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तालिबान को लेकर भारत सरकार क्या सोचता है, आगे का रोडमैप क्या है, इन सवालों पर पढ़िए विदेश मंत्रालय का जवाब
अनंत प्रकाश, भूमिका राय and अपूर्व कृष्ण
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भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने गुरुवार को तालिबान पर भारत सरकार के रुख को लेकर अहम जानकारी दी है.
हर गुरुवार होने वाली साप्ताहिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मीडिया की ओर से पूछा गया कि क्या भारत सरकार तालिबान को एक आतंकी संगठन के रूप में देखती है. और भारत सरकार का तालिबान को स्वीकृति देने के मुद्दे पर क्या रुख है.
इन सवालों पर बागची ने कहा, “इस समय हमारा ध्यान इस मुद्दे पर नहीं है. हमारा ध्यान इस पर है कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों और किसी तरह की आतंकवादी गतिविधियों के लिए न हो.”
हाल ही में क़तर में भारतीय राजदूत दीपक मित्तल ने दोहा स्थित तालिबान के राजनीतिक दफ़्तर प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्तनिकजई से मुलाक़ात की है.
ऐसे में तालिबान पर सरकार के रुख को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं.
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तालिबान से क्यों मिले भारतीय अधिकारी
इस प्रेस वार्ता में भी पत्रकारों की ओर से मित्तल और स्तनिकजई की बैठक को लेकर सवाल पूछे गए.
लेकिन बागची ने कहा कि इस समय ये सब बात करना बहुत जल्दबाजी होगी.
उन्होंने कहा, “हमें दोहा में हुई बैठक को उसी तरह देखना चाहिए जो कि ये असल में है. ये एक मुलाक़ात मात्र थी. मुझे लगता है कि अभी काफ़ी शुरुआती दिन हैं.
“हमने इस अवसर का लाभ उठाते हुए अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं जो अफ़ग़ानिस्तान से लोगों को बाहर निकालने और आतंकवाद से जुड़ी हैं. और हमें सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है.”
जब ये पूछा गया कि क्या भारत सरकार के पास तालिबान से संपर्क स्थापित करने से जुड़ा कोई रोडमैप है तो बागची ने बेहद सधे शब्दों में इसका जवाब दिया.
उन्होंने कहा, “ये कोई हां या ना कहने वाला सवाल नहीं हैं. हमने बिना सोचे कोई कदम नहीं उठाया होगा. हमारी प्राथमिक और तात्कालिक चिंता ये है कि अफ़ग़ान ज़मीन का इस्तेमाल भारत-विरोधी गतिविधियों और भारत के ख़िलाफ़ आतंकवाद के लिए न हो. हमारा ध्यान इस मुद्दे पर है. आने वाले समय में देखते हैं कि क्या होता है.”
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उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान की पंजशीर घाटी से तालिबान और स्थानीय लड़ाकों के बीच संघर्ष की ख़बरें आ रही हैं.
पंजशीर अफ़ग़ानिस्तान का वो आख़िरी प्रांत जो तालिबान के कब्ज़े में नहीं आया है.
दोनों तरफ़ से दावे किए गए हैं तो उसने दूसरे पक्ष को भारी नुकसान पहुंचाया है. लेकिन बीबीसी स्वतंत्र रूप से इन दावों की पुष्टि नहीं कर सकता.
तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, " हमने स्थानीय लड़ाकें के गुट से बातचीत विफल होने के बाद ऑपरेशन शुरु कर दिया है. तालिबान के लड़ाके पंजशीर घाटी में दाख़िल हो चुके हैं और उन्होंने कुछ इलाक़ों को कब्ज़े में भी ले लिया है."
लेकिन पंजशीर में तालिबान विरोधी अभियान को चलाने वाले नेशनल रेज़िसटेंस फ़्रंट ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान ने कहा है कि उनका पूरे इलाक़े पर मज़बूत कब्ज़ा है और उन्होंने तालिबान का हमला नाकाम कर दिया है.
सुदूर उत्तर में स्थित ये घाटी दशकों से अपने दुशमनों के दांत खट्टे करती रही है. सोवियत संघ से लेकर तालिबान तक को यहां मुंह खानी पड़ी है.
पंजशीर घाटी क्यों है ख़ास इसपर विस्तार इस लिंक पर क्लिक करें.

