रवांडा जनसंहार के 30 साल बाद अपने घर पहुंचीं बीबीसी की पत्रकार ने क्या देखा?

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- Author, विक्टोरिया उवोनकुंडा
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, किगाली
चेतावनी: इस कहानी के कुछ विवरण आपको परेशान करने वाले लग सकते हैं.
मैंने 30 साल पहले 12 साल की उम्र में अपना जन्म स्थान और अपना घर छोड़ दिया था. रवांडा में साल 1994 के भयावह जनसंहार के समय मैं अपने परिवार के साथ भाग गई थी.
केन्या और नॉर्वे में पलने-बढ़ने और लंदन में बसने के बाद मैं अक्सर सोचती थी कि वापस जाकर देखना कैसा होगा कि रवांडा के लोग ठीक हो गए हैं या नहीं.
जब मुझे उसी विषय पर एक डाक्यूमेंट्री बनाने के लिए वहां की यात्रा करने का अवसर मिला तो मैं उत्साहित थी. इसके साथ ही मैं इस बात को लेकर बेहद चिंतित भी थी कि मुझे क्या मिलेगा और मेरी प्रतिक्रिया क्या होगी.
मैं इन घटनाओं के भावनात्मक घाव जिसे पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) कहा जाता है, उसके साथ जी रही हूं.
देश छोड़ने का दर्द

कई रवांडा वासियों की तरह, मैंने भी अपने परिवार के कई सदस्यों को खो दिया. केवल 100 दिनों में ही जनजातीय हुतु चरमपंथियों ने अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के आठ लाख से अधिक लोगों की हत्या कर दी.
उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को भी निशाना बनाया था, भले ही वो किसी भी जातीय मूल के हों.
इस जनसंहार के बाद मुख्य तौर पर तुत्सी बलों ने सत्ता संभाली थी. उन पर भी प्रतिशोध में रवांडा में हज़ारों हुतु लोगों की हत्या का आरोप लगा था.
जब मैं राजधानी किगाली में पहुंची तो मेरे मन में भावनाएं उमड़-घुमड़ रही थीं.
अपनी भाषा किन्यारवाण्डा को अपने चारों ओर बोलते हुए सुनने का अपना अलग आनंद था. लेकिन मुझे याद है कि पिछली बार जब मैं शहर में थी, तो अराजकता का माहौल था. हममें से लाखों लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे. ज़िंदा रहने की कोशिश कर रहे थे.
अपनी छोटी सी यात्रा के दौरान मैं जिन स्थानों को देखना चाहती थी, उनमें मेरा प्राइमरी स्कूल और किगाली में मेरा आखिरी घर शामिल है, जहां मैं 6 अप्रैल 1994 की उस मनहूस रात को रिश्तेदारों के साथ खाने की मेज़ पर बैठी थी.
इस दौरान हमने सुना कि राष्ट्रपति के विमान को मार गिराया गया था. उस रात आए एक फ़ोन कॉल ने हमारे पूरे जीवन को उलट-पुलट कर रख दिया था.
अपना घर कैसे खोजा

मैं अपने परिवार का पुराना घर नहीं ढूंढ पाई थी. चार बार प्रयास करने के बाद, मैंने हार मान ली. मैंने नॉर्वे में अपनी मां को फोन किया ताकि वह मेरा मार्गदर्शन कर सकें.
आख़िरकार बंद गेट के सामने खड़े होकर, उन धूप वाली गर्म दोपहरों को याद करके मेरा गला भर आया जब हम छत पर बैठकर बातें करते थे और बेफिक्र रहते थे.
हमसे कहा गया कि तीन जोड़ी कपड़े पहन लो. हमें एक ऐसी यात्रा के लिए कार में बिठा दिया गया, जिसकी कल्पना हममें से किसी ने भी नहीं की होगी.
मुझे याद नहीं है कि हममें से किसी ने भी बात की हो या कोई शिकायत की हो, बावजूद इसके कि बच्चे पीछे की ओर कसकर ठूसे गए थे और उस समय भी जब बहुत ज़ोर की भूख लगी थी.
छठे दिन, हमें एहसास हुआ कि किगाली में कोई सुरक्षित जगह नहीं बची है. इसके बाद हम पलायन करने वालों में शामिल हो गए. ऐसा लगा जैसे पूरा किगाली, हम हज़ारों लोग पैदल, बाइक, कारों, ट्रकों से एक ही समय में जा रहे थे.
हम गिसेनी में अपने पारिवारिक घर की ओर जा रहे थे, जो लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो की सीमा के पास का एक इलाका है. उसे अब रुबावु ज़िले के रूप में जाना जाता है.
इस बार जब मैंने यात्रा की तो यातायात सुचारू रूप से चल रहा था और गोलियों की आवाज़ भी नहीं थी या सड़कों पर पलायन कर रहे लोगों की कतार भी नहीं थी. इस बार यह एक शांत, चमकीला और सुंदर दिन था.
मुझे हमारा तीन बेडरूम का घर मिला, जिसमें जनसंहार के तीन महीनों में करीब 40 लोगों को शरण दी गई थी. वह अभी भी खड़ा है, इस तथ्य के बाद भी कि जुलाई 1994 में हमारे छोड़ने के बाद से यह खाली है.
जनसंहार में जीवित बच गए रिश्तेदारों से मुलाकात

