वॉशिंगटन पोस्ट का दावा- हैकिंग की चेतावनी देने के बाद भारत सरकार ने एप्पल को बनाया निशाना

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इस साल 31 अक्टूबर को सुबह 9.30 बजे तृणमूल कांग्रेस पार्टी की सांसद महुआ मोइत्रा ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा कि उन्हें एप्पल से 'वॉर्निंग मैसेज' आया है कि उनके फ़ोन को ‘स्टेट- स्पॉन्सर’ अटैकर्स ने हैक करने की कोशिश की है.
महुआ मोइत्रा अकेली नहीं थीं उनके साथ-साथ शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी, कांग्रेस नेता, शाशि थरूर सहित कई और विपक्ष के सांसदों और कुछ पत्रकारों का दावा था कि उन्हें एप्पल ने ऐसी ही चेतावनी दी थी.
उस समय सरकार ने हैकिंग की कोशिश के आरोपों से इंकार किया था और कहा था की ‘एप्पल के इस नोटिफिकेशन की तह तक जाने के लिए मामले की जांच होगी.’
लगभग दो महीने बाद 28 दिसंबर को अमेरिकी अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट और एमनेस्टी इंटरनेशनल सिक्योरिटी लैब ने इस मामले में एक विस्तृत रिपोर्ट छापी है जिसके मुताबिक़ जिस दिन एप्पल ने विपक्ष के सांसदों और पत्रकारों को ये नोटिफिकेशन भेजा उसके ठीक एक दिन बाद ही नरेंद्र मोदी सरकार के अधिकारियों ने एप्पल के ख़िलाफ़ कार्रवाई तेज़ कर दी. एप्पल इंडिया के अधिकारियों पर 'दबाव बनाया गया कि वो इस वॉर्निंग को अपने सिस्टम की ग़लती बताएं. या कोई वैकल्पिक बयान तैयार करें.'
वॉशिंगटन पोस्ट की इस रिपोर्ट को केंद्रीय राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने ख़ारिज करते हुए कहा है कि ये ‘आधे-अधूरे तथ्यों पर आधारित, पूरी मनगढ़ंत है.’
जब सांसदों ने एप्पल के इस नोटिफिकेशन के स्क्रीनशॉट को शेयर करना शुरू किया तो बीजेपी के कई नेताओं ने इस वॉर्निंग पर सवाल उठाया और इस बात की ओर इशारा किया कि 'ये एप्पल का इंटरनल थ्रेट एल्गोरिदम था जो शायद ग़लती से लोगों को चला गया.'
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लेकिन वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह के सार्वजनिक दावों से अलग प्राइवेट में मोदी सरकार के अधिकारियों ने एप्पल के भारत में प्रतिनिधि को बुलाया और कहा कि "कंपनी वॉर्निंग को लेकर हो रहे राजनीतिक असर को कम करने के लिए सरकार की मदद करे. इतना ही नहीं सरकार ने एप्पल के देश से बाहर रहने वाले एक सिक्योरिटी एक्सपर्ट को बुलाया और उनसे कहा कि इस नोटिफिकेशन को लेकर एप्पल की ओर से सफ़ाई पेश करने के विकल्प तैयार करें."
अमेरिकी अख़बार का कहना है कि इस मामले की जानकारी रखने वाले तीन लोगों ने नाम ना ज़ाहिर करने की शर्त पर ये दावा किया है.
इनमें से एक व्यक्ति ने कहा- “सरकार के लोग काफ़ी नाराज़ थे.”
अख़बार के मुताबिक़, एप्पल के विदेशी अधिकारी कंपनी के वॉर्निंग मैसेज के पक्ष में मज़बूती से खड़े रहे. लेकिन जिस तरह से भारत सरकार ने एप्पल की विश्वसनीयता को कमतर करने की कोशिश की और जिस तरह का दबाव सरकार की ओर से बनाया गया उसका असर कूपरटिनो के हेडक्वार्टर में बैठे एप्पल के अधिकारियों पर पड़ा.
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात जो दिखी वो ये कि "दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनी को भारत की मौजूदा सरकार की ओर से दबाव का सामना करना पड़ा- ये भी जानना अहम है कि आने वाले दशक में भारत एप्पल के लिए अहम बाज़ार होने वाला है."

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रिपोर्ट पर सरकार का जवाब
केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने वॉशिंगटन पोस्ट की इस रिपोर्ट का सोशल मीडिया पर बयान जारी करके खंडन किया है.
