सोवियत संघ से लेकर तालिबान तक, पंजशीर पर क़ब्ज़ा क्यों है इतना मुश्किल

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- Author, पॉल केर्ली और ल्यूसिया ब्लास्को
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल से क़रीब 30 मील दूर तालिबान विरोधी कई हज़ार लड़ाकों के संकीर्ण प्रवेश द्वार वाली एक सुदूर घाटी में तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए इकट्ठा होने की ख़बर है.
देश के हाल के अशांत इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं है, जब नाटकीय और प्रभावशाली पंजशीर घाटी एक फ़्लैशपॉइंट बनकर उभरी है. 1980 के दशक में सोवियत सेना और 90 के दशक में तालिबान के ख़िलाफ़ यह विरोधियों का एक मज़बूत गढ़ रही है.
वहां मौजूद नेशनल रेज़िस्टेंस फ़्रंट ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान (एनआरएफ़) ने दुनिया को इस घाटी की ताक़त फिर से याद दिला दी है.
एनआरएफ़ के विदेशी मामलों के प्रमुख अली नज़ारी ने बीबीसी को बताया, "अपनी ताक़त के बावज़ूद रूस की लाल सेना हमें हराने में असमर्थ रही और 25 साल पहले तालिबान भी. उन सबने घाटी पर कब्ज़ा करने की कोशिश की पर वे असफल रहे. उन्हें यहां करारी हार का सामना करना पड़ा."

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पंजशीर का भूगोल
लंबी, गहरी और धूल भरी यह घाटी राजधानी काबुल के उत्तर में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व तक क़रीब 75 मील (120 किमी) में फैली है. इसके चारों ओर घाटी के तल से क़रीब 9,800 फ़ीट (3,000 मीटर) ऊंची पहाड़ों की चोटियां हैं. ये पहाड़ वहां रहने वालों के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करते हैं.
इस घाटी में केवल एक संकरी सड़क है जो बड़े चट्टानों और घुमावदार पंजशीर नदी के बीच अपना रास्ता बनाकर निकलती है.
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तालिबान के क़ब्ज़े के पहले तक अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले शाक़िब शरीफ़ी का बचपन पंजशीर घाटी में बीता है. वे बताते हैं, "पूरे इलाके का एक मिथकीय पहलू है. यह सिर्फ़ एक घाटी नहीं है. जब आप इसमें प्रवेश करते हैं तो यहां कम से कम और 21 उप-घाटियां आपस में एक-दूसरे से जुड़ी मिलती हैं."
मुख्य घाटी के दूसरे छोर पर 4,430 मीटर (14,534 फीट) लंबी एक पगडंडी है जो अंजुमन दर्रे तक जाती है. वह आगे पूर्व में हिंदूकुश के पहाड़ों में पहुंच जाती है. सिकंदर महान और तैमूरलंग की सेनाएं, दोनों इसी रास्ते से गुज़री थीं.
लीड्स यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय इतिहास की एसोसिएट प्रोफ़ेसर एलिजाबेथ लीक कहती हैं, "इतिहास में पंजशीर घाटी को अर्ध-क़ीमती रत्नों के लिए भी जाना जाता था."
आज पंजशीर घाटी में जलविद्युत के बांध और एक पवन फ़ार्म भी है. अमेरिका ने यहां की सड़कों के साथ काबुल से सिग्नल हासिल करने वाले एक रेडियो टावर के निर्माण में मदद की थी. बगराम का पूर्व अमेरिकी एयरबेस जिसे सोवियत रूस ने 1950 के दशक में बनाया था, घाटी के मुहाने से थोड़ी ही दूरी पर मौजूद है.