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मैं बहुत भाग्यशाली थी कि मुझे जीवित बचे अपने कुछ रिश्तेदारों से मिलने का मौका मिला. इनमें मेरा चचेरा भाई ऑगस्टिन भी शामिल था. जब मैंने आखिरी बार उसे गिसेनी में देखा था तो वह 10 साल का था.
उसे गले लगाना एक सपने जैसा लग रहा था. उनके साथ मेरी पसंदीदा यादें पास के सब्ज़ियों के खेतों में दौड़ने, ईस्टर की छुट्टियों का आनंद लेने की हैं, वह भी आने वाले खतरे से अनजान रहते हुए.
वह अब चार बच्चों का पिता है, लेकिन हमने वहीं से शुरू किया जहां से छोड़ा था, डीआर कांगो, जिसे तब जैरे कहा जाता था, भाग जाने के बाद वहां से हम अलग हो गए थे.
ऑगस्टिन ने बताया, "मैं अपने माता-पिता के बिना अकेले भाग गया. गांवों से होते हुए गया, जबकि मेरे माता-पिता गिसेनी शहर से होते हुए गोमा (डीआर कांगो में सीमा पर स्थित एक शहर) चले गए."
मैं इस बात की कल्पना नहीं कर सकती कि उसके लिए यह कैसा रहा होगा, किबुम्बा के विशाल शरणार्थी शिविर में अपने माता-पिता के बिना अकेला एक लड़का. जब हम भागे तो कम से कम मेरा परिवार मेरे साथ था.
अच्छी बात यह हुई कि उसके कुछ पूर्व पड़ोसियों ने उसके माता-पिता को यह बात बता दी. फिर वे सभी दो साल तक किबुम्बा में रहे.
उन्होंने मुझे बताया, "शुरुआती दिनों में, वहां का जीवन बहुत खराब था. वहां हैज़ा फैल गया था. लोग बीमार पड़ गए. गंदगी और पौष्टिक भोजन की कमी की वजह से हज़ारों लोगों की मौत इस बीमारी से हो गई."
ऑगस्टिन की कहानी एक हद तक मेरी कहानी से मिलती-जुलती है. मुझे गोमा में शरणार्थी के रूप में वे पहले सप्ताह याद हैं, जब मेरे परिवार के केन्या में अधिक स्थायी शरण की व्यवस्था करने से पहले शहर की सड़कों पर शवों का अंबार लग गया था.
दो जानलेवा हमलों में बची जान

लेकिन रवांडा में 13 साल की उम्र में क्लॉडेट मुकारुमन्जी कई हमलों के बाद भी बच गई थीं.
वह अब 43 साल की हैं. उनकी पोते-पोतियां हैं. वह मुझसे अपने कुछ अनुभव साझा करने के लिए सहमत हुईं. इसके साथ ही अपने ज़ख्मों के लिए ज़िम्मेदार लोगों में से एक के बारे में भी बताने के लिए तैयार हो गईं.
उन्होंने जिन हमलों के बारे में बताया, उनमें से एक दक्षिण-पूर्वी रवांडा के एक शहर न्यामाता में जहां हम मिले थे, उससे कुछ ही मीटर की दूरी पर हुआ था.
यह कैथोलिक चर्च था. जिसमें सैकड़ों लोग शरण के लिए गए थे, लेकिन चाकू से उनका शिकार कर उनको मार डाला गया.
उन्होंने बताया, "जब उसने मुझे काटा तो वह चर्च के अंदर खड़ा था. जब वह मुझे काट रहा था तो वह गा रहा था. उसने मेरे चेहरे पर काटा और मुझे अपने चेहरे से खून बहता हुआ महसूस हुआ.''
वो बताती हैं, "उसने मुझे पेट के बल लेटने का आदेश दिया. फिर उसने मेरी पीठ पर भाले से वार किया. उसके निशान आज भी हैं."
उन्होंने बताया, "उसने उस पर (भाला) ज़ोर से मारा और मुझे यह सोचकर छोड़ दिया कि भाला ज़मीन पर पहुंच गया है."
वह अपनी पीठ में गहराई तक घुसे भाले को निकालने के बाद वहां से भाग गईं. वह लड़खड़ाते हुए अपने पड़ोसी के घर यह सोचकर पहुंचीं कि वह सुरक्षित रहेंगी.
लेकिन उस किशोरी का सामना जीन क्लाउड नटंबारा से हुआ, जो उस समय 26 साल के पुलिस अधिकारी थे.
पुलिस अधिकारी ने मारने की कोशिश की

