पीएम राजीव गांधी के दफ़्तर के चर्चित जासूसी कांड की पूरी कहानी - विवेचना

इमेज स्रोत, Bloomsbury India
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
सन 1985 का जनवरी महीना भारतीय राजनीति के लिए काफ़ी उथल-पुथल वाला था. प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के प्रधान सचिव पीसी एलेक्ज़ेंडर ने इस्तीफ़ा दे दिया था.
भारत के कहने पर फ़्रांस ने दिल्ली से अपना राजदूत वापस बुला लिया था. चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड और पूर्वी जर्मनी के दिल्ली दूतावास से राजनयिकों को निष्कासित किया गया था.
इस सबके पीछे एक जासूसी स्कैंडल था जिसके तार भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय से जुड़े हुए थे, भारतीय मीडिया में इसे ‘मोल इन द पीएमओ स्कैंडल’ कहा जाने लगा.
इसमें शामिल थे राजीव गाँधी के प्रधान सचिव पीसी एलेक्ज़ेंडर के निजी सचिव एनटी खेर, पीए मल्होत्रा और यहाँ तक कि उनका चपरासी भी.

16-17 जनवरी की रात को इंटेलिजेंस ब्यूरो के काउंटर इंटेलिजेंस विभाग ने सबसे पहले एनटी खेर को गिरफ्तार किया था.
सुबह होते-होते पीए मल्होत्रा और यहाँ तक कि पीएमओ के एक चपरासी को भी गिरफ़्तार किया गया.
इन पर आरोप लगा कि ये एक भारतीय व्यापारी कूमार नारायण के ज़रिए गोपनीय सरकारी दस्तावेज़ विदेशी एजेंटों को भेज रहे थे.

इमेज स्रोत, kallol bhattacherjee
स्टेनोग्राफ़रों और निजी सचिवों के पास सूचनाओं का अंबार
सन 1925 में कोयंबटूर में जन्मे कूमार नारायण सन 1949 में दिल्ली आए थे और विदेश मंत्रालय में एक स्टेनोग्राफ़र के रूप में उन्होंने अपना करियर शुरू किया था.
बाद में उन्होंने इस्तीफ़ा देकर इंजीनियरिंग उपकरण बनाने वाली कंपनी एसएमएल मानेकलाल में काम करना शुरू कर दिया था.
हाल ही में प्रकाशित किताब ‘अ सिंगुलर स्पाई द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ कूमार नारायण’ में लेखक कल्लोल भट्टाचार्जी लिखते हैं, “लाइसेंस परमिट राज में सरकार में नेपथ्य में रहने वाले स्टेनोग्राफ़रों की विभिन्न मंत्रालयों में गोपनीय सूचनाओं तक ख़ासी पहुंच होती थी.”
उन्होंने लिखा, “नारायण को पता था कि स्टेनोग्राफ़र महज़ टाइपिस्ट ही नहीं हैं, उनके पास जो सूचनाएं होती हैं, उनका इस्तेमाल किया जा सकता है, बशर्ते वे इस जानकारी का सौदा करने को तैयार हों.”
हर महत्वपूर्ण मंत्रालय में थी कूमार नारायण की दोस्ती

इमेज स्रोत, kallol bhattacherjee
सन 1959 में सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद कूमार ने सरकार के छोटे पदों पर काम करने वाले लोगों का एक गुप्त नेटवर्क बना लिया था.
यही नहीं, उसने छह यूरोपीय देशों फ़्रांस, पूर्वी जर्मनी, पश्चिमी जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, सोवियत संघ और पोलैंड के दूतावासों के साथ भी संपर्क स्थापित कर लिया था और उन तक गोपनीय और संवेदनशील दस्तावेज़ पहुंचाने लगा था.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 28 जनवरी, 1985 के अखबार में यहाँ तक ख़बर छपी कि कूमार नारायण को “विदेश में गोपनीय सूचनाएं इकट्ठी करने की ट्रेनिंग तक दी गई थी.”
सन 1985 में भारत में लगभग दो हज़ार लोग विभिन्न कॉरपोरेट कंपनियों के लिए संपर्क अधिकारी के तौर पर काम कर रहे थे जिनमें कूमार नारायण भी शामिल थे.
कल्लोल भट्टाचार्जी लिखते हैं, “कूमार के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कार्यालय सहित हर महत्वपूर्ण मंत्रालय में दोस्त थे, अपनी गिरफ़्तारी से पहले उन्होंने कई संपत्तियाँ ख़रीदी थीं और वो एक अमीर शख़्स बन चुके थे, उनके अपने सूत्रों से बहुत आत्मीय संपर्क थे. अपने निकटतम लोगों को वो महंगे तोहफ़े दिया करते थे.”
मामले की जाँच के दौरान पता चला कि प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात पी. गोपालन उन्हें पिता की तरह मानते थे.
पासपोर्ट कार्यालय में दाखिल दस्तावेज़ में उन्होंने लिखा था कि अगर उनकी मृत्यु हो जाती है तो इसकी सूचना कूमार नारायण को दी जाए.

