राजस्थान में मेवाड़ की सीटों पर क्यों है मोदी और राहुल गांधी की नज़र?- ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, कमलेश मठेनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मेवाड़
राजस्थान का मेवाड़ जो आपको हर कुछ क़दम पर सैकड़ों साल पुराने इतिहास की सैर कराता है.
इसके ऐतिहासिक क़िले, महल और स्मारक इस जगह की कहानी ख़ुद-ब-ख़ुद कहते हैं.
वहीं, गाँव से अलग इसके शहरी इलाक़े होटलों, गाड़ियों और सुविधाओं के साथ आधुनिकता का अहसास भी कराते हैं.
इसी नए और पुराने का मेल मेवाड़ के मिजाज़ में ही नहीं बल्कि राजनीति में भी दिखता है.
जहाँ ज्वलंत मुद्दे तो हावी रहते ही हैं लेकिन मेवाड़ के इतिहास और संस्कृति का प्रभाव भी नज़र आता है.
मेवाड़ की भारत के इतिहास में ख़ास जगह है. यहाँ के शासकों बप्पा रावल, राणा सांगा, महाराणा प्रताप के क़िस्सों ने मेवाड़ को अलग पहचान दी है.
मेवाड़ की इसी विरासत की झलक नेताओं के बयानों और घोषणाओं में मिलती है.
फिर चाहे वो महाराणा प्रताप के इतिहास को लेकर बदलते पाठ्यक्रम हों या पद्मावती फ़िल्म को लेकर हुआ विवाद.
मानगढ़ धाम में गोविंद गुरु के लिए सम्मान जताना हो या राणा पूंजा भील की विरासत पर दावे के लिए होने वाला टकराव.

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ऐसे में अपने ऐतिहासिक महत्व के साथ मेवाड़ राजस्थान की सियासत में भी रसूख रखता है.
मेवाड़ ने राजस्थान को चार मुख्यमंत्री दिए हैं, जिनमें मोहन लाल सुखाड़िया सबसे ज़्यादा समय 16 साल तक इस पद पर बने रहे.
मेवाड़ के नेताओं को मंत्रिमंडल में भी जगह मिलती रही है.
कांग्रेस सरकार में मेवाड़ के रामलाल जाट, उदयलाल आंजना और महेंद्रजीत सिंह मालवीय को मंत्री पद मिला. इससे पहले गिरिजा व्यास और रघुबीर सिंह मीणा भी मंत्री रह चुके हैं.
वहीं, बीजेपी की सरकार में गुलाबचंद कटारिया गृह मंत्री रहे और नंद लाल मीणा को आदिवासी विकास मंत्रालय मिला था.
इस बार भी मेवाड़ जीतने के लिए बीजेपी और कांग्रेस ने पूरी ताक़त लगा दी है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी से लेकर गृह मंत्री अमित शाह मेवाड़ में जनसभा कर चुके हैं.
पीएम मोदी भी बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम आ चुके हैं और अब राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का अलग चरण मेवाड़ से ही शुरू होने वाला है.

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सियासी दलों की सक्रियता और आंकड़े
सियासी दलों की इस सक्रियता की वजह भी है क्योंकि मेवाड़ की सियासत में कहा जाता है कि जिसने मेवाड़ जीत लिया उसने राजस्थान जीत लिया.
राजस्थान के पिछले चुनावों के आँकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं.
2013: 28 सीटों में से बीजेपी ने 25, कांग्रेस ने दो सीटें जीतीं, सरकार बनी बीजेपी की.
2008: कांग्रेस ने 19 और बीजेपी ने 7 सीटें जीती, सरकार बनी कांग्रेस की.
2003: परिसीमन से पहले 25 सीटों में से 18 बीजेपी और 5 कांग्रेस को मिलीं. सरकार बनी बीजेपी की.
हालाँकि, साल 2018 के नतीजे कुछ अलग रहे थे. तब बीजेपी ने 15 और कांग्रेस ने 10 सीटें जीती थीं लेकिन सरकार कांग्रेस की बनी थी.

