पेगासस जासूसी मामले में सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का क्या असर होगा?

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- Author, शुभम किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट ने पेगासस जासूसी मामले की जाँच के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है.
इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज आरवी रविंद्रन, आलोक जोशी और संदीप ओबेरॉय होंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने ये फ़ैसला कई याचिकाओं के जवाब में दिया है, जिनमें कोर्ट से पेगासस जासूसी मामले में अदालत की निगरानी में स्वतंत्र जाँच की मांग की गई थी.
जुलाई में आई कई मीडिया संस्थाओं की रिपोर्ट में इसराइल की सर्विलांस कंपनी एनएसओ ग्रुप के सॉफ्टवेयर पेगासस का इस्तेमाल कर कई पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नेताओं, मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों के फ़ोन की जासूसी करने का दावा किया गया था.
50 हज़ार नंबरों के एक बड़े डेटा बेस के लीक की पड़ताल द गार्डियन, वॉशिंगटन पोस्ट, द वायर, फ़्रंटलाइन, रेडियो फ़्रांस जैसे 16 मीडिया संस्थानों के पत्रकारों ने की थी.
इसी मामले की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई थीं, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने जाँच कमिटी बनाने का फ़ैसला किया.
आठ हफ़्ते के बाद इस मामले की फिर सुनवाई होगी. यानी आठ हफ़्ते में यह कमिटी सुप्रीम कोर्ट को अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपेगी. लेकिन अब सवाल ये उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से मामले की निष्पक्ष जांच में कुछ मदद मिलेगी?

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पेगासस ख़रीदा या नहीं - सरकार ने अभी तक नहीं बताया
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता मानते हैं कि क़ानूनी लिहाज से ये फ़ैसला अहम है लेकिन कई मायनों में निराशाजनक भी.
कोर्ट के सामने सबसे अहम सवाल ये था कि कि केंद्र या किसी राज्य सरकार ने पेगासस सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल किया या नहीं. सरकार ने इस मामले पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया, न तो संसद में और ना ही सुप्रीम कोर्ट में.
विराग कहते हैं, "जाँच समिति के पास तो बयान दर्ज करने और रिपोर्ट देने का ही अधिकार है. तो फिर समिति को यह स्पष्ट जानकारी सरकार से कैसे मिलेगी?"
हालांकि सुप्रीम कोर्ट में वकील कामिनी जयसवाल सर्वोच्च अदालत के इस फ़ैसले को एक उम्मीद की तरह देखती हैं. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मुझे उम्मीद है कि इस मामले में इस कमिटी से मदद मिलेगी. कई कागज़ात हैं पेगासस से जुड़े, कई मीडिया संस्थाओं ने ख़बरें लिखीं,तो हर पहलू से इसकी जाँच की जाएगी."

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उनका ये भी कहना है कि मामले की जड़ तक पहुँचने के लिए सिर्फ़ सरकार के जवाब पर निर्भरता नहीं रहती. उनका कहना है कि कमिटी कंपनी से और इस मामले में जुड़े दूसरे लोगों और साक्ष्यों को ध्यान में रखकर ही रिपोर्ट पेश करेगी.
सरकार इस मामले में सुरक्षा कारणों का हवाले देकर भी जानकारियां देने से कतरा रही हैं. लेकिन जयसवाल के मुताबिक़ कोर्ट का रुख़ साफ़ है कि सुरक्षा कारणों की बात कह सरकार जवाबदेही से बच नहीं सकती है.
सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई के दैरान कहा कि हरेक नागरिक को निजता के उल्लंघन से सुरक्षा मिलनी चाहिए.
रिपोर्ट जमा करने की कोई समय सीमा नहीं
सुप्रीम कोर्ट की बनाई गई जाँच समिति को अपनी अंतिम रिपोर्ट देने के लिए कोई तय समय सीमा नहीं दी गई है, आठ हफ़्तों में सुनवाई होगी और लेकिन कमिटी के लिए किसी नतीजे पर इतनी जल्दी पहुँचना मुमकिन नहीं होगा.
विराग गुप्ता कहते हैं, "बहुत समय के बाद अगर कोई लंबी चौड़ी रिपोर्ट आती है, तब तक ये मामला बेमानी हो जाएगा."

