वो मुस्लिम समूह, जो ना रोज़ा रखता है और ना हर दिन नमाज़ पढ़ता है

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- Author, रुकिया बुले
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
मध्य सेनेगल का एक गाँव मबैके कादिओर. यहां शाम ढलते ही स्थानीय मुसलमानों की प्रार्थना के स्वर हवा में गूंज उठते हैं.
ये मुसलमान थोड़े अलग हैं. इनके कपड़ों पर पैचवर्क (अलग-अलग रंगों के पैबंद) किया गया है.
मुसलमानों के इस समुदाय को बाय फ़ॉल कहा जाता है.
एक मस्ज़िद के बाहर बाय फ़ॉल के अनुयायी एक छोटा घेरा बनाकर इकट्ठा होते हैं. फिर झूमते-गाते हैं. इनकी आवाज़ एक साथ उठती और गिरती है.
इसके बैकग्राउंड में धधकती हुई आग है, जिसकी परछाई इन अनुयायियों के बहुरंगी कपड़ों पर नाचती हुई दिखती है.
यह इस संप्रदाय का एक पवित्र अनुष्ठान है, जिसे 'साम फ़ॉल' के नाम से जाना जाता है.

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दरअसल, यह एक उत्सव और भक्ति का कार्य है. इसमें जब वो चलते हैं, तो उनके बाल झूलते दिखते हैं. उनका चेहरा पसीने और उत्साह से चमक उठता है.
इबादत में शामिल लोग उसमें डूब जाते हैं. ऐसा हफ्ते में दो बार होता है और अमूमन दो घंटे तक चलता है.
बाय फ़ॉल सेनेगल के बड़े मौराइड ब्रदरहुड का एक उप-समूह है, जो अन्य मुस्लिम समूहों से अलग है.
वे पश्चिमी अफ़्रीका के प्रमुख मुस्लिम देश सेनेगल की 1 करोड़ 70 लाख की आबादी का एक छोटा सा हिस्सा है. मगर, उनकी आकर्षक उपस्थिति ही उनको दूसरों से अलग बनाती है.
हालांकि, कुछ लोग मानते हैं कि उनकी प्रथाएं इस्लामिक तौर-तरीकों से बहुत दूर हैं.
क्या मानते हैं बाय फ़ॉल के अनुयायी?

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बाय फ़ॉल के अनुयायियों के लिए विश्वास वो नहीं है, जो दूसरे मुसलमान दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़कर और रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़ा रखकर व्यक्त करते हैं, बल्कि ये लोग कठिन परिश्रम और सामुदायिक सेवाओं के ज़रिए इस विश्वास को व्यक्त करते हैं. क्योंकि, उनकी नज़रों में जन्नत सिर्फ़ मंज़िल नहीं, बल्कि मेहनत करने वालों के लिए एक इनाम है.
आमतौर पर इन लोगों को अन्य मुस्लिमों द्वारा ग़लत समझा जाता है. पश्चिम में एक ग़लत धारणा है कि इनमें से कुछ लोग शराब तो कुछ गांजा पीते हैं, जो उनके तौर-तरीके का हिस्सा नहीं है.
मबैके कादिओर में बाय फ़ॉल समूह के नेता हैं माम सांबा. उन्होंने बीबीसी से कहा, "बाय फ़ॉल समुदाय का दर्शन काम पर केंद्रित है. यह एक रहस्यमय तरह का काम है, जहां श्रम ही ईश्वर के प्रति समर्पण है."
वह मानते हैं कि हर कार्य का आध्यात्मिक महत्व है. फ़िर वो कड़ी धूप में खेत की जोताई करना हो, या स्कूल का निर्माण करना हो, या कोई सामान तैयार करना हो.
काम केवल कर्तव्य नहीं है. यह एक ध्यानपूर्ण क्रिया है, जिसमें आप इबादत करते हैं.
समुदाय का क्या मानना है?

