अवैध प्रवासियों को अमेरिका से हथकड़ियां और बेड़ियां पहनाकर वापस भारत भेजने पर क्या कहते हैं जानकार

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- Author, जुगल पुरोहित
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता,नई दिल्ली
"प्लेन में चढ़ने के बाद मेरे हाथों और पैरों को बाँध दिया गया. सफ़र के दौरान हमारा विमान कई जगहों पर रुका लेकिन मेरे हाथ और पैर सिर्फ़ तब खोले गए जब विमान अमृतसर पहुँचा."
ये शब्द जसपाल सिंह के हैं.
अमेरिका से वापस भेजे गए सौ से अधिक भारतीय नागरिकों में वह भी शामिल हैं. वह पंजाब के गुरदासपुर के रहने वाले हैं. इन्हें अमेरिकी वायु सेना के सी-17 विमान से 5 फ़रवरी को अमृतसर लाया गया था.
हालाँकि, छह फ़रवरी को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने राज्य सभा में अपने बयान में कहा कि निर्वासन की प्रक्रिया सालों से चलती आई है. बुधवार (5 फ़रवरी) को जो हुआ उसमें कुछ भी नया नहीं है.

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विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

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विदेश मंत्री के मुताबिक़, "अमेरिका विमान के ज़रिए जो निर्वासन करता है, उसकी मानक संचालन प्रक्रिया है. यह 2012 से प्रभावी है. इस प्रक्रिया के तहत लाए जाने वाले लोगों पर कुछ प्रतिबंध होते हैं. हालाँकि, हमें अधिकारियों ने बताया है कि महिलाओं और बच्चों पर किसी क़िस्म का प्रतिबंध नहीं होता."
उन्होंने कहा, "इसके अलावा, निर्वासित लोगों की दूसरी ज़रूरतों जैसे- भोजन, इलाज या अन्य चीज़ों पर ध्यान दिया जाता है. ज़रूरत पड़ने पर शौचालय का इस्तेमाल करने के लिए उनके बंधन खोले भी जाते हैं."
बकौल विदेश मंत्री, "मानक संचालन की यह प्रक्रिया चार्टर्ड विमानों के साथ-साथ सैन्य विमानों पर भी लागू होती है. पाँच फरवरी 2025 को अमेरिका से आई उड़ान में पिछली प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं हुआ है. बेशक, हम यह सुनिश्चित करने के लिए अमेरिकी सरकार से बातचीत कर रहे हैं कि निर्वासित लोगों के साथ उड़ान के दौरान किसी भी तरह का दुर्व्यवहार न हो."
सरकार द्वारा दिए गए जवाब से यह लगता है कि जसपाल सिंह जैसे लोगों के साथ उस विमान में जो हुआ, उसके बारे में भारत सरकार अमेरिका से सार्वजनिक तौर पर कुछ सवाल पूछने नहीं जा रही.
लेकिन सात फ़रवरी को मीडिया के सवालों के जवाब में विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा कि जिस तरीके से लोगों को लाया गया उसपर सवाल उठाना उचित है.
'हमने इस बात पर ज़ोर दिया है कि लोगों के साथ सही सुलूक किया जाना चाहिए और जो लोग अभी डिपोर्ट भी हो रहे हैं उनके साथ भी सही सुलूक होना चाहिए'.
विपक्ष के सवाल

