जी-7 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वादा और देश में भावना आहत करने के मुकदमे

प्रेस

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    • Author, चंदन शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

फ़ैक्ट चेकिंग साइट ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद ज़ुबैर को सोमवार को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने धार्मिक भावनाएँ आहत करने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया. उसके बाद मंगलवार को उन्हें चार दिनों की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया.

दिल्ली पुलिस के अनुसार, आईपीसी की धारा 153-ए (समाज में शत्रुता बढ़ाने) और 295-ए (धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने) के आरोप में चार साल पहले एक एफ़आईआर दर्ज की गई थी, जिसके तहत उन्हें गिरफ़्तार किया गया है.

दूसरी तरफ़, भारत ने सोमवार को ही दुनिया के विकसित देशों के संगठन जी-7 के साथ 'अभिव्यक्ति की आज़ादी की ऑनलाइन और ऑफ़लाइन सुरक्षा और सिविल सोसायटी की आज़ादी की रक्षा' करने के लिए एक समझौते पर दस्तख़त किए.

इस बारे में जी-7 के सभी सात स्थायी सदस्यों, यूरोपीय संघ और भारत सहित पाँच आमंत्रित देशों की तरफ़ से चार पन्नों का एक संयुक्त बयान जारी किया गया. इसमें कहा गया, "अभिव्यक्ति और विचार की आज़ादी की ऑनलाइन और ऑफ़लाइन रक्षा करने के लिए सभी सहयोगी मिलकर काम करेंगे.'' साथ ही, इस समझौते में लिखा गया है, "इंटरनेट की दुनिया को अधिक खुला, आज़ाद, भरोसेमंद और सुरक्षित बनाया जाएगा."

इस तरह, एक ही दिन (27 जून को) इन दो घटनाओं के सामने आने के बाद मंगलवार को सोशल मीडिया पर कई तरह के सवाल उठने लगे.

'केवल समझौता करने से क्या होगा'

कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ जर्नलिस्ट ने एक बयान जारी करके कहा, "पत्रकार मोहम्मद ज़ुबैर की गिरफ़्तारी भारत में प्रेस की स्वतंत्रता में गिरावट की एक और मिसाल है जहाँ सरकार ने पत्रकारों के ख़िलाफ़ शत्रुतापूर्ण और असुरक्षित माहौल बनाया है."

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मोहम्मद ज़ुबैर की गिरफ़्तारी के बाद संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के प्रवक्ता स्टीफ़न यूज़ेरिक ने कहा, "दुनिया के किसी भी कोने में, यह बहुत अहम है कि लोगों को अपनी बात कहने की आज़ादी हो, पत्रकारों को इस बात की स्वतंत्रता हो कि वे बिना प्रताड़ना के डर के काम कर सकें."

उन्होंने ये बात मोहम्मद ज़ुबैर की गिरफ़्तारी के बाद पूछे गए एक सवाल के जवाब में कही थी.

वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''मुझे लगता है कि यह एक क़िस्म की विडंबना है. देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी नाम की चीज़ अब ख़त्म हो गई है. सरकार चाहती है तो किसी को भी हल्के से हल्के केस में गिरफ़्तार कर लिया जाता है. मोहम्मद ज़ुबैर जैसे कई उदाहरण हैं. सरकार ने जी-7 के साथ समझौता तो कर लिया, पर अभिव्यक्ति की आज़ादी के प्रति जो सम्मान होना चाहिए, वो नहीं है."

वहीं एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता कहते हैं, "हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी विदेश जाकर अभिव्यक्ति की आज़ादी के बारे में चाहे कुछ भी कहें, लेकिन अपने देश की कहानी कुछ और ही है.''

राजनीति से जुड़े कई लोगों ने सरकार पर पक्षपात के आरोप लगाए हैं, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तिहाद-उल-मुसलमीन के सांसद असदउद्दीन ओवैसी ने ट्वीट करके सवाल उठाया कि भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा के ख़िलाफ़ भी धार्मिक भावनाएँ भड़काने का मामला है, लेकिन उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया गया जबकि मोहम्मद ज़ुबैर को गिरफ़्तार कर लिया गया.