इमेज स्रोत, kallol bhattacherjee
श्रीलंका के साथ बैठक में लीक की पहली भनक लगी
प्रधानमंत्री कार्यालय से सूचनाएं लीक हो रही हैं इस बात की पहली भनक तब लगी, जब भारत और श्रीलंका के अधिकारियों की दिल्ली में बैठक हुई.
जैसे ही बैठक शुरू हुई श्रीलंका के अधिकारियों ने भारतीय अधिकारियों को रॉ का एक टॉप सीक्रेट दस्तावेज़ दिखाया जिसमें बताया गया था कि श्रीलंका के बारे में भारत सरकार में क्या सोच है.
विनोद शर्मा और जीके सिंह ने ‘द वीक’ पत्रिका के 17 फ़रवरी, 1985 के अंक में लिखा था, “भारत के लिए ये शर्मसार करने वाला दस्तावेज़ था. खुफ़िया अधिकारी इस बात पर दंग थे कि जो दस्तावेज़ भारत के उच्चतम पदों पर बैठे लोगों के लिए लिखा गया था, श्रीलंका के पास कैसे पहुंचा?”
उस दस्तावेज़ की सिर्फ़ तीन प्रतियाँ बनाई गई थीं. दो प्रतियाँ रॉ के उच्चाधिकारियों के पास थीं और एक प्रति प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी गई थी.
ख़ुफ़िया अधिकारियों को ये जानने में दिलचस्पी थी कि वो टॉप सीक्रेट दस्तावेज़ कोलंबो तक किस तरह पहुंचा?
विनोद शर्मा और जीके सिंह लिखते हैं, “बाद में जाँच करने पर पता चला कि एक फ्रेंच अधिकारी ने नारायण नेटवर्क के ज़रिए वो दस्तावेज़ हासिल कर श्रीलंका तक पहुंचाया था.”
कूमार नारायण का फ़्रेंच ख़ुफ़िया एजेंसी से संबंध

इमेज स्रोत, Getty Images
जाँच अधिकारियों ने बताया था कि अपनी गिरफ़्तारी से पहले तक नारायण फ़्रेंच ख़ुफ़िया एजेंसी के लिए काम कर रहे थे.
उनको भारत में फ़्रेंच कॉरपोरेट और रक्षा हितों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी.
कल्लोल भट्टाचार्जी लिखते हैं, “भारत में उस समय रक्षा बाज़ार खुल रहा था और फ़्रांस की कोशिश थी कि इस पर किसी तरह काबिज़ हुआ जाए.”
उन्होंने लिखा, “नारायण फ़्रेंच जासूसी संस्था डीजीएसई के लिए सात सालों से काम कर रहे थे. उनका डीजीएसई से संपर्क एंलेक्ज़ांद्रे द मैरेंचे के कार्यकाल में शुरू हुआ था और सन 1981-82 के दौरान जब पाएरे मारियो संस्था के प्रमुख बने, तब ये अपने चरम पर पहुंचा था.”
सन 1982 में फ़्रांस को 46 मिराज 2000-एच और 13 मिराज 2000-टीएच युद्धक विमानों की सप्लाई करने का ठेका मिला था और इस बात की भी गुंजाइश रखी गई थी कि 110 विमान और ख़रीदे जा सकते हैं.
सालों बाद पाएरे मारियो ने शेख़ी बघारी थी कि उनके नेतृत्व में भारत के रक्षा मंत्रालय में सेंध लगाना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी जिसकी वजह से फ़्रांस मिराज विमान भारत को बेचने में कामयाब रहा था.
इस पूरे मिशन को ‘ऑपरेशन निकोबार’ का नाम दिया गया था.
हालाँकि यह कहने का कोई आधार नहीं है कि फ्रांस को यह ठेका दिए जाने में इस जासूसी स्कैंडल की कोई भूमिका थी.
भारत और फ्रांस के बीच समझौता होने से पहले सोवियत संघ ने अपने रक्षा मंत्री दिमित्री उस्तीनोव को इस मिशन के साथ दिल्ली भेजा था कि वो भारत को फ्रेंच विमान की जगह सोवियत विमान ख़रीदने के लिए मनाएं लेकिन वो अपनी मुहिम में कामयाब नहीं हुए थे.
संयोग से कूमार नारायण पर हुआ शक