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हालाँकि, विपक्ष ने इस बारे में सरकार के सामने सवाल खड़े किए हैं.
कांग्रेस नेता और वायनाड से सांसद प्रियंका गांधी ने सोशल मीडिया एक्स पर टिप्पणी की है.
वह कहती हैं, "बहुत बात की गई थी कि मोदी जी और ट्रंप जी बहुत अच्छे मित्र हैं, फिर मोदी जी ने ऐसा क्यों होने दिया? क्या इंसानों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है कि उनको हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ पहनाकर भेजा जाए? ये कोई तरीका है... प्रधानमंत्री को जवाब देना चाहिए."
क्यों अहम है ये मुद्दा?
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बिना दस्तावेज़ वाले विदेशी नागरिकों का सामूहिक निर्वासन, अपने कार्यकाल का एक लक्ष्य बनाया है. इसलिए यह मुद्दा अहम हो जाता है.
प्यू रिसर्च सेंटर के 2022 के आँकड़ों के मुताबिक़ अमेरिका में लगभग सात लाख 25 हज़ार भारतीय ऐसे हैं जो अवैध रूप से वहाँ रह रहे हैं.
बाक़ी देशों के नागरिकों समेत इन सभी पर भी कार्रवाई किए जाने और वापस भेजे जाने का ख़तरा मंडरा रहा है.
यह पता करने के लिए कि क्या भारतीय लोगों को अमेरिका से निर्वासित किए जाने की प्रक्रिया में कभी सैन्य विमान का इस्तेमाल हुआ है, बीबीसी ने पुरानी मीडिया रिपोर्ट खंगाली. इससे पता चला कि सैन्य विमान का इस्तेमाल शायद ही कभी हुआ हो.
इस संबंध में भारत के विदेश मंत्रालय से भी हमने जानकारी लेने की कोशिश की पर कोई जवाब नहीं मिला.

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बीबीसी हिंदी ने अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता से पूछा कि जहाँ पहले चार्टर्ड विमान और एयरलाइंस से लोगों को वापस भेजा जाता था, वहीं अब सैन्य विमान का इस्तेमाल क्यों? यही नहीं, लोगों ने सफ़र के दौरान जिन मुश्किलों के बारे में बताया, उस पर उनकी क्या राय है?
उन्होंने जवाब दिया, ''अमेरिकी सेना अवैध प्रवासियों को हटाने में तेज़ी लाने के लिए सरकार के प्रयासों का समर्थन कर रही है. मैं इससे ज़्यादा कुछ बताना नहीं चाहूँगा. इन व्यक्तियों ने अमेरिका-मेक्सिको या अमेरिका-कनाडा सीमा से अवैध रूप से अमेरिका में प्रवेश करने की कोशिश की. वहाँ रहने का इनके पास कोई क़ानूनी आधार नहीं था."
अमृतसर वाली उड़़ान का हवाला देते हुए अमेरिका के बॉर्डर पेट्रोल संस्था के अध्यक्ष माइकल बैंक्स ने एक वीडियो जारी किया. इसमें भारतीय नागरिक जंजीरों में, मुश्किल से चलते हुए विमान के अंदर जाते दिख रहे हैं.
उन्होंने वीडियो के साथ अपने पोस्ट में यह भी लिखा, "हमने सैन्य परिवहन का इस्तेमाल करते हुए अवैध 'एलियंस' को सफलतापूर्वक भारत लौटा दिया… निर्वासन के लिए यह अब तक की सबसे दूर की उड़ान है. यह मिशन आव्रजन क़ानूनों को लागू करने और तेज़ी से निष्कासन सुनिश्चित करने की हमारी प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है."
उनकी संस्था ने चार फ़रवरी को बताया था कि निर्वासित किए गए लोगों को वापस भेजने के लिए भारत के अलावा मेक्सिको और होंडुरास में भी विमान भेजे जा रहे हैं.
'ये आतंकवादी या युद्ध बंदी नहीं हैं'
पूर्व विदेश सचिव शशांक ने बीबीसी हिंदी को बताया कि उनकी राय में भारत ने अब तक इस मुद्दे को सही तरीके से संभाला हैं.
"जैसा कि सरकार ने कहा है – हमारी प्राथमिकता उन लोगों पर नकेल कसने पर होनी चाहिए जो अवैध तरीकों से लोगों को देश से बाहर भेजते हैं. मेरा मानना है कि यह सब कुछ अमेरिका के अंदरूनी राजनीति का हिस्सा ज़्यादा हैं और भारत जैसे देशों को संदेश कम हैं. राष्ट्रपति ट्रंप चुनाव के दौरान किए गए वादों का पालन करने के लिए कितने प्रतिबद्ध हैं फिलहाल यह दिखाने का प्रयास किया जा रहा हैं और मुझे लगता है कि जैसे-जैसे समय बीतेगा अमेरिका के रुख़ में कुछ नरमी आएगी."
राजीव डोगरा भारत के राजदूत रहे हैं. अपने कार्यकाल में संयुक्त राष्ट्र के संस्थानों में भी उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया है.
बीबीसी हिंदी से बात करते हुए उन्होंने बताया, "निर्वासन का मुद्दा कोई नया नहीं है, लेकिन निर्वासन के तरीक़े ने इस बार ध्यान आकर्षित किया है. मेरा मानना है कि अमेरिका को निर्वासन के इस तरीक़े पर पुनर्विचार करना चाहिए. जिन लोगों को निर्वासित किया जा रहा है, वे आतंकवादी नहीं हैं. न ही युद्ध अपराधी हैं."
"ये अक्सर ऐसे युवा होते हैं जिन्होंने निश्चित रूप से क़ानून का उल्लंघन किया है लेकिन वे केवल विदेश में एक नया जीवन बनाना चाहते थे. ऐसे लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार किया गया है, यह हम सब देख सकते हैं."
राजीव डोगरा कहते हैं, "कूटनीति को नज़दीक से देखने का मेरा लगभग 50 वर्षों का अनुभव है. मैं कह सकता हूँ कि निर्वासन के लिए ऐसी सैन्य उड़ान की कोई मिसाल नहीं है, जहाँ लोगों को घंटों तक बेड़ियों और जंज़ीरों में रखा गया. यह पहली बार नहीं है कि कोई देश अवैध नागरिकों को निर्वासित कर रहा है. यह प्रक्रिया पूरी दुनिया में चल रही है. भारत भी बांग्लादेश से अवैध नागरिकों को निर्वासित करता है. लेकिन ऐसा करने का एक सम्मानजनक तरीका है. इसका पालन किया जाता है."
अमेरिका की नीति का विरोध