उन्होंने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा है, "वॉशिंगटन पोस्ट की खराब स्टोरी टेलिंग का जवाब देना थकाने वाला काम है, लेकिन किसी को तो ऐसा करना ही होगा.”
"यह कहानी आधा सच, पूरी तरह सजावटी है. उन्होंने यह भी कहा कि नोटिफिकेशन को लेकर जांच अभी भी जारी है."
उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में 31 अक्टूबर को एप्पल की ओर से दिए गए बयान का ज़िक्र नहीं किया गया.
"आईटी मंत्रालय का इस पर रुख़ साफ़ है और हमेशा से एक ही रहा है. ये एप्पल को बताना है कि आखिर ऐसा क्या हुआ जिससे ये वॉर्निग ट्रिगर हुई. एप्पल से भारत सरकार की जांच में शामिल होने को कहा गया है और ये जांच जारी है. ये सभी तथ्य हैं और बाकी पूरी कहानी एक रचनात्मक सोच भर है.”
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अदानी पर रिपोर्ट और पत्रकार को एप्पल की वॉर्निंग का समय
इस साल अक्टूबर में 20 लोगों को एप्पल ने चेतावनी नोटिफ़िकेशन भेजा था. ये लोग विपक्ष के नेता और पत्रकार थे.
अमेरिकी अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, जिन दो पत्रकारों को एप्पल ने वॉर्निंग भेजा था उनमें से दो नामों की चर्चा है- आनंद मंगनाले और सिद्धार्थ वर्धराजन.
आनंद मंगनाले ऑर्गनाइज़्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट यानी ओसीसीआरपी के दक्षिण एशिया के एडिटर हैं. ये एक नॉन प्रॉफिटेबल संस्था है जो खोजी पत्रकारिता के लिए जानी जाती है. इस साल सितंबर की शुरुआत में ब्रिटिश अख़बार ‘द गार्डियन’ और ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ के साथ मिल कर ओसीसीआरपी ने एक रिपोर्ट की थी .
दावा था कि टैक्स हेवन देश मॉरीशस के दो फंड - इमर्जिंग इंडिया फोकस फंड (ईआईएफएफ) और ईएम रीसर्जेंट फंड (ईएमआरएफ) ने 2013 से 2018 के बीच अदानी ग्रुप की चार कंपनियों में पैसा लगाया और इनके शेयरों की ख़रीद-फ़रोख़्त भी की.
द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक़, इस साल 23 अगस्त को ओसीसीआरपी ने अदानी समूह को इस कहानी पर उनका बयान जानने के लिए मेल किया था. मेल करने के दस दिन के बाद ये रिपोर्ट आयी. लेकिन आनंद मंगनाले के फोन का एमनेस्टी इंटरनेशनल ने फॉरेंसिक एनालिसिस किया जिसमें पता चला कि अदानी समूह को कहानी पर उनका रुख जानने के लिए किए गए इमेल के 24 घंटे के भीतर उनके फोन में एक पेगासस स्पाइवेयर डाला गया.
पेगासस एक स्पाइवेयर है जिसे इसराइल की कंपनी एनएसओ ग्रुप बनाता है और कंपनी का कहना है कि वो इसे केवल देश की सरकारों को ही बेचता है.
वॉशिंगटन पोस्ट के दिए गए जवाब में अदानी समूह ने इन आरोपों से इनकार किया है कि वह किसी भी तरह कि हैकिंग में शामिल था और उन्होंने ओसीसीआरपी पर ‘उनके ख़िलाफ़ बदनाम करने वाला अभियान’ चलाने का आरोप लगाया है.
अदानी ग्रुप की कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन की प्रमुख वर्षा चेनानी ने वॉशिंगटन पोस्ट के दिए गए जवाब में कहा है- “अदानी ग्रुप उच्च स्तर की सत्यनिष्ठा और नियमों के साथ काम करता है.”
एमेनेस्टी ने पाया कि जिस एप्पल आईडी का इस्तेमाल मांगले के फ़ोन को हैक करने के लिए किया गया था उसी आईडी से भारतीय न्यूज़ वेबसाइट द वायर के सह-संस्थापक सिद्धार्थ वर्धराजन के फ़ोन को हैक करने का प्रयास भी किया गया था. यह एपल आईडी थी- [email protected]

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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की जांच में सहयोग नहीं किया- वर्धराजन
बीबीसी ने सिद्धार्थ वर्धराजन से बात की और ये समझने की कोशिश की कि आख़िर एप्पल के दबाव में आने के दावे वाली रिपोर्ट को वो कैसे देखते हैं.