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नटंबारा ने मुझे बताया, "उस घर के मालिक ने हमें फोन किया, जिसमें वो छिपी हुई थीं. मकान मालिक ने हमें फोन पर कहा कि वहां 'इनयेन्जी' है."
'इनयेन्जी' का अर्थ है, 'कॉकरोच'. इस शब्द का इस्तेमाल हुतु कट्टरपंथियों और खबरों में तुत्सी लोगों का वर्णन करने के लिए किया जाता था.
उन्होंने बताया, "मैंने उसे बिस्तर पर बैठा पाया, पहले से ही गंभीर रूप से घायल और खून से लथपथ. मैंने उसे खत्म करने के लिए उसके कंधे पर गोली मार दी.''
"हमें किसी को भी न छोड़ने का आदेश था. मुझे लगा कि मैंने उसे मार डाला है."
इसके बाद भी कुछ समय बाद, वह घर से भाग गई और अकेली तब तक भटकती रही, जब तक कि उसकी मुलाकात किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं हुई जिसे वह जानती थी, जिसने उसके घावों की देखभाल की.
मुकारुमन्जी और नटंबारा उन लोगों में से हैं, जिन्होंने आश्चर्यजनक रूप से एक रास्ता खोज लिया है.
जब मैं उनकी ओर बढ़ी तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वे एक पत्तेदार पेड़ की छाया के नीचे एक साथ हंस रहे थे. लेकिन उनकी हंसी ने यह साबित कर दिया कि यह प्रक्रिया कितनी कठिन है.
जब मैंने पूर्व पुलिस अधिकारी से पूछा कि क्या वह जानते हैं कि जनसंहार के दौरान उन्होंने कितने लोगों को मार डाला था. इस सवाल पर उन्होंने चुपचाप अपना सिर हिलाया.
जनसंहार में उस युवक की भूमिका के लिए उन पर आरोप लगाए गए. उनको 10 साल से अधिक की सज़ा सुनाई गई.
जेल की सज़ा काटने की जगह उन्होंने पश्चाताप और माफी मांगने की इच्छा जताई और सामुदायिक सेवा की.
उन्होंने मुकारुमन्जी की तलाश की. सातवीं बार अपील करने पर वो उसे माफ करने के लिए तैयार हो गईं.
समाज में भरोसे की कमी

एलेक्जेंड्रोस लॉर्डोस, एक मनोवैज्ञानिक हैं. उन्होंने रवांडा में काम किया है. वो कहते हैं कि व्यक्तिगत उपचार शुरू करने के लिए सामूहिक उपचार की ज़रूरत होती है.
उन्होंने मुझसे कहा, "हिंसा इतनी विस्तृत थी कि पड़ोसियों ने पड़ोसियों पर हमला किया और परिवार के सदस्यों ने परिवार के सदस्यों पर हमला किया. इसलिए अब यह समझ में नहीं आ रहा है कि किस पर भरोसा किया जा सकता है."
मुकारुमन्जी के लिए यह उनके अपने परिवार के बारे में अधिक चिंता का विषय रहा है.
वो कहती हैं, ''मुझे ऐसा लगा कि अगर मैं उसे माफ किए बिना मर गई, तो इसका बोझ मेरे बच्चों पर पड़ सकता है. अगर मैं मर गई और वह नफरत कायम रहती है, तो हम उस रवांडा का निर्माण नहीं कर रहे होंगे, जो मैं अपने बच्चों के लिए चाहती हूं. यह वह रवांडा होगा जहां मैं बड़ी हुई हूं.''
वो कहती हैं, "मैं इसे अपने बच्चों को नहीं दे सकती."
सुलह-समझौते की कोशिशें

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सुलह-समझौते की कई कोशिशें की गई हैं. इनमें से एक है ईसाई नेतृत्व वाली परियोजना. यह दोषियों और उनके शिकार को पशुओं के ज़रिए एक साथ लाती है, जो रवांडा के समाज में बहुत महत्वपूर्ण है.
मिल-जुलकर एक गाय की देखभाल करके. मेल-मिलाप और माफी के बारे में बातचीत में शामिल होकर. वे एक साथ बेहतर भविष्य का निर्माण करते हैं.
रवांडा ने जातीय आधार पर विभाजित देश को फिर एकजुट करने की दिशा में कदम उठाए हैं. जातीयता के बारे में बात करना अवैध है.
हालांकि आलोचक कहते हैं कि सरकार बहुत कम असहमति को ही बर्दाश्त करती है. उनका कहना है कि स्वतंत्रताएं कम हैं, ये दीर्घकालिक प्रगति में बाधा पहुंचा सकती हैं.
रवांडा वासियों को सुलह के इस मुकाम तक पहुंचने में तीन दशक लगे. मुकारुमन्जी और नटंबारा फिर पड़ोसी की तरह एक साथ रहेंगे.
मेरे लिए चौंकाने वाला एहसास यह है कि रवांडा, जो हमेशा मेरे दिल का टुकड़ा रहेगा, अब मुझे मेरा घर नहीं लगता.
लेकिन इस यात्रा में मैंने उसके साथ शांति स्थापित कर ली है. इससे मेरे घावों को भरने में भी मदद मिली है.
(विक्टोरिया उवोनकुंडा बीबीसी पत्रकार हैं. वे बीबीसी वर्ल्ड सर्विस पर न्यूज़डे की प्रेज़ेंटर हैं.)
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