गटर साफ़ करने में मौत का सिलसिला कब थमेगा?

    • Author, योगिता लिमये
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई

हाल ही में बेंगलुरू में गटर की सफ़ाई करते हुए दम घुटने से दो सफ़ाई कर्मचारियों की मौत हो गई.

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इससे कुछ दिन पहले मुंबई में नाले की सफ़ाई के दौरान ऐसे ही दो कर्मचारियों की मौत हो गई थी.

सफ़ाई कर्मचारियों के संगठनों का कहना है कि वो लोग भारत में गटर साफ़ करने वाले उन दर्जनों सफ़ाई कर्मचारियों में से थे जो सुरक्षा उपकरणों के अभाव में अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं.

मुंबई में गटर साफ़ करने वाले एक कर्मचारी बिनोद लाहोट ने बताया, "जब मैं खाना खाने के लिए अपना हाथ उपर उठाता हूं तो मुझे इससे नाले की बदबू आती है...मैं फिर भी उसे खाता हूं, क्योंकि मुझे ज़िंदा रहना है और अपने काम पर वापस जाना है."

लाहोट को अपनी उम्र का कोई पता नहीं है, लेकिन वो 20 साल से भी ज़्यादा वक़्त से गटर की सफ़ाई का काम कर रहे हैं.

आप उन्हें अक्सर ज़मीन में बने सुरंग में देख सकते हैं, जहां से वो नंगे हाथों से कीचड़ को बाहर निकाल रहे होते हैं और शहर के गटर को साफ़ करते हैं. यह एक जोखिम का काम है, लेकिन लाहोट जैसे कर्मचारियों को इसके लिए हर रोज़ क़रीब 300 रुपये की मज़दूरी मिलती है.

वो आमतौर पर तिलचट्टों के झुंड से घिरे होते हैं, उनके चेहरे पर कोई मास्क भी नहीं होता है, जो उन्हें गटर से निकलने वाली ज़हरीली गैस से बचा सके. लेकिन लाहोट के मुताबिक़ उनके काम में यही सबसे बड़ा ख़तरा नहीं होता है.

कई बार तो उन्हें गटर के बहुत अंदर तक महज़ एक रस्सी के सहारे जाना पड़ता है. उन्हें डर होता है कि कहीं अचानक गटर में बड़ी मात्रा में गंदगी बहती हुई न आ जाए और उन्हें बहाकर न ले जाए.

इस तरह की घटना पहले भी हो चुकी है. 2014 में गटर की सफ़ाई करते हुए 45 साल के इस्माइल क़ाज़ी की मौत इसी तरह के हादसे में हुई थी.

इस्माइल काज़ी की पत्नी रेहाना क़ाज़ी मुंबई के शांतिटाउन के एक कमरे रहती हैं. वो बताती हैं कि इस्माइल ने यह मुश्किल और जोख़िम भरा काम इसलिए चुना था ताकि वो अपने तीनों बच्चों को पढ़ा सकें.

उनके सबसे बड़े बेटे को परिवार की मदद के लिए कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी... यह बताते हुए रेहाना की आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं.

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मुंबई में गटर साफ़ करने वालों के संगठन के एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ मई 2014 से इस्माइल काज़ी की मौत तक 28 सफ़ाई कर्मचारी, काम के दौरान मारे गए गए थे.

मुंबई महानगरपालिका के पास ख़ास तौर पर गटर साफ़ करने वालों से जुड़ा कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है. लेकिन पिछले साल उसने कहा था कि बीते क़रीब 6 साल में साफ़- सफ़ाई के काम में लगे 1,386 कर्मचारियों की मौत हुई है. यानी 2009 से 2015 तक 1,386 मौत.

गटर साफ़ करने वालों के अलावा साफ़-सफ़ाई के काम में वो लोग भी शामिल हैं, जो सड़कों पर झाड़ू लगाते हैं और कूड़े को हटाने काम काम करते हैं.

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इन बढ़ती हुई मौतों का कारण जानने के लिए निगम अधिकारियों ने एक अध्ययन भी कराया है, लेकिन गटर साफ़ करने वालों को सुरक्षा के सामान क्यों नहीं दिए जाते हैं या फिर उनका बीमा क्यों नहीं करवाया जाता है, बीबीसी के इस सवाल का महानगरपालिका प्रशासन ने कोई उत्तर नहीं दिया.

हालांकि इसके पीछे कर्मचारियों को काम पर रखे जाने का तरीक़ा, एक वजह हो सकती है.

मुंबई को साफ़-सुथरा रखने के लिए महानगरपालिका में क़रीब 30,000 कर्मचारियों को नौकरी पर रखा गया है. लेकिन गटर को साफ़ रखने का मुश्किल और ख़तरों से भरा काम आमतौर पर अस्थाई कर्मचारियों से करवाया जाता है. ऐसे कर्मचारी ठेकेदारों के अधीन होते हैं, और उन्हें दिहाड़ी पर रखा जाता है. इसलिए ये लोग किसी स्वास्थ्य सेवा या बीमा का लाभ नहीं ले सकतें हैं.

'बी सैमुअल बांदा' ऐसे ही एक ठेकेदार हैं जो गटर साफ़ करने वालों को काम पर रखते हैं. वो कहते हैं, "हम उन्हें कभी-कभी दस्ताने और रबर के जूते देते हैं, लेकिन यह बहुत ही असंगठित क्षेत्र है."

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उनके मुताबिक़, "हम रोज़ अलग-अलग लोगों के साथ काम करते हैं और फिर सब अलग हो जाते हैं, इसलिए कर्मचारियों का बीमा करा पाना मुश्किल है."

यह केवल मुंबई की ही समस्या नहीं है. इससे जुड़ा कोई राष्ट्रीय सर्वेक्षण तो नहीं हुआ है, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक़ पूरे भारत में हर रोज़ क़रीब 100 सफ़ाई कर्मचारियों की मौत होती है.

2014 में सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से नालियों की सफ़ाई के दौरान मारे गए कर्मचारियों के परिवारों को 10 लाख़ रुपये मुआवज़ा देने का फ़ैसला दिया था. लेकिन रेहाना क़ाज़ी की तरह कई और लोग हैं जिन्हें अभी तक कोई पैसा नहीं मिला है.

रेहाना कहती हैं, "अभी सरकार से कोई मदद नहीं मिली है, यहां तक कि कोई हमसे मिलने भी नहीं आया है."

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पिछले साल से भारत सरकार ने व्यावक स्वच्छता अभियान के लिए लोगों से अतिरिक्त कर वसूलना शुरू किया है.

गटर की सफ़ाई तो हमेशा मुश्किलों से भरा काम रहेगा, लेकिन इसे ख़तरों से दूर किया जाना ज़रूरी है.

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