महिला आरक्षण बिल का आगामी चुनाव में कितना फ़ायदा उठा पाएगी बीजेपी

नारी शक्ति वंदन अधिनियम संसद के दोनों सदनों में पारित हो गया है

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    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दशकों के इंतजार के बाद महिला आरक्षण बिल या नारी शक्ति वंदन विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारित हो गया.

इस विधेयक का विपक्ष ने समर्थन तो किया लेकिन सरकार को कुछ मुद्दों पर कठघरे में भी खड़ा किया.

इस विधेयक में कहा गया है कि ये जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद लागू होगा तो वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों का कहना है कि इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम महिलाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए.

साथ ही विपक्ष का कहना है परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया में समय लगेगा, ऐसे में महिला आरक्षण क़ानून के लागू होने में भी वक़्त लगेगा.

परिसीमन का मतलब होता है जनसंख्या के अनुसार देश में लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों और राज्यों की विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों की संरचना का निर्धारण करना. बदलती आबादी के मुताबिक़, ये एक सतत प्रक्रिया है. इसके लिए क़ानून बनाकर परिसीमन आयोग की स्थापना की जाती है.

बीजेपी की रणनीति

वीडियो कैप्शन, महिला आरक्षण बिल के मौजूदा स्वरूप पर महुआ मोइत्रा क्या सोचती हैं?

राजनीतिक दलों और विश्लेषकों ने ये सवाल उठाया है कि जब विधेयक को लागू होने में कई वर्ष लगेंगे तो संसद का विशेष सत्र बुलाकर सरकार ने इसे पारित क्यों कराया?

साल 2019 में हुए आम चुनाव के बाद ये बात सामने आई थी कि भारतीय जनता पार्टी को बड़ी संख्या में महिलाओं ने वोट दिया था.

ऐसे में क्या आगामी विधानसभा और आम चुनाव को देखते हुए ये बीजेपी की रणनीति का एक हिस्सा है?

क्या ये महिला मतदाताओं में अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश है और क्या वाकई इससे कोई असर पड़ेगा.

अगले कुछ महीनों में तेलंगाना, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिज़ोरम में विधानसभा चुनाव होने हैं और साल 2024 में देश में आम चुनाव होंगे.

महिलाओं पर असर

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जानकारों का मानना है कि विपक्ष लोगों तक ये संदेश पहुंचाने में कामयाब रहा है कि ये बिल अगले आम चुनाव में लागू नहीं होगा. ऐसे में नारी शक्ति वंदन विधेयक इन राज्यों में बीजेपी को ज़्यादा फ़ायदा नहीं दे पाएगा लेकिन मोदी की छवि कि 'वो करके दिखाते हैं' उसे ज़रूर मज़बूती देगा.

हालांकि बीजेपी इन चुनाव में इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश करेगी कि विपक्ष ने 27 साल तक ठंडे बस्ते में पड़े इस बिल पर कुछ नहीं किया और बीजेपी इसे महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए लेकर आई है.

वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन के अनुसार महिलाओं के समक्ष बीजेपी इसे केवल नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तौर पर पेश नहीं करेगी बल्कि एक पैकेज में इसे शामिल करके बताएगी.

राधिका रामशेषन के अनुसार, "अगर निर्मला सीतारमण के भाषणों को देखें तो वो केवल ताज़ा विधेयक के बारे में ही बात नहीं कर रही हैं बल्कि 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ', 'उज्ज्वला योजना', 'शौचालय के निर्माण' आदि की बात कर रही हैं. ये देखा गया है कि उज्ज्वला स्कीम के बाद हुए चुनाव में महिलाओं ने जातिवाद से दूर हटकर पार्टी के लिए वोट किया है."

महिला उम्मीदवारों को टिकट देने का दबाव

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राधिका रामशेषन मानती हैं कि पार्टी केवल इस विधेयक को ही नहीं लेकिन इन सभी योजनाओं को एक पैकेज के तौर पर महिलाओं के सामने पेश करेगी क्योंकि केवल इस बिल से बीजेपी को कम ही फ़ायदा होगा.

