गोवा में गिरती प्रजनन दर, सरकार के क़दम से क्या बदलेंगे हालात?

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गोवा भारत का पहला राज्य होगा जहां सरकार ऐसे दंपतियों को मुफ़्त आईवीएफ़ इलाज देगी जो माता-पिता बनना चाहते हैं.
इस मामले पर बीबीसी से बातचीत में गोवा के स्वास्थ्य मंत्री विश्वजीत राणे ने बताया कि गोवा मेडिकल कॉलेज में आईवीएफ़ के इलाज के लिए अब तक 100 दंपति रजिस्टर करा चुके हैं और इसके लिए कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉसिबीलिटी (सीएसआर) फंडिंग करेगा.
आईवीएफ़, एआरटी (असिस्टिड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी) तकनीक के अंतर्गत आता है जिसमें कृत्रिम तकनीक की सहायता से प्रजनन होता है.
सरकार साल 2021 में महिलाओं के प्रजनन अधिकारों के सरंक्षण के मक़सद से एआरटी बिल लेकर आई थी.
इसी में आईवीएफ़ तकनीक भी शामिल है जिसके अंतर्गत महिला के गर्भाशय के अंडे बाहर निकाल कर प्रयोगशाला में स्पर्म से फर्टिलाइज़ किया जाता है. फर्टिलाइज़ होने पर भ्रूण तैयार किया जाता है और उसके बाद उसे महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है.

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गोवा के स्वास्थ्य मंत्री ने क्या कहा
गोवा के स्वास्थ्य मंत्री विश्वजीत राणे का कहना था कि जब वो ग्रामीण इलाकों में जाते थे तो वहां कई दंपति उन्हें आईवीएफ़ को लेकर अपने अनुभव बताते थे.
हालांकि ये समस्या केवल ग्रामीण इलाकों तक ही सीमित नहीं है.
गोवा के स्वास्थ्य मंत्री विश्वजीत राणे ने बीबीसी से बातचीत में बताया, "जब हमने ऐसे दंपतियों को लेकर शोध किया तो पाया कि हर साल गोवा से तकरीबन 200-300 कपल आईवीएफ़ के लिए पुणे, कोल्हापुर आदि जगह पर जाते हैं. इनमें से कई परिवार ऐसे होते थे जो अपनी जमा पूंजी इसमें लगा देते हैं. कई बार वे क्वैक (नकली) डॉक्टरों के चक्कर में फंस जाते थे. ऐसे में पैसा भी जाता और सफलता भी हासिल नहीं होती थी."
"उनका माता-पिता बनने का सपना अधूरा ही रह जाता है. ऐसे कई जोड़ों ने हमसे अपना दुख साझा किया और तब हमने ये फ़ैसला लिया कि इनकी मदद की जाए क्योंकि हम किसी दंपति को संतान सुख से दूर नहीं रखना चाहते हैं."

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आमतौर पर देखा जाए तो आईवीएफ़ के इलाज में पांच लाख से ज़्यादा ख़र्च आता है ऐसे में अगर गोवा की सरकार दंपतियों को ये मदद मुफ़्त मुहैया कराती है तो इसका ख़र्च कौन वहन करेगा?
स्वास्थ्य मंत्री का कहना है, "आईवीएफ़ तकनीक पर औसतन साढ़े छ लाख तक ख़र्च आता है जो बढ़कर नौ लाख तक चला जाता है. हमारी इस योजना में सीएसआर 100 प्रतिशत मदद करेगा जहां वे बुनियादी सुविधाओं से लेकर उसके विस्तार का ख़र्च उठाएंगे तो सरकार की तरफ से हमारे डॉक्टर सहयोग करेंगे और हम इसके संचालन पर निवेश करेंगे."
साल 2011 में की गई जनगणना के अनुसार गोवा की आबादी 14,58,545 थी लेकिन हावर्ड पॉपुलेशन एस्टिमेट 2020 के मुताबिक़ ये आकलन है कि राज्य की आबादी 16.5 लाख तक पहुंच गई है.

