वर्ल्ड टॉयलेट डेः भारत की सफलता से क्या सीख सकती है दुनिया?

नई दिल्ली में सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ टॉयलेट की एक महिला कर्मचारी आधुनिक टॉयलेट दिखाती

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इमेज कैप्शन, नई दिल्ली में सुलभ इंटरनेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ टॉयलेट की एक महिला कर्मचारी आधुनिक टॉयलेट के बारे में जानकारी देते हुए.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक साफ़ टॉयलेट की कमी के कारण होने वाले बीमारियों से दुनिया की आधी आबादी की ज़िंदगी पर ख़तरा मंडरा रहा है.

साफ़ सफ़ाई की कमी से पैदा होने वाले कचरे के कारण पेय जल के प्रदूषित होने का ख़तरा बढ़ रहा है जिससे कॉलरा और अन्य जानलेवा बीमारियां पनप सकती हैं.

जहां भारत जैसे कुछ देशों ने साफ़ सफ़ाई के अपने रिकॉर्ड में सुधार किया है, वहीं इस बात के भी संकेत हैं कि जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ टॉयलेट उपलब्ध कराने में और समस्या खड़ी कर सकता है.

वैश्विक स्तर पर साफ़ सफ़ाई पर जोर देने के लिए साल 2013 से ही संयुक्त राट्र ने 19 नवंबर को 'वर्ल्ड टॉयलेट डे' घोषित किया है.

यूनीसेफ़ के 2023 के अनुमान के अनुसार, हर साल पूरी दुनिया में पांच साल से कम आयु के क़रीब चार लाख बच्चे स्वच्छ पेयजल और साफ़ सफ़ाई की कमी से पैदा होने वाली बीमारियों के कारण मरते हैं, जिन्हें पूरी तरह रोका जा सकता है. यानी यह आंकड़ा हर दिन 1000 है.

टॉयलेट की कमी यौन हिंसा के ख़तरे के बढ़ाती है और माहवारी शर्मिंदगी का सबब बनती है. इसकी वजह से पूरे अफ़्रीका की लगभग आधी लड़कियां अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पातीं.

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) में सैनिटेशन एंड वेस्ट एक्सपर्ट केट मेडलीकॉट ने बीबीसी को बताया, “यह कोई बहुत आकर्षक मुद्दा नहीं है और इसमें प्रगति के लिए साफ़ सफ़ाई से जुड़ी भ्रांतियों को तोड़ना और इसे बुनियादी सार्वजनिक सुविधा के रूप में स्वीकार करना बहुत ज़रूरी है, जिस पर हम सभी अपने स्वास्थ्य के लिए हर दिन भरोसा करते हैं.”

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, सब सहारा अफ़्रीका, दक्षिण एशिया और ओशिनिया के क्षेत्र साफ़ सफ़ाई के मामले में बहुत बड़ी चुनौती से जूझ रहे हैं.

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हालांकि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां साफ़ सफ़ाई संकट की बात करती हैं लेकिन साथ ही उनकी रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में टॉयलेट की सुविधा बढ़ी है. पूरी दुनिया में साल 2000 से अबतक 2.5 अरब लोगों तक सुरक्षित टॉयलेट की सुविधा पहुंची है.

आज नाइजीरिया में सबसे अधिक संख्या में लोग खुले में शौच जाते हैं. एक दशक पहले तक इस मामले में भारत अव्वल था, लेकिन यहां की सरकार ने इस ट्रेंड को पलटने में कामयाबी हासिल की.

साल 2014 में दक्षिण एशिया में खुले में शौच करने वाले 90% और पूरी दुनिया के खुले में शौच करने वाले 1.2 अरब लोगों में से आधे केवल भारत से थे.

उस समय भारत के लगभग 20% स्कूलों में लड़कियों के लिए टॉयलेट नहीं हुआ करता था.

लेकिन टॉयलेट बनाने का एक विशाल अभियान शुरू किया गया, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा अभियान भी माना गया. इसके बाद 60 महीनों में 60 करोड़ लोगों के लिए करीब 11 करोड़ टॉयलेट बनाए गए.

हालांकि सरकार ने 2019 में ग्रामीण इलाक़ों को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया, फिर भी यूनीसेफ़ ने इसके लक्ष्य को आगे बढ़ा दिया और कहा कि इस दिशा में अभी और काम करना बाकी है.

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खुले में शौच

बीते दो दशकों में खुले में शौच करने वालों की संख्या पूरी दुनिया में दो तिहाई से अधिक कम हुई है.

लेकिन डब्ल्यूएचओ और यूनीसेफ़ की रिपोर्ट बताती है कि अभी भी पूरी दुनिया में 41.9 करोड़ लोगों के सामने यही एकमात्र उपलब्ध विकल्प है.

अफ़्रीका की सबसे अधिक आबादी वाले देश नाइजीरिया में 4.6 करोड़ या 23% आबादी खुले में शौच करती है जोकि दुनिया में सर्वाधिक दर है.

एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ वॉटरएड नाइजीरिया में हेड ऑफ़ प्रोग्राम्स कोलावोले बानवो ने बीबीसी से कहा, “ये संख्या इतनी अधिक है कि नाइजीरिया में खुले में शौच राष्ट्रीय गरिमा का मुद्दा बन गया है.”