हालांकि कुछ जानकारों का मानना है कि अब तक जो महिलाएं नरेंद्र मोदी की समर्थक रही हैं, उन पर थोड़ा असर पड़ सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, "अगर ये विधेयक साल 2024 में लागू होता तो पार्टी के लिए ये गेमचेंजर साबित हो सकता था लेकिन परिसीमन और जनगणना से जोड़ना यानी इन पर काम 2026 से शुरू होगा तो ऐसे में बिल के लागू होने में समय लगेगा. वहीं ये भी बात आ रही है दक्षिण की सीट घटेगी और उत्तर की बढ़ेगी तो किस क़ानूनी पेच में फंसकर कितना लंबा खिंचेगा, ये कहना भी मुश्किल है."

जानकारों का मानना है कि आने वाले चुनाव में पार्टियों पर महिला उम्मीदवारों को टिकट देने का दबाव होगा क्योंकि उन्हें ये दिखाना होगा कि वे महिला समर्थक हैं.

'महिलाएं अब अधिक जागरूक हैं...'

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इमेज कैप्शन, बिल पास होने की खुशी में जश्न मनाते कांग्रेसी कार्यकर्ता

राधिका रामाशेषन का कहना है कि हर पार्टी को कम से कम 30 प्रतिशत महिलाओं को टिकट तो देना ही होगा नहीं तो उन्हें काफ़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा.

साथ ही वे कहती हैं, "यहां ये भी देखना होगा कि वो कैसी महिलाओं को टिकट देंगे."

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए नीरजा चौधरी कहती हैं, "ज़मीनी स्तर पर जो महिलाएं पंचायत या स्थानीय निकायों में काम कर रही हैं, उनकी संख्या करीब 15 लाख है और वे तैयार हैं. वे अब ज़्यादा जागरूक हैं और अपने अधिकारों के लिए सशक्त होकर अपनी बात रखती हैं. ऐसे में पार्टियों को इन महिलाओं को राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में मौका देना चाहिए."

नीरजा चौधरी और राधिका रामाशेषन का मानना है कि रिपोर्टिंग के दौरों पर, पहले उनके पास कई पंच पति के उदाहरण सामने आते थे लेकिन पिछले दस साल के मुक़ाबले इसमें कमी आई है.

लेकिन एक पक्ष ये सवाल भी उठाता है कि अगर महिलाओं को टिकट भी दे दिया जाए तो उनका जीतना कितना सभंव हो पाएगा?

वीडियो कैप्शन, महिला आरक्षण बिल में ओबीसी महिलाओं के आरक्षण पर बीजेपी सांसद ने क्या कहा

उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने महिलाओं को 40 फ़ीसदी टिकट देने की घोषणा की थी लेकिन पार्टी राज्य की 403 सीटों में से केवल दो ही सीट जीत पाई थी. इतना ही नहीं उसका प्रदर्शन पिछले चुनाव के नतीजों से भी ख़राब रहा.

इसका जवाब देते हुए सीएसडीएम के संजय कुमार कहते हैं, "अगर चुनाव में पार्टी का जनाधार पूरी तरह से खिसका हुआ हो तो महिला या पुरुष को टिकट देने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता. हमारा शोध बताता है कि महिलाओं को चुनाव खड़ा करने से महिलाएं उन्हें ज़्यादा वोट नहीं देतीं. साथ ही शोध ये भी बताता है कि लोग पार्टी को देखकर वोट करते हैं. ऐसे में यूपी में कांग्रेस के प्रति रुझान नहीं था तो वहां भी महिलाओं ने पार्टी को वोट नहीं दिया."

साल 1992 में पंचायती राज में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था. उसके तीन दशक बाद नारी शक्ति वंदन अधिनियम राजनीति में लैंगिक समानता लाने की दिशा में अहम कदम माना जा सकता है.

लेकिन क्या पार्टी अगामी चुनाव में महिलाओं को उम्मीदवार बनाएगी इस पर कांग्रेस के प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह कहते हैं, "बेशक उनकी पार्टी महिलाओं को ज़्यादा टिकट देगी जैसा कि यूपी में भी हुआ था लेकिन बीजेपी अगर ये सोच रही है कि उसे इस बिल के ज़रिए महिलाओं के वोट मिलेंगे तो ऐसा नहीं होगा."

बीबीसी ने इस बारे में बीजेपी से भी बात करने की कोशिश की लेकिन जवाब नहीं मिला.

