ज़िले के थेड़ी स्थित नाथ आश्रम में भी रहे और शिक्षा ली.

बालकनाथ को अलवर लोकसभा का टिकट मिला तो भारी बहुमत से जीते और चर्चित रहे.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी नाथ संप्रदाय के योगी हैं, लेकिन वे जाति से राजपूत हैं.

बाबा बालकनाथ यादव हैं. यादव मूल ओबीसी की जाति है और जाट-बिश्नोई-सिख आदि उच्च ओबीसी के बरक्स वंचित ओबीसी का प्रतिनिधित्व करती है.

अभी तक उन पर कोई आरोप-प्रत्यारोप नहीं है और वे विवादों से परे हैं. विनम्र हैं.

लेकिन धार्मिक कट्‌टरता की राजनीति में इसलिए आसानी से फ़िट होते हैं कि मेवों से उनका संघर्ष लगातार हो रहा है.

अलवर के मूर्ति तोड़ने वाले प्रकरण में वे काफ़ी चर्चा में रहे थे और उन्होंने सरकार और स्थानीय प्रशासन के ख़िलाफ़ लोगों को एकजुट भी किया.

वे जितने हरियाणा में जुड़े हैं, उतने ही राजस्थान में भी. लेकिन इन दोनों राज्यों की सरहद को छूते उत्तर प्रदेश की यादव आबादी को भी वे कमोबेश प्रभावित करते हैं.

राजेंद्र राठौड़ : जातियों के पेचोख़म में नक्शो-निग़ारी के माहिर

राजेंद्र राठौड़

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इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ राजेंद्र राठौड़ (दाएं) - फाइल फोटो

नेता प्रतिपक्ष और चूरू से विधायक. उम्र 68 साल. राजस्थान विश्वविद्यालय के चर्चित छात्र नेता. जनता पार्टी से जुड़े और समाजवादी छात्र आंदोलन की उपज.

राजनीति में आने की अदमनीय ललक ऐसी थी कि जनता पार्टी के बुरे दौर में भी 1980 में जयपुर के बनीपार्क से इसी दल के टिकट पर चुनाव लड़ बैठे और महज 2031 वोट मिले.

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और ऐसी राजनीति में ज़िद की ऐसी रार ठानी कि 1985 में उन्होंने चूरू से कांग्रेस की दिग्गज नेता हमीदा बेगम को चुनौती दी.

वे हार गए, लेकिन 1990 में जनता दल की टिकट पर चुनाव जीत गए और इसके बाद उन्होंने कभी हार का मुँह नहीं देखा.

अब वे सातवीं बार विधायक हैं. वे बीजेपी में 1993 में आए और भैरोसिंह शेखावत के विश्वासपात्र लोगों में शामिल हो गए. वे उनके मंत्रिमंडल में चिकित्सा मंत्री बने.

भैरोसिंह शेखावत बाद में उपराष्ट्रपति बने तो राठौड़ वसुंधरा राजे के क़रीब आ गए और लगातार उनके संकटमोचन की भूमिका में रहे.

राठौड़ जातियों के पेचोख़म में सियासत की नक्शो-निग़ारी के माहिर हैं और जोड़तोड़ बिठाने में उनका कोई सानी नहीं.

सीबीआई ने 2016 में उन्हें दारा सिंह मुठभेड़ प्रकरण में गिरफ़्तार किया और और उन्हें जेल तक जाना पड़ा, लेकिन वे निचली अदालत के बाद सुप्रीम कोर्ट से भी बरी हो गए.

1987 में वे रूप कंवर सती प्रकरण के गौरवान्वयन में भी गिरफ़्तार हुए. यह मामला उनका पीछा 2004 तक करता रहा.

वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री के दोनों कार्यकाल में काफ़ी पावरफुल मंत्री रहे. लेकिन जैसे ही दिल्ली में बीजेपी का शक्ति संतुलन नए सिरे से तय हुआ तो वे दिल्ली के भी क़रीब हो गए और कांग्रेस की सरकार बनने पर वे उप नेता प्रतिपक्ष बनाए गए.

नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया रहे. कटारिया के असम का राज्यपाल बनने पर राठौड़ को कुछ समय बाद ही नेता प्रतिपक्ष बना दिया गया.

राजस्थान की राजनीति में भैरोसिंह शेखावत और अशोक गहलोत की शैली वाली राजनीति में वे काफ़ी फ़िट हैं और लोगों से उनका जुड़ाव काफ़ी सशक्त है.

