कर्नाटक हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद क्या मैरिटल रेप का मामला दर्ज करने का रास्ता साफ हो गया है?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए
कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक फ़ैसले ने वैवाहिक संबंध में बलात्कार की यातना झेल रही महिलाओं के लिए न्याय का दरवाजा खोल दिया है. कर्नाटक उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के उस फ़ैसले को बरक़रार रखा है जिसमें क्रूर यौन उत्पीड़न झेलने वाली पत्नी की शिकायत पर पति के ख़िलाफ़ बलात्कार का आरोप निर्धारित किया गया था.
जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने अपने आदेश में कहा है कि भारतीय दंड संहिता बलात्कार के मामले में पति को जो छूट देती है, वह समानता के अधिकार (संविधान की धारा 14) का उल्लंघन है और लिंग के आधार पर भेदभाव ( संविधान की धारा 15-1) का उदाहरण है.
कर्नाटक उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले को महिला उत्पीड़न से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले एक्टिविस्ट 'काफ़ी दिलचस्प' और 'ज़्यादा प्रगतिशील' बता रहे हैं, हालांकि इन लोगों ने यह भी संदेह जताया है कि क़ानूनी तौर पर रेप के मामले में पति को मिलने वाली छूट का प्रावधान अभी भी बना हुआ है.
जस्टिस नागप्रसन्ना ने अपने फ़ैसले में कहा, "कोई पुरुष, एक पुरुष है. कोई कृत्य, एक कृत्य है. बलात्कार, बलात्कार है. चाहे वह पति पुरुष के द्वारा महिला पत्नी के साथ क्यों ना किया गया हो."
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने बताया, "इससे शादीशुदा महिलाओं को काफ़ी ताक़त मिलेगी. अब अपने पति के साथ उनके संबंध बेहतर होंगे."
कर्नाटक उच्च न्यायालय में वकालत करने वालीं वरिष्ठ वकील जायना कोठारी ने कहा, "मैरिटल रेप मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित मामले का फ़ैसला जो भी हो, यह स्पष्ट है कि कर्नाटक उच्च न्यायालय के फ़ैसले ने भारतीय दंड संहिता की धारा में बलात्कार के मामलों में पति को छूट देने के प्रावधान पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं."
दिल्ली उच्च न्यायालय ने मैरिटल रेप के अपराधीकरण मामले की सुनवाई के दौरान दो मार्च को केंद्र सरकार के स्टैंड को फटकार लगाने बाद अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था. केंद्र सरकार ने इस मामले में स्टैंड लेते हुए कहा था कि उसे अभी कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की राय का इंतज़ार है.
इस पर चर्चा करने से पहले, बात उस मामले की जिसमें जस्टिस नागप्रसन्ना ने 90 पेजों का अपना फ़ैसला सुनाया है. इस मामले की प्राथमिकी मार्च, 2017 में दर्ज हुई थी.
आख़िर किस मामले में आया है फ़ैसला

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ओडिशा की रहने वाली रिचा (बदला हुआ नाम) ने पुलिस से अपनी शिकायत में कहा था कि वह 12वीं तक पढ़ी है और उनकी मां ने उन्हें अभियुक्त शादी करने के लिए मज़बूर किया था. उन्होंने यह भी कहा था, "मैं उस दिन को याद नहीं करना चाहती जिस दिन से मेरी ज़िंदगी नरक बन गई थी."
"मेरे पति, हमारे परिचित हर शख़्स के सामने बेशर्मी से कहते थे कि मैं उनसे सेक्स संबंध नहीं बनाती हूं जबकि उन्होंने मुझे सेक्स गुलाम बनाकर रखा हुआ था."
वहीं इस मामले में पति ने भी अपनी पत्नी के ख़िलाफ़ पुलिस कमिश्नर ऑफ़िस में शिकायत दर्ज करायी थी, जिसमे उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी, उनके साथ सेक्स संबंध नहीं बनाती. रिचा ने इस मामले में एक रिश्तेदार से मदद ली, जिसकी मदद से वह वकील तक पहुंची और वकील ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर पिंकी की मदद की.