इस अपवाद के साथ राजस्थान की राजनीति को समझने वालों का कहना है कि पिछले आँकड़ों और मेवाड़ के भावनात्मक महत्व को देखें, तो इस सियासी कहावत से इनकार नहीं किया जा सकता.
राजनीतिक विश्लेषककुंजन आचार्य कहते हैं, ‘‘मेवाड़ सत्ता का द्वार कहलाता है और आज से नहीं बरसों से. लेकिन, पहली बार ऐसा हुआ कि बीजेपी ने मेवाड़ को जीता और सत्ता तक नहीं पहुँच पाई. मिथक कभी बनते हैं, कभी टूटते हैं लेकिन शाश्वत तौर पर जो चीज़ चल रही है वो लोगों के ज़ेहन में रहता है.’’
‘‘शायद इसलिए सीएम गहलोत के इतने दौरे यहाँ पर हुए हैं, केंद्र के जितने नेता, मंत्री आ सकते थे, यहाँ आ रहे हैं. वैसे तो कुल 200 में से यहाँ सिर्फ़ 28 सीटे हैं लेकिन इनका प्रभाव चाहे वो किसी लहर में हो, जातीय हो या भावनात्मक हो, अन्य सीटों पर भी पड़ता है.’’
कुंजन आचार्य उदयपुर की मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता विभाग के प्रमुख भी हैं.
वहीं, वरिष्ठ पत्रकारउग्रसेन राव का कहना है, ‘‘पूरे देश में ये दो नाम तो स्थापित हैं महाराणा प्रताप और मीरा. आप गुजरात में जाकर बोलोगे कि उदयपुर, मेवाड़ से आए हो तो बोलेंगे कि तमे मीरा बाई ना देस ना छु. यह क्षेत्र वीरता और भक्ति का एक ऐसा पुंज है जिस पर यहाँ के सभी लोगों को गर्व है और ये बात राजनीतिक पार्टियाँ भी समझती हैं.’’

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समझें मेवाड़ को
राजधानी जयपुर से 394 किमी. दक्षिण में बसे मेवाड़ की सीमाएँ गुजरात और मध्य प्रदेश से मिलती हैं.
इस इलाक़े को ऐतिहासिक तौर पर मेवाड़ कहते हैं लेकिन मौजूदा समय में ये उदयपुर संभाग कहलाता है.
उदयपुर संभाग में उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा और सलूम्बर ज़िले आते हैं.
इस साल संभागों में हुए बदलाव से पहले उदयपुर संभाग में बाँसवाड़ा, डुंगरपुर, प्रतापगढ़ ज़िले भी आते थे. लेकिन, अब ये अलग होकर बाँसवाड़ा संभाग बन गया है.
इस बदलाव की भी मेवाड़ में काफ़ी चर्चा है. इसमें आदिवासी सीटों वाले वागड़ इलाक़े को बाँसवाड़ा संभाग बना दिया गया है.
संभाग और ज़िले बनाने की मांग बहुत पहले से हो रही थी लेकिन इसी साल ये घोषणा करके गहलोत सरकार ने लोगों को एक और फ़ायदा दे दिया है.
कुंजन आचार्य कहते हैं, ‘‘प्राशसनिक विकेंद्रीकरण से स्थानीय स्तर पर नौकरशाही ठीक ढंग से काम कर पाती है. लेकिन, इसमें कुछ लोगों को ये भी लग रहा है कि हमारा ज़िला छोटा हो गया. आधी चीज़ें इधर बँट गईं और आधी उधर.’’
‘‘पर इससे नए ज़िलों में नए संसाधन तैयार होंगे और नया बजट मिलेगा. उदयपुर मुख्यालय से बाँसवाड़ा पहुंचने में ढाई-तीन घंटे लगते हैं. कभी आपात स्थिति हो तो यहाँ पहुँचने में बहुत समय लगता था. अब नया संभाग बनने से तात्कालिक स्तर पर वहीं सुविधाएँ मिल सकती हैं.’’