इमेज स्रोत, Getty Images
इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद दिल्ली में हाई अलर्ट था और सत्ता के गलियारे में हर शख़्स शक के घेरे में था.
एक समय ऐसा भी आया जब प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कार्यालय के बड़े अधिकारियों की गतिविधियों पर भी नज़र रखी जाने लगी.
लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय का कूमार नारायण कनेक्शन इसके बावजूद नज़र में नहीं आया. कूमार नारायण महज़ संयोग से पुलिस के हत्थे चढ़े.
सीबीआई में काम करने वाले वेद प्रकाश शर्मा अक्सर अपने एक दोस्त सुभाष शर्मा की फोटो कॉपी करने की दुकान पर जाया करते थे.
दुकान में रोशनी बहुत रहती थी. अचानक उनकी नज़र फ़ोटो कॉपी किए जा रहे एक पेज पर पड़ी जिस पर लिखा हुआ था, सेंट्रल इंटेलिजेंस ब्यूरो.
वेद प्रकाश को अपने अनुभव से पता था कि इंटेलिजेंस ब्यूरो अपने किसी भी आंतरिक कागज़ को बाहर ले जाने की अनुमति नहीं देता.
इंटेलिजेंस ब्यूरो के महत्वपूर्ण कागज़ों का फ़ोटो स्टेट
कल्लोल भट्टाचार्जी लिखते हैं, “वेद प्रकाश कमरे के कोने में पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गए. फ़ोटो कॉपी करवाने वाले शख़्स और फोटो कॉपी करने वाले शख़्स सुभाष शर्मा की पीठ उनकी तरफ़ थी. उन्होंने देखा कि इंटेलिजेंस ब्यूरो के कागज़ प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रपति भवन के लिए मार्क थे. ये काग़ज़ असम, कश्मीर, भारी उद्योग और पाकिस्तान से संबंधित थे.”
इसके बाद वेद प्रकाश इस उम्मीद से अपने दोस्त की दुकान पर रोज़ जाने लगे कि उनकी मुलाकात एक बार फिर फ़ोटो कॉपी करवाने वाले से हो जाएगी.
ये सिलसिला कई दिनों तक जारी रहा. इन कागज़ों में भारत की आंतरिक और बाह्य चुनौतियों पर इंटेलिजेंस ब्यूरो की इंटेलिजेंस ब्रीफ़ रहती थी.
दिलचस्प बात ये थी कि इन गोपनीय कागज़ों को दिल्ली के बीचों-बीच कनॉट प्लेस में कॉपी किया जा रहा था.
भट्टाचार्जी लिखते हैं, “जब वेद प्रकाश को पूरा विश्वास हो गया तो उन्होंने अपने पूर्व बॉस और इंटेलिजेंस ब्यूरो में अतिरिक्त निदेशक जेएन रॉय से संपर्क कर उन्हें सारी बात बताई.”
रॉय ने जाँच के लिए कुछ अधिकारियों को फोटो कॉपी वाली दुकान पर भेजा लेकिन कुछ ठोस निकलकर नहीं आया.
जासूसी रैकेट में शामिल सभी लोगों की पहचान