उन्होंने कहा, “जब हमने साल 2021 में फॉरबिडेन स्टोरीज़ के साथ मिल कर पेगासस स्पाइवेयर पर रिपोर्ट की थी तब ही सामने आया था कि कई फ़ोन में इसका इस्तेमाल किया गया था, मैं भी उनमें से एक था. सुप्रीम कोर्ट में ये मामला गया और मामले की जांच भी की गई लेकिन वहां भी सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद माना की जांच कमेटी के साथ सरकार ने जांच में कोई सहयोग नहीं दिया. ये तो एक तरह से कोर्ट की अवमानना थी. मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. मेरा सवाल है कि ये मामला सुप्रीम कोर्ट क्यों हल्के में ले रही है. तीन साल बाद फिर लोगों के फ़ोन को टारगेट कि गया है.”
सिद्धार्थ बताते हैं कि 16 अक्टूबर को उन्हें एप्पल की ओर से वॉर्निंग मिली.
वो कहते हैं, “उस दौरान मैं कोई ऐसी सेंसिटिव रिपोर्ट तो नहीं कर रहा था. ओसीसीआरपी की तरह हम उस समय कोई रिपोर्ट नहीं कर रहे थे, लेकिन द वायर जो भी ख़बरें करता है उसका 90 फ़ीसदी काम सरकार को पसंद नहीं आता. मैं पेगासस की पहली लिस्ट में पहले भी था और इस बार भी हूं. जब हम काम करते हैं तो हमें पता होता है कि सरकार हम पर नज़र रख रही है. इस तरह के सॉफ्टवेयर से होता ये है कि हम किस रिपोर्ट पर काम कर रहे हैं, हमारे सोर्स कौन हैं इसका पता सरकार को ख़बर आने से पहले चल सकता है.”
रिपोर्ट में इस बात का ज़िक्र भी है कि भारत एप्पल के लिए एक बड़ा बाज़ार है. बीते दिनों भी रिपोर्ट आयी थी कि भारत सरकार ने किसान आंदोलन के दौरान कथित तौर पर ट्विटर पर ये दवाब डाला था कि वो कुछ लोगों के ट्वीट को डिलीट करे. ऐसे में एप्पल के इस तरह दबाव में आने के दावे को वो कैसे देखते हैं.
इस सवाल पर सिद्धार्थ कहते हैं, “एप्पल अपनी सिक्योरिटी के लिए जाना जाता है. दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है लेकिन रिपोर्ट में जिस तरह ये बात निकल कर आ रही है कि एप्पल ने भारत सरकार के दबाव में आकर अपने ही नोटिफ़िकेशन को कमज़ोर बताया, उन्हें तय करना होगा कि आप वो कंपनी बने रहना चाहते हैं जिसे उसके एथिक्स और सिक्योरिटी के लिए जाना जाता है या वो कंपनी बनना चाहते हैं जो सरकारों के दबाव में काम करे.”

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'एप्पल की वॉर्निंग और कंपनी के अधिकारियों को सरकार का बुलावा'
वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट कहती है कि जब अक्टूबर में कई सांसदों ने एप्पल के वॉर्निंग को एक्स पर शेयर करना शुरू किया और इस पर चर्चा शुरू हुई तो भारत सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने एप्पल इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर विराट भाटिया को बुलाया. अख़बार को मामले की जानकारी रखने वाले दो लोगों ने ये बात बतायी.
इनमें से एक ने अख़बार को बताया कि भारतीय अधिकारी ने एपल से कहा कि वो "अपनी वार्निंग वापस लें और कहें कि ये ग़लती से हुआ. सरकार के अधिकारी और एप्पल के अधिकारी के बीच इस पर कहासुनी हो गयी. एप्पल इंडिया के अधिकारी ने कहा कि ज्यादा से ज्यादा वो एक ऐसा बयान जारी कर सकते हैं जिसमें कुछ कैविएट पर ज़ोर दिया जाए, जैसा कि एप्पल की वेबसाइट पर पहले से लिखा है."
इस मामले पर सांसदों के ट्वीट के कुछ घंटों बाद ही एप्पल इंडिया ने एक बयान जारी किया था जिसमें कहा गया था कि “इस तरह के अटैक की पहचान ख़तरे के ख़ुफ़िया सिग्नल पर आधारित होते हैं और कई बार सटीक नहीं होते हैं और अधूरे होते हैं. ऐसा संभव है कि वॉर्निंग वाले कुछ मैसेज फॉल्स अलार्म हो सकते हैं या हो सकता है कि अटैकर्स का कभी पता ही न लगे.”