राजेंद्र राठौड़

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वे हिंदू मुसलमान की राजनीति नहीं करते. चूरू का बड़ा मुस्लिम तबका बीजेपी में होने के बावजूद उन्हें वोट करता रहा है. वोटों पर उनकी पकड़ ज़बरदस्त है.

राजस्थान की राजनीति जाट बनाम राजपूत के बीच बहुत बार विभाजित रही है, लेकिन राठौड़ उन गिने चुने नेताओं में हैं, जो जाटों में भी अपना पूरी दख़ल रखते हैं.

अभी वे अमित शाह के बहुत क़रीब माने जाते हैं. बीजेपी सत्ता में हो या न हो, सदन में पार्टी का फ़्लोर मैनेजमेंट वे जिस ख़ूबी से करते हैं, वह उनकी अलग जगह बनाता है.

उनके दोस्त जहाँ बीजेपी से बाहर भी बड़ी तादाद में हैं, वहीं उनके शत्रु पार्टी के भीतर भी बहुत हैं.

उन्हें संघ विरोधी प्रचारित किया जाता रहा है. लेकिन एक कामयाब नेता की सारी खू़बियों वाला यह नेता सियासत की काली सिल पर बहुत बार और बहुत तरह से बहुतेरे नेताओं के हाथों पिस-पिसकर पारंगत हुआ है.

अशोक गहलोत ने सचिन पायलट पर जो तंज़ कसा था कि उनकी अभी रगड़ाई और घिसाई नहीं हुई है तो इस मामले में राठौड़ घिस-घिसकर यहाँ तक पहुँचे हैं.

विधानसभा में उनके भाषण बहुत नपे तुले और कांग्रेस तक के युवा नेताओं को लुभाने वाले रहते हैं. पीढ़ीगत बदलाव में वे मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदारों में एक हैं.

फ़िलहाल वे चूरू ज़िले की तारानगर सीट पर कांग्रेस के खांटी जाट नेता नरेंद्र बुडानिया के साथ मुक़ाबले में हैं; लेकिन यह चुनाव उनके लिए चुनौतियों से भरा है.

सतीश पूनिया : संघनिष्ठ लॉबी के लाडले

सतीश पूनिया

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बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे पूनिया 2018 में पहली बार आमेर से विधायक बने. वे 2019 में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष मदनलाल सैनी के निधन के बाद अध्यक्ष बनाए गए.

यह वह दौर था जब वसुंधरा राजे के विरोध के चलते बीजेपी की केंद्रीय हाईकमान गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेश अध्यक्ष बनाने में कामयाब नहीं हो सकी थी.

पूनिया 23 मार्च 2023 तक अध्यक्ष रहे. प्रेक्षकों का मानना है कि राजपूत राजेंद्र सिंह राठौड़ के नेता प्रतिपक्ष रहते जाट पूनिया को विधानसभा में उप नेता प्रतिपक्ष बनाना उनके समुदाय को पच नहीं रहा है.

फ़िलहाल वे उप नेता प्रतिपक्ष हैं. चूरू के राजगढ़ के एक छोटे गाँव के किसान परिवार में जन्मे पूनिया भूगोल में एमएससी और पीएचडी हैं.

पूनिया 1982 में एबीवीपी से जुड़े और आरएसएस की पाठशालाओं में वैचारिक रूप से ढले.

1998 में जब बीजेपी की सरकार बुरी तरह हारी, तो पूनिया ने युवा नेता के तौर पर 550 किलोमीटर की एक पदयात्रा की. वे नौ लोकसभा क्षेत्रों, 34 विधानसभा इलाक़ों और 225 गाँवों तक पहुँचे.

वे 2004 से 2006 तक पार्टी में मंत्री रहे. 2011 में वे आडवाणी की यात्रा के स्टेट कन्वीनर बने.

लेकिन उनकी पहचान एक गंभीर युवा नेता के रूप में तब बनी जब राजस्थान में वसुंधरा राजे के पहले मुख्यमंत्री काल में संघनिष्ठों और सत्तानिष्ठों में ठनी.

वे संघनिष्ठों के साथ रहे और बिल्कुल नहीं टूटे. इसी वजह से बाद में वे संघ की एक मज़बूत लॉबी के प्रिय भी रहे और स्थापित भी हुए.

पूनिया वैचारिक तौर पर संघ के साँचे में ढले हैं, लेकिन एक उदार नेता सा व्यवहार करते हैं.