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केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने पीएफ खातों में जमा रकम के ब्याज पर कर लगाने के लिए नए नियमों को जारी किया है. आयकर क़ानून में 25वें संशोधन के तहत जोड़ी गयी धारा 9डी के मुताबिक़, पीएफ़ खातों को दो भागों में बांटा जाएगा.
सरकार ने फ़ाइनेंस एक्ट 2021 में ही ये प्रावधान जोड़ दिया था कि ढाई लाख से ऊपर के पीएफ़ कंट्रीब्यूशन पर कर लगेगा. ये नियम इस वर्ष एक अप्रैल से लागू हो चुका है.
अब सरकार ने ये बताया है कि टेक्स कैसे वसूला जाएगा.
अगर आप पीएफ़ में सालाना ढाई लाख से अधिक योगदान देते हैं तो आप के दो खाते हो जाएंगे.
इसमें से पहले भाग में वार्षिक जमा होने वाली अधिकतम राशि 2.5 लाख रुपये होगी जो कि टैक्स फ्री यानी कराधान से मुक्त रहेगी.
वहीं, दूसरे भाग में 2.5 लाख रुपये से ऊपर की राशि जमा होगी जिस पर मिलने वाला ब्याज़ कराधान मुक्त या टैक्स फ्री नहीं होगा.
साथ ही खाताधारक को इनकम टैक्स रिटर्न भरते हुए इस बारे में जानकारी देनी होगी.
ऐसा माना जा रहा है कि सरकार का ये कदम पीएफ़ विभाग के लिए एक बड़ी मुश्किल साबित होने जा रहा है
क्योंकि भारत में इस समय 24 करोड़ से ज़्यादा लोगों के पास पीएफ़ खाते हैं और इनमें से सिर्फ 14 करोड़ लोगों को यूएएन नंबर दिया गया है.
पीएफ विभाग को इन सभी खातों को दो भागों में बांटकर उन पर जमा राशि पर मिले ब्याज का आकलन करना होगा.
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नेपाल सरकार ने एक उच्च स्तरीय बैठक में चीन के साथ जारी सीमा विवाद का अध्ययन करने के लिए एक समिति बनाने का फ़ैसला किया है.
केंद्रीय मंत्री ज्ञानेंद्र बहादुर ने बुधवार को बताया कि ये समिति लिपी लापचा से लेकर हिलसा (हुमला ज़िला) के बीच नेपाल-चीन सीमा से जुड़ी समस्याओं का अध्ययन करेगी.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, चीन ने पिछले साल कथित रूप से हुमला ज़िले में नेपाली ज़मीन पर कब्ज़ा कर 9 इमारतों को निर्माण किया था.
इसके बाद ज़िलाधिकारी के नेतृत्व में नेपाल सरकार की एक टीम ने घटनास्थल का दौरा करके इस मामले का अध्ययन भी किया था. लेकिन, इस टीम की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया.
इसके साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने चीन द्वारा नेपाल की ज़मीन पर कब्ज़ा करने की ख़बरों का खंडन किया था.
सरकार द्वारा बनाई गयी इस नयी समिति में सर्वे विभाग, नेपाल पुलिस, सशस्त्र बल, और सीमा विशेषज्ञ शामिल होंगे.
नेपाल सरकार में क़ानून, न्याय और संसदीय कार्यों के मंत्री एवं प्रवक्ता ज्ञानेंद्र बहादुर करकी ने बताया है कि ये समिति गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव की देखरेख में बनाई जाएगी.
इसके साथ ही समिति अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को सौंपेगी. हालांकि, इस रिपोर्ट को जमा करने के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है.
इस मामले पर और जानकारी के लिए पढ़िए ये रिपोर्ट:-

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ब्रिटेन के विदेश मंत्री डोमिनिक राब ने कहा है कि निकट भविष्य में ब्रिटेन तालिबान को मान्यता नहीं देने जा रहा है. हालाँकि उन्होंने इसके साथ ही कहा कि उनके साथ "सीधे संपर्क" की ज़रूरत है.
ब्रिटिश विदेश मंत्री ने क़तर की राजधानी दोहा में वहाँ के नेताओं से मुलाक़ात के बाद कहा, "मुझे लगता है कि तालिबान ने हमें जो भरोसा दिया है उसकी परीक्षा के लिए उनके साथ संपर्क और संवाद की ज़रूरत है."
उन्होंने कहा कि ब्रिटेन को अब नई सच्चाई के साथ ढलना चाहिए.
राब का इस दौरे का मुख्य उद्देश्य अफ़ग़ानिस्तान से ब्रिटिश और अफ़ग़ान लोगों को बाहर निकालने की व्यवस्था करना था जिसमें क़तर मदद कर सकता है जिसके तालिबान के साथ संबंध हैं.
उन्होंने कहा, "हमारी पहली प्राथमिकता वहाँ बचे हुए ब्रिटिश नागरिकों के साथ उन अफ़ग़ान लोगों को भी निकालने की है जिन्होंने ब्रिटेन के लिए काम किया है या जिन लोगों को ख़तरा हो सकता है."
राब ने बताया कि ब्रिटेन एक क्षेत्रीय गठबंधन बनाने का प्रयास कर रहा है ताकि तालिबान पर अधिकतम दबाव डाला जा सके.
उन्होंने कहा कि क़तर इस काम में एक "प्रभावशाली पक्ष" हो सकता है.
ब्रिटेन के अधिकारी दोहा में वरिष्ठ तालिबान नेताओं से भी मिल रहे हैं और वो ब्रिटेन के विदेश मंत्री को इस बातचीत के परिणाम से अवगत कराएँगे.
ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय ने कह है कि काबुल से पिछले हफ़्ते हटा अफ़ग़ान दूतावास अब दोहा में तैयार हो चुका है और काम कर रहा है.