मेवाड़ में जातीय फ़ैक्टर
किसी चुनाव में कई फ़ैक्टर काम करते हैं और मेवाड़ में जातीय समीकरण भी काफ़ी मायने रखते हैं.
ये इलाक़ा दो हिस्सों में बँटा है- एक आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र और अन्य में अलग-अलग जातियों की मिलीजुली संख्या है.
प्रमुख तौर पर यहाँ राजपूत, ब्राह्मण, जाट, माहेश्वरी, गुर्जर और अनुसूचित जातियाँ मिलती हैं. जाट और गुर्जर यहां ओबीसी में आते हैं.
जानकारों के मुताबिक़ उदयपुर सिटी ब्राह्मण और जैन बाहुल्य सीट है. वहीं, चित्तौड़गढ़ और वल्लभनगर में राजपूत बहुल सीट होने के कारण बीजेपी का वर्चस्व है.
भीलवाड़ा के मांडल में गुर्जरों की आबादी अधिक है जबकि आसींद के लिए कहा जाता है कि जीत के लिए गुर्जर और ब्राह्मण दोनों की ज़रूरत पड़ती है.
इसी तरह कुंभलगढ़ में राजपूत और माहेश्वरी उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं. वहीं, नाथद्वार में अधिकतर ब्राह्मण और जैन प्रत्याशी की जीत हुई है.
मेवाड़ की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र शर्मा बताते हैं, ‘‘बाँसवाड़ा और डुंगरपुर की आदिवासी बेल्ट में आदिवासी वोट ही जीत-हार तय करते हैं. बाक़ी सीटों पर अलग-अलग समीकरण साधने होते हैं.’’

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देवेंद्र शर्मा के मुताबिक़ अगर लगता है कि यहाँ कोई जाति विशेष एक तरफ़ है तो उसका असर दूसरी सीटों पर भी पड़ता है. फिर उन जातियों के संगठन भी हैं जो ज़िला और राज्य स्तर पर काम करते हैं. राजनीतिक दल इनका समर्थन हासिल करने की कोशिश करते हैं.
फ़िलहाल राजस्थान में बीजेपी और कांग्रेस हरसंभव तरीक़े से जनता का समर्थन पाना चाहते हैं.
इसी कोशिश में अशोक गहलोत सरकार ने इस साल 100 यूनिट मुफ़्त बिजली, महिलाओं को मोबाइल फ़ोन, राशन पैकेट और 500 रुपए में सिलेंडर जैसी योजनाओं की घोषणा की है.
वहीं, बीजेपी ने अपनी दूसरी ‘परिवर्तन यात्रा’ की शुरुआत बाँसवाड़ा से की जो मेवाड़ की लगभग सभी सीटों से होकर निकली.
इस यात्रा में बीजेपी सांसद मनोज तिवारी और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत तक ने हिस्सा लिया.
बीजेपी नेताओं ने जनसभा के दौरान कांग्रेस पर फ़्री की रेवड़ियाँ बाँटने का आरोप लगाया.

