सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस की पुलिस व्यवस्था से नाराज़गी का असर क्या होगा?

जस्टिस एन वी रमन्ना

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    • Author, भूमिका राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना ने देश में नौकरशाही को लेकर, ख़ासतौर पर पुलिस अधिकारियों के व्यवहार पर आपत्ति ज़ाहिर की है.

मुख्य न्यायाधीश ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान कहा, "मुझे इस बात पर बहुत आपत्ति है कि नौकरशाही, विशेष रूप से पुलिस अधिकारी कैसे व्यवहार कर रहे हैं."

उन्होंने यह भी कहा कि इस बात के ध्यानार्थ नौकरशाहों ख़ासकर पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज शिकायतों की जांच के लिए एक स्थायी समिति के गठन पर विचार भी किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट

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मुख्य न्यायधीश ने यह टिप्पणी किस संदर्भ में की

लाइव लॉ के मुताबिक, चीफ़ जस्टिस ने यह टिप्पणी छत्तीसगढ़ के निलंबित अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक गुरजिंदर पाल सिंह की एक याचिका पर सुनवाई करने के दौरान की. इसमें उन्होंने अपने ख़िलाफ़ दर्ज आपराधिक मामलों में सुरक्षा की मांग की थी.

गुरजिंदर पाल सिंह पर राजद्रोह, जबरन वसूली और आय से अधिक संपत्ति के गंभीर आरोप लगाए गए हैं. इस पीठ में चीफ़ जस्टिस के अलावा न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली भी शामिल थे.

याचिका पर सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस ने कहा था, "बेहद दुखद स्थिति है. जब कोई राजनीतिक दल सत्ता में होता है तो पुलिस अधिकारी उसके साथ होते हैं. फिर विपक्षी पार्टी के सत्ता में आने के बाद उन अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू करती है. यह नया चलन है, जिसे रोकने की ज़रूरत है."

अपनी टिप्पणी में चीफ़ जस्टिस ने कहा कि मैं एक बार नौकरशाहों, विशेष तौर पर पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ शिकायत की जाँच के लिए एक स्थायी समिति बनाने के बारे में विचार कर रहा था. यह पैनल संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में होता. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वह अपने इस विचार को अभी फ़िलहाल के लिए सुरक्षित रखना चाहते हैं.

पुलिस

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पुलिस विभाग और राजनीतिक प्रभाव

रिटायर्ड आईपीएस विभूति नारायण राय चीफ़ जस्टिस की टिप्पणी पर कहते हैं कि ये बिल्कुल सही है कि मौजूदा समय में देश में स्थिति अच्छी नहीं है.

वह कहते हैं,"चीफ़ जस्टिस ने जो कुछ टिप्पणी की है वह कुछ उदाहरणों के आधार पर ही की है और ऐसे में उनका कहना पूरी तरह से सही है कि देश में स्थिति दुखद है और सुधार की पर्याप्त आवश्यकता है."

हालांकि विभूति नारायण राय यह भी कहते हैं समिति बनाने की बात नई नहीं है. पुलिस विभाग में सुधार के लिए कई समितियां बनी हैं लेकिन समितियां जो संस्तुति सरकारों के पास लागू करने के लिए भेजती हैं, वे लागू ही नहीं हो पाती हैं.

वह कहते हैं, "चीफ़ जस्टिस ने समिति के गठन के विषय में सोचा, अगर ऐसा करने से सुधार होता है तो यह अच्छा ही होगा. पुलिस विभाग के लिए भी और देश के लिए भी."

राजनीतिक प्रभाव वाली चीफ़ जस्टिस की टिप्पणी पर वह कहते हैं, "इससे तो किसी सूरत में इनकार नहीं किया जा सकता है. यही भ्रष्टाचार का सबसे अहम कारण भी है. भ्रष्ट नेता को भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की ज़रूरत होती है और ऐसे अधिकारी को अपने जैसे नेता की."

चीफ़ जस्टिस की टिप्पणी पर हमने कई कार्यरत पुलिस अधिकारियों से बात करने की कोशिश की. ज़्यादातर पुलिस अधिकारियों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस की टिप्पणी पर असहमति या दूसरे विचार का सवाल नहीं उठता.

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राज्य सरकारें आज्ञा का पालन करें तो सुधार मुश्किल नहीं

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह कहते हैं कि चीफ़ जस्टिस ने पुलिस अधिकारियों के संदर्भ में जो कुछ कहा है, मैं उससे पूरी तरह से सहमत हूँ.

वह कहते हैं, ''चीफ़ जस्टिस ने समिति बनाने की जो बात की है लेकिन सुप्रीम कोर्ट पहले के अपने आदेशों में, याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पुलिस विभाग में सुधार के लिए ज़िला स्तर, राज्य स्तर पर समितियों के गठन का आदेश दे चुका है.''

वह कहते हैं कि साल 2006 में उन्होंने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट में इस संदर्भ में याचिका डाली थी.

वह बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने सुधार के लिए आदेश दिए थे लेकिन ज़मीनी स्तर पर आज्ञा का पालन नहीं हुआ. राज्य सरकारों ने उन्हें सही ढंग से लागू नहीं किया. कुछ राज्यों ने अगर आदेशों को लागू भी किया तो उनका पालन सही ढंग से नहीं किया.

वह कहते हैं कि ऐसे में किसी नई समिति के बारे में सोचने से बेहतर तो यही है कि राज्य सरकारों को आदेश दिया जाए कि पुलिस विभाग में सुधार के लिए जारी पहले के आदेशों का पालन हो. राज्य और ज़िला स्तर पर, कारगर तरीक़े से इसका पालन हो.