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"इसके अलावा पूरी जाँच में सात बिंदु हैं, जिनमें साइबर सुरक्षा से जुड़े पहलू भी हैं. समिति पीड़ितों से तो बात करेगी ही, वो राज्य सरकारों का पक्ष भी सुनेगी, तो यह भी अंदेशा जताया जा रहा है कि कहीं मुद्दा सरकार की जवाबदेही से भटक न जाए."
पिछली कमिटियों का उदाहरण देते हुए गुप्ता कहते हैं, "सीबीआई डायरेक्टर के विवाद के समय सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठे थे. तत्कालीन चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई ने न्यायिक व्यवस्था को ख़तरे में डालने के आपराधिक साज़िश की जाँच के लिए पूर्व जज पटनायक कमिटी का गठन किया था, जो किसी तर्कसंगत नतीजे पर नहीं पहुँची."
"इसी तरीक़े से कृषि क़ानून के बारे में भी सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई. आंध्र प्रदेश में बलात्कार के अभियुक्तों की पुलिस एनकाउंटर में मौत के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट की जाँच समिति का कार्यकाल कई बार बढ़ाया जा चुका है. इस पृष्ठभूमि में पेगासस जाँच समिति से सार्थक निष्कर्ष की उम्मीद कैसे की जाए?"
कामिनी जयसवाल इस बात को तो मानती हैं कि पहले कई कमिटियों के कारण नतीजे बहुत अच्छे नहीं नहीं रहे, लेकिन वो कहती हैं इसका मतलब ये नहीं है कि ये कमिटी मामले के तह तक नहीं पहुँच पाएगी.
उनका कहना है कि ये कमिटी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम करेगी और कोर्ट की कोशिश ये सुनिश्चित करना है कि मामले की सच्चाई सामने आए. वो इस बात से भी इनकार करती हैं कि शुरुआत में समय सीमा तय नहीं करने से नुक़सान होगा.
वो कहती है, "ये कोई छोटी-मोटी जाँच नहीं होगी. इसके कई पहलू होंगे और वो कई बातें पर निर्भर करेगा, हो सकता है इसमें कई और बातें सामने आएं और कई नए लोगों के बारे में पता चलेगा."
"सुप्रीम कोर्ट ने एक तय समय के बाद कमिटी से अंतरिम रिपोर्ट देने के लिए कहा है. उसके बाद उस हिसाब से कमिटी को समय दिया जाएगा. कोर्ट की कोशिश होगी की मामले की जाँच सही तरीक़े से हो और बिना किसी वजह से देरी न हो."
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विराग का ये भी कहना है कि सिर्फ़ राजनीतिक विवाद या निजता के लिहाज से देखना ग़लत है.
"इस मामले में बड़े नेता, अफसर, मंत्री, जज, वकील और पत्रकारों के मोबाइल फ़ोन हैक करके के जासूसी के गंभीर आरोप हैं. यदि यह काम विदेशी शक्तियों द्वारा किया जा रहा है तो इससे राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता को बड़ा ख़तरा है. आईटी क़ानून के अनुसार ऐसे मामले साइबर आतंकवाद अपराध के दायरे में आते हैं."
उनका मानना है कि सिविल जाँच के साथ ऐसे मामलों में पुलिस और सीबीआई द्वारा आपराधिक मामला भी दर्ज होने के लिए आदेश होना चाहिए, जिससे कि सबूत नष्ट नहीं हो सके. लेकिन जाँच समिति के गठन के बाद इस मामले की आपराधिकता पर फ़िलहाल कोई कार्रवाई होना मुश्किल लगता है.
कई दूसरे जानकारों का मानना है कि इस तरह से निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले कमिटी की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में आगे की सुनवाई और रूख़ का इंतज़ार करना चाहिए.

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क्या है मामला?
दुनिया की कई मीडिया संस्थानों ने इसराइल की सर्विलांस कंपनी एनएसओ ग्रुप के साफ़्टवेयर पेगासस पर पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नेताओं, मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों के फ़ोन की जासूसी करने का दावा किया था.
विपक्ष इस पर बहस और जाँच की मांग कर रहा है और उसने सरकार से स्पष्ट करने को कहा है कि क्या पेगासस साफ़्टवेयर सरकार ने ख़रीदा था.
सरकार फ़ोन की जासूसी के आरोपों को ख़ारिज कर रही है और इसे फ़ेक न्यूज़ बता रही है. इस मामले पर आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने रिपोर्ट के जारी होने के समय को लेकर सवाल खड़े किए थे.
सदन में बयान देते हुए उन्होंने कहा था, "एक वेब पोर्टल पर बेहद सनसनीखेज़ स्टोरी चली. इस स्टोरी में बड़े-बड़े आरोप लगाए गए. मॉनसून सत्र से एक दिन पहले प्रेस रिपोर्टों का आना संयोग नहीं हो सकता है. ये भारतीय लोकतंत्र को बदनाम करने की साज़िश है.''
उन्होंने कहा था, ''इस जासूसी कांड से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है. डेटा से ये साबित नहीं होता कि सर्विलांस हुआ है. सर्विलांस को लेकर सरकार का प्रोटोकॉल बेहद सख़्त है, क़ानूनी इंटरसेप्शन के लिए भारतीय टेलिग्राफ़ एक्ट और आईटी एक्ट के तय प्रावधानों के अंतर्गत ये किया जा सकता है."
केंद्रीय मंत्री वैष्णव के इस बयान के कुछ देर बाद ही पेगासस प्रोजेक्ट की दूसरी रिपोर्ट सामने आई, जिसमें कथित जासूसी वाले नंबर में उनका नाम भी शामिल था. इस दूसरी कड़ी में नेता, मंत्रियों, नौकरशाहों और राजनीति से जुड़े लोगों के नाम शामिल थे.
केंद्र सरकार के पूर्व आईटी मंत्री और बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर रिपोर्ट की टाइमिंग पर सवाल उठाए थे और रिपोर्ट को एमनेस्टी जैसी संस्थाओं का भारत विरोधी एजेंडा बताया.
इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने एक बयान जारी करके आरोपों को 'साज़िश' बताया था और कहा था, "विघटनकारी और अवरोधक शक्तियां अपने षड्यंत्रों से भारत की विकास यात्रा को नहीं रोक पाएंगी"

