अमेरिका के साथ कारोबार में भेदभाव से जुड़े ट्रंप के दावे कितने सही

ट्रंप

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    • Author, बेन चू
    • पदनाम, बीबीसी वेरिफ़ाई

डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी टीम से कहा है कि वह अमेरिका में आने वाले सामानों पर नए टैरिफ़ लगाने की योजना पेश करें.

ट्रंप बाकी देशों पर "रेसिप्रोकल टैरिफ़" या बराबर टैरिफ़ लगाना चाहते हैं यानी उन देशों के सामानों पर उतना ही आयात शुल्क लगाना जितना वे अमेरिकी सामानों पर लगाते हैं.

राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि अन्य देश अमेरिकी सामानों के आयात पर, अमेरिका को निर्यात होने वाले अपने सामानों की तुलना में अधिक टैरिफ़ लगाते हैं. ट्रंप का मानना है कि अमेरिका के "व्यापारिक साझेदार अमेरिका के साथ भेदभाव करते हैं और ऐसा दोस्त और विरोधी, दोनों तरह के देश करते हैं."

बीबीसी वेरिफ़ाई ने ये जानने की कोशिश की है कि ट्रंप के इन दावों में कितना दम है.

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आयात पर टैरिफ़ कैसे तय होता है?

पहले तो वैश्विक व्यापार को समझना महत्वपूर्ण है.

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की सदस्यता की शर्तों के तहत देशों को आयात पर टैरिफ़ लगाने की इजाज़त है.

ये टैरिफ़ अलग-अलग आयात होने वाले सामानों पर अलग-अलग हो सकता है.

उदाहरण के लिए एक देश चावल के आयात पर 10% और कारों के आयात पर 25% टैक्स लगा सकता है.

लेकिन डब्ल्यूटीओ के नियमों के मुताबिक, किसी एक ही वस्तु के अलग-अलग देशों से आयात पर लगाये जाने वाले टैरिफ़ में भेदभाव नहीं किया जा सकता है.

उदाहरण के लिए मिस्र को इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती कि वह रूस से आयात किए जाने वाले गेहूं पर 2 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाए और यूक्रेन से आने वाले गेहूं पर 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगा दे.

इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन (एमएफ़एन) के सिद्धांत के तौर पर जाना जाता है. यानी टैरिफ़ लगाने वाले देश द्वारा हर देश पर बराबर टैरिफ़ लगाना होगा.

लेकन जब दो देश आपस में मुक्त व्यापार समझौता करते हैं जिसमें व्यापार का अधिकांश हिस्सा शामिल होता तो यह सिद्धांत अपवाद होता है. इन स्थितियों में वे एक दूसरे के सामान पर कोई टैरिफ़ नहीं भी लगा सकते हैं लेकिन दुनिया के बाकी देशों से आने वाली वस्तुओं पर टैरिफ़ लगा सकते हैं.

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हालांकि अधिकांश देश अलग-अलग आयातित वस्तुओं पर अलग-अलग टैरिफ़ लगाते हैं, लेकिन वे डब्ल्यूटीओ को अपने औसत टैरिफ़ के बारे में जानकारी देते हैं, जो कुल आयात पर लगने वाले टैरिफ़ दर का औसत होता है.

साल 2023 में अमेरिका का औसत बाहरी टैरिफ़ 3.3% था.

यह ब्रिटेन के 3.8% टैरिफ़ दर से थोड़ा कम था.

यह यूरोपीय संघ के 5% टैरिफ़ और चीन के 7.5% से काफ़ी नीचे था.

अमेरिका का औसत टैरिफ़, इसके अन्य कुछ व्यापारिक साझेदारों के मुक़ाबले काफ़ी कम है.

उदाहरण के लिए भारत का औसत टैरिफ़ 17% है, जबकि दक्षिण कोरिया का 13.4% है.

अमेरिका का औसत टैरिफ़ मैक्सिको (6.8%) और कनाडा (3.8%) से कम है, हालांकि इन देशों से अमेरिका के व्यापारिक समझौते का मतलब है कि अमेरिका इन देशों को होने वाले अमेरिकी निर्यात पर टैरिफ़ नहीं लगाता.

दक्षिण कोरिया के साथ यही बात सही है, जिसके साथ अमेरिका का मुक्त व्यापार समझौता है.