रिचा के पति और उनके सास-ससुर चाहते थे कि वह अपने एक करोड़ की संपत्ति बेच दे. वे लोग रिचा को उनकी बेटी को नहीं ले जाने दे रहे थे. इस मौके पर हुई कहासुनी में उनके पति ने रिचा का मोबाइल और ऊंगली तोड़ दीं लेकिन पड़ोसियों के आ जाने की वजह से रिचा अपने साथ बेटी को ले जाने में कामयाब हुईं.
पुलिस को अपनी शिकायत में रिचा ने बताया, "शादी के दिन से ही मेरे पति का मेरे साथ व्यवहार सेक्स गुलाम जैसा था. उन्होंने मुझे अश्लील फ़िल्में दिखाकर अप्राकृतिक सेक्स संबंध बनाने के लिए मज़बूर किया. गर्भवती होने के बाद भी उन्होंने मेरे साथ जबरदस्ती संबंध बनाए. उनमें सामान्य शिष्टाचार का कोई बोध नहीं था, गर्भपात होने के बाद भी उन्होंने सेक्स संबंध बनाया."
"मेरे पति का व्यवहार बिलकुल इंसानों जैसा नहीं था. उन्होंने मेरी बच्ची के सामने मुझे अप्राकृतिक सेक्स संबंध बनाने के लिए मज़बूर किया. कई मौकों पर उन्होंने मेरी बेटी को मारा पीटा और जबरदस्ती संबंध बनाए. मेरे यौन उत्पीड़न की कोई गिनती नहीं है, ऐसी स्थिति में शायद ही दुनिया की कोई महिला अपना दुख दुनिया को बताए. मैं चाहती हूं कि मेरा और मेरी बेटी का नाम अज्ञात रखा जाए और मेरे पति को सजा हो."
रिचा ने यह भी कहा, "मुझे तब बहुत दुख हुआ जब मुझे मालूम हुआ कि मेरे पति ने मेरी बेटी को स्कूल से समय से पहले लाकर उसका यौन उत्पीड़न किया. मैं नहीं चाहती कि कोई भी बेटी और मां को वह सब झेलना पड़े जो मैंने और मेरी बेटी ने झेला है.''
मामले की जांच और क़ानूनी लड़ाई
इस मामले में 21 मार्च, 2017 को भारतीय दंड संहिता की धारा 506, 498ए, 323, 377 और पोक्सो एक्ट की धारा 10 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई. मामले की जांच के बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 को भी शामिल किया, जिसका मतलब ये हुआ कि पिंकी की बलात्कार की शिकायत का संज्ञान लिया गया.
पोक्सो की विशेष अदालत ने चार्ज़शीट दाखिल होने के बाद मामले में रेप के प्रावधानों को भी शामिल किया. मामले के यहां तक पहुंचने के बाद हरुशिकेष ने निचली अदालत की प्रक्रिया को रद्द कराने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया.
जस्टिस नागप्रसन्ना ने अपने आदेश में कहा, "शिकायत को देख कर लगता है कि ये याचिकाकर्ता के क्रूर कृत्यों को लेकर पत्नी के सब्र के बांध का विस्फ़ोट से टूटना है. यह एक निष्क्रिय ज्वालामुखी के फटने के समान है. शिकायत में वर्णित तथ्यों के आधार पर, मेरे विचार से, विद्वान सत्र न्यायाधीश द्वारा आईपीसी की धारा 376 के तहत दंडनीय अपराधों का संज्ञान लेने और इस आशय का आरोप तय करने में कोई गड़बड़ी नहीं है."
न्यायाधीश ने अपने आदेश में यह लिखा है, "याचिकाकर्ता ने अपनी नौ साल की बेटी की उपस्थिति में शिकायतकर्ता / पत्नी के साथ कितनी क्रूरता से यौन संबंध बनाए. इतना ही नहीं बाद में बेटी के निजी अंगों को टच करके बेटी का भी यौन उत्पीड़न किया है."
इस फ़ैसले में जस्टिस जेएस वर्मा के नेतृत्व वाली कमिटी की अनुशंसाओं का संदर्भ भी दिया गया है. इस कमेटी का गठन निर्भया मामले के बाद किया गया था.
