जी-7 क्या है? क्या ये ग्रुप यूक्रेन और ग़ज़ा में जंग रुकवा सकता है?

इटली में हो रहे ग्रुप-7 देशों के सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हिस्सा ले रहे हैं, प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी के साथ उनकी फ़ाइल फ़ोटो

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दुनिया के सात सबसे अमीर मुल्कों के नेता इटली में इकट्ठा हो रहे हैं.

ये नेता इस बात का फ़ैसला करेंगे कि यूक्रेन और ग़ज़ा की जंग को कैसे रोका जाए.

जी-7 शिखर सम्मेलन में अफ़्रीका और इंडो-पैसेफ़िक क्षेत्र के नेता भी होंगे और वे विकासशील देशों के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर विचार-विमर्श करेंगे.

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जी-7 क्या है?

जी 7 यानी 'ग्रुप ऑफ़ सेवेन' दुनिया की तथाकथित सात 'अत्याधुनिक' अर्थव्यवस्थाओं की एक संस्था है जिसका ग्लोबल ट्रेड और अंतरराष्ट्रीय फ़ाइनेंशियल सिस्टम पर दबदबा है.

ये सात देश हैं - कनाडा, फ़्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका.

रूस को भी 1998 में इस गुट में शामिल किया गया था और तब इसका नाम जी-8 हो गया था पर साल 2014 में रूस के क्राइमिया पर कब्ज़े के बाद उसे इस गुट से निकाल दिया गया.

एक बड़ी इकॉनमी और दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के बावजूद चीन कभी भी इस गुट का हिस्सा नहीं रहा है.

चीन में प्रति व्यक्ति आय इन सात देशों की तुलना में बहुत कम है इसलिए चीन को एक एडवांस इकॉनमी नहीं माना जाता.

लेकिन चीन और अन्य विकासशील देश जी 20 समूह में हैं.

यूरोपीय संघ भी जी-7 का हिस्सा नहीं है लेकिन उसके अधिकारी जी-7 के वार्षिक शिखर सम्मेलनों में शामिल होते हैं.

पूरे साल जी-7 देशों के मंत्री और अधिकारी बैठकें करते हैं, समझौते तैयार करते हैं और वैश्विक घटनाओं पर साझे वक्तव्य जारी करते हैं.

इस साल जी-7 की अध्यक्षता इटली कर रहा है.

इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी

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शिखर सम्मेलन के लिए इटली का एजेंडा क्या है?

इस साल जी-7 की समिट 13 से 15 जून के बीच इटली के अपुलिया में हो रही है.

अक्तूबर, 2022 में सत्ता संभालने के बाद इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी पहली बार किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय फ़ोरम की मेजबानी कर रही हैं.

यूक्रेन और ग़ज़ा में युद्ध के अलावा इटली चाहता है कि अफ़्रीका और माइग्रेशन के मुद्दे पर भी बात हो.

साथ ही आर्थिक सुरक्षा और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर सहयोग का मुद्दा भी उठाया जाए.

जी-7 देशों के नेताओं की बैठक

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जी-7 के नेता ग़ज़ा और यूक्रेन पर क्या कर सकते हैं?

जी-7 देशों ने पहले ही रूस की अर्थव्यवस्था पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं.

इन देशों ने रूस को इंटरनेशनल कॉमर्स और ग्लोबल फ़ाइनेंशियल सिस्टम से पूरी तरह से ब्लॉक कर दिया है.

जी-7 और यूरोपीयन संघ ने रूस के 325 अरब डॉलर की परिसंपत्तियां फ़्रीज़ कर दी हैं. ये सारा धन इन सात देशों में जमा था.

इनमें रूस के सेंट्रल बैंक द्वारा जमा किए गए फ़ॉरेन रिज़र्व (विदेशी मुद्रा) भी शामिल हैं.

अब जी-7 देश एक योजना पर काम कर रहे हैं जिसके तहत इस भारी-भरकम रकम से मिलने वाले ब्याज को यूक्रेन को बतौर ऋण दे दिया जाएगा.

ब्याज की ये रकम अब तक करीब 50 अरब डॉलर हो चुकी है.

तीन जून को जी-7 देशों के नेताओं ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की ग़ज़ा में युद्ध रोकने की प्लान को भी हरी झंडी दे दी है.

बाइडन ने इसराइल और हमास के बीच तुरंत युद्धविराम का प्रस्ताव रखा है. इस शांति प्रस्ताव में सभी बंधकों की रिहाई और ग़ज़ा को सहायता में बढ़ोतरी भी शामिल है.

बाइडन के प्रस्ताव में ऐसा शांति समझौता है जो इसराइल की सुरक्षा और ग़ज़ा के लोगों की हिफ़ाज़त की गारंटी बन सके.