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पंजशीर के बहादुर लड़ाके
पंजशीर घाटी में एक अनुमान के अनुसार 1.5 से 2 लाख लोग रहते हैं. यहां के अधिकांश लोग 'दारी' भाषा बोलते हैं. ताजिक मूल की यह भाषा अफ़ग़ानिस्तान की मुख्य भाषाओं में से एक है.
देश के 3.8 करोड़ की आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा ताजिकों का है. हालांकि पंजशीरी अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी पड़ोसियों में से एक ताजिकिस्तान की ओर नहीं देखते. इसकी बजाय इनकी अपनी स्थानीय पहचान है.
शाक़िब शरीफ़ी, जो हाल तक अफ़ग़ान कृषि मंत्रालय में योजना महानिदेशक थे, पंजशीरियों को बहादुर बताते हैं. वे कहते हैं कि ये 'शायद अफ़ग़ानिस्तान में सबसे बहादुर लोग' हैं. उनका कहना है कि स्थानीय लोग तालिबान के साथ असहज हैं और उनमें 'एक सकारात्मक आक्रामकता' है. ब्रिटेन, सोवियत संघ और तालिबान के ख़िलाफ़ मिली ऐतिहासिक जीत ने 'लोगों का और हौसला बढ़ाया' है.
प्रांत का दर्जा
2001 में तालिबान की हार के बाद पंजशीर घाटी को एक ज़िले से बढ़ाकर एक प्रांत का दर्जा दे दिया गया. यह अफ़ग़ानिस्तान के सबसे छोटे प्रांतों में से एक है.
रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट (आरयूएसआई) के एक सीनियर फ़ेलो डॉक्टर एंटोनियो गिउस्टोज़ी कहते हैं, "इसे एक प्रांत बनाने का निर्णय विवादास्पद था." वे बताते हैं कि 2000 के दशक के शुरू में पंजशीरी लड़ाकों के पास बहुत ताक़त थी. उन्होंने काबुल पर क़ब्ज़ा दिलाने में मदद की थी और इसके बाद 'नंबर एक हितधारक' बन गए थे.
पंजशीरी नेताओं को सरकार और सेना में प्रमुख स्थान दिए गए. घाटी को स्वायत्तता दी गई. यह देश का अकेला ऐसा प्रांत था, जहां वहीं के गवर्नर बनाए गए, जबकि दूसरे प्रांतों में स्थानीय लोगों को गवर्नर नहीं बनाया जा सकता था.
डॉक्टर गिउस्टोज़ी कहते हैं, "आम तौर पर गवर्नरों से स्थानीय आबादी की तुलना में सरकार के प्रति अधिक वफ़ादार होने की अपेक्षा होती है. लेकिन पंजशीर की बात अलग थी."

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रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाका
डॉक्टर गिउस्तोज़ी के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान में 'शायद सैकड़ों' ऐसी घाटियां हैं. लेकिन इस घाटी की काबुल से उत्तर को जाने वाली मुख्य सड़क से नजदीकी है. इससे यह 'व्यापक रणनीतिक महत्व' वाली घाटी बन जाती है.
इस घाटी का प्रवेश द्वार उस स्थान से दूर नहीं है जहां काबुल से आने वाला मुख्य राजमार्ग समतल मैदान को छोड़कर पहाड़ों में सालांग दर्रे की ओर ऊंचा होता जाता है. सालांग दर्रा, उत्तरी शहर कुंदुज़ और मज़ार-ए-शरीफ़ को जाने वाली एक सुरंग है.
शरीफ़ी बताते हैं कि पंजशीर कई शक्तिशाली कारकों के मिलने से महत्वपूर्ण हो जाता है.
उनके अनुसार, "इसका महत्व सिर्फ़ इसलिए नहीं है कि यहां दूर से मोर्चा लेने के दर्जनों स्थान हैं और न ही इसके पहाड़ी इलाका होने के चलते है. ऐसा पंजशीर वासियों के अभिमान के चलते भी नहीं है. इसका महत्व इन सभी कारकों को मिलाने से बनता है. यदि खोजेंगे तो पूरे अफ़ग़ानिस्तान में कई जगह ये तत्व अकेले में मिल जाएंगे."
ताज़ा गतिरोध के समय माना जा रहा है कि इस घाटी में हथियारों का बड़ा भंडार है. 20 साल पहले तालिबान के हटने के बाद यहां के लड़ाकों के दल भंग कर दिए गए थे और उन्होंने अपने हथियार भी सरकार को सौंप दिए थे. डॉक्टर गिउस्टोज़ी बताते हैं, ''लेकिन हथियारों के भंडार वहां अभी भी हैं."
वे कहते हैं, "पंजशीर से संबंध रखने वाले अफ़ग़ान अधिकारी वहां हथियार भेजते रहे थे क्योंकि वे राष्ट्रपति करज़ई और ग़नी को लेकर सतर्क थे. लेकिन अंत में उन्हें तालिबान को लेकर चिंतित होना पड़ा."
पंजशीर की घाटी में तालिबान विरोधी बल का नेतृत्व करने वाले शख़्स 32 साल के अहमद मसूद हैं. वे 1980 और 90 के दशक के सम्मानित विद्रोही नेता अहमद शाह मसूद के बेटे हैं.
मसूद ने दावा किया है कि उसके लड़ाकों को अफ़ग़ान सेना और विशेष बलों के सदस्यों का सैन्य समर्थन हासिल है.
वॉशिंगटन पोस्ट के लिए लिखे एक हालिया आलेख में उन्होंने लिखा, "हमारे पास गोला-बारूद और हथियारों के भंडार हैं, जिसे हमने अपने पिता के ज़माने से धैर्यपूर्वक एकत्र किया है. हम जानते थे कि ऐसा वक़्त कभी भी आ सकता है."