इमेज स्रोत, x
वेद प्रकाश इसका सबूत इकट्ठा करना चाहते थे. उन्होंने एक दिन उस चपरासी का लाया एक कागज़ चुराकर अपने कोट की जेब में डाल लिया.
उन्होंने उस कागज़ को पढ़ा तो पाया कि वो इंटेलिजेंस ब्यूरो का एक कागज़ था. अब उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि उनका शक सही था.
वहाँ से वो सीधे अपने पूर्व बॉस जेएन रॉय के पास गए. रॉय ये देखते ही उछल पड़े और उन्होंने पूरे मामले की जाँच करवाने का फ़ैसला किया.
वेद प्रकाश ने उनसे कहा कि दुकान का मालिक इस काम में शामिल नहीं है, इसलिए उसे परेशान न किया जाए. इंटेलिजेंस ब्यूरो के लोगों ने सादे कपड़ों में फोटो कॉपी की दुकान की निगरानी शुरू कर दी.
भट्टाचार्जी लिखते हैं, “अगले दिन जब चपरासी कागज़ कॉपी कराकर दुकान से निकला तो वेद प्रकाश ने आईबी के आदमी को उसके पीछे लगा दिया.”
उन्होंने लिखा, “जब ये पता चला कि वो शख़्स एसएलएम मानेक लाल के हेली रोड वाले दफ़्तर से आया है, उस दफ़्तर पर भी 24 घंटे की निगरानी बैठा दी गई. कई दिनों की निगरानी के बाद इस रैकेट में शामिल सभी लोगों की पहचान कर ली गई.”
नारायण के दफ़्तर पर छापा

इमेज स्रोत, kallol bhacharya
इस सबसे बेख़बर कूमार नारायण अपने दफ़्तर में पीएमओ में काम कर रहे पी गोपालन का इंतज़ार कर रहे थे. करीब 11 बजे रात को गोपालन एक ब्रीफ़केस लिए नारायण के पास पहुंचे.
कूमार ने उनके लिए व्हिस्की की एक बोतल खोली और उनसे बात करने लगे. तभी उन्हें दरवाज़े पर दस्तक की आवाज़ सुनाई दी.
कल्लोल भट्टाचार्जी लिखते हैं, “दरवाज़ा खुलते ही इंटेलिजेंस ब्यूरो की टीम कमरे में दाख़िल हुई और उसने कूमार की मेज़ पर सिर्फ़ डेढ़ घंटे पहले हुई कैबिनेट बैठक के नोट्स पाए. टीम ने कूमार और गोपालन को अपनी जगह बैठे रहने के लिए कहा और पूरे दफ़्तर की तलाशी लेने लगे. ये तलाशी अगले दिन सुबह होने तक चली.”
टीम को बेहतरीन स्कॉच व्हिस्की की 14 बोतलें वहाँ मिलीं. नारायण और गोपालन को पूछताछ के लिए लाल किले ले जाया गया.
17 जनवरी की रात को तिलक मार्ग पुलिस स्टेशन पर उन आठ लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर लिखवाई गई जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज़ों तक पहुंच बनाकर उसे विदेशी लोगों के साथ शेयर किया था.
कूमार नारायण तिहाड़ जेल में

गिरफ़्तार किए गए लोगों में एक कश्मीरी टीएन खेर थे जो पीएम के प्रधान सचिव पीसी एलेक्ज़ेंडर के पीएस थे. एलेक्ज़ेंडर के निजी सचिव के तौर पर उनकी पूरे प्रधानमंत्री कार्यालय में पहुंच थी.
एक और शख़्स केके मल्होत्रा को भी गिरफ़्तार किया गया जो गृह मंत्रालय से प्रधानमंत्री कार्यालय प्रतिनियुक्ति पर आए थे.
गिरफ़्तार किए जाने वाले एक और व्यक्ति थे राष्ट्रपति के प्रेस सलाहकार तरलोचन सिंह के वरिष्ठ निजी सहायक एस शंकरण. मदुरै के रहने वाले शंकरण पिछले बीस से अधिक वर्षों से राष्ट्रपति के स्टाफ़ में थे और प्रेसिडेंशियल एस्टेट में ही रह रहे थे.
कुछ दिनों की पूछताछ के बाद कूमार को तिहाड़ जेल पहुंचा दिया गया था. जेल के माहौल ने कूमार के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाला था और वो वहाँ बीमार रहने लगे थे. उनको ये डर सताने लगा था कि उनकी जेल में ही हत्या कर दी जाएगी इसलिए वो रात में जाग कर चिल्लाने लगते थे.
तिहाड़ जेल के पूर्व प्रेस अधिकारी रहे सुनील गुप्ता बताते हैं, “कूमार हर समय रोते ही रहते थे. गिरफ़्तार होने के पहले दो महीने के अंदर उनका वज़न 20 किलो घट गया था. हम लोग उनसे मज़ाक भी करते थे कि उनका वज़न घटना अच्छी बात है. अब वो लंबे समय तक जीवित रहेंगे.”
कूमार नारायण ने अपना जुर्म क़बूला
इन गिरफ़्तारियों को बाहरी दुनिया से छिपाकर रखा गया था लेकिन ‘द हिंदू’ के जीके रेड्डी को इसकी ख़बर लग गई थी और उन्होंने सबसे पहले यह ख़बर प्रकाशित की थी.
4 फ़रवरी, 1985 को एसएमएल मानेकलाल ने कूमार नारायण को नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया था.
कूमार नारायण ने अपने 15 पेजों के इक़बालिया बयान में स्वीकार किया कि इस जासूसी केस में कम-से-कम तीन देश शामिल थे और वो पिछले 25 वर्षों से उन्हें नक़द पैसों के बदले गोपनीय दस्तावेज़ उपलब्ध कराते रहे हैं.
कूमार ने अपने नियोक्ता मानेकलाल के बारे में भी कहा कि उन्होंने भी उसकी दी जानकारियों का लाभ उठाया है.
पीसी एलेक्ज़ेंडर का इस्तीफ़ा