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केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को गुजरात में रक्षा उत्पादों के आयात पर विवाद को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की आलोचना की है.
उन्होंने कहा है कि भारत में रफ़ाल विमान उतर चुके हैं लेकिन राहुल गांधी का उड़ान भरना अभी शेष है.
गुजरात के केवड़िया में भाजपा की तीन दिवसीय कार्यकारिणी बैठक का आयोजन करते हुए उन्होंने कहा- "कांग्रेस और राहुल गांधी ने अनावश्यक राफेल का मुद्दा बनाया. नतीजा क्या हुआ? राफेल फ्रांस में तैयार हो गए. राफेल भारत में लैंड भी कर गए मगर राहुल जी अभी भी 'Take off' नही कर पाए हैं."
बता दें कि राहुल गांधी समेत तमाम विपक्षी दलों ने फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन से रफ़ाल विमानों की ख़रीद के मुद्दे पर केंद्र सरकार की आलोचना की थी. इसे लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा है.
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महात्मा गांधी के नाम का ग़लत इस्तेमाल
राजनाथ सिंह ने कहा है कि कांग्रेस पार्टी आम जनता के कल्याण के बारे में भूलकर सिर्फ अपना फायदा करने में लगी हुई है और महात्मा गांधी के नाम का ग़लत इस्तेमाल कर रही है.
उन्होंने कहा, “कांग्रेस पार्टी ने गांधी का नाम खूब इस्तेमाल किया। यहां तक कि गांधी नाम भी रख लिया, मगर गांधीजी का काम उन्होंने छोड़ दियावे अपने परिवार और पार्टी को बढ़ाने में लग गए. यही नहीं, उन्होंने भ्रष्टाचार को भी संस्थागत रूबप दे दिया है.”
मॉनसून सत्र में हंगामे के लिए कांग्रेस ज़िम्मेदार
राजनाथ सिंह ने मॉनसून सत्र के दौरान सदन न चलने देने का ठीकरा भी कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी के सिर मढ़ा.
उन्होंने कहा, “जब सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध किया जाए तो यह संसदीय सत्र में व्यवधान के रूप में सामने आता है. हमें विपक्ष का सामना करने के लिए लगाए जाने वाले समय और ऊर्जा को एक हद में लाना चाहिए.
“लोकतंत्र में विरोध करने में बुराई नहीं है. मगर विरोध के लिए विरोध करने की कोशिश की जा रही है. संसद का एक पूरा सत्र ठीक से चलने नहीं दिया गया.“
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पूर्व अमेरिकी राजनयिक निक्की हेली ने अफ़ग़ानिस्तान पर चेतावनी देते हुए कहा है कि चीन बगराम एयर फोर्स बेस पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश कर सकता है.
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत रहीं निक्की ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान से सैन्य टुकड़ियों को जल्दबाजी में वापस बुलाकर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अमेरिकी सहयोगियों का विश्वास एवं भरोसा खो दिया है.
बगराम पर क़ब्जा कर सकता है चीन
निक्की हेली ने चीन, पाकिस्तान और भारत के मुद्दे पर भी चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि अमेरिकी सरकार को चीन पर नज़र रखने की ज़रूरत है.
उन्होंने कहा है कि “हमें चीन पर नज़र रखने की ज़रूरत है क्योंकि मुझे लगता है कि आप चीन को बगराम एयर फोर्स बेस की ओर कदम बढ़ाते हुए देखने जा रहे हैं. मुझे लगता है कि वे अफ़ग़ानिस्तान में अपने कदम बढ़ा रहे हैं और भारत के ख़िलाफ़ मज़बूती से आगे बढ़ने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं.”
अमेरिकी सेना ने बीती जुलाई में रातों-रात बगराम एयरबेस खाली कर दिया था.
20 साल तक चले अफ़ग़ानिस्तान युद्ध में बगराम एयरबेस अमेरिकी सेना के मुख्य सैन्य अड्डों में शामिल रहा है. एक समय में इस एयरबेस पर लाखों अमेरिकी सैनिक रहा करते थे.
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रूस पर भी दी चेतावनी
निक्की हेली ने रूस पर चेतावनी देते हुए कहा है कि अमेरिकी सरकार को ये सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि अमेरिकी सायबर सुरक्षा मजबूत हो.
उन्होंने कहा है, "रूस जैसे तत्व लगातार हमें हैक करते रहेेंगे क्योंकि हम उनका सामना करने का साहस नहीं दिखा रहे हैं."
इसके साथ ही हेली ने कहा है कि अमेरिका को इस समय अपने सहयोगियों को आश्वस्त करने की ज़रूरत है कि अमेरिका उनके साथ खड़ा है.
इन सहयोगियों में भारत का नाम शामिल करते हुए हेली ने कहा कि "अमेरिका को अपने क़रीबी मित्रों जैसे भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया को आश्वस्त करने एवं ये अहसास दिलाने की आवश्यकता है कि हम उनके साथ हैं और हमें भी उनकी ज़रूरत है."