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अहमद मसूद के पिता अहमद शाह मसूद
अहमद मसूद के पिता अहमद शाह मसूद को 'पंजशीर के शेर' के उपनाम से बुलाया जाता था. वे एक मुजाहिदीन कमांडर थे जिन्होंने सोवियत रूस और तालिबान दोनों की सेनाओं को पंजशीर पर क़ब्ज़ा करने से रोक दिया था. वैसे पंजशीर का मतलब ही 'पांच शेर' होता है.
अफ़ग़ान सेना के एक जनरल के बेटे अहमद शाह मसूद का जन्म घाटी में ही हुआ था. पंजशीर और काबुल के स्मारकों से लेकर होर्डिंग और दुकान की खिड़कियों तक में उनकी तस्वीरें अब भी पाई जा सकती हैं.
1978 में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान (पीडीपीए) के सत्ता में आने और उसके एक साल बाद सोवियत रूस की सेना के प्रवेश के बाद उनके चलते ही पंजशीर घाटी कम्युनिस्ट विरोधी 'प्रतिरोध का केंद्र' बन गई.
लीड्स विश्वविद्यालय की प्रोफे़सर एलिज़ाबेथ लीक कहती हैं, ''वो सोवियत-अफ़ग़ान युद्ध में प्रतिरोध का सार्वजनिक चेहरा बन गए थे. उनके पास एक करिश्मा था और वो पश्चिमी मीडिया के साथ सक्रियता से जुड़े हुए थे. वो उन मुख्य नेताओं में से एक थे जिनसे सोवियत संघ बातचीत को तैयार था. इन्हीं बातों ने उन्हें इतना महत्वपूर्ण बना दिया था."
डॉक्टर गिउस्टोज़ी के अनुसार, अहमद शाह मसूद उस समय के बाक़ी नेताओं से अलग थे. वो बताते हैं, "वो शिक्षित, फ़्रेंच बोलने में सक्षम, धीरे से बात करने वाले और आकर्षक थे. वहीं बाक़ी के कमांडरों को असभ्य, अनपढ़ और ज़ोर से बोलने वाला माना जाता था.''
2001 में 9/11 की घटना के ठीक दो दिन पहले यानी 9 सितंबर को अलक़ायदा के आतंकियों ने उनकी हत्या कर दी. बाद में राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने उन्हें राष्ट्रीय नायक घोषित किया था.
हालांकि, कुछ का मानना है कि अहमद शाह मसूद एक युद्ध अपराधी थे. 2005 की ह्यूमन राइट्स वॉच की जांच के अनुसार, "अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध के दौरान उनकी कमान के सैन्य बलों पर मानवाधिकार हनन के कई आरोप लगे थे.''

