महिला आरक्षण बिल: क्या 'सोशल जस्टिस' वाली पार्टियों ने ओबीसी कोटे पर समझौता कर लिया है

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण के प्रावधान वाला बिल लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों से पारित हो गया.
इस बिल में एससी-एसटी समुदाय की महिलाओं के लिए आरक्षण का तो प्रावधान है. लेकिन इस आरक्षण के अंदर ओबीसी समुदाय की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है.
सवाल ये उठ रहा है कि साल 2010 में ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की मांग कर इस बिल को रोक चुकी पार्टियों का रुख इस बार इस पर इतना नरम क्यों है.
जबकि खुद बीजेपी के नेता इस पर लामबंदी करते दिखने लगे हैं. बीते शनिवार (23 सितंबर, 2023) को बीजेपी की नेता उमा भारती ने कहा कि वो बगैर ओबीसी आरक्षण के महिला आरक्षण कानून लागू नहीं होने देंगी.
दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण में ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग तो दोहराई है लेकिन इस बार वो 2010 की तरह मुखर नहीं दिख रहे हैं. साल 2010 में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले यूपीए की पहल पर लाए गए महिला आरक्षण बिल को राज्यसभा ने पारित कर दिया था.
तेरह साल के बाद
लेकिन उस समय मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव जैसे ओबीसी नेताओं ने इसमें ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण की मांग करते हुए लोकसभा में इसका समर्थन करने से इनकार कर दिया था. इसके बाद ये बिल ठंडे बस्ते में चला गया था.
लेकिन अब 13 साल के बाद संसद में इस बिल को समर्थन देने में आरजेडी, जनता दल यूनाइटेड और समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियों ने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई. जबकि मौजूदा बिल में महिला आरक्षण के अंदर ओबीसी आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है.
अलग से ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान न होने के बावजूद ये बिल इस बार इन पार्टियों का समर्थन पाने में कामयाब रहा.
तो क्या ये मान लिया जाए कि इन दलों ने महिला आरक्षण के भीतर ओबीसी महिलाओं को आरक्षण देने के मुद्दे पर समझौता कर लिया है. या फिर वो इसे हासिल करने के लिए जोर-आजमाइश के सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं.
ओबीसी कोटे को लेकर विपक्षी दलों का रुख और रणनीति

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बीबीसी हिंदी ने इन पार्टियों के बदले रुख और रणनीति को समझने के लिए दो वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों से बात की. दोनों इस मुद्दे को लंबे समय तक कवर करते आ रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक स्मिता गुप्ता महिला आरक्षण के अंदर ओबीसी आरक्षण की मांग करती आई पार्टियों के इस बदले रुख की वजह समझाती हुई कहती हैं, "बीजेपी ने इस बिल के लिए दो शर्तें लगा दी हैं. पहले जनगणना होगी और फिर परिसीमन होगा, इसके बाद ही ये कानून लागू होगा. लिहाजा 2024 के चुनाव से पहले इसके लागू होने की तो कोई संभावना नहीं दिखती. 2029 और उसके बाद भी ये लागू होगा कि नहीं, कह नहीं सकते."
आरजेडी और समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियों को लग रहा है कि बीजेपी ने एक चुनावी मुद्दा उछाल दिया है. अगर उन्होंने इस वक्त ओबीसी आरक्षण का सवाल उठा कर बिल का विरोध किया तो उन्हें महिला विरोधी समझा जाएगा.
स्मिता गुप्ता एक और अहम पहलू की ओर ध्यान दिलाती हैं.
वो कहती हैं कि "सीपीएम और सीपीआई जैसी पार्टियों ने महिला आरक्षण के लिए लंबा आंदोलन चलाया था लेकिन वो भी अब महिला आरक्षण बिल के पारित होने पर ज्यादा खुशी नहीं जता रही हैं. क्योंकि उन्हें मालूम है कि ये बिल निकट भविष्य में शायद ही कानून का रूप ले पाए. ओबीसी पार्टियां भी इसी पहलू को ध्यान में रख कर ज्यादा आक्रामक नहीं हैं."
बीजेपी के पिछड़े नेताओं ने ओबीसी आरक्षण की मांग तेज की

