एमपॉक्स कोरोना से कैसे अलग है, जानिए पाँच अहम बातें

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- Author, डोरकास वंगिरा, कैरोलाइन कियाम्बो
- पदनाम, बीबीसी अफ़्रीका
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एमपॉक्स यानी मंकी पॉक्स को लेकर जब ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी का एलान किया तो एक सवाल दुनियाभर में पूछा गया.
क्या एमपॉक्स नया कोराना है?
वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का जवाब है- नहीं, ऐसा नहीं है. पर हाँ लोगों की चिंता जायज़ है.
यूरोप में डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ संगठन) के क्षेत्रीय निदेशक डॉ हान्स क्लूगे ने कहा, ''एमपॉक्स नया कोराना नहीं है. आम आबादी के लिए जोखिम कम है.''
वो कहते हैं, ''हमें मालूम है कि एमपॉक्स को कैसे काबू करना है. यूरोप में इस संक्रमण को कैसे रोकना है, इस बारे में भी हम जानते हैं.

कोरोना और एमपॉक्स दोनों ही बीमारी वायरस के कारण होती हैं. लेकिन दोनों के लक्षण काफ़ी अलग हैं और इनके फैलने का तरीक़ा भी अलग है.
कीनिया के आगा ख़ान यूनिवर्सिटी अस्पताल के प्रोफ़ेसर रोडने एडम कहते हैं- दोनों बीमारियों के बीच समानताओं से ज़्यादा विभिन्नताएं हैं.
इस रिपोर्ट में आपको ऐसी ही पाँच बातों के बारे में हम बताएंगे कि कैसे एमपॉक्स कोरोना से अलग है और किन बातों का ध्यान रखने की ज़रूरत है.


1. एमपॉक्स नया वायरस नहीं
एमपॉक्स कोरोना की तरह नया वायरस नहीं है.
एमपॉक्स पहले मंकी पॉक्स के नाम से जाना जाता था. ये बीमारी साल 1958 से मौजूद है. ये वायरस सबसे पहले डेनमार्क के बंदरों में मिला था.
इंसान के इस वायरस की चपेट में आने का पहला मामला 1970 में देखने को मिला. जगह थी- डीआर कॉन्गो.
तब से पश्चिम और मध्य अफ़्रीका में ये वायरस कई बार फैला.
एमपॉक्स को लेकर ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी का एलान सबसे पहले 2022 में किया गया था. ये वायरस अब तक 70 देशों में फैल चुका है.
इससे इतर कोरोना का पहला मामला 2019 में चीन के वुहान में देखने को मिला. जल्द ही ये वैश्विक महामारी बन गया था.
वैज्ञानिकों का कहना है- दोनों ही वायरसों को वैश्विक हेल्थ इमरजेंसी घोषित किया गया. पर अब हम एमपॉक्स के बारे में कोरोना से ज़्यादा जानते हैं.


2. एमपॉक्स संक्रामक नहीं
एमपॉक्स कोरोना जैसा संक्रामक नहीं है.
हालांकि दोनों ही बीमारियां क़रीबी संपर्क में आने से फैलती हैं लेकिन कोरोना ज़्यादा तेज़ी से फैलता है क्योंकि ये एयरबोर्न है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, कोरोना किसी इंसान के खांसने, छींकने, बोलने, गाने, साथ बैठने से भी फैल जाता है.
वहीं एमपॉक्स किसी संक्रमित व्यक्ति के काफ़ी क़रीब आने पर फैलता है. जैसे- आप संक्रमित मरीज़ की त्वचा को छू लें, शारीरिक संबंध बना ले, संक्रमित इंसान के बिस्तर पर लेट जाएं या उसके कपड़ों का इस्तेमाल कर लें.
देर तक आमने-सामने बात करने से भी एमपॉक्स वायरस एक से दूसरे इंसान में जा सकता है.
कोरोना के मुख्य लक्षण थे- बुखार, सर्दी, गले में खराश. एमपॉक्स के लक्षण हैं- बुखार, सिर दर्द, बदन दर्द, गले में सूजन, चकत्ते...
दिसंबर 2019 से अगस्त 2023 तक 76 करोड़ से ज़्यादा कोरोना केस दर्ज किए गए थे.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, मई 2022 से अब तक एमपॉक्स के दुनियाभर में एक लाख के क़रीब केस दर्ज किए गए.
अफ़्रीका सेंटर्स फोर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेनशन (सीडीसी) ने कहा है कि क़रीब 18910 केस दर्ज किए गए और 600 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई.