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अजेय घाटी
1980 और 1985 के बीच सोवियत संघ ने ज़मीन पर और हवा से पंजशीर घाटी पर कम से कम आधा दर्जन हमले किए थे. रूसी लड़ाकों को इलाके का बहुत कम अनुभव था और वे अक्सर घात लगाकर किए गए हमले में फंस गए.
शरीफ़ी के अनुसार, सोवियत संघ को बाएं, दाएं और बीच से 'हज़ारों घाव' मिले थे. सोवियत रूस की मशीनगन के नाम पर 'मिस्टर डीएचएसके' के रूप में मशहूर एक शख़्स था. वो चट्टानों के पीछे छिपकर उन पर गोलियां चलाता, लेकिन जिसे वे कभी ढूंढ़ नहीं पाए और उसने उन्हें 'पागल' बना दिया.
वे कहते हैं कि आज के कुछ कमांडर उस समय भी मौजूद थे. उनके अनुसार, "उन्हें मुख्यालय से उचित संदेश मिलने तक चौकी पर अकेले खड़े होने को कहा जाता था. उन्हें पता था कि कैसे इंतज़ार करना है और कैसे दर्द देना है."
डॉक्टर गिउस्टोज़ी कहते हैं कि सोवियत संघ ने कुछ समय के लिए घाटी में एक गढ़ को सुरक्षित कर लिया था, लेकिन वे लंबे समय तक उसे संभाल नहीं सके.
वो कहते हैं, "रूसी वहां रहने और सेना रखने की जगह ढूंढ़ नहीं सके. वे उत्तर-दक्षिण राजमार्ग को संभालना चाहते थे, लेकिन लड़ाई आसपास के अन्य इलाकों में शुरू हो गई."
पंजशीर घाटी में हथियारों, टैंकों और विमानों को जंग लगने के लिए यूं ही छोड़ दिया गया. ये सोवियत संघ के असफ़ल सैन्य अभियानों की विरासत हैं.

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अहमद मसूद
अहमद मसूद तब 12 साल के ही थे जब उनके पिता की मौत हुई थी. उन्होंने लंदन में अध्ययन किया है और सैंडहर्स्ट में रॉयल मिलिट्री एकेडमी में एक साल तक प्रशिक्षण भी लिया है.
डॉक्टर गिउस्टोज़ी के अनुसार, "उनके पास अपने पिता का आकर्षण है. हालांकि एक सैन्य कमांडर के रूप में अभी उनकी परीक्षा नहीं हुई है."
वो कहते हैं, "उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले किसी भी सत्ता-साझेदारी के प्रस्ताव पर बात करने के लिए कौशल की भी आवश्यकता होगी. हालांकि उनके पास खोने को बहुत कुछ नहीं है. हो सकता है कि वे बातचीत में ज्यादा की मांग करें.''
वहीं प्रोफ़ेसर लीक का मानना है कि घाटी में आगे क्या होगा, इसका अभी से अंदाज़ा लगाना मुश्किल है.
वो कहती हैं, "वो स्पष्ट रूप से अपनी विरासत और अपने पिता के ऐतिहासिक महत्व को लेकर बहुत जागरूक हैं. हम उन्हें अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव की अपनी विरासत को बनाए रखते हुए भी देख सकते हैं.
उनका मानना है, "हालांकि इस बार, कहानी पहले से अलग है. तालिबान ने बड़े शहरों और कस्बों को अपने क़ब्ज़े में ले लिया है जिससे सप्लाई लाइन बाधित हो गई है. इससे संतुलन बदल सकता है."
अहमद मसूद ने ख़ुद बैकअप की मांग की है.
उन्होंने वॉशिंगटन पोस्ट में अपने आलेख में लिखा, "यदि तालिबान के सरदार हमला करते हैं तो उन्हें निश्चित रूप से हमारे कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा... फिर भी हम जानते हैं कि हमारे सैन्य बल और रसद पर्याप्त नहीं होंगे."
उन्होंने लिखा, "हमारे संसाधन तेज़ी से समाप्त हो जाएंगे, जब तक कि हमारे पश्चिम मित्र बिना देर किए हमें सप्लाई पहुंचाने का कोई रास्ता नहीं खोज लेते."
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