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अमेरिका के पूर्वोत्तर तट पर भारी बारिश और तूफ़ान के बाद अचानक आई बाढ़ से स्थानीय मीडिया के मुताबिक़ कम-से-कम 9 लोगों की मौत हो गई है.
न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी में आपाताकाल की घोषणा कर दी गई है. न्यूयॉर्क सिटी के मेयर बिल डी ब्लासियो ने इसे एक "ऐतिहासिक मौसमी घटना" बताया है.
न्यूयॉर्क के जाने माने सेंट्रल पार्क में केवल एक घंटे के भीतर तीन इंच या 8 सेेंटीमीटर की बारिश दर्ज की गई.
शहर की भूमिगत ट्रेन सेवा को बंद कर दिया गया है और रास्तों से सामान्य वाहनों के चलने पर पाबंदी लगा दी गई है.
न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी से कई विमानों और ट्रेनों को स्थगित कर दिया गया है.
अमेरिका में अचानक बदले इस मौसम का कारण समुद्री तूफ़ान इडा के बताया जा रहा है जिसका बचा हिस्सा ये असर दिखा रहा है.
इडा तूफ़ान पिछले सप्ताह अमेरिका के दक्षिणी राज्य लुइज़ियाना में आया था जहाँ उसने भारी तबाही मचाई थी.

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तेज़ी से आया पानी
सोशल मीडिया पर कई वीडियो पोस्ट किए गए हैं जिनमें दिख रहा है कि पानी कैसे लोगों के घरों में घुस रहा है.
न्यूयॉर्क के एक निवासी जॉर्ज बेली ने बीबीसी से कहा- "मैं डिनर कर रहा था जब पानी के गड़गड़ाने की आवाज़ आई, ये पानी बाथरूम के ड्रेनेज से आ रहा था.
मैं दूसरे कमरे में पानी की मेन लाईन चेक करने गया और जब तक लौटा तब तक ड्रॉइंग रूम में लगभग एक फुट पानी भर चुका था. विश्वास नहीं होता कि पानी कितनी तेज़ी से आया."
अमेरिका की राष्ट्रीय मौसम सेवा ने न्यूयॉर्क सिटी, ब्रूकलिन, क्वींस और लॉन्ग आइलैंड के कुछ हिस्सों में बाढ़ का आपातकाल घोषित कर दिया है.
संस्था ने बताया कि चेतावनी की तुलना में आपातकाल अलग होता है और ये तभी जारी किया जाता है जब अचानक बाढ़ आने से लोगों के मारे जाने ख़तरा होता है.
मैसाचुसेट्स और रोड आइलैंड के कुछ हिस्सों में समुद्री तूफ़ान की चेतावनी जारी की गई है.

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध भारतीय किसान संघ (बीकेएस) ने तीन नए कृषि क़ानूनों के विरोध में 8 सितंबर को पूरे देश में धरना देने का फ़ैसला किया है.
समाचार एजेंसी पीटीआआई के अनुसार संघ का कहना है कि केंद्र तीन नए कृषि क़ानूनों और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 31 अगस्त तक दिए गए उसके अल्टीमेटम पर कार्रवाई करने में नाकाम रहा है.
उसका कहना है कि फसलों की एमएसपी लागत पर तय होनी चाहिए और नए कृषि क़ानूनों पर जारी विवादों को सुलझाने के लिए एक नया क़ानून बनाया जाना चाहिए.
बीकेएस के खजांची युगल किशोर मिश्रा ने बुधवार को उत्तर प्रदेश के बलिया में पत्रकारों से कहा कि इन माँगों को लेकर 8 सितंबर को देश भर में एक सांकेतिक धरना दिया जाएगा.
उन्होंने कहा,"हमने मोदी सरकार को अपनी माँगों पर अमल के लिए 31 अगस्त तक का समय दिया था. चूँकि सरकार की ओर से कोई सकारात्मक संकेत नहीं आए हैं, इसलिए हम 8 सितंबर को धरना देंगे.
उन्होंने कहा कि इस दिन सारे ज़िला मुख्यालयों में प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर किसानों की समस्याओं को बताया जाएगा.
उन्होंने कहा, "हम आगे क्या क़दम उठाना है इसका फ़ैसला 8 सितंबर के बाद करेंगे."