जस्टिस नागप्रसन्ना ने विस्तार से बताया कि कमिटी की अनुशंसा से पहले क्या स्थिति थी, यौन उत्पीड़न के मामले की परिभाषा क्या थी. उन्होंने यह भी बताया कि पूरा क़ानून बदला लेकिन मैरिटल रेप वाले मामले में कोई संशोधन नहीं किया गया.

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फ़ैसले की साकारात्मक-नकारात्मक बातें
कर्नाटक उच्च न्यायालय की वकील गीता देवी पापन्ना ने बीबीसी हिंदी से बताया, "न्यायालय ने संवैधानिक दृष्टिकोण से क़ानून की व्याख्या की है. लैंगिक समानता के दृष्टिकोण से न्यायालय ने मामले को सही ढंग से देखा है. अगर व्यापक संदर्भ में देखें तो इससे महिलाओं को परिवार में बेहतर बर्ताव मिलना तय है."
पापन्ना ने यह भी कहा, "इस सही फ़ैसले से महिलाओं को बराबर के पार्टनर के तौर पर देखा जाएगा उनके साथ कमतर व्यवहार नहीं होगा."
मद्रास उच्च न्यायालय की वकील गीता रामाशेषण ने बीबीसी हिंदी से कहा, "इस फ़ैसले ने क़ानून के उस प्रावधान को नहीं हटाया है जो पति को बलात्कार के आरोप से छूट देता है. जब तक इस प्रावधान को समाप्त नहीं किया जाता यह क़ानून की किताब में बना रहेगा. इसे या तो सरकार को निरस्त करना होगा या इसे समाप्त करना होगा."
हालांकि, रामसेशन ने कहा कि यह फ़ैसला अन्य पहलुओं में भी एक क़दम आगे का फ़ैसला है. उन्होंने कहा, "घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत यौन शोषण भी घरेलू हिंसा है. अगर हिंसा होती है, तो यह बलात्कार की श्रेणी में आता है. इस लिहाज से यह एक क़दम आगे ले जाने वाला फ़ैसला है.''
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के पोलित ब्यूरो की सदस्य कविता कृष्णन ने फ़ैसले को 'सकारात्मक' बताया है लेकिन उनके मुताबिक, "इस फ़ैसले में कमज़ोर तर्क दिया गया है. इसमें अप्राकृतिक सेक्स, अश्लील साहित्य आदि पर नैतिकता की दुहाई तो है जबकि महिलाओं के सहमति की कमी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. इससे पूरे उद्देश्य को हानि है."

यहाँ से कहाँ जाएगा मामला
जयसिंह और कोठारी दोनों का विचार है कि दिल्ली उच्च न्यायालय का फ़ैसला चाहे जो हो, आईपीसी में बलात्कार के प्रावधान में पतियों को जो छूट मिली है उसे हटाने की संवैधानिक वैधता पर फैसला सर्वोच्च न्यायालय ही लेगा.
इंदिरा जय सिंह कहती हैं, "दिल्ली उच्च न्यायालय में केंद्र सरकार के दृष्टिकोण को देखते हुए, मुझे नहीं लगता कि सरकार वैवाहिक बलात्कार को अपराधीकरण करने का इच्छुक है. सरकार इसे चुनौती दे सकती है."
संयोग से, जस्टिस नागप्रसन्ना वही न्यायाधीश हैं जिन्होंने कुछ महीने पहले फ़ैसला सुनाया था जिसमें उन्होंने अनुकंपा के आधार पर रोज़गार पाने के लिए सरकारी कर्मचारी की विवाहित बेटी को बेटे के समान ही पात्र बताया था.
दुरुपयोग की आशंका भी
जहां एक पक्ष कोर्ट में आए इस फैसले को प्रगतिशील मान रहा है वहीं दूसरा पक्ष इसके दुरूपयोग की बात भी कर रहा है. जब दिल्ली हाई कोर्ट में इस मामले पर बहस चल रही थी उस दौरान भी #MarriageStrike भी ट्रेंड हुआ था.
साथ ही लोगों का कहना था कि 498ए ( भारतीय दंड संहिता में दहेज के लिए उत्पीड़न के मामलों के लिए धारा) के दुरुपयोग के मामले भी सामने आते हैं ऐसे में अगर ऐसा कोई क़ानून आता है इस तरह के मामलों की तादाद बढ़ सकती है.
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