तेजस्वी अपने पिता के सियासी समीकरण मुस्लिम-यादव से क्या बाहर निकल पाएंगे

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
राष्ट्रीय जनता दल के नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव आरजेडी को ‘माय बाप’ की पार्टी बता रहे हैं.
तेजस्वी की कोशिश अपने पिता लालू प्रसाद यादव के बनाए मुस्लिम-यादव समीकरण से बाहर अपने लिए जगह बनाने की दिखती है.
क़रीब तीन दशक से जो पहचान आरजेडी के साथ साए की तरह नज़र आती है, उससे बाहर निकलने की ज़रूरत तेजस्वी यादव को क्यों पड़ रही है और उनके लिए यह कितना आसान है?
हाल ही में आरजेडी नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव 10 दिनों की राज्य की जन विश्वास यात्रा पर थे.
इस यात्रा में तेजस्वी ने कई बार राष्ट्रीय जनता दल के हर जाति, वर्ग और तबके की पार्टी होने का दावा किया है.
तेजस्वी यादव इसके लिए एक ‘बाप’ का इस्तेमाल करते हैं. बीएएपी यानी बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी (महिलाएँ) और पुअर (ग़रीब) की पार्टी.
तेजस्वी यादव अपने वोट बैंक का दायरा बढ़ाने की कोशिश में दिखते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, “लोकतंत्र में वोट बैंक कोई बुरी चीज़ नहीं हैं. भारत ही नहीं अमेरिका और ब्रिटेन में डेमोक्रेटिक पार्टी और लेबर पार्टी के अपने वोट माने जाते हैं. पहले बीजेपी और नीतीश ने लालू के वोट को तोड़ा था. अब तेजस्वी उनके वोट को तोड़ना चाहते हैं.”
'एम-वाय' की ताक़त

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1990 के दशक की शुरुआत में ही मंडल की राजनीति और पिछड़ों को आरक्षण के मुद्दे पर बिहार में लालू प्रसाद यादव और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव बड़े नेता के दौर पर उभरे थे.
इसी दौर में अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन के दौरान दोनों ही नेताओं ने मुस्लिम वोटरों को भी साधने की कोशिश की.
बाबरी मस्जिद गिराए जाने और देश के कई इलाक़ों में हिंसक घटनाओं के बाद मुस्लिमों का कांग्रेस के प्रति मोहभंग देखा गया था.
सुरूर अहमद कहते हैं, “सच्चाई यह है कि जितना लालू ने नहीं कहा, उससे ज़्यादा लोगों ने उनके साथ 'एम-वाय' को जोड़ दिया था. जबकि लालू का यह समीकरण जितना राजनीतिक था, उससे ज़्यादा एक सामाजिक गठजोड़ था, ताकि लोग एक दूसरे से झगड़ें न.”
बिहार में लालू प्रसाद यादव को इस समीकरण ने इतनी ताक़त दी कि वो साल 1990 और 1995 में लगातार दो बार मुख्यमंत्री बने.
लालू यादव ने जनता दल से निकलकर साल 1997 में आरजेडी की स्थापना की.
आरजेडी को साल 2000 के बिहार विधानसभा चुनावों में भी जीत मिली.
बीएएपी (बाप) की ज़रूरत

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इसी ताक़त ने आरजेडी और तेजस्वी यादव के लिए एक लकीर भी खींच दी और आरजेडी को इन्हीं दो समुदायों की पार्टी के तौर पर देखा जाने लगा.
साल 2005 के बाद बिहार में बीजेपी और जेडीयू के गठबंधन ने आरजेडी की राजनीतिक ताक़त को बड़ा झटका दिया.
एक तरफ नीतीश कुमार ने कुर्मी, पिछड़ी जातियों और महादलित वोटों में सेंध लगाई.
वहीं बीजेपी ने बीते 10 साल में ओबीसी एक बड़े हिस्से को अपने पक्ष में मोड़ा है.
बिहार में आरजेडी, बीजेपी, कांग्रेस, सीपीआई, सीपीआईएम, सीपीआईएमएल और जेडीयू के अलावा कई ऐसे छोटे दल हैं, जो अलग-अलग जाति और वर्ग की राजनीति करते देखे जाते हैं.
इनमें रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के दो धड़े, उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा, जीतन राम मांझी की पार्टी ‘हम’ और मुकेश सहनी की ‘वीआईपी’ शामिल है.
इन सभी दलों की वोटरों के एक हिस्से पर पकड़ दिखती है.
पिछले साल जारी किए गए जातिगत सर्वे के मुताबिक़ बिहार में अत्यंत पिछड़ा वर्ग की आबादी क़रीब 36 फ़ीसदी है.
जबकि पिछड़ा वर्ग 27.12%, अनुसूचित जाति 19.65% और अनारक्षित यानी सवर्ण जातियां क़रीब 15.52% हैं.
इन्हीं आँकड़ों के मुताबिक़ राज्य में मुस्लिम आबादी 17.7%, यादव आबादी क़रीब 14% है.
इसके बावजूद आरजेडी के 'माय' समीकरण में दोनों की हैसियत बराबर नहीं रही है.
इसे आप लोकसभा और विधानसभा चुनाव में आरजेडी से मिलने वाले टिकटों के आधार पर भी समझ सकते हैं.
2019 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी ने बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 19 पर उम्मीदवार उतारे थे. इनमें से आरजेडी ने आठ यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया था और पांच मुसलमानों को.
2015 के विधानसभा चुनाव में भी आरजेडी ने 48 यादवों को टिकट दिया था और इसकी तुलना में महज़ 16 मुसलमानों को उतारा था. आरजेडी में मुसलमानों और यादवों के बीच का यह असंतुलन हमेशा से रहा है. 2020 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने 58 यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया था जो कि कुल उम्मीदवारों का 33 फ़ीसदी था. इसके बरक्स 18 मुस्लिमों को टिकट दिया था.
चुनौती