प्रकाश सिंह पुलिस विभाग के साथ-साथ हर विभाग पर राजनीतिक प्रभाव की बात कहते हैं.

वह कहते हैं कि सरकारें बदलने के साथ ही पुलिस अधिकारियों और नौकरशाहों के तबादले हो जाते हैं, क्योंकि राजनेताओं को लगता है कि जो पुलिस अधिकारी पिछली सरकार के दौरान क़रीबी रहा, वह अब उनका सगा नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट

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चीफ़ जस्टिस की टिप्पणी की गंभीरता

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन मानती हैं कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी बेहद गंभीर है.

वह कहती हैं कि चीफ़ जस्टिस के सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जिसमें पुलिस अधिकारियों के ऊपर गंभीर आरोप थे/हैं और उनकी यह टिप्पणी इसी आधार पर है.

रेबेका मानती हैं कि भारत में 'ताक़त' कुछ विभागों और अधिकरियों तक सीमित है, ऐसे में जवाबदेही भी तय होनी चाहिए. लेकिन ऐसा है नहीं. इसलिए कई बार, कई मामलों में पुलिस अधिकारी, नौकरशाह अपनी ताक़त का ग़लत इस्तेमाल करते हैं. लेकिन जवाबदेही तय होनी चाहिए.

और इस लिहाज़ से चीफ़ जस्टिस की यह टिप्पणी और गंभीर हो जाती है. अगर कोई समिति हो जहाँ, पुलिस अधिकारियों, नौकरशाहों के ख़िलाफ़ आने वाली शिकायतों की स्वतंत्र जाँच हो तो बेशक इससे जवाबदेही तय होगी.

गोरखपुर

पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते चर्चित और हालिया मामले

चीफ़ जस्टिस का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश की राजधानी समेत देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में पुलिस की कथित मनमानी और बर्बर व्यवहार को लेकर उंगली उठ रही है.

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले में एक होटल में कानपुर के कारोबारी मनीष गुप्ता की संदिग्ध मौत के मामले में छह पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ हत्या का मुक़दमा दर्ज किया गया है.

आरोप है कि गोरखपुर पुलिस की एक टीम रात में क़रीब 12 बजे नियमित जाँच के लिए होटल पहुँची और यहाँ ठहरे मनीष गुप्ता के साथ कथित तौर पर मारपीट की, जिससे उनकी मौत हो गई.

लेकिन यह कोई पहला मामला नहीं है, जिसमें पुलिस पर आरोप लगे हैं.

पुलिस

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इससे पहले साल 2020 में हुए दिल्ली दंगों में भी पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे हैं. कुछ मामलों में तो खुद अदालत ने पुलिस को फ़टकार लगायी है. शांति, निस्वार्थ सेवा, न्याय के स्लोगन वाली दिल्ली पुलिस को कई बार अपनी जांच, कार्रवाई और स्थिति संभालने में अक्षमता के लिए शर्मसार होना पड़ा है.

बीते महीने (20 सितंबर को) दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई थी. इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट से लेकर अन्य निचली अदालतें दिल्ली पुलिस की जांच और उसकी चार्जशीट पर सवाल उठा चुकी हैं.

दिल्ली दंगों के संबंध में पुलिस पर आरोप लगे कि उसने दंगों को रोकने के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठाए. अदालतों में दिल्ली पुलिस के अधिकारियों से जवाब तक मांगे गए.

एक मौक़ा ऐसा भी आया जब दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस एस मुरलीधर को दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिश्नर से यह कहना पड़ा कि 'जब आपके पास भड़काऊ भाषणों के क्लिप मौजूद हैं तो एफ़आईआर दर्ज करने के लिए आप किसका इंतज़ार कर रहे हैं?'

हिंसा में लाल शर्ट पहना एक व्यक्ति पिस्तौल के साथ नज़र आया

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कोर्ट में यह भी कहा गया था कि 'शहर जल रहा है, तो कार्रवाई का उचित समय कब आएगा?'

हैदराबाद की महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार और उनकी हत्या के मामले में चार अभियुक्तों के एनकाउंटर को लेकर भी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पुलिस पर सवाल उठाए.

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नई नहीं है चीफ़ जस्टिस की ऐसी टिप्पणी

हालांकि यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब चीफ़ जस्टिस ने पुलिस विभाग को लेकर तल्ख़ टिप्पणी की है.

इससे पूर्व अगस्त महीने में भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमन्ना ने एक बयान में कहा था कि पुलिस स्टेशन मानवाधिकारों और मानवीय सम्मान के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि संवैधानिक गारंटी के बावजूद पुलिस हिरासत में उत्पीड़न और मौत की घटनाएं जारी हैं.

उन्होंने कहा था, "मानवाधिकारों और मानवीय सम्मान के लिए सबसे बड़ा ख़तरा पुलिस स्टेशन हैं. हाल की रिपोर्टों को देखा जाए तो विशेषाधिकार प्राप्त लोग भी थर्ड डिग्री व्यवहार से बच नहीं पाते हैं."

जस्टिस रमन्ना ने कहा था कि पुलिस हिरासत में आए व्यक्ति के पास तुरंत क़ानूनी सहायता उपलब्ध नहीं होती है और हिरासत के पहले घंटे आमतौर पर ये तय करते हैं कि अभियुक्त का क्या होगा.

जस्टिस रमन्ना ने ये बातें दिल्ली के विज्ञान भवन में नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी के ऐप को जारी करने के कार्यक्रम में कही थीं.

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