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"हम किन हालात में ऐसे ख़तरों से जुड़ी सूचनाएं जारी करते हैं, ये नहीं बता सकते क्योंकि ऐसा करने पर स्टेट-प्रायोजित हमलावर, भविष्य में ऐसी हरकत पकड़े जाने से बचने का रास्ता खोज लेंगे."
जब एप्पल ने ये बयान जारी किया तो इससे जो संदेश साफ़तौर पर ज़ाहिर था वो ये कि एप्पल अपनी ही चेतावनी को गंभीरता से ना लेने की ओर इशारा कर रहा है.
एक व्यक्ति ने वॉशिंगटन पोस्ट को बताया कि भाटिया ने कंपनी के लोगों से कहा था कि "वह सरकार की ओर से काफ़ी दबाव में हैं. लेकिन कंपनी के बाकी एक्ज़ीक्यूटिव ने कहा कि हमें मज़बूत बने रहने की ज़रूरत है."
रिपोर्ट ये भी कहती है कि दो बड़े टेक पत्रकारों ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि एप्पल इंडिया के कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन विभाग ने उनसे ऐसी कहानियां करने को कहा जो इस बात पर ज़ोर देती हों कि एप्पल की वॉर्निंग ग़लत हो सकती है. यानी ऐसी रिपोर्ट करना जो ख़ुद एप्पल के ही सिक्योरिटी सिस्टम पर सवालिया निशान खड़े करे.

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आज हमारी जासूसी हो रही है कल को सीजेआई की भी होगी- प्रियंका चतुर्वेदी
जिन लोगों को 30 अक्टूबर को एप्पल ने वॉर्निंग भेजी थी उनमें से एक थीं शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी.
प्रियंका बीबीसी से कहती हैं, “एप्पल के मंहगे डिवाइस ख़रीदने का कारण यही होता है कि हमारी सिक्योरिटी मज़बूत होगी लेकिन अगर दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी सरकार के दबाव में आकर, सरकार के साथ हो जाएगी या अपना व्यापार देख कर एथिक्स से समझौते कर लेगी तो आप सोचिए कि आगे क्या हो सकता है”
प्रियंका इसे मौलिक अधिकार बताते हुए कहती हैं कि “सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हुए कहना चाहती हूं- प्राइवेसी यानी निजता एक मौलिक अधिकार है. अगर सुप्रीम कोर्ट आज इस तरह से विपक्षी पार्टियों पर और पत्रकारों की हो रही जासूसी की अनदेखी करेगा तो कल को इस सरकार के हौसले इतने बढ़ चुके होंगे कि चीफ़ जस्टिस के फ़ोन को भी टारगेट कर लिया जाएगा. कोई महफ़ूज़ नहीं होगा. ”
“जब फ़ेसबुक पर आरोप लगे तो हम सबने देखा कि अमेरिकी संसद में किस तरह से मार्क ज़ुकरबर्ग को असहज कर देने वाले कठिन सवाल पूछे गए लेकिन यहां हम ये कह रहे हैं कि हमारा फ़ोन कॉम्प्रमाइज़ किया जा रहा है और इस पर कोई बात भी नहीं हो रही.”
एप्पल की वॉर्निंग जिस हैकिंग को लेकर भेजी गई थी उसके ज़रिए कथित रूप से पेगासस स्पाइवेयर फ़ोन में डालने की कोशिश की गई थी. पेगासस एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो अगर फ़ोन में डाल दिया जाए तो हैकर के पास दूर बैठे हुए भी फ़ोन का माइक और फोटोज़, कैमरे का एक्सेस होता है.
प्रियंका चतुर्वेदी कहती हैं, “एक महिला होने के नाते मेरे लिए ये और भी परेशान करने वाला है, जब मैं अपने दोस्तों और परिवार वालों के साथ होती हूं तो भी मैं मज़ाक में भी कुछ ऐसा नहीं बोलती जिसका कोई अलग मतलब निकाला जा सके. हर पल इस बात से शक में रहना कि क्या कोई बात तो नहीं सुन रहा, चार लोग जिन्हें मुझ पर नज़र रखनी है वो मेरी व्यक्तिगत तस्वीरें देख सकते हैं. इन लोगों का अतीत क्या रहा है और गुजरात में इन लोगों ने इससे पहले क्या किया है ये हम सबको पता है. लेकिन ये प्राइवेसी का तो हनन है ही ये आने वाले चुनाव को भी प्रभावित कर सकता है. लोगों की पसंद को प्रभावित करना क्योंकि आपके पास उनके डेटा और डिवाइस का एक्सेस है.”