ओबीसी वोट बैंक पर असर

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नारी शक्ति वंदन विधेयक के अनुसार, अब लोकसभा और विधानसभा में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी यानी लोकसभा में 543 सीटों में से 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी.

चुनाव आयोग की वेबसाइट के मुताबिक़, साल 2019 के आम चुनाव में 8,054 उम्मीदवारों में से 726 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था.

जिसका मतलब ये हुआ कि केवल 9 प्रतिशत महिलाओं को टिकट दिया गया था हालांकि 2014 में 8,251 में से 668 महिलाओं को टिकट दिया गया था.

सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बीजेपी ने साल 2019 में 12.5 प्रतिशत महिलाओं को टिकट दिए, वहीं कांग्रेस ने 12.8 प्रतिशत महिलाओं को मैदान में उतारा था.

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तृणमूल कांग्रेस ने 37 प्रतिशत, तमिलनाडु की पार्टी एनटीके ने 47 प्रतिशत टिकट महिला उम्मीदवारों को दिए थे.

एक अनुमान के अनुसार भारत की राजनीति में ओबीसी का वोट बैंक तकरीबन 45 फ़ीसद है.

ऐसे में विपक्ष की ओबीसी, मुसलमान महिलाओं को शामिल करने की मांग का क्या असर पड़ेगा?

इसका जवाब देते हुए संजय कुमार कहते हैं, "अनुसूचित जाति और जनजाति महिलाओं को तो लाभ मिलेगा लेकिन ओबीसी महिलाएं इससे ज़रूर वंचित रह जाएगी. ओबीसी समुदाय के कुछ वोटरों का झुकाव विपक्ष की ओर झुकेगा क्योंकि वो इसे जोर-शोर से उठा रहे हैं. ऐसे में ओबीसी महिलाओं में, वोट बीजेपी से खिसकता हुआ नज़र आ सकता है."

महिला आरक्षण बिल का इतिहास

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  • साल 1996 में महिला आरक्षण बिल को तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने संसद में पेश किया था.
  • ये बिल 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रुप में पेश हुआ था लेकिन पारित नहीं हो सका.
  • इस बिल में संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण का प्रस्ताव दिया था.
  • इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान था लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग या ओबीसी के लिए प्रावधान नहीं था.
  • साल 1998 में अटल बिहारी वाजेपयी की सरकार ने लोकसभा में फिर बिल पेश किया हालांकि पार्टियों के विरोध के कारण ये बिल पारित नहीं हो सका.
  • वाजपेयी सरकार ने महिला आरक्षण बिल को 1999,2002, और 2003-2004 में भी पारित कराने की कोशिश की.
वीडियो कैप्शन, बॉम्ब सक्वॉड, ये यूनिट हर एक देश की सेना में होती है और अमूमन इस दस्ते में पुरुष होते हैं.

साल 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी. इस दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस बिल को साल 2008 में राज्यसभा में पेश किया और 2010 में ये भारी बहुमत से पारित हुआ.

इस बिल के समर्थन में बीजेपी, वाम दल और जेडीयू आए लेकिन जब लोकसभा में पेश किया गया तो समाजवादी पार्टी और आरजेडी ने इसका विरोध किया जो यूपीए का हिस्सा थे.

कांग्रेस को डर था कि अगर उसने बिल को लोकसभा में पेश किया तो उसकी सरकार ख़तरे में पड़ सकती है. साल में 2008 में इस बिल को क़ानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति को भेजा गया था. इसके दो सदस्य वीरेंद्र भाटिया और शैलेंद्र कुमार समाजवादी पार्टी के थे.

इन दोनों ने कहा कि वे बिल के विरोधी नहीं है लेकिन महिलाओं को 20 फ़ीसदी टिकट और महिला आरक्षण 20 फ़ीसदी से अधिक न होने की की बात कही गई. साल 2014 में लोकसभा भंग होने के बाद यह बिल अपने आप ख़त्म हो गया.

साल 1998-99, 2004 और 2009 से तुलना की जाए तो 2019 में बीजेपी को महिला वोटरों का फायदा मिला था लेकिन इन चुनाव में नारी शक्ति वंदन अधिनियम का असर महिला मतदाताओं पर कितना पड़ेगा, ये देखने वाली बात होगी.

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