Drapeaux des pays du G7
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जी-7 का रुतबा

  • 7सदस्य देश

  • 30 %ग्लोबल जीडीपी में हिस्सेदारी

  • 1/10दुनिया की आबादी में हिस्सा

  • 2014क्राइमिया का अतिक्रमण करने के बाद रूस को संस्पेंड किया

स्रोत - बीबीसी रिसर्च

विकासशील देशों के साथ कैसे काम करता है जी-7?

इटली का कहना है कि जी-7 समिट के लिए "विकसित देशों और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ रिश्ते एजेंडे के केंद्र में होंगे" और वो "सहयोग और आपसी फ़ायदे की साझीदारी पर आधारित मॉडल बनाने के लिए काम" करेगा.

शिखर सम्मेलन के लिए इटली ने अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और भारत प्रशांत क्षेत्र के 12 विकासशील देशों के नेताओं को निमंत्रण दिया है.

जियोर्जिया मेलोनी की सरकार के 'मैटेई प्लान' के तहत इटली कई अफ्रीकी देशों को 5.5 अरब यूरो का कर्ज और आर्थिक सहायता देने जा रहा है.

इटली की इस योजना का मक़सद इन अफ्रीकी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को आगे बढ़ाने में मदद देना है.

इस योजना से इटली को ऊर्जा सेक्टर में खुद को ऐसे महत्वपूर्ण देश के रूप से स्थापित करने में मदद मिलेगी जो अफ्रीका और यूरोप के बीच गैस और हाइड्रोजन की पाइपलाइन बना सकता है.

हालांकि कई विश्लेषकों को ये संदेह भी है कि इटली 'मैटेई प्लान' की आड़ लेकर अफ्रीका से होने वाले प्रवासन को रोकने जा रहा है.

इस योजना के लिए इटली अन्य देशों से भी वित्तीय योगदान देने की अपील कर रहा है.

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आर्थिक सुरक्षा और एआई से जुड़े जोख़िम से जी-7 कैसे निपट सकता है?

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साल 2023 में जी-7 के अध्यक्ष के रूप में जापान ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा के लिए योजना बनाने पर ज़ोर दिया था.

इसके लिए जी-7 देशों ने एक ऐसा समझौता किया जिसका मक़सद चीन और रूस जैसे देशों को अपनी आर्थिक ताक़त का इस्तेमाल दूसरे देशों पर अपनी मर्ज़ी थोपने से रोकना था.

दिसंबर, 2023 में इटली चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' से अलग हो गया. चीन इस परियोजना की मदद से दुनिया भर में अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए बंदरगाह और ट्रांसपोर्ट रूट का विस्तार कर रहा है.

जियोर्जिया मेलोनी ने कहा भी कि चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' में इटली का शामिल होना एक ग़लती थी.

अमेरिका ने चीन की इस परियोजना को 'कर्ज़ देकर अपने जाल में फंसाने की कूटनीति' करार दिया है.

ये माना जा रहा है कि इटली में होने वाले समिट में आर्थिक सुरक्षा के मुद्दे पर और जी-7 देशों के नेताओं से और कदम उठाने के लिए अमेरिका भी तैयार है.

जापान में हुए साल 2023 के समिट में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की सुरक्षा का मुद्दा उठा था और इसकी नतीजा 'हिरोशिमा एआई प्रोसेस' के रूप में निकला जिसका मक़सद 'दुनिया भर में सुरक्षित और भरोसेमंद आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस' को बढ़ावा देना था.

हालांकि ये तमाम कोशिशें जी-7 देशों का अपनी तरफ़ से उठाए कदमों का महज हिस्सा भर थीं.

इस बार की बैठक में मुमकिन है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की सुरक्षा को लेकर कुछ अंतरराष्ट्रीय नियम क़ायदे पर बात आगे बढ़े और यूरोपीय संघ और अमेरिकी राष्ट्रीय के एग्जिक्यूटिव ऑर्डर के जरिये आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस क़ानून को स्वीकार कर लिया जाए.

जी-7 देश

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क्या जी-7 के पास कोई ताक़त है?

जी-7 देशों का समूह कोई क़ानून नहीं बना सकता है लेकिन अतीत में इस ग्रुप के कुछ फ़ैसलों का असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा गया है.

उदाहरण के लिए जी-7 देशों ने साल 2002 में मलेरिया और एड्स के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक ग्लोबल फंड को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

साल 2021 में जब ब्रिटेन में जी-7 देशों के शिखर सम्मेलन का आयोजन होने वाला था तो उससे पहले जी-7 के वित्त मंत्रियों ने इस बात पर सहमति जताई थी कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अधिक टैक्स देना चाहिए.

जी-7 देश विकासशील देशों को वित्तीय मदद पहुंचाते रहे हैं और इस संगठन ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने की दिशा में भी कदम उठाए हैं.

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