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‘सरकार अपने खिलाफ़ जांच ठीक से कैसे करेगी’
ये जानना कि आप संभावित सर्विंलांस पर हैं और इस बात का हर पल अहसास रहना मानसिक रूप से कितना परेशान करता है.
इस बात का जवाब वर्धराजन और चतुर्वेदी लगभग एक ही तरह से देते हैं.
वर्धराजन कहते हैं कोई सरकार कड़ी आलोचना पसंद नहीं करती लेकिन अंतर बस ये होता है कि कुछ सरकारों की सहन करने की क्षमता बेहतर होती है तो कुछ को बिलकुल आलोचना बर्दाश्त नहीं होती. लेकिन हम जैसे लोग जब इस पेशे में आए तो हमें हमेशा पता था कि डर की कोई जगह नहीं है पत्रकारिता में, या मैं ये कहूं कि डेमोक्रेसी में भी डर की कोई जगह नहीं हो सकती. अगर लोकतंत्र को बचाए रखना है तो डर पूरी तरह ख़त्म होना चाहिए.
प्रियंका चतुर्वेदी कहती हैं कि “जिस तरह के हालात हैं मुझे नहीं लगता कि ये सर्विलांस ख़त्म होने वाला है लेकिन देश के लिए आवाज़ उठाने की अगर यही क़ीमत है तो मैं ये क़ीमत चुकाऊंगी.”
द वॉशिंगटन पोस्ट को दिए जवाब में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कहा है कि “हमने इस मामले में तकनीकी जांच शुरू कर दी है. अब तक, एप्पल ने जांच प्रक्रिया में पूरा सहयोग किया है.”
अख़बार से बात करते हुए भारत की टेक नीतियों पर काम करने वाली न्यूज़ वेबसाइट मीडियानामा के संस्थापक निखिल पहवा ने कहा, “भारत सरकार ख़ुद पर ही लगे आरोपों की जांच निष्पक्ष होकर कैसे कर सकती है. भारत सरकार बस कहने के लिए ये बातें कर रही है जैसा हम अक्सर सरकार को करते हुए देखते हैं वो मामले को ठंडा करने के लिए ऐसी बातें करती है.”

पेगासस से जासूसी
जुलाई, 2021 में, यानी दो साल पहले फॉरबिडेन स्टोरीज़ के साथ मिल कर दुनिया की कुछ न्यूज़ संस्थाओं ने एक खोजी रिपोर्ट की जिसमें दावा किया गया कि दुनियाभर के कई पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के फोन हैक किए गए.
पेगासस नाम के जिस स्पाईवेयर से फ़ोन हैक करने की बात की गई उसे तैयार करने वाली कंपनी एनएसओ ने तमाम आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वो संप्रभु देश की सरकारों को ही ये सॉफ्टवेयर बेचती हैं और इसका उद्देश्य "आतंकवाद और अपराध के ख़िलाफ़ लड़ना" है.
उस समय भारत में द वायर ने इस रिपोर्ट को छापा था. जिसमें दाव किया गया था कि देश में 40 पत्रकार, तीन विपक्ष के बड़े नेता, एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति, मोदी सरकार के दो मंत्री और सुरक्षा एजेंसियों के मौजूदा और पूर्व प्रमुख समेत कई बिजनेसमैन पर पेगासस का इस्तेमाल हुआ है.
उस समय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सदन में बयान देते हुए कहा था कि बेहद सनसनीखेज़ स्टोरी चली, इस स्टोरी में बड़े-बड़े आरोप लगाए गए. मॉनसून सत्र से एक दिन पहले प्रेस रिपोर्टों का आना संयोग नहीं हो सकता है. ये भारतीय लोकतंत्र को बदनाम करने की साज़िश है. उन्होंने साफ़ किया कि इस जासूसी कांड से सरकार का कोई लेना-देना नहीं.
हालांकि भारत सरकार ने कभी भी इस बात पर स्पष्ट रूप से ये नहीं कहा है कि उन्होंने एनएससो ग्रुप से पेगासस स्पाइवेयर नहीं ख़रीदा.

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पेगासस काम कैसे करता है?