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सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया, वेब पोर्टल और निजी टीवी चैनलों के एक वर्ग में झूठी ख़बरों को चलाने और उन्हें सांप्रदायिक लहजे में पेश करने को लेकर चिंता जताते हुए कहा है कि इससे देश का नाम ख़राब हो सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये कहा. इस पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना कर रहे थे. साथ ही जस्टिस सूर्य कांत और एएस बोपन्ना भी इस बेंच में शामिल थे.
इन याचिकाओं में पिछले वर्ष निज़ामुद्दीन मरकज़ में हुई एक धार्मिक सभा को लेकर "फ़ेक न्यूज़" के प्रसारण पर रोक लगाने के लिए केंद्र को निर्देश देने और इसके ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने की माँग की गई है.
सुनवाई करते हुए अदालत ने पूछा, "निजी समाचार चैनलों के एक वर्ग में जो भी दिखाया जा रहा है उसका लहजा सांप्रदायिक है. आख़िरकार इससे देश का नाम ख़राब होगा. आपने कभी इन निजी चैनलों के नियमन की कोशिश की है?"
पीठ ने कहा कि सोशल मीडिया केवल "शक्तिशाली लोगों" की आवाज़ सुनता है और न्यायाधीशों, संस्थाओं के ख़िलाफ़ बिना किसी जवाबदेही के लिखा जा रहा है.
उन्होंने कहा, "फ़ेक न्यूज़ और वेब पोर्टल तथा यूट्यूब चैनलों पर लांछन लगाने को लेकर कोई नियंत्रण नहीं है. अगर आप यूट्यूब पर जाएँ तो वहाँ देखेंगे कि किसी आसानी से फ़ेक न्यूज़ को चलाया जा रहा है और कोई भी यूट्यूब पर चैनल शुरू कर सकता है."
अदालत ने ये भी कहा कि वो छह सप्ताह बाद केंद्र की विभिन्न हाई कोर्टों में दायर उन याचिकाओं को स्थानांतरित करने के आग्रह के बारे में भी सुनवाई करेगी.
ये याचिकाएँ सोशल मीडिया और वेबसाइटों पर पेश की जा रही सामग्रियों के नियमन को लेकर जारी किए गए नए आईटी नियमों से संबंधित हैं.

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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान आज गुरुवार को अपनी नई सरकार का एलान कर सकता है.
तालिबान के वरिष्ठ नेता अहमदुल्लाह मुत्तक़ी ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी है कि काबुल के राष्ट्रपति भवन में एक समारोह की तैयारी हो रही है.
तालिबान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पिछले दिनों समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा था कि तालिबान के सर्वोच्च नेता मुल्ला हिब्तुल्लाह अख़ुंदज़ादा के नेतृत्व में एक शासकीय परिषद का गठन हो सकता है जिसके प्रमुख राष्ट्रपति होंगे.
मुल्ला हिब्तुल्लाह के तीन उप-प्रमुख हैं. वो हैं तालिबान संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे मौलवी याक़ूब, शक्तिशाली हक़्क़ानी नेटवर्क के प्रमुख सिराजुद्दीन हक़्क़ानी और तालिबान के संस्थापक सदस्यों में से एक अब्दुल ग़नी बरादर.
तालिबान ने पिछली बार 1996 से 2001 तक के अपने शासनकाल में ऐसी ही एक परिषद के सहारे शासन किया था जो निर्वाचित नहीं हुई थी.
तब तालिबान सरकार ने बर्बरता से अफ़ग़ानिस्तान में शरीयत क़ानूनों को लागू करवाया था.
2001 में अमेरिकी अगुआई में गठबंधन सेना के अफ़ग़ानिस्तान पर हमले के बाद तालिबान सत्ता से बाहर हो गए थे और उसके अधिकतर नेताओं को निर्वासित होना पड़ा था.
20 साल बाद तालिबान ने फिर से अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण कर लिया है और उसके अधिकतर नेता देश लौट चुके हैं.


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टीवी अभिनेता और बिग बॉस 13 के विजेता रहे सिद्धार्थ शुक्ला का गुरुवार को निधन हो गया.
मुंबई के कूपर अस्पताल के डॉक्टर शैलेष मोहिते ने बीबीसी से कहा कि सिद्धार्थ को अस्पताल लाया गया मगर तब तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी.
40 वर्षीय सिद्धार्थ दस सालों से अधिक समय से छोटे पर्दे पर सक्रिय थे लेकिन उन्हें उनकी पहचान मिली बिग बॉस का विजेता बनकर.
इसके अलावा वो ख़तरों के खिलाड़ी में भी नज़र आए थे. बालिका वधू में भी उन्होंने अपने अभिनय की छाप छोड़ी थी.

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अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने कहा है कि पंजशीर से तालिबान का प्रतिरोध जारी रहेगा और वो पूरे अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के हक़ की रक्षा करेंगे.
सालेह ने फ़ेसबुक पर "तालिबान पर प्रतिक्रिया" शीर्षक से एक पोस्ट लिखा है.
उन्होंने इसमें लिखा है- "हमारा प्रतिरोध सभी अफ़ग़ान नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए है. विरोधी पंजशीर में हैं, पर वो केवल पंजशीर के लिए प्रतिरोध नहीं कर रहे.
"आज ये घाटी सारे मुल्क़ की मेज़बानी कर रही है और उन सभी अफ़ग़ान लोगों के लिए एक उम्मीद है जो दमन, बदला, विद्वेष, लोगों की संपत्तियों पर दख़ल और तुम्हारी स्याह सोच से बचना चाहते हैं.
अगर ये देश तुमपर थोड़ा भी भरोसा करता है, तो सरहद पर क्यों लोगों की क़तार लगी हुई है, जो अपना सबकुछ छोड़ देना चाहते हैं मगर तुम्हारे नियंत्रण में नहीं रहना चाहते."