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समुदाय का मानना है कि मबैके कादिओर गाँव में ही उनके संस्थापक इब्राहिमा फ़ॉल पहली बार शेख अहमदौ बाम्बा से मिले थे, जिन्होंने 19वीं सदी में मौराइड ब्रदरहुड की स्थापना की थी.
यह सूफी इस्लाम की एक शाखा है, जो सेनेगल में एक प्रभावी भूमिका निभाती है.
फ़ॉल के लिए कहा जाता है कि उन्होंने पूरी तरह से बाम्बा की सेवाओं के लिए खुद को समर्पित कर दिया था. आमतौर पर वो खुद की ज़रूरतों जैसे- भोजन, रोज़ा रखना, नमाज़ पढ़ना और खुद का ध्यान रखना, को नज़रअंदाज़ कर जाते थे.
उनके अनुयायी बताते हैं कि समय के साथ उनके कपड़े ख़राब होते चले गए. उनमें पैबंद लगते चले गए.
ये उनकी निःस्वार्थ भक्ति को दर्शाते हैं. इस तरह से बाय फ़ॉल का दर्शन और पैबंद वाले कपड़े पहनने की परंपरा की शुरुआत हुई.
एक धार्मिक नेता के प्रति इस तरह की वफ़ादारी का अभ्यास इसके अनुयायी करते हैं. इस अवधारणा को "एनडिगुएल" कहा जाता है. कई बाय फ़ॉल के अनुयायी अपने बच्चों के नाम में इसे भी शामिल करते हैं.
पैचवर्क वाले कपड़े क्यों पहनते हैं?

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मबैके कादिओर फ़ॉल की कार्य नीति को दर्शाती एक कार्यशाला है, जहां खूबसूरत पैचवर्क से कपड़े बनाने के लिए सहयोग और रचनात्मकता पनपती नज़र आती है.
महिलाएं शांत रहकर पूरी तल्लीनता से काम करती हैं. वे सादे कपड़ों को रंगों में डुबोती हैं. हर डुबकी के बाद कपड़ा और खूबसूरत बन जाता है. आख़िर में आकर्षक कपड़े में बदल जाता है.
इसी तरह पुरुष भी पूरी सावधानी के साथ रंगे हुए कपड़ों को लेते हैं. फिर उनको सिलाई के ज़रिए ऐसे परिधान में बदल देते हैं, जो बाय फ़ॉल की विशिष्ट पहचान को दर्शाते हैं.
एक बार जब ये कपड़े तैयार हो जाते हैं, तो इनमें कलात्मकता और श्रम का संयोग नज़र आता है. तैयार कपड़ों को सेनेगल के बाज़ारों में भेज दिया जाता है, इससे न केवल लोगों को जीविका चलती है, बल्कि ये दूर-दूर तक समुदाय की अवधारणा को फ़ैलाते हैं.