बीजेपी और कांग्रेस का वार-पलटवार
बीजेपी के उदयपुर सिटी ज़िला अध्यक्ष रविंद्र श्रीमाली ने कहा कि गहलोत सरकार पिछले चार सालों से हर मोर्चे पर विफल रही है. अब आख़िर में जिस प्रकार से रेवड़ियाँ बाँटने का काम कर रहे हैं, चाहे जितने भी प्रयत्न कर लें, राजस्थान की जनता मन मस्तिष्क में ये तय कर चुकी है कि भाजपा को विजयी बनाना है.
इसके जवाब में उदयपुर के पूर्व सांसद और कांग्रेस नेता रघुवीर सिंह मीणा कहते हैं, ‘‘भाजपा करे तो ठीक है, दूसरी पार्टी करे तो वो रेवड़ियाँ खिलाती हैं. कांग्रेस पार्टी अगर 100 यूनिट बिजली भी दे रही है तो इसे फ़्री में रेवड़ी नहीं कह सकते. ये लाभ बीजेपी के लोग भी ले रहे हैं, कांग्रेस के लोग भी ले रहे हैं, ये लोगों को सहायता है.’’
उदयपुर से बीजेपी के क़द्दावर नेता गुलाब चंद कटारिया के इस चुनाव में ना होने की भी काफ़ी चर्चा है. उन्हें असम का राज्यपाल बना दिया गया है.
गुलाबचंद कटारिया को राजस्थान से दूर करने के पीछे राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि उन्होंने अपने पीछे नेतृत्व नहीं पनपने दिया इसलिए उन्हें लेकर मतभेद थे. लेकिन, कटारिया के ना होने से बीजेपी को पकड़ बनाने में मुश्किल ज़रूर होगी.
भाजपा नेताओं को भी मेवाड़ में उनकी ज़रूरत महसूस हो रही है.

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उदयपुर ग्रामीण से बीजेपी विधायक फूल सिंह मीणा बार-बार कहते हैं कि हमें कोई भी समस्या हो तो तुरंत उन्हें फ़ोन कर लेते हैं. वो ख़ुद भी महीने-दो महीने में यहाँ आते रहते हैं. उनसे परिवार की तरह मुलाक़ात होती है.
वहीं, कांग्रेस ने राजस्थान में सरकार बना तो ली लेकिन मेवाड़ नहीं जीत पाए थे. इस बार पार्टी की क्या रणनीति है.
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता गिरजा व्यास उदयपुर से सांसद रही हैं.
वे कहती हैं, ‘‘हमने पाँच सालों में इसी पर काम किया है. ट्राइबल के नेताओं को भी यही कहा गया है कि वो इस दिशा में ख़ुद भी काम करें और ट्राइबल बेल्ट को केवल विकास नहीं चाहिए, उनमें आत्मविश्वास पैदा करने की ज़रूरत है. फिर से मेवाड़ अगुआ रहेगा और हमारी सरकार बनेगी.’’

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मेवाड़ के मन में क्या है
राजनीतिक पार्टियों के दावों के इतर मेवाड़ के लोगों के मन में क्या है.
लोगों के बीच हाल में घोषित योजनाओं की चर्चा भी है और बरसों से चले आ रहे बिजली, पानी के मसलों की परेशान भी.
पालड़ी गाँव की एक महिला चुनाव पर सवाल पूछे जाने पर तुरंत कहती हैं, ‘‘यहाँ पर बसों की कोई सुविधा नहीं है. ना ही ऑटो आता है. यहाँ पर सिर्फ़ पानी की सुविधा हुई है वो भी दो-तीन दिन में एक बार देते हैं.’’
लेकिन, उसी गाँव की एक अन्य महिला इलाक़े के विधायक को लेकर कहती हैं कि अबकी बार तो यहाँ पानी और सड़क दोनों की सुविधा हो गई हैं. बीजेपी सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है.

गहलोत सरकार की योजनाओं को लेकर भी राय बँटी हुई मिलती है.
उदयपुर सिटी के एक दुकानदार का कहना है, ‘‘चुनाव आ रहे हैं तो गहलोत साहब कभी मोबाइल दे रहे हैं, कभी मसाला दे रहे हैं. अरे मसाला, मोबाइल नहीं चाहिए. जनता के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा सबसे ज़रूरी है. सबकुछ मुफ़्त कर दोगे तो फिर हम क्या करेंगे."
लेकिन, एक सब्ज़ी विक्रेता महिला कहती हैं कि उन्हें मुफ़्त राशन से मदद मिल रही है.
वो कहती हैं, ‘‘राशन फ़्री दे रहे हैं, पढ़ने वाले बच्चों को मोबाइल दिया है. इतनी फ़्री दवाइयाँ कर रहे हैं. हमको अच्छा लग रहा है. कांग्रेस सरकार भी अच्छी है.’’