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पंजशीर में मोर्चाबंदी
अफ़ग़ानिस्तान के अपदस्थ प्रथम उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह पंजशीर में ही हैं और उन्होंने तालिबान के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद रखी हुई है.
उन्होंने ख़ुद को कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित किया हुआ है और कहा है कि वो तालिबान के साथ समझौता नहीं करेंगे.
बताया जाता है कि वहाँ हज़ारों तालिबान विरोधी लड़ाके अभी भी मोर्चा बाँधे हुए हैं.
पूर्व जिहादी कमांडर अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद भी पंजशीर में ही हैं और उनके आस-पास हज़ारों लोग मौजूद हैं.
उन्होंने कहा है कि वो तालिबान से बात करने के लिए तैयार हैं मगर "ज़रूरत हुई तो लड़ेंगे भी".
पंजशीर घाटी काबुल से लगभग 50 किलोमीटर दूर है और वहाँ जाने का मार्ग बहुत सँकरा है.
पंजशीर का अफ़ग़ानिस्तान में एक सांकेतिक महत्व है क्योंकि पिछले कई दशकों से वहाँ के लोगों ने हमला करने वालों का मुक़ाबला किया है.

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तालिबान की अपील
तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में उनके विरोधियों के एकमात्र गढ़ पंजशीर घाटी के लड़ाकों से कहा है कि वो हथियार डाल दें.
तालिबान के एक वरिष्ठ नेता आमिर ख़ान मुत्तक़ी ने बुधवार को पंजशीर के लोगों से आग्रह किया है कि वो उनके विरोधियों को लड़ना बंद करने के लिए समझाएँ.
मुत्तकी ने एक ऑडियो संदेश में कहा है, "देश में कहीं लड़ाई नहीं हो रही है और लोग शांत हैं. पंजशीर के लोगों को और सहन करने की ज़रूरत नहीं है."
उन्होंने कहा कि पंजशीर के लोगों के साथ कुछ समय से एक शांतिपूर्ण समाधान के लिए बातचीत हो रही थी मगर कोई समझौता नहीं हो सका है.

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वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा के सदस्य रहे चंदन मित्रा का निधन हो गया है, वे 65 वर्ष के थे और कुछ समय से बीमार चल रहे थे.उनके बेटे कुशान मित्रा ने ट्वीट करके इसकी जानकारी दी.
चंदन मित्रा समाचार पत्र पॉयनियर के प्रमुख संपादक और प्रकाशक थे.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने ट्वीट करके मित्रा के निधन पर शोक व्यक्त किया है.
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चंदन मित्रा को भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा में भेजा था लेकिन तीन साल पहले उन्होंने 10 साल पार्टी में रहने के बाद बीजेपी से इस्तीफ़ा देकर, तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया था.
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चंदन मित्रा को एक कुशल संपादक और एक अच्छे लेखक के तौर पर याद किया जाएगा, वे संगीत-सिनेमा से लेकर राजनीतिक जैसे विषयों पर बेहतरीन लेख लिखते रहे थे. उन्होंने ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की थी.

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सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फ़ेसबुक ने बीबीसी को बताया है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का कब्ज़ा होने के बाद देश छोड़कर जाने वाले लोगों में से 175 लोगों को बाहर निकालने में उसने भी सहयोग किया.
कंपनी ने कहा कि उनके स्टाफ़ सदस्यों समेत कुछ अफ़ग़ान भी मेक्सिको सिटी जाने वाले विमान में थे.
मेक्सिको की सरकार ने पुष्टि की है कि इस फ़्लाइट में कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार थे, जिनके साथ उनका परिवार भी था. कुल मिलाकर 75 लोग इसमें थे.
बहुराष्ट्रीय कंपनियां और संगठन अफ़ग़ानिस्तान से लोगों को बाहर निकालने का काम कर रही हैं.
फ़ेसबुक के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया, "फ़ेसबुक के कर्मचारी और क़रीबी सहयोगी अफ़ग़ानिस्तान छोड़ रहे थे और इसी क्रम में हमने पत्रकारों और उनके परिवारों के एक समूह को भी निकालने के प्रयास में मदद की."
फ़ेसबुक के प्रवक्ता का कहना है कि ये वे लोग थे जिनके लिए जान का जोख़िम था.
कंपनी ने मैक्सिकन सरकार के नेतृत्व की प्रशंसा की है. उन्होंने शुरुआत में लैंडिंग देने के लिए संयुक्त अरब अमीरात को भी धन्यवाद दिया है.
फ़र्म ने अफ़ग़ानिस्तान में जारी सुरक्षा स्थिति के कारण कोई और विवरण देने से इनकार कर दिया है.
मेक्सिको सरकार ने कहा कि अफ़ग़ान नागरिकों का एक समूह बुधवार को आया.
उन्होंने कहा, "यह समूह, अफ़ग़ानिस्तान के हालातों की वजह से मानवीय कारणों से मेक्सिको आया है."
दो हफ्ते पहले, फेसबुक ने अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित यूज़र्स के लिए नए सुरक्षा उपाय शुरू किये थे.
अतिरिक्त उपायों की घोषणा फ़ेसबुक के सुरक्षा नीति प्रमुख नथानिएल ग्लीचर ने की थी.
उन्होंने कहा था, "हमने अफ़ग़ानिस्तान में लोगों के लिए अपने अकाउंट्स को तुरंत लॉक करने के लिए एक-क्लिक टूल लॉन्च किया है. जब उनकी प्रोफ़ाइल लॉक हो जाती है, तो जो लोग उनके मित्र नहीं हैं वे उनकी प्रोफ़ाइल फ़ोटो डाउनलोड या साझा नहीं कर सकते हैं या टाइमलाइन पर पोस्ट नहीं देख सकते हैं. "
कंपनी ने इस महीने की शुरुआत में यह भी पुष्टि की थी कि वह अपने प्लेटफॉर्म से तालिबान से जुड़ी सामग्री पर प्रतिबंध लगाना जारी रखेगी क्योंकि वह समूह को एक चरमपंथी संगठन मानती है.