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विपक्ष का क्या कहना है
गोवा में कांग्रेस पार्टी और विपक्ष के नेता यूरी अलेमाओ का कहना है कि संतान का सुख देना एक अच्छा कदम है लेकिन सरकार इसे धरातल पर कितना सफल बना पाएगी वो देखने की बात होगी.
विपक्षी नेता बीबीसी से बातचीत में सवाल उठाते हुए कहते हैं, "राज्य में सत्ताधारी पार्टी ने ऐसी कई योजनाओं की घोषणाएं की हैं लेकिन यहां ये देखने की बात है कि इस पहल के लिए राज्य सरकार पैसा कहा से लाएगी वो भी ऐसे समय में जब राज्य कर्ज़ में डूबा हुआ है."
राज्य में 40 विधानसभा की सीट हैं और वहां बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में है.
यूरी अलेमाओ कहते हैं, "गोवा पर 28,000 करोड़ रुपये का कर्ज़ है. गोवा की आबादी अगर 14 लाख से ऊपर है तो प्रति व्यक्ति कितना कर्ज़ होगा. हमारा ग्रोस स्टेट डॉमस्टिक प्रोडेक्ट सीमा पार हो चुका है. सरकार नई-नई स्कीम ला रही है. आप ये सोचिए कि कैंसर के लिए स्क्रीनिंग मशीन तक नहीं है. ऐसे में इस तरह की योजनाओं को कैसे अमलीजामा पहनाया जाएगा?"
उनका का कहना है, "चलिए मान लिया जाए कि ये मंत्री का एक विज़न हो सकता है और राज्य सरकार की योजनाओं का एलान करती रहती है जैसे 10,000 लोगों को रोज़गार देने का वादा आदि लेकिन सरकार अपनी इन योजनाओं के लिए पैसा कहां से लाएंगी ये एक बड़ा सवाल है?"

गोवा की प्रजनन दर
इकोनॉमिक सर्वे 2022-23 पर छपी जानकारी के मुताबिक़ पिछले पांच सालों में गोवा की प्रजनन दर या फर्टिलिटी रेट में कमी आई है.
इस सर्वे में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे या NFHS-5 के छपे आंकड़ों के अनुसार गोवा की कुल प्रजनन दर 1.3 है.
रिसर्च इंस्टीट्यू 'पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च' के मुताबिक़ गोवा एक ऐसा राज्य है जिसने अपने कुल बजट का 9.1 प्रतिशत स्वास्थ्य पर ख़र्च के लिए आवंटित किया है जो अन्य राज्यों के औसत से कहीं ज़्यादा है.
इंटरनेशनल इंस्ट्टीयूट फ़ॉर पॉपुलेशन साइंसेज़ (आईआईपीएस) के अनुसार गोवा की पिछले पांच सालों में प्रजनन दर काफ़ी नीचे चली गई है.
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली संस्था आईआईपीएस के इस अधिकारी के मुताबिक़ अगर कुल प्रजनन दर 1.6 से नीचे होती है तो उसे अच्छा नहीं माना जाता है और आमतौर पर 2.1 की दर होनी चाहिए.
हालांकि स्वास्थ्य मंत्री इस बात से तो इनकार करते हैं कि प्रजनन दर में कमी आई है लेकिन उसमें गिरावट की बात को ज़रूर स्वीकार करते हैं.
NFHS-4 (2015-2016) में जहाँ भारत का फर्टिलिटी रेट 2.2 था, वहीं NFHS-5 (2019-2021) में ये घटकर 2.0 पहुंच गया.
भारत में बिहार, मेघालय, उत्तरप्रदेश, झारखंड और मणिपुर ऐसे राज्य हैं जिनमें प्रजनन दर सबसे अधिकर है वहीं सिक्किम में सबसे कम 1.1 है.
गोवा में प्रजनन दर कम होने का कारण बताते हुए आईआईपीएस के इस अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "राज्य में लोग शिक्षित ज़्यादा हैं, वहां छोटे परिवार की नीति के प्रति लोग जागरूक होने के साथ-साथ गर्भनिरोधक का इस्तेमाल भी करते हैं. वहीं ये देखा जाता है कि राज्य से माइग्रेशन या प्रवास भी होता है."

प्रजनन दर का असर
आईआईपीएस के इस अधिकारी ने बीबीसी से बातचीत में समझाते हुए कहा, "गोवा की प्रजनन दर 1.3 है तो इसे ऐसे समझा जा सकता है कि वहां 100 महिलाएं 130 बच्चे पैदा कर रही हैं यानी महिलाएं एक बच्चा तो कुछ दो या तीन कर रही है तो औसतन एक महिला अपने जीवनकाल में 1.3 बच्चा पैदा कर रही है और इसी आधार पर प्रजनन दर निकाली जाती है."
ये अधिकारी बताते हैं कि प्रजनन दर घटने से जनसंख्या और उससे अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ता है.
वे बताते हैं कि जनसंख्या के कम होने से काम करने के लिए लोगों की कमी आएगी , बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ जाएगी ऐसे में जनसंख्या बढ़ने का जो लाभ जो एक राज्य को मिलना चाहिए वो नहीं मिल पाता है.
जानकारों का कहना है कि गोवा की इस पहल से दंपतियों को मदद मिलेगी लेकिन क्या इसे हर राज्य में लागू किया जा सकता है, वो देखने वाली बात होगी. क्योंकि ये राज्य की जनसंख्या के आधार, ख़र्च और बुनियादी सुविधाओं पर निर्भर करेगा.
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