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कांग्रेस ने क्या कहा
कांग्रेस ने बुधवार को पेगासस पर एक्सपर्ट कमिटी गठित करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि इसने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बचने और ध्यान भटकाने की सरकार की तथाकथित कोशिशों को नकार दिया है.
ट्विटर पर कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने लिखा, "डरपोक फासीवादियों के लिए छद्म-राष्ट्रवाद अंतिम पनाहगाह होता है."
"राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बचने और ध्यान भटकाने की सरकार की कोशिश के बीच पेगासस स्पाइवेयर के दुरुपयोग की जाँच के लिए विशेष समिति के गठन के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत है. सत्यमेव जयते."
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राहुल गांधी ने एक ट्वीट में कहा, "सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर का हम स्वागत करते हैं. बात राजनीति की नहीं है- ये देश के लोकतांत्रिक ढाँचे पर, जनता पर और आज़ादी पर हमला है. ये हमला करने का निर्देश सिर्फ़ दो ही लोग दे सकते हैं और जब सच सामने आएगा उनके पास कोई जवाब नहीं होगा."
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बीजेपी ने क्या कहा?
इस मामले पर भारतीय जनता पार्टी ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला सरकार के ही इस मामले पर दिए गए शपथ पत्र के मुताबिक़ है.
पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी का भी मखौल उड़ाते हुए कहा कि वो बीजेपी को निशाना बनाने के लिए एक ही तरह की शब्दावली का इस्तेमाल करते है और बातों को दोहराते हैं.
संबित पात्रा ने कहा, "आज सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय को लेकर राहुल गांधी जी ने फिर उन्हीं शब्दों का उच्चारण किया, जो वो हमेशा करते हैं. राहुल गांधी और कांग्रेस इस विषय को लेकर कोर्ट नहीं गए थे."
पात्रा ने कहा, "भ्रम और राहुल गांधी जी का गहरा रिश्ता रहा है. झूठ बोलना, भ्रम फैलाना ये राहुल गांधी जी की आदत रही है".
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क्या है पेगासस?
पेगासस को इसराइल की साइबर सुरक्षा कंपनी एनएसओ ने तैयार किया है. बांग्लादेश समेत कई देशों ने पेगासस स्पाईवेयर ख़रीदा है. इसे लेकर पहले भी विवाद हुए हैं.
मेक्सिको से लेकर सऊदी अरब की सरकार तक पर इसके इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए जा चुके हैं. व्हाट्सऐप के स्वामित्व वाली कंपनी फ़ेसबुक समेत कई दूसरी कंपनियों ने इस पर मुक़दमे किए हैं.
भारत के बारे में आधिकारिक तौर पर ये जानकारी नहीं है कि सरकार ने एनएसओ से 'पेगासस' को ख़रीदा है या नहीं.
ये एक ऐसा प्रोग्राम है जिसे अगर किसी स्मार्टफ़ोन फ़ोन में डाल दिया जाए, तो कोई हैकर उस स्मार्टफोन के माइक्रोफ़ोन, कैमरा, ऑडियो और टेक्स्ट मेसेज, ईमेल और लोकेशन तक की जानकारी हासिल कर सकता है.

साइबर सुरक्षा कंपनी कैस्परस्काई की एक रिपोर्ट के अनुसार, पेगासस आपको एन्क्रिप्टेड ऑडियो सुनने और एन्क्रिप्टेड संदेशों को पढ़ने लायक बना देता है.
एन्क्रिप्टेड ऐसे संदेश होते हैं जिसकी जानकारी सिर्फ मेसेज भेजने वाले और रिसीव करने वाले को होती है. जिस कंपनी के प्लेटफ़ॉर्म पर मेसेज भेजा जा रहा, वो भी उसे देख या सुन नहीं सकती.
पेगासस के इस्तेमाल से हैक करने वाले को उस व्यक्ति के फ़ोन से जुड़ी सारी जानकारियां मिल सकती हैं.
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