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इस हफ़्ते जो भारत के साथ हुआ वह पिछले महीने दक्षिण अमेरिका के देश ब्राज़ील और कोलंबिया के साथ हुआ था.
जब इन दोनों देशों के नागरिकों को हथकड़ियों और जंज़ीरों में सैन्य विमानों में निर्वासित किया गया तो इन्होंने अमेरिका से सार्वजनिक तौर से विरोध जताया था. कोलंबिया ने तो अमेरिकी विमानों को वापस किया. अपने सैन्य विमान अमेरिका भेजे ताकि अपने नागरिकों को सम्मान के साथ वापस लाया जा सके.
लेकिन डोगरा इस बात से सहमत नज़र नहीं आए.
वे कहते हैं, "देखिए जो देश किसी दूसरे देश के नागरिकों को अपने इलाक़े में पाता है और फिर अवैध घोषित करता है, उस देश की ज़िम्मेदारी बनती है कि उन लोगों को वेरिफिकेशन के बाद उनके देश भेजे. तो इस मामले में पूरी ज़िम्मेदारी अमेरिका की है."
दूसरी ओर, एमनेस्टी इंटरनेशनल संस्था ने राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों पर चिंता जताई है. एमनेस्टी ने ट्रंप की इस पूरी कार्रवाई को हानिकारक, नस्लवादी, अराजकता फैलाने वाला और समुदायों को नुक़सान पहुँचाने वाला बताया है.
तो क्या भारत को अमेरिका की इस नीति को लेकर कड़ा विरोध करना चाहिए था?
राजीव डोगरा का जवाब है, "मुझे लगता है कि भारत इसे किसी न किसी रूप में अमेरिका के सामने उठाएगा. हालाँकि, यह ध्यान देने वाली बात है कि यह अमेरिका जैसे पश्चिमी देश ही थे जो दुनिया को मानवाधिकारों पर भाषण देते थे. आज देखिए उन्होंने किस तरह से यह काम किया है."
शशांक भी मानते हैं कि अमेरिका जल्द ही अपनी ज़रूरतों के कारण ऐसे रवैये पर पुनर्विचार करने को मजबूर होगा.
शशांक कहते हैं, "अमेरिका को भी सस्ते दामों पर काम करने वालों की ज़रूरत हैं जो अक्सर उन लोगों से आता है जिन्हें वे अब आक्रामक रूप से निर्वासित कर रहे हैं, इसलिए ऐसी संभावना है कि उनके सिस्टम में इस तरह की आक्रामक नीति को जारी रखने को लेकर कुछ चर्चाएं होंगी और उनका रुख़ बदलेगा'.
(बीबीसी पंजाबी के गुरप्रीत चावला के सहयोग के साथ)
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