सांबा बताती हैं, "बाय फ़ॉल का तरीका ओरिजनल है." उनके दिवंगत पिता एक सम्मानित बाय फ़ॉल शेख थे. उनको सेनेगल में एक धार्मिक नेता माना जाता है.
"पैचवर्क वाले कपड़े सार्वभौमिकता को प्रदर्शित करते हैं. आप मुस्लिम हो सकते हैं और फ़िर भी अपनी संस्कृति के साथ रह सकते हैं. मगर, हर कोई इसे नहीं समझता है. हम कहते हैं कि यदि आप आलोचना को स्वीकार नहीं कर सकते हैं, तो आप प्रगति नहीं कर सकते हैं."
जबकि दूसरे मुस्लिम रमज़ान के दौरान सूर्योदय से सूर्यास्त तक रोज़ा रख रहे हैं. बाय फ़ॉल के अनुयायी इस दौरान शाम को होने वाली इफ़्तारी के लिए खाना तैयार करने में जुट जाते हैं.
यह समर्पण केवल शारीरिक कार्यों तक ही सीमित नहीं है.
बाय फ़ॉल ने क्या-क्या किया?
बाय फ़ॉल ने सेनेगल के ग्रामीण इलाकों में स्थायी विकास को बढ़ावा देने के मकसद से वहां सहकारी, सामाजिक व्यापार, और गैर-सरकारी संगठनों की स्थापना की है. उनके लिए, काम केवल जीवन जीने का ज़रिया मात्र नहीं है, बल्कि आध्यात्म को प्रदर्शित करने का एक तरीका भी है.
सांबा बताती हैं, "हमारे पास काम करने के लिए स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और सामाजिक एंटरप्राइजेस हैं."
वह कहती हैं, "हमारे जीवन दर्शन में हर चीज़ प्रकृति के प्रति सम्मान, प्यार और ध्यान रख कर की जानी चाहिए. हमारा जो स्थायी विकास का मॉडल है, उसके केंद्र में इकोलॉजी है."
मगर, समूह को (सड़कों पर भीख मांगना) जैसे कार्यों को लेकर आलोचना का भी सामना करना पड़ा है.
हालांकि, पैसा मांगना बाय फ़ॉल की मान्यता के ख़िलाफ़ नहीं है. यह पारंपरिक तौर पर किया जाता है. इसका उद्देश्य नेता को सहयोग करना है, जो समुदाय के भले के लिए इसे फ़िर से वितरित कर देते हैं.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
शेख सेने, बाम्बे शहर स्थित आलियुन डियोप यूनिवर्सिटी के भूतपूर्व वाइस चांसलर हैं. इसके अलावा वो मौराइड ब्रदरहुड के विशेषज्ञ भी हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया, " कुछ असली बाय फ़ॉल हैं और जिन्हें हम 'बाय फ़ॉक्स' कहते हैं, वो झूठे बाय फ़ॉल हैं."
इसके शहरी केंद्रों में, जैसे- राजधानी डकार में "बाय फ़ॉक्स" की मौजूदगी बढ़ती जा रही है.
सेने कहते हैं, "ये लोग हमारे जैसे कपड़े पहनते हैं और रास्ते पर भीख मांगते हैं, लेकिन समुदाय में कोई योगदान नहीं देते हैं. यह एक गंभीर मामला है, जो हमारी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाता है."
बाय फ़ॉल का ज़ोर कठिन परिश्रम और समुदाय पर है, जिसकी आवाज़ सेनेगल की सीमा से बाहर भी गूंजी है.
उनके अनुयायियों में कीटन सॉयर स्कैनलॉन एक अमेरिकी हैं, जो साल 2019 में यहां आई थीं.
इसके बाद वो इस समुदाय में शामिल हो गईं. फ़िर उनको एक सेनेगली नाम फ़ातिमा बटौली बाह दिया गया. एक फ़कीर से हुई पहली मुलाक़ात को वो उनके जीवन को बदल देने वाला पल बताती हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "ऐसा महसूस हुआ, जैसे मेरे शरीर से प्रकाश निकल रहा है. मेरे दिल ने सत्य को पहचान लिया था. यह मेरे लिए परम आध्यात्मिक भाव के जागने जैसा था."
सुश्री बाह अब बाय फ़ॉल के बीच रहती हैं. वो उनके प्रोजेक्ट्स और उनकी सेवाओं के लोकाचार का अभ्यास करती हैं. वो एक छोटे मगर बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय अनुयायियों का हिस्सा हैं, जिन्होंने इस समूह के अनोखे रास्ते को अपनाया है.
समाज में बाय फ़ॉल की क्या भूमिका?
बाय फ़ॉल सेनेगल के समाज में एक अहम भूमिका निभाते हैं. कृषि गतिविधियों के व्यापक स्तर में उनकी भागीदारी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं.
हर साल वे लोग मौजूदा मौराइड लीडर के प्रति वफ़ादारी की कसम खाते हैं. उनको ख़लीफ़ा या महान फ़कीर माना जाता है. वो पैसा, मवेशी और फ़सल को दान देकर अपनी निष्ठा प्रदर्शित करते हैं.
सेनेगल का पवित्र शहर टौबा, जो मौरिदिज़्म का एपिसेंटर माना जाता है. यहां मौजूद ग्रैंड मस्ज़िद का रख-रखाव करने का जिम्मा इन्हीं लोगों का है.
टौबा में कोई बड़ा आयोजन होने पर ग्रैंड मस्ज़िद में वे लोग अनौपचारिक सुरक्षाकर्मी की भूमिका निभाते हैं. जैसे- टौबा में होने वाला सालाना जश्न मगाल तीर्थयात्रा, इस दौरान हज़ारों लोग इस शहर में आते हैं.
उदाहरण के लिए, वे लोग यह सुनिश्चित करते हैं कि लोग शालीन कपड़े पहने. उस इलाक़े में नशीली दवाएं न बेची जाए. और ख़लीफ़ा का अपमान न किया जाए.
सेने कहते हैं, "बाय फ़ॉल ने हमेशा शहर और ख़लीफ़ा की सुरक्षा की गारंटी दी है. जब बाय फ़ॉल आसपास हो, तो कोई भी अनुचित व्यवहार करने की हिम्मत नहीं करता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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