वे संघ के प्रचारकों की तरह न तो घुन्ने हैं और न ही लोगों के साथ वे दूरी बनाकर रखते हैं. वे एक कामयाब प्रदेश अध्यक्ष रहे.

हालाँकि करोड़ीलाल मीणा जैसे कुछ नेताओं से उनका तीखा विवाद भी रहा. वे अपनी जातिगत मतदाताओं में भी लोकप्रिय हैं और उसके बाहर भी. वे अच्छे भाषण देते हैं.

उनका स्वभाव मजाक़िया है और वे गंभीर से गंभीर मौक़ों पर माहौल को हल्का बनाने की कूव्वत रखते हैं. संघ के कई बड़े नेताओं की पसंद पूनिया हैं.

पिछले दिनों जब राजेंद्र सिंह राठौड़ और वसुंधरा राजे के बीच तक़रार हुई और राजे रूठ गईं तो माना जाता है कि राजे से मान-मनौवल करने वाले वही थे. प्रेक्षकों के अनुसार पूनिया एक संजीदा नेता हैं.

गजेंद्र सिंह शेखावत : सियासत की नई रंगत

गजेंद्र सिंह शेखावत

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गजेंद्र सिंह शेखावत राजस्थान की सियासत की एक नई रंगत हैं. वे तेज़ी से चमके सितारे हैं.

वे भी दीया कुमारी और अर्जुन मेघवाल आदि की तरह अच्छे दिनों की उपज हैं और उन्हें बीजेपी के बुरे दिनों का अनुभव नहीं है.

इन दिनों कांग्रेस के नेताओं को छाँट-छाँटकर बीजेपी में भर्ती करने और पर्दे के पीछे के बहुत से काम करते हुए ग़ुलों में रंग भरने का काम कर रहे हैं.

अगर इस चुनावी दौर में कोई खुले तौर पर बीजेपी का चेहरा नज़र आ रहा है तो वह शेखावत का ही है.

गजेंद्र सिंह शेखावत ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को पटखनी दी है और इस समय गहलोत और शेखावत के बीच रिश्ते बहुत कटुतापूर्ण हैं.

ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब दोनों एक दूसरे के ख़िलाफ़ तीखी प्रतिक्रिया नहीं देते.

शेखावत जोधपुर के जयनारायण विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष रहे हैं और उनकी पहचान वहाँ के एक कामयाब और तेज़ तर्रार डिबेटर के रूप में रही है.

वे कॉरपोरेट कल्चर में ढले हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान अपने कुशल पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशनों से काफ़ी बार खींच चुके हैं.

बास्केट बॉल का खिलाड़ी रहा यह राजनेता इस समय राजनीति का ऊँचा खिलाड़ी है और पार्टी के भीतर वसुंधरा राजे और पार्टी के बाहर अशोक गहलोत के ख़िलाफ़ खुले लड़ रहा है.

सियासत की यही वो नब्ज़ है, जो शेखावत और पायलट की राजनीति को हमकलाम करती है.

अशोक गहलोत सरकार को जब गिराए जाने की कोशिशें करने के आरोप लगे तो शेखावत विवादों में आए और उनकी कांग्रेस नेता भंवरलाल शर्मा से बातचीत की तथाकथित ऑडियो सीडी क्लिप का प्रकरण बहुत चर्चा में रहा.

उन्हें सियासत में बहुत महत्वाकांक्षी माना जाता है और बक़ौल एक प्रेक्षक उन पर सबसे बड़े पद की चाह का इल्ज़ाम पिछली वसुंधरा राजे सरकार के समय से ही है.

लेकिन राजे ने उन्हें तिल भर भी हाथ नहीं धरने दिया. उस समय भले वे नाकाम हो गए हों, लेकिन नाउम्मीद कभी नहीं हुए. वे गाहे-बगाहे राजधानी और प्रदेश के बाक़ी हिस्सों में डेरा डाले रहते हैं

अर्जुन मेघवाल : सियासी रंगत बदल चुकी है अब

अर्जुन मेघवाल

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पूर्व आईएएस और केंद्रीय क़ानून और न्याय मंत्री अर्जुन मेघवाल बीकानेर से सांसद हैं और पार्टी का दलित चेहरा हैं.

वे अपने आपको बहुत आगे नहीं रखते और पीछे की पंक्ति में रहकर आगे रहने की कोशिश करते हैं.

