मिलिए इन विधानसभा चुनावों में पहली बार जीतने वाली पांच महिलाओं से

- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में से चार में बीजेपी और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने बहुमत हासिल किया है.
इन चुनावों में राजनीतिक दलों ने देश की आधी आबादी यानी महिलाओं के लिए अपने-अपने घोषणा पत्रों में कई वायदे किए.
बात अगर विधानसभा चुनाव में जीतने वाली महिलाओं की संख्या की करें तो उत्तर प्रदेश में ये 47 है. वहीं पंजाब में 13 महिलाएं जीत कर विधानसभा पहुंची हैं.
हालांकि पिछली बार की तुलना में उत्तर प्रदेश में विधानसभा पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या में कमी आई है.
विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से कुछ ऐसी भी महिलाएं हैं जो पहली बार चुनावी मैदान में उतरीं और जीत हासिल कीं.
आज हम उन पांच महिलाओं की बात कर रहे हैं जो पहली बार चुनावी महासमर में अपने किस्मत की आजमाइश कर रही थीं और उन्होंने न केवल जीत हासिल की बल्कि जिन प्रत्याशियों को हराया उसने भी सुर्खियां बटोंरी.
आइए मिलते हैं ऐसी ही पांच महिला विधायकों से-
डॉ.पल्लवी पटेल

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सपा पार्टी से कौशांबी की सिराथू सीट पर चुनाव लड़ने वाली डॉ. पल्लवी पटेल का ये पहला चुनाव था.
उन्होंने बीजेपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को 7337 मतों से हराया. हालांकि मतों का अंतर ज़्यादा नहीं है लेकिन सपा पार्टी के नेता अखिलेश यादव का पल्लवी पटेल को लड़ाने का फैसला काम आया और वहां साइकिल ने सबको पीछे छोड़ दिया.
कौशांबी से पत्रकार मोहम्मद बाक़र कहते हैं कि पल्लवी की उम्मीदवारी से लेकर प्रचार 14 दिन का रहा और वे लोगों से मुख्य मुद्दों पर बातचीत करती दिखती थीं जबकि डिप्टी सीएम जनसभा में बड़े वायदे करके चले जाते थे.
स्थानीय लोगों के खेतीबाड़ी बचाने, रोज़गार और महंगाई जैसे मुद्दे किसी भी बीजेपी के दिग्गज नेताओं ने नहीं उठाए जबकि हाईवे बनाने और वहां प्लेन उतारे जाने, ब्रिज बना दिए जाने जैसे बयान दिए गए जिनसे आम लोगों का सरोकार नहीं दिखा.
जानकारी के मुताबिक डॉ. पल्लवी पटेल बायो-टेक्नोलॉजी में स्नातक हैं.
पल्लवी पटेल के पिता सोनेलाल पटेल थे जो अपना दल पार्टी के संस्थापक थे. उनके निधन के बाद पत्नी कृष्णा पटेल अपना दल की मुखिया बनीं.
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इसके बाद पल्लवी पटेल को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया लेकिन परिवार में इसका विरोध हुआ और पार्टी दो धड़ों में बंट गई. अब पल्लवी पटेल अपना दल (कमेरावादी) की उपाध्यक्ष हैं और उनकी छोटी बहन अनुप्रिया पटेल अपना दल (एस) से नेता हैं जो बीजेपी के साथ गठबंधन में शामिल है.
पत्रकार मोहम्मद बाक़र कहते हैं, ''उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य अपने चुनाव प्रचार में ख़ुद को सिराथू (कौशांबी की सीट) का बेटा बताते थे लेकिन आम जनता को नहीं पहचानते थे साथ ही क्षेत्र में सरकारी ठेकों की भी बात सामने आ रही थी जिससे लोग नाराज़ थे. ऐसे में उन्होंने अखिलेश पर भरोसा दिखाते हुए पल्लवी को अपना वोट देना पसंद किया.''
बेबी रानी मौर्य

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आगरा ग्रामीण से चुनाव लड़ने वाली बेबी रानी मौर्य के चुनावी मैदान में क़दम रखते ही बीजेपी ने उनके नाम के पीछे जाटव लगाने की रणनीति अपनाई.
आगरा ग्रामीण एक सुरक्षित सीट है और पार्टी का इसके पीछे मक़सद साफ़ था कि लोगों में ये संदेश जाए कि वे दलित हैं ताकि इलाके के दलित वोटों को साधा जा सके.
उन्होंने बसपा की किरण प्रभा केशरी को 76,608 मतों से शिकस्त दी.
स्थानीय पत्रकार नसीम अहमद कहते हैं कि इसी क्षेत्र से बीजेपी की विधायक रह चुकीं हेमलता दिवाकर कुशवाहा से लोग ख़ासे नाराज़ थे. ऐसे में बेबी रानी मौर्य की जीत को अप्रत्याशित कहा जा सकता है.
उनके अनुसार, ''वे जहां-जहां जाती थीं वहां लगे बैनर में उनके नाम के पीछे जाटव लिखा होता था और पार्टी ने उन्हें अपने दलित चेहरे की तरह पेश किया. चुनावी मैदान में उतरने के बाद से ही वे काफ़ी आत्मविश्वास से भरी हुईं थीं.''
वे मेयर रह चुकी हैं, बीजेपी में कई पदों पर रहीं, उत्तराखंड की राज्यपाल बनीं और फिर उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया.
ऐसी चर्चाएं तेज़ है कि उन्हें उप मुख्यमंत्री या विधानसभा अध्यक्ष बनाया जा सकता है. लेकिन ऐसी भी बातें सामने आ रही हैं कि गर्वनर के पद के बाद विधायक का पद उनका डिमोशन नहीं हैं?
महाराजी प्रजापति