लेकिन आम तौर पर कहा जाए तो ट्रंप का ये कहना सही है कि अमेरिका के मुकाबले कुछ देशों का आयात पर औसत टैरिफ़ अधिक है.

और इन टैरिफ़ दरों के चलते अधिकांश अमेरिकी निर्यात उन देशों में महंगे पड़ते हैं और जो देश अमेरिका में सामान भेजते हैं, उन देशों में अमेरिकी निर्यातकों के लिए अपेक्षाकृत नुकसान उठाना पड़ता है.

हालांकि यह भेदभाव वाला व्यापार है, जिससे अमेरिका को नुक़सान होता है, इसे दो टूक नहीं कहा जा सकता.

अधिकांश अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आयात टैरिफ़ की क़ीमत आख़िरकार उस देश में परिवारों को वहन करना पड़ती है जो उन सामान पर टैरिफ़ लगाते हैं, क्योंकि इसका मतलब होता है कि आयातित वस्तुएं अधिक महंगी हो जाती हैं.

इसका ये भी मतलब निकाला जा सकता है कि अमेरिका के मुक़ाबले औसत बाहरी टैरिफ़ की ऊंची दरों वाले देश, अमेरिकियों की तुलना में अपने ही उपभोक्ताओं को सज़ा देते हैं.

रेसिप्रोकल टैरिफ़ कैसे काम करता है?

10 फ़रवरी को ट्रंप ने बताया कि रेसिप्रोकल टैरिफ़ से उनका आशय है, उन देशों पर उतना ही टैरिफ़ लगाना, जितना वे अमेरिकी सामानों पर लगाते हैं.

उन्होंने पत्रकारों से कहा, "अगर वे हम पर शुल्क लगाते हैं, तो हम उन पर लगाएंगे. अगर वे उनकी दर 25 तो हमारी भी 25 होगी. अगर उनकी दर 10 है तो हमारी भी दर 10 होगी."

इसका मतलब होगा कि यह डब्ल्यूटीओ के एमएफ़एन नियमों का उल्लंघन, जिसके तहत एक देश को ख़ास सामान पर समान टैरिफ़ लगाना होता है, चाहे वे कहीं से आ रहे हों.

मान लीजिए अगर अमेरिका वियतनाम से आने वाली सभी वस्तुओं पर 9.4% टैरिफ़ लगाता है लेकिन ब्रिटेन से आने वाले सामान पर 3.8% टैरिफ़ लगाता है, तो यह नियमों का उल्लंघन होगा.

अगर अमेरिका दिखा सके कि कोई देश उसके साथ डब्ल्यूटीओ के नियमों का किसी तरह से उल्लंघन कर रहा है तो अमेरिका ये कह सकता कि उसने बदले में उसके ख़िलाफ़ टैरिफ़ लगाया है और यह डब्ल्यूटीओ नियमों के तहत जायज है.

लेकिन एक आम नीति के तहत सीधे रेसिप्रोकल टैरिफ़ थोपना डब्ल्यूटीओ के नियमों के उल्लंघन के दायरे में आ सकता है.

अलग अलग वस्तुओं पर रेसिप्रोकल टैरिफ़ कितना होगा?

एक और संभावना है कि ट्रंप औसत राष्ट्रीय टैरिफ़ दरों की बजाय अलग-अलग सामानों पर विभिन्न देशों द्वारा लगाए जाने वाले अलग-अलग टैरिफ़ की बराबरी करें.

उदाहरण के लिए यूरोपीय संघ, गुट के बाहर अमेरिका समेत बाकी देशों से आयातित सभी कारों पर 10% टैरिफ़ लगाता है.

लेकिन अमेरिका यूरोपीय संघ समेत बाकी देशों से आयातित कारों पर केवल 2.5% टैरिफ़ लगाता है.

इस स्थिति में अमेरिका समान अवसर के लिए यूरोपीय संघ से आयातित कारों पर 10% का टैरिफ़ लगाने का निर्णय ले.

हालांकि अगर उसने हर अलग-अलग देश के साथ हर तरह के आयात पर लगाए जाने वाले टैरिफ़ की बराबरी करने की कोशिश की तो यह बहुत लंबी और जटिल प्रक्रिया हो जाएगी, क्योंकि वैश्विक व्यापार और डब्ल्यूटीओ के 166 सदस्य देशों द्वारा अलग अलग टैरिफ़ दरें होती हैं.