पेगासस एक स्पाइवेयर है जिसे इसराइली साइबर सुरक्षा कंपनी एनएसओ ग्रुप टेक्नॉलॉजीज़ ने बनाया है.
ये एक ऐसा प्रोग्राम है जिसे अगर किसी स्मार्टफ़ोन में डाल दिया जाए, तो कोई हैकर उस स्मार्टफ़ोन के माइक्रोफ़ोन, कैमरा, ऑडियो और टेक्सट मेसेज, ईमेल और लोकेशन तक की जानकारी हासिल कर सकता है.
साइबर सुरक्षा कंपनी कैस्परस्काई की एक रिपोर्ट के अनुसार, पेगासस आपको एन्क्रिप्टेड ऑडियो सुनने और एन्क्रिप्टेड संदेशों को पढ़ने लायक बना देता है.
एन्क्रिप्टेड ऐसे संदेश होते हैं जिसकी जानकारी सिर्फ मेसेज भेजने वाले और रिसीव करने वाले को होती है. जिस कंपनी के प्लेटफ़ॉर्म पर मेसेज भेजा जा रहा, वो भी उसे देख या सुन नहीं सकता.
पेगासस के इस्तेमाल से हैक करने वाले को उस व्यक्ति के फ़ोन से जुड़ी सारी जानकारियां मिल सकती हैं.
पेगासस से जुड़ी जानकारी पहली बार साल 2016 में संयुक्त अरब अमीरात के मानवाधिकार कार्यकर्ता अहमद मंसूर की बदौलत मिली.
उन्हें कई एसएमएस प्राप्त हुए थे, जो उनके मुताबिक संदिग्ध थे. उनका मानना था कि उनमें लिंक गलत मकसद से भेजे गए थे.
उन्होंने अपने फ़ोन को टोरंटो विश्वविद्यालय के 'सिटीजन लैब' के जानकारों को दिखाया. उन्होंने एक अन्य साइबर सुरक्षा फर्म 'लुकआउट' से मदद ली.
मंसूर का अंदाज़ा सही था. अगर उन्होंने लिंक पर क्लिक किया होता, तो उनका आइफ़ोन मैलवेयर से संक्रमित हो जाता. इस मैलवेयर को पेगासस का नाम दिया गया. लुकआउट के शोधकर्ताओं ने इसे किसी "एंडपॉइंड पर किया गया सबसे जटिल हमला बताया."
गौर करने वाली बात ये है कि आमतौर पर सुरक्षित माने जाने वाले एप्पल फ़ोन की सुरक्षा को ये प्रोग्राम भेदने में कामयाब हुआ. हालांकि एप्पल इससे निपटने के लिए अपडेट लेकर आया था.
इसके बाद साल 2017 में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक मेक्सिको की सरकार पर पेगासस की मदद से मोबाइल की जासूसी करने वाला उपकरण बनाने का आरोप लगा.
रिपोर्ट के मुताबिक इसका इस्तेमाल मेक्सिको में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ किया जा रहा था.

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मैक्सिको के जाने-माने पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी सरकार पर मोबाइल फ़ोन से जासूसी करने का आरोप लगाते हुए इसके ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि पेगासस सॉफ्टवेयर मैक्सिको की सरकार को इसराइली कंपनी एनएसओ ने इस शर्त पर बेचा थी कि वो इसका इस्तेमाल सिर्फ़ अपराधियों और चरमपंथियों के ख़िलाफ़ करेंगे.
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक इस सॉफ्टवेयर की ख़ासियत यह है कि यह स्मार्टफ़ोन और मॉनिटर कॉल्स, टेक्स्ट्स और दूसरे संवादों का पता लगा सकता है. यह फ़ोन के माइक्रोफोन या कैमरे को एक्टिवेट भी कर सकता है.
कंपनी पर सऊदी सरकार को सॉफ्टवेयर देने का भी आरोप है, जिसका कथित तौर पर पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या से पहले जासूसी करने के लिए इस्तेमाल किया गया था.
एनएसओ कंपनी हमेशा से दावा करती रही है कि ये प्रोग्राम वो केवल मान्यता प्राप्त सरकारी एजेंसियों को बेचती है और इसका उद्देश्य "आतंकवाद और अपराध के ख़िलाफ़ लड़ना" है.
कंपनी ने कैलिफ़ोर्निया की अदालत में कहा था कि वह कभी भी अपने स्पाइवेयर का उपयोग नहीं करती है - केवल संप्रभु सरकारें करती हैं.
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