सूडान में हिंसा के पीछे क्या है सियासत और कैसे होगा इसका समाधान?

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    • Author, बेवरली ओचियंग
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग, नैरोबी से

सूडान की राजधानी खार्तूम और देश के अन्य इलाक़ों में शुरू हुआ ताज़ा संघर्ष, सेना और वहां के अर्धसैनिक बल के बीच के बुरे शक्ति संघर्ष का नतीज़ा है.

पिछले तीन दिनों से जारी ताज़ा संघर्ष में सूडान के अर्धसैनिक बल 'रैपिड सपोर्ट फ़ोर्स' यानी आरएसएफ और वहां की सेना आमने-सामने हैं. राजधानी खार्तूम में रणनीतिक लिहाज से अहम लगभग सभी जगहों पर झडपें हो रही हैं.

दोनों पक्षों ने सूडान की राजधानी खार्तूम के अलग-अलग हिस्सों पर नियंत्रण स्थापित करने का दावा किया है.

इस संघर्ष में अब तक 100 नागरिकों के मरने और क़रीब 1,100 के घायल होने का अनुमान है. ताजा जानकारी के मुताबिक़, ये संघर्ष अब देश के अलग-अलग इलाकों में फैल रहा है.

डॉक्टरों का कहना है कि खार्तूम के अस्पतालों में हालात बेहद मुश्किल हो गए हैं. संघर्ष के चलते स्वास्थ्यकर्मी घायलों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.

अफ्रीका में कहां है सूडान?

दशकों के गृहयुद्ध के बाद 2011 में दक्षिण सूडान के अलग होने तक सूडान, क्षेत्रफल के लिहाज से अफ्रीका का सबसे बड़ा देश था.

अफ्रीका के उत्तर-पूर्व में स्थित इस देश की सीमाएं सात देशों से लगती है.

इसके उत्तर में शक्तिशाली देश मिस्र है, जबकि पूर्व में इरिट्रिया और इथियोपिया है. देश के अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिहाज से काफ़ी अहम लाल सागर इसके उत्तर-पूर्व में स्थित है. दक्षिण में दक्षिण सूडान स्थित है, जबकि चाड और लीबिया इसके पश्चिम में मौजूद है.

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क्यों शुरू हुआ ताज़ा संघर्ष?

सूडान में नागरिक सरकार को सत्ता हस्तांतरित करने की माँग को लेकर 2021 से ही संघर्ष चल रहा है. मुख्य विवाद सेना और अर्धसैनिक बल 'आरएसएफ' के विलय को लेकर है.

ताज़ा हिंसा कई दिनों के तनाव के बाद हुई. आरएसएफ के जवानों को अपने लिए ख़तरा मानते हुए सेना ने पिछले सप्ताह इनकी तैनाती को बदलते हुए नई व्यवस्था शुरू की. इसे लेकर आरएसएफ के जवानों में नाराज़गी थी. कुछ उम्मीद थी कि बातचीत से समस्या का हल निकल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

अक्तूबर 2021 में नागरिकों और सेना की संयुक्त सरकार के तख्तापलट के बाद से ही सेना और अर्धसैनिक बल आमने-सामने हैं.

फ़िलहाल सॉवरेन काउंसिल के ज़रिए देश को सेना और आरएसएफ चला रहे हैं. लेकिन सरकार की असली कमान सेना प्रमुख जनरल अब्देल फतेह अल बुरहान के हाथों में है. वे एक तरह से देश के राष्ट्रपति हैं.

सॉवरेन काउंसिल के डिप्टी और आरएसएफ़ प्रमुख मोहम्मद हमदान दगालो यानी हेमेदती देश के दूसरे नंबर के नेता हैं.

क़रीब एक लाख की तादाद वाली रैपिड सपोर्ट फ़ोर्स के सेना में विलय के बाद बनने वाली नई सेना का नेतृत्व कौन करेगा, इस पर सहमति नहीं बन पा रही है.

आरएसएफ़ प्रमुख का कहना है कि सेना के सभी ठिकानों पर कब्ज़ा होने तक उनकी लड़ाई चलती रहेगी. वहीं सेना ने बातचीत की किसी संभावना को नकारते हुए कहा है कि अर्धसैनिक बल आरएसएफ़ के भंग होने तक उनकी कार्रवाई जारी रहेगी.

हालांकि जनरल बुरहान ने पहले कहा था कि प्रस्तावित नागरिक सरकार में एकीकृत सेना का नेतृत्व कौन करेगा, इस विवाद को सुलझाने के लिए वे अपने डिप्टी यानी जनरल हेमेदती से बात करने को तैयार हैं.

सूडान के डॉक्टरों की संस्था के अनुसार इस बात पर एक राय नहीं है कि शनिवार को सबसे पहले गोली किसने चलाई.

वीडियो कैप्शन, दक्षिण सुडान में बढ़ रहा है जनसंहार का ख़तरा

कैसे फंसे आम नागरिक?