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स्मिता गुप्ता बिल के मौजूदा स्वरूप और इसे पारित कराने से पहले उठाए जाने वाले जरूरी कदमों की ओर भी ध्यान दिलाती हैं.
उन्होंने कहा, "ये बिल 2010 में लाए गए बिल से अलग है. तो इन बदलावों के देखते हुए इसे सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाना चाहिए थे. लेकिन ऐसा नहीं किया गया. अगर बीजेपी की मंशा साफ रहती तो 2024 से संसद में महिलाओं को आरक्षण देने का एलान कर देती. जनगणना और परिसीमन जब होता तब होता रहता."
स्मिता गुप्ता कहती हैं कि संसद में महिला आरक्षण का मुद्दा काफी जटिल है. इसमें सत्ता और सामाजिक संघर्ष के कई पहलू जुड़े हैं. खुद बीजेपी के लिए इसे लागू करना इतना आसान नहीं होगा.
बीजेपी नेता उमा भारती ने हाल में एक न्यूज़ चैनल से कहा कि महिला आरक्षण में ओबीसी महिलाओं के आरक्षण का प्रावधान जरूरी है.
उन्होंने मौजूदा बिल से असहमति जताते हुए कहा, "एससी-एसटी महिलाओं को तो संवैधानिक प्रावधानों के तहत आरक्षण दे दिया जाएगा, रह जाएंगी ओबीसी महिलाएं. उनकी जगह ब्यूरोक्रेट्स और सांसदों की बीवियां संसद में बैठ जाएंगी."
उमा भारती और तेजस्वी यादव का बयान

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उमा भारती ने महिला आरक्षण में ओबीसी आरक्षण के प्रावधान की मांग तेज कर दी है. 23 सितंबर को उन्होंने भोपाल में इस मांग को तेज करने के लिए ओबीसी नेताओं की बैठक बुलाने का एलान किया था.
उमा भारती कहती हैं कि उन्होंने 1996 में देवगौड़ा सरकार के दौरान महिला आरक्षण बिल की तैयारी के वक्त ओबीसी महिलाओं के आरक्षण की मांग रखी थी. और इस बार भी वो ओबीसी महिलाओं को इसमें शामिल कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
स्मिता गुप्ता कहती हैं कि बीजेपी में नेताओं एक बड़ा वर्ग महिला आरक्षण के अंदर ओबीसी आरक्षण का मुखर समर्थक है. विपक्षी दल भले ही अपनी रणनीति के तहत इस पर अभी बहुत ज्यादा जोर देते नहीं दिख रहे हैं लेकिन जब महिला आरक्षण बिल को कानून बनाने की तैयारी होगी तो वो जोर-शोर से मैदान में उतर सकती हैं. और उस वक्त उन्हें बीजेपी के ओबीसी नेताओं का भी साथ मिल सकता है.
विपक्षी दल ने अपने इस रुख का संकेत दे दिया है.
राष्ट्रीय जनता दल नेता और बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "ओबीसी लड़ाका वर्ग है, मोदी सरकार अच्छे से जान लें अगर बीजेपी ने देश की 60 फ़ीसदी ओबीसी आबादी का हक़ खाने का दुःसाहस किया तो ओबीसी इनकी ईंट से ईंट बजा देगा. हमारी दशकों से माँग रही है कि महिला आरक्षण 33 फीसदी नहीं बल्कि 50 फीसदी हो और इसे तुरंत लागू किया जाए तथा इसमें एससी,एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण रहे."