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संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि उत्तर कोरिया ने कहा है कि उसे दी जाने वाली लगभग तीन मिलियन कोविड -19 वैक्सीन कहीं और दे दी जाए.
एक प्रवक्ता ने कहा कि दुनिया के कई देश कोविड महामारी से बुरी तरह प्रभावित हैं और वैश्विक स्तर पर कोविड वैक्सीन की कमी भी है. इन्हीं मुद्दों को देखते हुए उत्तर कोरिया की ओर से ऐसा बयान दिया गया है.
ये वैक्सीन वैश्विक कोवैक्स कार्यक्रम के तहत उत्तर कोरिया को दी गई थीं. ये चीन में बनीं सिनोवैक वैक्सीन थीं.
कोवैक्स कार्यक्रम का उद्देश्य दुनिया के ग़रीब देशों को वैक्सीन की आपूर्ति करना है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि 19 अगस्त तक उत्तर कोरिया ने कोविड -19 का कोई मामला दर्ज नहीं किया गया.
डब्ल्यूएचओ ने अपनी साप्ताहिक रिपोर्ट में कहा कि कुछ 37,291 लोगों का (जिनमें हेल्थ वर्कर और वे लोग शामिल थे जिन्हें फ्लू जैसी बीमारियों के लक्षण थे) का परीक्षण किया गया और इन सभी का टेस्ट निगेटिव पाया गया है.
उत्तर कोरिया में कोविड की स्थिति के बारे में कभी बहुत स्पष्ट तौर पर कुछ भी सामने नहीं आया. उत्तर कोरिया का दावा है कि उसने महामारी की शुरुआत से ही सख़्त उपाय किये थे. पिछले साल कोरोना महामारी के शुरू होने पर अपनी सीमाओं को बंद करने वाले पहले देशों में से एक उत्तर कोरिया भी था.
यह पहली बार नहीं है जब उत्तर कोरिया ने वैक्सीन लेने से मना किया है. इससे पहले जुलाई में, संभावित दुष्प्रभावों का हवाला देते हुए उत्तर कोरिया ने एस्ट्राजेनेका वैक्सीन की लगभग दो मिलियन खुराक के शिपमेंट को लेने से मना कर दिया था.
रूस के विदेश मंत्री, सर्गेई लावरोव ने जुलाई में संवाददाताओं से कहा था कि रूस कई बार उत्तर कोरिया को रूस में बने स्पुतनिक वैक्सीन की आपूर्ति की पेशकश कर चुका है.
उत्तर कोरिया ने कोविड -19 टीकाकरण के प्रभाव को लेकर संदेह जताए हैं. उत्तर कोरिया की सरकारी मीडिया अक्सर उन ख़बरों को प्रमुखता से छापती है जिसमें अमेरिका या यूरोप में वैक्सीन के नकारात्मक प्रभाव की बात होती है.