3. वैक्सीन उपलब्ध है
एमपॉक्स की वैक्सीन पहले ही उपलब्ध है.
कोरोना के मामले में सबसे बड़ी चुनौती तो यही था कि वैक्सीन बनानी होगी, फिर उसका ट्रायल होगा, फिर मंज़ूरी मिलेगी और तब जाकर कोरोना पर काबू पाया जा सकेगा.
मगर एमपॉक्स से बचाने के लिए वैक्सीन पहले से ही उपलब्ध है.
एमपॉक्स स्मॉलपॉक्स जैसा है. वैक्सीन के ज़रिए इससे निपटने का इंतज़ाम 1980 में हो गया था.
जिन वैक्सीन से स्मॉलपॉक्स से निपटा जाता है, वही वैक्सीन एमपॉक्स से भी बचा रही हैं, ख़ासकर जब 2022 में ये बीमारी फैली थी.
प्रोफ़ेसर एडम कहते हैं, ''ये 100 फ़ीसदी सरंक्षण मुहैया नहीं करवाती है. 2022 में जब ये बीमारी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में फैली, तब बुजुर्गों में इसके जोखिम कम थे. ऐसा इसलिए भी हुआ होगा क्योंकि इन बुजुर्गों को पहले कभी स्मॉलपॉक्स वैक्सीन लगी होगी.''
स्मॉलपॉक्स वैक्सीन पर आधारित एमपॉक्स वैक्सीन एमवीए-बीएन वैक्सीन के नाम से जानी जाती है.
2022 में वैक्सीन बनाने वाली कंपनी बावेरियन नोर्डिक ने डेढ़ करोड़ से ज़्यादा वैक्सीन डोज़ सप्लाई की थी. ये वैक्सीन 76 देशों में भेजी गई थी.


4. कोरोना की तरह तेज़ी से रूप नहीं बदलता
वक़्त के साथ वायरस बदलता है. लेकिन कुछ वायरस बहुत तेज़ी से अपना रूप बदलते हैं. जैसे- कोरोना.
मगर एमपॉक्स ऐसा नहीं है.
वजह- एमपॉक्स डीएनए वायरस से होता है. मगर कोरोना आरएनए वायरस से होता है.
अमेरिकन सोसाइटी ऑफ माइक्रोबायोलॉजी के मुताबिक़, डीएनए वायरस आरएनए वायरस जितनी तेज़ी से रूप नहीं बदलते हैं.
एमपॉक्स के दो स्ट्रेन या रूप हैं- क्लेड 1 और क्लेड 2. सार्स-कोव2 वायरस से 20 से ज़्यादा क्लेड हैं.
अभी तो एमपॉक्स संक्रमण फैल रहा है, वो क्लेड 1 वायरस से फैल रहा है, जिसे क्लेड 1बी भी कहते हैं.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में ग्लोबल हेल्थ रिसर्च के प्रोफ़ेसर ट्रूडी लेंग कहते हैं, ''हम क्लेड 1बी के साथ ये देख रहे हैं कि ज़्यादातर मामलों में ये शारीरिक संबंधों के कारण फैल रहा है. लेकिन ये व्यक्तियों के आपसी संपर्क से भी फैल रहा है. जैसे मां-बेटे, बच्चों से बच्चों में या फिर बच्चे की देखभाल करने के कारण.''
विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैज्ञानिकों का कहना है कि वो नहीं जानते कि 1बी स्ट्रेन क्या बाक़ी स्ट्रेन के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ी से फैल रहा है.


5. लॉकडाउन या वैक्सीन लगवाने की बाध्यता नहीं
कई लोगों के मन में ये डर था कि एमपॉक्स को जब वैश्विक बीमारी बताते हुए इमरजेंसी का एलान किया गया तो हालात कहीं 2020 जैसे तो नहीं हो जाएंगे.
जब दुनियाभर में लॉकडाउन लगाया गया था और सरहदों पर बंदिशें लग गई थीं. कितने लोगों की नौकरी चली गई थी और हालात मुश्किल हो गए थे.
मगर एमपॉक्स के मामले में अब तक ऐसा नहीं है.
बीते दो सालों में एमपॉक्स अफ़्रीका के 16 देशों में फैल चुका है. लेकिन अफ़्रीका सीडीसी ने किसी सरहद को बंद करने या लॉकडाउन लगाने की बात नहीं कही.
अफ़्रीका सीडीसी के डायरेक्टर जनरल डॉ जीन कासिया के मुताबिक़, अभी ऐसे कोई सबूत नहीं है, जिसके आधार पर लोगों की आवाजाही पर रोक लगाई जाए या फिर माल के आवागमन को रोका जाए.
डॉ जीन के मुताबिक़, जैसा अब तक चलता आया है, वैसा ही चलता रहेगा. हम इससे निपटने के लिए इंतज़ाम मुहैया करवा रहे हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आपातकालीन कार्यक्रमों के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ माइक रियान भी सहमति जताते हैं.
डॉ माइक ने कहा- एमपॉक्स ऐसा वायरस है, जिसे सही समय पर सही क़दम उठाकर काबू में किया जा सकता है.
एमपॉक्स आमतौर पर तुलनात्मक तौर पर कम हल्का वायरस है और लोग दो से चार हफ़्ते में स्वस्थ हो जाते हैं. हालांकि कुछ लोगों की हालत बिगड़ती भी है और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है.
एमपॉक्स से संक्रमित व्यक्ति या उससे जुड़ी चीज़ों के संपर्क से दूर रहकर आप इस वायरस से बच सकते हैं.
ज़ख़्मों या दानों को छूने के बाद हाथ धोकर, सैनिटाइजर इस्तेमाल करके आप इससे बच सकते हैं.
प्रोफ़ेसर रोडने के मुताबिक़- हम जानते हैं कि वैक्सीन बचाने में काफी मददगार साबित हो रही है.
हमारे पास बेहतर टूल्स हैं और एक कम फैलने वाला वायरस है. ऐसे में लगता नहीं कि ये एमपॉक्स वायरस कोराना जैसी महामारी बनेगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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