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विश्लेषकों ने उमा भारती और तेजस्वी यादव के बयानों का हवाला देते हुए कहा है कि बीजेपी के बाहर और भीतर दोनों जगह महिला आरक्षण के अंदर ओबीसी आरक्षण की मांग पर काफी जोर है.
लेकिन फिलहाल विपक्ष इस पर इसलिए जोर नहीं दे रहा है कि इस बिल के लागू होने की फिलहाल कोई सूरत नहीं दिख रही है. इसलिए इसका विरोध कर बीजेपी को बैठे-बिठाए मुद्दा न दे दिया जाए.
स्मिता गुप्ता कहती हैं कि ये सिर्फ़ महिला आरक्षण के अंदर ओबीसी आरक्षण का मुद्दा नहीं है. समाज के हर वर्ग की महिलाओं के सामने संघर्ष के हालात हैं. चाहे सामान्य वर्ग की महिलाएं हों या ओबीसी या दलित महिलाएं उनके लिए पुरुष नेतृत्व इतनी आसानी से रास्ता छोड़ने वाला नहीं है.
वो कहती हैं, "ओबीसी पुरुषों के लिए संसद सदस्यता हासिल करना संघर्ष नहीं है लेकिन उनकी महिलाओं के लिए ये है."
संसद में महिलाओं के लिए सीटें निर्धारित करने वाले महिला आरक्षण बिल के अंदर ओबीसी आरक्षण की मांग करने वाली ओबीसी पार्टियों की इस मुद्दे पर फिलहाल संभल कर चलने की रणनीति की क्या वजह है?
2024 चुनाव का मुद्दा बनेगा ओबीसी कोटा?

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वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं, "इसकी मुख्य वजह है 'इंडिया' गठबंधन. 'इंडिया' गठबंधन का सदस्य होने के नाते अलग-अलग पार्टियां एक विषय पर अलग-अलग फैसले नहीं ले सकती. चूंकि विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ओबीसी आरक्षण का समर्थन कर रही है इसलिए जेडीयू,आरजेडी या समाजवादी पार्टियों को इस पर अलग से आक्रामक रुख अख्तियार करने की जरूरत नहीं लग रही है."
बीजेपी पार्टी संगठन में 35 फीसदी सीट महिलाओं को देने की बात कर रही थी. तृणमूल कांग्रेस में 40 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए हैं.
शरद गुप्ता कहते हैं, "राहुल गांधी ने 2010 के महिला आरक्षण बिल में ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था न किए जाने की गलती मानी है."
सही वक्त पर वार करने की रणनीति
शरद गुप्ता कहते हैं कि कांग्रेस के इस रुख से साफ है कि महिला आरक्षण बिल में ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण को लेकर सभी विपक्षी दल एकमत हैं. लेकिन इस समय वो इस मुद्दे को इसलिए तूल नहीं देना चाहते कि बीजेपी उन्हें महिला विरोध बता कर फायदा न ले ले. विपक्षी नेताओं के बयानों और रुख से लग रहा है कि वो अपने हिसाब से सही वक्त पर इस पर 'वार' करेंगी.
विपक्षी दल भले ही महिला आरक्षण बिल में ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण के मुद्दे पर बीजेपी को घेरने के लिए फिलहाल सड़कों पर नहीं उतर रहे हैं. लेकिन वो 2024 चुनाव में इसे मुद्दा बनाएंगे.
क्योंकि बीजेपी ने विपक्षी दलों से अति पिछड़ा वर्ग के वोटों का बड़ा हिस्सा झटका है.
लिहाजा इस बार विपक्षी पार्टियां पिछड़ों की गिनती करने की मांग उठाएंगी और उनके लिए आरक्षण मांगेंगी.
शरद गुप्ता कहते हैं कि ओबीसी आरक्षण का मुद्दा उठा कर इस बार विपक्षी दल बीजेपी के पिछड़े वोटों में सेंध लगा सकते हैं.यानी 2024 के चुनाव में पिछड़ा वोट एक बड़ा मुद्दा बनेगा.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी ने 'इंडियन एक्सप्रेस' में छपे अपने कॉलम में भी इस नजरिये की पुष्टि की है.
उन्होंने लिखा है कि महिला आरक्षण बिल से एक बात साफ होती जा रही है कि सरकार और विपक्षी दल दोनों महिला वोटरों के समर्थन के लिए जोर-आजमाइश में लग गई हैं. और ये भी साफ है कि महिला आरक्षण बिल के बहाने 2024 में ओबीसी का सवाल एक बड़ा मुद्दा बनेगा.
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