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चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी किसी न किसी रूप में चुनावी मैदान में दस्तक देने को तैयार दिखते हैं.
ज़ाहिर है कुछ न कुछ असर रखने वाले क़रीब दर्जनभर सियासी दलों की मौजूदगी में तेजस्वी यादव के लिए केवल मुस्लिम-यादव समीकरण पर आगे बढ़ना आसान नहीं है.
पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर का मानना है कि तेजस्वी यादव इस बात को समझते हैं.
उनके मुताबिक़, “लालू प्रसाद यादव ने नारा दिया था ‘भूरा बाल उखाड़ फेंको’. यह नारा सवर्णों के ख़िलाफ़ था और तेजस्वी ने ऐसी पुरानी ग़लती के लिए सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगी है.”

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दरअसल तेजस्वी यादव लंबे समय से राष्ट्रीय जनता दल को 'ए टू ज़ेड' यानी हर तबके की पार्टी बताने की कोशिश कर रहे हैं.
तेजस्वी ने एक और कोशिश की है कि उन्होंने अपनी भाषा को संयमित रखा है.
नीतीश कुमार के महागठबंधन से अलग होने के बाद भी तेजस्वी अक्सर उनको चाचाजी कहते सुने जाते हैं.
जबकि विधानसभा से लेकर सार्वजनिक रैलियों में भी वो लालू के ठेठ देशी अंदाज़ से अलग व्यवहार करते दिखते हैं.
हालाँकि अब भी तेजस्वी को सबसे बड़ा समर्थन मुस्लिमों और यादवों का ही दिखता है.
तेजस्वी की जन विश्वास यात्रा के दौरान भी कई शहरों में यह समर्थन खुलकर देखने को मिला है.
कितने सफल दिखते हैं तेजस्वी यादव

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डीएम दिवाकर मानते हैं कि नीतीश के अलग होने के बाद मुस्लिमों के लिए कोई अन्य रास्ता नहीं है और लालू यादव ख़ुद यादवों के जन नेता हैं.
इसलिए यह समर्थन उनके साथ रहेगा ही. फिर भी तेजस्वी यादव लालू की विरासत से आगे निकल चुके हैं और ज़्यादा परिपक्व व्यवहार कर रहे हैं.
उनका कहना है, “भले नीतीश इनकार करें, लेकिन ललन सिंह आरजेडी के क़रीब आ रहे थे, जो दिखाता है कि आरजेडी का दायरा बढ़ा है. तेजस्वी ने जातिगत गणना के मुद्दे पर पिछड़ों को साधने की कोशिश की है और रोज़गार के मुद्दे पर बाक़ी सभी वर्गों को.”
भूमिहार बिरादरी से ताल्लुक़ रखने वाले राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह पिछले साल तक जेडीयू के अध्यक्ष थे.
बीजेपी ने भी यह आरोप लगाया था कि नीतीश ने आरजेडी से क़रीबी की वजह से ललन सिंह को अध्यक्ष के पद से हटाया था.
सुरूर अहमद कहते हैं, “अब समय काफ़ी बदल चुका है. बिहार के पिछले विधानसभा चुनावों में महागठबंधन के क़रीब 20 भूमिहार उम्मीदवार चुनाव जीते थे, जो बताता है कि तेजस्वी की स्वीकार्यता मुस्लिम और यादवों से आगे बढ़ी है.”
हालाँकि उनका मानना है कि तेजस्वी को अब तक जो सफलता मिली है वह विधानसभा तक ही सीमित है, लोकसभा चुनावों के परिणाम के बाद ही पता लग पाएगा कि तेजस्वी यादव अपनी रणनीति में कितने कामयाब हो पाए हैं.
रोज़गार का मुद्दा

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उनका मानना है कि राम मंदिर बनने से अयोध्या का मुद्दा भी ख़त्म हो चुका है और सबको आगे के बारे में सोचना है.
तेजस्वी यादव ने बिहार में नौकरी भी दी है, इसलिए लोग उनकी तरफ देख रहे हैं.
बीजेपी के केवल पाँच फ़ीसदी सवर्ण वोटर वोट देने न निकलें तो यह भी तेजस्वी की जीत होगी.
बिहार में पिछली महागठबंधन सरकार के दौरान क़रीब पाँच लाख़ सरकारी नौकरी देने का श्रेय तेजस्वी यादव ख़ुद को देते हैं, जबकि नीतीश कुमार की जेडीयू भी इसका श्रेय लेने की कोशिश करती है.
आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी दावा करते हैं, “तेजस्वी के साथ 'एम-वाय' समीकरण हमेशा रहेगा. लेकिन विश्वास मत के दौरान तेजस्वी ने जो भाषण दिया उससे तेजस्वी का क़द काफ़ी बढ़ा है. भले ही मुस्लिम-यादव ज़्यादा हों लेकिन तेजस्वी की सभा में हर जाति के युवा शामिल हो रहे हैं.”

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बिहार में महागठबंधन की सरकार के दौरान जिस पैमाने पर सरकारी नौकरी दी गई, वैसा नीतीश के कार्यकाल में पहले कभी नहीं हुआ था.
इस लिहाज से तेजस्वी यादव बिहार में हर वर्ग के लिए रोज़गार को मुद्दा बनाने में सफल दिखते हैं.
फिर भी बिहार में तेजस्वी यादव या आरजेडी को लोग आमतौर पर राज्य सरकार से जोड़कर देखते हैं.
इसलिए तेजस्वी यादव की अपील का लोकसभा चुनावों पर कतना असर होगा यह बता पाना आसान नहीं होगा.
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