इस नीति की रूपरेखा बनाने वाले ट्रंप के आधिकारिक मेमोरेंडम के अनुसार, रेसिप्रोकल टैरिफ़ को बाकी देशों के नियमों, घरेलू सब्सिडी, एक्सचेंज रेड और वैल्यू एडेड टैक्सों (वैट) के आधार पर तय किया जाएगा.

अमेरिका वस्तुओं पर वैट नहीं वसूलता है, लेकिन ब्रिटेन समेत बाकी देश ऐसा करते हैं.

इससे टैरिफ़ तय करने की प्रक्रिया और जटिल हो सकती है.

हालांकि अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि व्यापार में घरेलू नियम और सब्सिडी एक अहम ग़ैर टैरिफ़ बाधा (ट्रेड बैरियर) में योगदान देते हैं.

उनका कहना है कि इस हिसाब से वैट इस श्रेणी में नहीं आता है क्योंकि घरेलू स्तर पर बिक्री वाली सभी चीजों पर यह लागू होता है और इसलिए अमेरिका से आयातित होने वाली वस्तुओं के मामले में उसे कोई नुकसान नहीं होता.

डब्ल्यूटीओ वैट को ट्रेड बैरियर नहीं मानता.

क्या अमेरिकी टैरिफ़ भी कम करना पड़ सकता है?

अगर ट्रंप रेसिप्रोकल टैरिफ़ लगाने पर दृढ़ रहते हैं, तो सैद्धांतिक रूप से अमेरिका को भी टैरिफ़ बढ़ाने की बजाय कम करना पड़ सकता है.

कुछ विशेष कृषि उत्पादों के मामले में अपने व्यापारिक साझेदारों के मुकाबले अमेरिका ने ऊंचे टैरिफ़ लगा रखे हैं.

उदारहण के लिए मौजूदा समय में अमेरिका ने दुग्ध उत्पादों के आयात पर 10% से अधिक का प्रभावी टैरिफ़ लगाया हुआ है. लेकिन एक दुनिया एक बड़े दुग्ध उत्पादक देश न्यूज़ीलैंड ने अपने डेयरी आयात को टैरिफ़ मुक्त (0%) रखा है.

अमेरिकी मिल्क टैरिफ़, अमेरिकी डेयरी किसानों को बचाने के लिए बनाया गया है और स्विंग स्टेट विस्कांसिन में ऐसे किसानों की संख्या अच्छी ख़ासी है.

और अगर न्यूज़ीलैंड से आने वाले दुग्ध उत्पादों पर टैरिफ़ कम होता है तो इससे इस राज्य में राजनीतिक विरोध पैदा हो सकता है.

इसी तरह अलग-अलग सामान के लिए अलग-अलग अमेरिकी टैरिफ़ से अमेरिकी ऑटो उद्योग को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

अमेरिका यूरोपीय संघ समेत सभी देशों से आयातित ट्रकों पर 25% टैरिफ़ लगाता है.

जबकि यूरोपीय संघ में अमेरिका समेत बाकी देशों से आने वाले ट्रकों पर सिर्फ 10% टैरिफ़ है.

इसका मतलब है कि अगर यूरोपीय संघ के साथ रेसिप्रोकल टैरफ़ लगाया जाता है तो सिद्धांत के रूप में अमेरिका को इन पर अपना टैरिफ़ करना होगा.

इसलिए यूरीपीय संघ की कारों पर रेसिप्रोकल टैरिफ़ का अमेरिकी ऑटो निर्माता स्वागत करेंगे लेकिन यूरोपीय संघ के ट्रकों पर रेसिप्रोकल टैरिफ़ का विरोध करेंगे.

हालांकि, बीते गुरुवार को ट्रंप ने स्पष्ट किया कि स्टील और एल्यूमीनियम जैसे कुछ उत्पादों पर लगाए गए टैरिफ़, उनके रेसिप्रोकल टैरिफ़ के अतिरिक्त होंगे.

इससे यह संकेत मिलता है कि दरअसल व्यापार में असली बराबरी उनका मूल उद्देश्य नहीं है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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