चूंकि 9.5 करोड़ नाइजीरियाई लोगों के पास साफ़ सफ़ाई की बुनियादी सुविधा नहीं है, देश कॉलरा की महामारी से जूझ रहा है. बहुत से अन्य देशों में स्वच्छ पानी और सीवेज सिस्टम के द्वारा पानी से पैदा होने वाली बीमारियों का् उन्मूलन हो चुका है.

अभी जनवरी 2023 में यहां कॉलरा बड़े पैमाने पर फैल गया और नाइजीरिया के उत्तर पूर्वी प्रांत बोर्नो में 400 लोगों की मौत हो गई.

नाइजीरिया ने खुले में शौच को ख़त्म करने के लिए 2025 तक का लक्ष्य निर्धारित किया है. यूनीसेफ़ का कहना है कि समय सीमा में इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 39 लाख टॉयलेट बनाने की ज़रूरत है.

अक्टूबर 2022 में उत्तरी जिगावा स्टेट नाइजीरिया का पहला खुले में शौच मुक्त प्रांत बना.

बांग्लादेश में सतखीरा ज़िले में एक नए बने टॉयलेट के सामने खड़ी महिला.

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इमेज कैप्शन, बांग्लादेश में सतखीरा ज़िले में एक नए बने टॉयलेट के सामने खड़ी महिला.

स्वास्थ्य संकट

बांग्लादेश की कहानी थोड़ी अलग है. उसने 2015 में देश को खुले में शौच मुक्त घोषित कर दिया था लेकिन खुले में शौच को ख़त्म करना महज पहला कदम है.

बांग्लादेश की 16.9 करोड़ आबादी की आधी आबादी के ही पास स्वच्छता से संचालित किये जा रहे टॉयलेट की पहुंच है.

वॉटरएड बांग्लादेश में कंट्री डायरेक्टर हसीन जहां ने बीबीसी को बताया, “खुले में शौच अब बहुत नगण्य है, एक प्रतिशत से भी कम, लेकिन अभी भी हम स्वच्छ टॉयलेट के मामले में पीछे हैं.”

संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास के लक्ष्यों के तहत बांग्लादेश को 2030 तक सबके लिए स्वच्छ टॉयलेट और साफ़ सफ़ाई युक्त सुविधाएं देने का लक्ष्य हासिल करना है.

लेकिन ये कोशिशें ग़रीबी हटाने के साथ साथ चलानी होंगी.

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में ही शहर की 20 प्रतिशत यानी 44 लाख आबादी झुग्गियों में रहती है.

जहां कहती हैं, “अभी भी ऐसे परिवार हैं जो टॉयलेट साझा करते हैं, जिसे असुरक्षित माना जाता है और जगह की कमी के चलते वो व्यक्तिगत टॉयलेट नहीं बना सकते.”

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समाधान क्या है?

समाधान ढूंढना क्यों लगातार जटिल होता जा रहा है?

हालांकि साफ़ सफ़ाई का संकट का पैमाना बहुत बड़ा दिखता है लेकिन इसका हल बहुत साधारण है. और वो है दुनिया भर में अधिक से अधिक टॉयलेट और सीवेज सिस्टम में कटौती की जानी चाहिए.

यूनीसेफ़ के एन थॉमस ने बीबीसी को बताया, “सच्चाई ये है कि यह समाधान का बस एक छोटा सा हिस्सा है.”

इसमें अन्य कारक भी जुड़ते जाते हैं जैसे शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव.

हल ढूंढने की जलिटता को सूखा और बाढ़ और बढ़ा देते हैं.

थॉमस कहते हैं, “जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए दुनिया भर में गैर सीवरेज जैसे आइडिया की हमारे पास भरमार है.”

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गैर सीवरेज टॉयलेट

गैर सीवरेज सिस्टम कचरे के सुरक्षित ट्रीटमेंट की सहूलियत देता है. हाई टेक टॉयलेट कचरे को प्रॉसेस करता है और बिना सीवेज सिस्टम से जुड़े भी काम कर सकता है. ऐसे ही वैकल्पिक हल जैसे सौर ऊर्जा संचालित टॉयलेट इस समस्या का हल हो सकते हैं.

पारंपरिक सीवेज सिस्टम से उलट गैर सीवरेज के तरीकों में पानी की बहुत कम खपत होती है या उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती.

यूनीसेफ़ की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, तीन में एक बच्चा या पूरी दुनिया में 73.9 करोड़ बच्चे ऐसे इलाके में रहते हैं जहां पानी की किल्लत बहुत है और जलवायु परिवर्तन से इसके और भयावह होने का ख़तरा मंडरा रहा है.

अभी तो, पानी की किल्लत वाले दुनिया के हिस्से में पानी मुक्त टॉयलेट का विकल्प बहुत महंगा हो सकता है.

लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि जैसे जैसे मौसम में अतिवृष्टि की निरंतरता बढ़ेगी, इस तरह की तकनीक के विकास में तेजी आएगी क्योंकि जलवायु परिवर्तन ग़रीब और धनी दोनों तरह के देशों पर असर डालेगा.

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