इमेज स्रोत, Getty Images
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीसी एलेक्ज़ेडर ने पूरे मामले की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया.
उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘थ्रू द कॉरिडोर्स ऑफ़ पावर’ में लिखा, “18 जनवरी, 1985 को प्रधान सचिव के रूप में मेरी सेवाओं का सबसे काला दिन साबित हुआ.”
उन्होंने लिखा, “उस सुबह मुझे ये हिला देने वाली ख़बर बताई गई कि मेरे निजी सचिव और तीन निजी सहयोगियों को मेरे दफ़्तर की गोपनीय जानकारी कुछ व्यापारिक संगठनों को लीक करने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया है.”
उन्होंने लिखा, “मेरी तुरंत प्रतिक्रिया थी कि मैं इस मामले की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दूँ.”
वे लिखते हैं, “मैं तीन बजे प्रधानमंत्री से मिलने गया. उस समय उनके तीन वरिष्ठ सहयोगी नरसिम्हा राव, वीपी सिंह और एसबी चव्हाण उनके पास बैठे हुए थे. मैंने राजीव गाँधी से कहा कि मैं आपसे अकेले में मिलना चाहता हूँ. जैसे ही वो लोग गए मैंने सारी बात प्रधानमंत्री को बताई और अपने इस्तीफ़े की जानकारी उन्हें दी.”
फ़्रांस से दिल्ली ने राजदूत वापस बुलाने के लिए कहा

इमेज स्रोत, Getty Images
पेरिस में भारत के राजदूत नरेंद्र सिंह को मैसेज भेजकर बताया गया कि वो फ़्रांस के विदेश मंत्री से मिलकर भारत में फ़्रांस के राजदूत को वापस बुलाने का अनुरोध करें और ये भी कहें कि दिल्ली में उनके दूतावास के कर्मचारियों की संख्या पेरिस में भारतीय दूतावास के कर्मचारियों के बराबर होनी चाहिए.
चिन्मय गरेखां अपनी आत्मकथा, ‘सेंटर्स ऑफ़ पावर’ में लिखते हैं, “फ़्रांस के राष्ट्रपति फ़्राँसुआ मितराँ ने राजीव गाँधी को पत्र लिखकर कहा कि जो कुछ भी हुआ वो उसे भूल जाएं. इस घटना को दो देशों के बीच मैत्री में आड़े नहीं आने दिया जाएगा.”
22 जनवरी, 1985 को मितराँ ने अपने भाई को राजीव गाँधी से मिलने दिल्ली भेजा. ये उनका कहने का तरीका था कि वो दुखी हैं, लेकिन इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया.
इस रैकेट में लिप्त पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया और पूर्वी जर्मनी के कर्मचारियों को तुरंत देश छोड़ देने के लिए कहा गया लेकिन नरसिम्हा राव की सलाह पर सोवियत दूतावास से कुछ नहीं कहा गया.
कूमार नारायण की मौत
सभी 13 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ 17 सालों तक मुकदमा चला.
उन सभी को गोपनीय सूचनाएं विदेशी एजेंटो को पहुंचाने का दोषी पाया गया. ये सभी सरकारी कर्मचारी थे. उनमें से चार प्रधानमंत्री कार्यालय और रक्षा मंत्रालय में काम कर रहे थे.
इन सबको 10 वर्ष की जेल की सज़ा सुनाई गई लेकिन फ़ैसला आने से दो साल पहले 20 मार्च, 2000 को कूमार नारायण का निधन हो गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