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चीन के टेक अरबपति और अलीबाबा के संस्थापक जैक मा ने कुछ समय पहले वर्क कल्चर को लेकर एक बयान दिया था. जिसमें उन्होंने '996 वर्क कल्चर' की वक़ालत की थी.
966 का मतलब- एक ऐसा वर्क प्लेस जहां लोग सुबह 9 बजे से लेकर रात 9 बजे तक सप्ताह के छह दिन काम करें.
लेकिन अब चीन के अधिकारियों ने कंपनियों को कड़ी चेतावनी जारी करते हुए इस तरह के ‘सज़ा’ जैसे वर्क-शेड्यूल को ग़ैर-क़ानूनी कहा है.
पिछले गुरुवार को प्रकाशित एक संयुक्त बयान में चीन की शीर्ष अदालत और श्रम मंत्रालय ने श्रम विवादों से संबंधित 10 अदालती फैसलों को विस्तार से देखा. जिनमें से कई विवाद ऐसे थे जिसमें श्रमिकों को ओवरटाइम काम करने के लिए मजबूर किया गया था.
ये मामले किसी एक ख़ास सेक्टर के नहीं थे. इसमें मीडिया, कंस्ट्रक्शन जैसे कई सेक्टर शामिल थे. लेकिन इन सब में एक सामान्य बात थी कि इन विवादों में नियोक्ता हार गए थे.
नोटिस में चेतावनी दी गई है कि "कानूनी तौर पर, श्रमिकों को संबंधित मुआवज़े, आराम का समय या छुट्टियों का अधिकार है. राष्ट्रीय तौर पर तय काम के घंटों का पालन करना नियोक्ताओं की ज़िम्मेदारी है."
जारी नोटिस में श्रम विवादों को हल करने के लिए अतिरिक्त दिशा निर्देश जारी करने की भी बात की गई है.
चीन के श्रम कानूनों के अनुसार, मानक तौर पर एक दिन में आठ घंटे काम करने का प्रावधान है और सप्ताह में अधिकतम 44 घंटे. इससे अधिक घंटे अगर कोई काम कर रहा है तो उसके बदले उसके अतिरिक्त वेतन देना आवश्यक है. लेकिन इसका अच्छी तरह पालन नहीं हो पाया है.

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एक शीर्ष अमेरिकी जनरल ने तालिबान को एक "क्रूर समूह" बताया है और कहा है कि यह स्पष्ट नहीं है कि वे बदलेंगे या नहीं.
जनरल मार्क मिले ने कहा, हालांकि, इस "संभावना" से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका भविष्य के चरमपंथ विरोधी अभियानों के लिए इस्लामी चरमपंथियों के साथ को-ऑर्डिनेट करे.
अफ़ग़ानिस्तान में क़रीब 20 साल तक चले युद्ध के बाद से अमेरिकी सेना पूरी तरह वापसी कर चुकी है और इसी के साथ अफ़ग़ानिस्तान में अब तालिबान का राज है.
तालिबान ने घोषणा की है कि वे तीन दिनों के भीतर अफ़ग़ानिस्तान में नई सरकार की घोषणा कर देंगे. अपनी घोषणा में उन्होंने महिलाओं को भी सरकार में शामिल करने की बात कही है.
अमेरिकी सेना की वापसी के बाद पहली बार सार्वजनिक तौर पर सेना के शीर्ष अधिकारी का बयान आया है. इस मौक़े पर जनरल मिले के साथ अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन भी मौजूद थे.

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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सेनाओं को जिस तरह आनन-फ़ानन में अफ़ग़ानिस्तान से वापस आने का आदेश जारी किया उसे लेकर व्यापक आलोचना भी हो रही है. आलोचकों का कहना है कि अमेरिका की नीति के कारण ही महज़ 11 दिनों में तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान को अपने कब्ज़े में ले लिया.
हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति अपने फ़ैसले का बचाव करते रहे हैं और इसे अमेरिका के हित में बताते हैं.
बुधवार को संवाददाता सम्मेलन में जनरल मिले और रक्षा सचिव ऑस्टिन दोनों ने अफ़ग़ानिस्तान में सेवा देने वाले सैनिकों की प्रशंसा की.
अफ़ग़ानिस्तान से लोगों को निकाले जाने के लिए तालिबान के साथ सामंजस्य से जुड़े एक सवाल के जवाब में लॉयड ऑस्टिन ने कहा कि हम तालिबान के साथ बेहद मामूली स्तर पर काम कर रहे थे.
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जनरल मिले ने इसके जवाब में कहा, "युद्ध में आप वह करते हैं जो आपको मिशन और बल के जोख़िम को कम करने के लिए करना चाहिए ना कि वह जो आप करना चाहते हैं."
उन्होंने कहा कि हो सकता है कि अमेरिका इस्लामिक स्टेट से संबद्ध आईएस-के के ख़िलाफ़ भविष्य की कार्रवाई के लिए तालिबान के साथ को-ऑर्डिनेट करे.
पिछले हफ्ते काबुल हवाई अड्डे के बाहर हुए हमले की ज़िम्मेदारी आईएस-के ने ली है जिसमें 13 अमेरिकी सेवाकर्मियों सहित 170 लोग मारे गए थे.
आईएस-के अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय सभी जिहादी चरमपंथी समूहों में सबसे अधिक हिंसक हैं.
साथ ही कुछ मुद्दों पर तालिबान के साथ इसके बड़े मतभेद भी हैं.
हालांकि ऑस्टिन ने कहा कि वह भविष्य के सहयोग को लेकर "कोई भविष्यवाणी नहीं करना चाहेंगे".