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बँटी हुई है लोगों की राय

दूसरे मामलों की तरह इस मामले में लोगों के विचार दो हिस्सों में बँटे हुए हैं, सरकार की कार्रवाइयों का समर्थन करने वाले लोग भी हैं जिन्होंने मोहम्मद ज़ुबैर की गिरफ़्तारी को सही ठहराया है.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने मोहम्मद जुबैर एक 'जिहादी'कहा है और उन पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है. भाजपा महासचिव सीटी रवि ने ट्वीट किया, 'उन्होंने (राहुल गांधी) महाराष्ट्र में एक साधारण फेसबुक पोस्ट के लिए एक मराठी अभिनेत्री की गिरफ़्तारी का विरोध नहीं किया, जब राजस्थान में महिलाओं और बच्चों के साथ बलात्कार हुआ, उन्होंने अपना मुंह बंद रखा लेकिन वे एक जिहादी के लिए आंसू बहा रहे हैं."

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इसी तरह भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता गौरव भाटिया ने मोहम्मद ज़ुबैर की गिरफ़्तारी को सही ठहराया.

उन्होंने पार्टी कार्यालय में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा, "कोई अपने आप को अगर स्वघोषित फ़ैक्ट चैकर बता दे, उससे वो फ़ैक्ट चैकर नहीं हो जाता. कोई न्यूज़ एजेंसी, पत्रकार हो, फ़ैक्ट चैकर हो तो उनका सम्मान है. लेकिन वो जो फ़ैक्ट चेक करेगा या न्यूज़ दिखाएगा, वो सेलेक्टिव नहीं हो सकता. वो किसी पॉलिटिकल दल और किसी समुदाय को सूट करे, और किसी और को टार्गेट करे. ये निष्पक्षता भी नहीं है."

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भारत की हालत पर चिंतित अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ

पिछले साल की रिपोर्ट के मुताबिक़, प्रेस फ्रीडम इंडेक्स यानी प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों की लिस्ट में भारत 142वें स्थान पर है. 2016 में भारत 133वें स्थान पर था और 2021 आते-आते 142वें स्थान पर आ गया.

एशिया के कई देश भारत से काफ़ी ऊपर हैं जबकि पाकिस्तान का नंबर 145वां है, पिछले कई वर्षों से इस सूचकांक में भारत की स्थिति में लगातार गिरावट आई है.

यह रिपोर्ट जानी-मानी संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स हर साल जारी करती है. आप रिपोर्ट यहाँ देख सकते हैं.

इसी तरह मानवाधिकारों के लिए दुनिया भर में काम करने वाली संस्था ह्यूमन राइट्स वाच ने भी भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंता जिताई है.

इसी साल तीन मई को न्यूयॉर्क से जारी रिपोर्ट में कहा गया है, "भारत में पत्रकारों और विरोधियों को निशाना बनाया जा रहा है. सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों तरह से परेशान किया जा रहा है जिसके पीछे हिंदुत्ववादी लोग और संगठन हैं जिन्हें सरकार का प्रश्रय हासिल है."

मोहम्मद ज़ुबैर की गिरफ़्तारी के बाद मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बयान जारी किया है, "भारत सरकार ने मोहम्मद ज़ुबैर को निशाना बनाया है क्योंकि वे अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे दुष्प्रचार अभियान और उनके साथ हो रहे भेदभाव की पोल खोल रहे थे. ज़ुबैर की गिरफ़्तारी दिखाती है कि मानवाधिकार के लिए काम करने वालों के लिए ख़तरा एक संकट के स्तर तक पहुँच चुका है."

'सरकार से ज़्यादा न्यायपालिका से निराशा'

वहीं सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील रेबेका जॉन भारत के मौजूदा माहौल को डराने वाला होने का दावा करते हुए कहती हैं कि इसके लिए देश की न्यायपालिका ज़्यादा ज़िम्मेदार है.

वो कहती हैं, ''आज की तारीख़ में मुझे सरकार से ज़्यादा निराशा अपनी ज्यूडिशियरी के रुख़ से है, क्योंकि यही संस्था भारतीयों की निजी आज़ादी और अधिकार की रक्षा कर सकती है. और जब वो ऐसा न करे तो बेहतर हो पाने की उम्मीद रखना बेकार है.''