आदिवासी इलाक़ों की स्थिति
मेवाड़ के शहरी इलाक़े सुविधाओं के लिहाज से फिर भी बेहतर हैं लेकिन जितना अंदर जाते हैं उतनी ही सुविधाएँ घटती जाती हैं.
कई अंदरूनी इलाक़ों तक सड़कें पहुँची हैं, लेकिन कुछ ही साल पहले.
ऊँचे पहाड़ों पर बने गाँवों तक बिजली के तार आए हैं लेकिन बिजली कभी-कभी आती है.
इनमें अधिकतर आदिवासी इलाक़े हैं, जो दूर-दराज में बसे हैं.
डुंगरपुर के शानु कहते हैं, ‘‘आदिवासियों के लिए सबसे बड़ी चीज़ शिक्षा है. स्कूलों में स्टाफ़ की कमी है, बिल्डिंग बहुत पुरानी है. ऐसे में बच्चे आगे जाकर मज़दूरी करते हैं. फिर रोज़गार भी यहाँ नहीं है. यहाँ के लोग गुजरात और महाराष्ट्र में पलायन करते हैं.’’
बासव गाँव के हरीश ढिंढरो बताते हैं, ‘‘लोगों के घर में नल आ रहा है. हमारा पहाड़ी पर मकान है, हमें कहाँ नल दिया गया. कहाँ से पानी लाएं या तो हैंडपंप से भरो या ख़ुद का कुंआ खोदो, भरो, पीयो, जियो.’’

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लेकिन, लोगों की समस्याओं के साथ-साथ यहाँ की राजनीति भी रफ़्तार से चलती रहती है.
बाँसवाड़ा और डुंगरपुर में जहाँ पहले कांग्रेस-बीजेपी के बीच मुक़ाबला होता था अब वहाँ बीटीपी और बीएपी दो नई पार्टियाँ आ गई हैं.
मेवाड़ में आदिवासी आरक्षित कुल 16 सीटें हैं.
भारतीय ट्राइबल पार्टी यानी बीटीपी ने पिछले चुनाव में दो सीटें जीतकर बीजेपी और कांग्रेस के लिए चुनौती खड़ी कर दी थी.
हालाँकि, इस बार बीटीपी के दोनों विधायकों ने पार्टी छोड़कर एक नई पार्टी बनाई है- भारतीय आदिवासी पार्टी. इससे मुक़ाबला और बढ़ गया है.

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बीटीपी प्रदेश अध्यक्ष वेलाराम घोगरा कहते हैं, ‘‘जिस क्षेत्र के लोगों ने विश्वास किया था उसके साथ विश्वासघात कर रहे हैं और ऐसी स्थिति में लोगों को पता है कि विश्वासघात कौन कर रहा है. आज नहीं तो कल बीटीपी प्रथम मंच है.’’
बीएपी के संस्थापक सदस्य कांतिलाल रोत का कहना है, ‘‘भारतीय आदिवासी पार्टी की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि ट्राइबल पार्टी भी उसी नक़्शे क़दम पर चल पड़ी थी जिस पर कांग्रेस और बीजेपी चल रहे हैं और मनमर्ज़ी कर रही थी. हमारे इलाक़े में हम एक विचारधारा के आधार पर पार्टी चला रहे हैं ना कि हाईकमान के आधार पर.’’
मेवाड़ में लोगों के अपने मुद्दे हैं और पार्टियों के अपने दावे.
लेकिन, जानकार कहते हैं कि मेवाड़ में एकदम से हवा चलती है और वोट खिसक जाता है.
मेवाड़ में हर पार्टी फ़िलहाल अपनी हवा बनाने की कोशिश में है.
लेकिन, राजस्थान की राजनीति में ख़ास जगह रखने वाले मेवाड़ के किले को कौन भेद पाता है, ये देखना होगा.
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