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अमेठी विधानसभा सीट चुनाव जीतने वाली महाराजी प्रजापति की पहचान उनके पति से है तो कहना ग़लत नहीं होगा.
उनके पति गायत्री प्रजापति सपा के संस्थापक रहे मुलायम सिंह और शिवपाल यादव के नज़दीकी माने जाते हैं.
उनपर भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं और कथित बलात्कार के मामले में जेल में बंद हैं.
महाराजी प्रजापति एक गृहणी हैं और उन्होंने पहली बार सपा से चुनाव लड़ा और बीजेपी के डॉ संजय सिंह को 18,096 वोटों से हरा दिया.
जनसभाओं में वे अपनी दो बेटियों के साथ नज़र आती थीं और कम ही बोलती थीं. उनकी जीत की वजह सहानुभूति वोट बताया जा रहा है.
स्थानीय पत्रकार क़मर महमूद बताते हैं, ''महाराजी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं, उन्हें राजनीति और जनसभा में भाषण देने का अनुभव कम ही है. ज्यादातर जनसभाओं में ये देखा गया कि वे दो वकतव्य देकर रोने लगती थीं और फिर उनकी बेटियां उनसे लिपट जाती थीं और इन जनसभाओं में लोग भी भावुक हो जाते थे. शायद यही उनकी जीत का यही बड़ा फैक्टर बना.''

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गायत्री प्रजापति के बारे में लोगों की ये आम धारणा रही है कि वे लोगों की मदद करते थे और यही जनता से उनके जुड़ाव का मुख्य कारण बना.
ऐसे में सपा के नेता अखिलेश यादव की रैलियों में उमड़ी भीड़ से लोगों को सपा की लहर दिखाई दी और इससे आस जगी कि अगर वो विधायक बनेंगी तो गायत्री प्रजापति भी जेल से बाहर आ जाएंगे और फिर मदद मिलने लगेगी.
इधर बीजेपी की तरफ़ से चुनाव लड़े डॉ संजय सिंह की छवि भी इलाके में बहुत अच्छी रही है. लेकिन ये बताया जा रहा है कि संगठन से उन्हें सहयोग नहीं मिला जो उनकी हार का मुख्य कारण बना.
जीवनजोत कौर

आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार जीवनजोत ने अमृतसर पूर्व सीट से पहली बार चुनाव लड़ा और जीतीं.
क़रीब 20 साल से ज्यादा सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहीं जीवनजोत की जीत इस मायने में ख़ास बताई जा सकती है कि उनके सामने दो दिग्गज नेता नवजोत सिंह सिद्धू और शिरोमणि अकाली दल के विक्रम सिंह मजीठिया थे.
बीबीसी से ख़ास बातचीत में उन्होंने बताया था कि उन्होंने कभी राजनीति में आने के बारे में तो नहीं सोचा था. साथ ही वे मानती हैं कि परिवार के सहयोग के बिना एक महिला का आगे जाना संभव नहीं है.
अपने सामाजिक कार्यों के बारे में वो बताती हैं कि अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान ही उन्होंने स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया था.
साथ ही उन्होंने 'इकोशी' नाम का एक प्रोजेक्ट भी चलाया है जिसके तहत वे रीयूज़ेबल सैनिटरी पैड को बढ़ावा देती है उन्हें पंजाब की पैड वुमन के रूप में भी जानी जाता है.
नरेंद्र कौर भराज

आम आदमी पार्टी के लिए पोलिंग एजेंट का काम करने वालीं नरेंद्र कौर भराज ने कभी नहीं सोचा था कि वे चुनाव लड़ेगी.
समाज के लिए कुछ करने का जज़्बा रखने वाली नरेंद्र कौर पेशे से किसान हैं और उनकी चल-अचल संपति महज़ 24,000 थी. ये जानकारी उन्होंने चुनाव लड़ने से पहले चुनाव आयोग को दी थी.
क़ानून की पढ़ाई कर रहीं नरेंद्र कौर ने साल 2014 में आम आदमी के साथ एक कार्यकर्ता के तौर पर अपना सफ़र शुरू किया और वो तब से लेकर पार्टी के लिए लोगों के बीच काम करती रही हैं.
बीबीसी से उन्होंने कहा था, "मुझे नहीं पता कि पार्टी ने मुझे अपना उम्मीदवार क्यों और कैसे चुना? मैं बस इतना जानती हूं कि मैं पार्टी के लिए काम कर रही थी."
संगरूर विधानसभा क्षेत्र से नरेंद्र कौर भराज ने विजय इंदर सिंगला को हराया जो कांग्रेस पार्टी से अब तक विधायक थे और पार्टी के दिग्गज नेताओं में उनकी गिनती होती है.
पंजाब विधानसभा चुनाव 2022 में आम आदमी पार्टी ने 92 सीटों पर जीत हासिल की है.
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