भले ही यह संघर्ष देश के रणनीतिक ठिकानों के आसपास होता दिख रहा है, लेकिन यह लड़ाई मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक ही सिमटी है. ऐसे में आम लोग अनजाने में इस लड़ाई के शिकार बन गए.

अभी तक ये साफ नहीं है कि आरएसएफ के ठिकाने कहां हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि उनके लड़ाके घनी आबादी वाले इलाकों में चले गए हैं.

सूडान की वायु सेना ने 60 लाख से अधिक आबादी वाले खार्तूम में हवाई हमले किए हैं, जिसमें नागरिकों के हताहत होने की आशंका है.

हालांकि इस लड़ाई से लोगों को राहत देने के लिए रविवार को दोनों पक्षों के बीच तीन घंटे का एक अल्प युद्धविराम लागू किया गया था.

सूडान में आरएसएफ के सैनिक

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रैपिड सपोर्ट फोर्स का इतिहास

आरएसएफ का गठन 2013 में हुआ था. सेना से अलग इतने मजबूत सुरक्षा बल का होना, सूडान की अस्थिरता की वजह माना जाता रहा है. इसकी उत्पत्ति कुख्यात 'जंजावीद' विद्रोही संगठन के रूप में हुई थी.

इसने दारफुर में विद्रोहियों के खि़लाफ़ क्रूरता से लड़ाई लड़ी थी. उस दौरान इन पर बड़े पैमाने पर नृजातीय हिंसा करने का आरोप लगा था.

जनरल दगालो ने तब से अब तक एक शक्तिशाली सुरक्षा संगठन तैयार कर लिया है. इसने यमन और लीबिया के संघर्षों में भी दख़ल दिया.

सूडान में सोने की कई खान नियंत्रित करने के साथ उन्होंने अच्छा ख़ासा आर्थिक साम्राज्य भी बना लिया है.

आरएसएफ पर मानवाधिकारों के हनन का आरोप लगता रहा है. इस बल पर जून 2019 में 120 से अधिक प्रदर्शनकारियों को मारने का आरोप लगा था.

सेना की भूमिका

सूडान के लगभग तीन दशक तक राष्ट्रपति रहे उमर अल-बशीर को हटाने के लिए 2019 में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए.

इन विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए सेना ने उनका तख्तापलट कर दिया. लेकिन उसके बाद लोकतंत्र बहाली के लिए नागरिकों ने अपना अभियान जारी रखा.

हालांकि इस मकसद के लिए सेना और नागरिकों की एक संयुक्त सरकार की स्थापना तब की गई थी. लेकिन अक्तूबर 2021 में एक और तख्तापलट के बाद इसे ख़त्म कर दिया गया.

जनरल बुरहान और जनरल दगालो के बीच की प्रतिद्वंद्विता उसके बाद से और तेज़ हो गई.

नागरिक शासन की बहाली के लिए दिसंबर 2022 में एक समझौते के मसौदे पर सहमति बनी थी, लेकिन अंतिम तौर पर वो बातचीत विफल हो गई.

सूडान के दूसरे नंबर के नेता और आरएसएफ़ प्रमुख मोहम्मद हमदान डगालो

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इमेज कैप्शन, सूडान के दूसरे नंबर के नेता और आरएसएफ़ प्रमुख मोहम्मद हमदान डगालो सेना के सामने झुकने को तैयार नहीं है.

क्या चाहते हैं दोनों पक्ष?

जनरल दगालो का कहना है कि 2021 का तख्तापलट एक ग़लती थी. वे खुद और आरएसएफ, दोनों को देश के कुलीन वर्ग के खिलाफ और आम लोगों के पक्ष में दिखाने की कोशिश करते रहे हैं.

हालांकि आरएसएफ के ख़राब ट्रैक रिकाॅर्ड को देखते हुए उनके दावों पर यकीन कर पाना मुश्किल लगता है.

इस बीच, सेना प्रमुख जनरल बुरहान ने कहा है कि सेना किसी निर्वाचित सरकार को ही सत्ता का पूर्ण हस्तांतरण करेगी.

ऐसा लगता है कि दोनों जनरल और उनके समर्थक, इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यदि दोनों अपने पदों से हट गए, तो उनके धन और रुतबे का क्या होगा?

क्या कर सकती है दुनिया?

ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इस लड़ाई से सूडान और कमजोर हो सकता है. इसके कारण देश में अशांति बढ़ सकती है.

नागरिक शासन की बहाली का अनुरोध करने वाले कई राजनयिकों ने दोनों जनरलों से बात करने की अपील की है.

केन्या, दक्षिण सूडान और जिबूती के राष्ट्रपतियों को राजधानी खार्तूम भेजने पर सहमति बनी है. हालांकि विमानों की आवाजाही ठप रहने के कारण अभी तक साफ नहीं हो पाया है कि वे सूडान कब जा पाएंगे.

अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ, सभी ने इस समस्या को हल करने के लिए संघर्ष विराम लागू करने और बातचीत करने की अपील की है.

वीडियो कैप्शन, सूडान: तख़्तापलट के बाद सड़कों पर अपना हक़ मांगते लोग

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