उनके साथ ख़ास बात ये है कि प्रदेश के दलितों में उनकी जाति के सबसे अधिक वोट हैं; लेकिन वे शुरू से अपने समुदाय और दलितों में यह संदेश देते रहे हैं कि दर्द का चाँद बुझ गया, हिज़्र की रात ढल गई.

ब्यूरोक्रेसी में रहने के दौरान भी एक सहज नेता जैसी छवि रखने वाले अर्जुन मेघवाल ज़मीन से जुड़े हैं और प्रदेश में अपनी बिरादरी के अकेले ऐसे व्यक्ति हैं, जो उस पद तक पहुँचे हैं, जहाँ कभी बीआर आंबेडकर रहे थे.

मूलत: उद्योग विभाग की सेवा से आए और प्रदेश के विभिन्न ज़िलों में ज़मीनी सच्चाइयों से वाक़िफ़ मेघवाल असल में राजनीति के अर्जुन नहीं, लेकिन वे सत्ता के रथ पर एक प्रभावी भूमिका में हैं.

वे बीजेपी में आए तो वहाँ कांग्रेस की तरह अनुसूचित जाति के नेताओं की लंबी भीड़ नहीं थी. लिहाजा, उन्हें तेज़ी से आगे बढ़ने का मौक़ा मिला और अपने दोस्ताना स्वभाव से जगह बनाने में क़ामयाब रहे.

और ये भी नाम रहते हैं चर्चा में

अश्विनी वैष्णव

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कई केंद्रीय मंत्रियों के नाम भी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में माने जा रहे हैं. इनमें अर्जुन मेघवाल और अश्विनी वैष्णव के नाम तो हैं ही, लोग भूपेंद्र यादव तक को याद करके कहते हैं, ‘उनकी भी तो जड़ें राजस्थान में हैं और वे अजमेर से हैं.’

पूर्व मंत्री अरुण चतुर्वेदी को टिकट मिलता तो वे भी दावेदारों में माने जाते. अलबत्ता, प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी का नाम ब्राह्मण दावेदारों के रूप में सामने आता है.

चित्तौड़गढ़ से सांसद सीपी जोशी को तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजस्थान की चुनावी सभाओं में अपनी खुली जीप पर साथ रखे रहे. इससे उनका क़द बहुत बढ़ गया और वे तेज़ी से चर्चाओं में आए.

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के महामंत्री संगठन रहे सुनील बंसल का नाम भी बार-बार लिया जाता है.

वे फ़िलहाल पार्टी के महामंत्री और ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल के प्रभारी हैं.

राजस्थान की राजनीति से वे आज भी गहरे जुड़े हुए हैं.

राजस्थान में एक बहुत पुराना नाम है ओम प्रकाश माथुर. वे नरेंद्र मोदी के बहुत क़रीब रहे हैं और उनका गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले से याराना रहा है. वे भी बहुत बार इस पद के लिए चर्चित रहते हैं.

लेकिन एक चौंकाने वाला नाम बार-बार आता है और वह है प्रकाशचंद्र का. प्रकाशचंद्र संघ के स्वयंसेवक हैं और वे मौन रहकर मुखर राजनीति करने में दक्ष हैं.

प्रकाशचंद्र, वसुंधरा राजे के पहले मुख्यमंत्री काल के समय पार्टी के महामंत्री संगठन थे और दोनों के रिश्ते आख़िर में बेहद कड़वाहट भरे रहे.

पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने जब सरकार चले जाने पर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और प्रदेश अध्यक्ष ओम माथुर के साथ-साथ महामंत्री संगठन से इस्तीफ़ा देने को कहा तो जोधपुर जाने की तैयारियाँ कर रहे प्रकाशचंद्र ने तत्काल अपने मोबाइल की सिम निकालकर जेब में डाली, पार्टी का हैंडसेट दफ़्तर में जमा करवाया, धोती कुर्ते वाला अपना थैला उठाया और फ़कीराना अंदाज़ में स्टेशन निकल गए.

वे अब पुन: चर्चा में आए हैं और फ़िलहाल संघ बीजेपी की राजनीति में एक प्रभावी कामयाब भूमिका में हैं.

केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव एमबीएम इंजीनियरिंग कॉलेज जोधपुर के स्नातक हैं और आईएएस बनने के बाद ओडिशा कैडर में चले गए.

वे मूल रूप से ओबीसी से संबंधित हैं; लेकिन 'उच्च' जातियों के साथ भी उनका समान तालमेल है. प्राय: उनका नाम भी सीएम पद की दौड़ में आता रहता है.

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