रेबेका जॉन के अनुसार, ''किसी भी देश में क़ानून का शासन उसकी ज्यूडिशियरी क़ायम रखती है. क़ानून और संविधान, जो हर डेमोक्रेटिक रिपप्ब्लिक के लिए बहुत अहम होता है, उसकी रक्षा सिर्फ़ अदालत करती है. लेकिन मुझे बेहद दुख है कि समय के साथ हमारी अदालतों ने क़ानून, क़ानून के शासन, सिविल और पर्सनल लिबर्टीज़ की रक्षा ढंग से करने में नाकाम रही है.''

उनके अनुसार, ''सरकारें आएंगी और जाएंगी, लेकिन जो संस्थागत तरीके हैं उन पर नियंत्रण करने के, संविधान को लागू करने के, जब वो फेल होता है तब डर लगना शुरू हो जाता है. ऐसे में जी-7 में अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर किया गया समझौता एक मज़ाक है. एक ओर आप समझौते पर साइन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर किसी के ट्वीट को लेकर उसे अरेस्ट किया जा रहा है.''

वहीं परंजय गुहा ठाकुरता कहते हैं, ''प्रधानमंत्री मोदी विदेश में क्या कहते और करते हैं, उससे ज़्यादा अहम यह है कि सरकार देश में काम क्या कर रही है. सरकार ने अभी तक यति नरसिंहानंद, हमारे दो माननीय सांसदों साध्वी प्रज्ञा और साक्षी महाराज के विवादास्पद बयानों को लेकर इन पर कोई कार्रवाई नहीं की.''

वहीं रेबेका जॉन का कहना है कि यदि देश की सभी संस्थाएं अपना अपना काम सही तरीके से करे तो समस्या ख़ुद ही सुलझ जाएगी.

वो कहती हैं, ''हर संस्था अपना काम करे, चाहे वो ज्यूडिशियरी हो या चुनाव आयोग, जब ये सब अपना अपना काम करेंगी, तो सरकारें चाहे जो मर्ज़ी करें, वो ग़ैर क़ानूनी काम नहीं कर सकतीं. और यदि करती भी हो तो उस पर बहुत हद तक नियंत्रण बनाया जा सकता है. वैसे असली ताक़त तो जनता के हाथों में है.''

जी-7

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'इसमें जी-7 की क्या भूमिका होगी'

जी-7 के सभी सात स्थायी 7 सदस्यों अमेरिका, कनाडा, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और इटली के साथ यूरोपीय संघ और पांच सहयोगी देशों भारत, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया अर्जेंटीना और सेनेगल ने इस समझौते पर अपने दस्तख़त किए हैं.

इसमें कहा गया है कि सभी सदस्य अपने लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए काम करेंगे और लोकतांत्रिक व्यवस्था के उन सभी साहसी रक्षकों का स्वागत करते हैं, जो उत्पीड़न और हिंसा के ख़िलाफ़ खड़े होते हैं.

इस समझौते से जुड़े सभी पक्षों ने विश्व स्तर पर लोकतांत्रिक समाजों के लचीलेपन को बेहतर बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने का वादा किया है. इससे लोकतंत्र में खुली सार्वजनिक बहस, आज़ाद और बहुलतावादी मीडिया और ऑनलाइन और ऑफलाइन सूचनाओं के मुक्त प्रवाह को सक्षम बनाया जा सके.

साथ ही साइबर ख़तरों को लेकर जागरुकता बढ़ाने, साइबर सहयोग का विस्तार करने सहित डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने की भी बात कही गई है.

वहीं इंटरनेट पर दुष्प्रचार के साथ सूचना के हेरफेर और उसमें हस्तक्षेप के ख़तरों को रोकने की भी बात कही गई है. और डिजिटल स्किल और डिजिटल साक्षरता को बढ़ा कर विश्वसनीय जानकारी और डेटा के तमाम स्रोतों तक ऑनलाइन और ऑफलाइन पहुंच को बढ़ाने का दावा भी किया गया है.

समझौते में हिंसक, चरमपंथी और ऑनलाइन तरीक़े से उकसाने वाले कंटेंट के मुकाबले के लिए पारदर्शिता बढ़ाने का संकल्प लिया गया है.

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