नीतीश कुमार आठ मंत्रियों से ही क्यों चला रहे हैं काम, क्यों नहीं कर पा रहे हैं मंत्रिमंडल का विस्तार

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का साथ छोड़ने के बाद नीतीश कुमार ने 28 जनवरी को बीजेपी के साथ सरकार बनाई थी.
नीतीश कुमार के शपथ लिए क़रीब 30 दिन हो गए लेकिन अभी तक अपने मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर पाए हैं.
ऐसे में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. नीतीश कुमार न केवल गठबंधन को लेकर जूझ रहे हैं बल्कि अपनी पार्टी के भीतर भी कई मोर्चों पर जूझ रहे हैं.
अभी बिहार की नई सरकार में नीतीश कुमार को मिलाकर कुल 9 मंत्री शामिल हैं.
माना जा रहा था कि शपथ ग्रहण के बाद कुछ ही दिनों में ही नीतीश कुमार मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे.
दरअसल, बीजेपी के साथ नीतीश की यह पारी कई चुनौतियों से भरी हुई मानी जाती है.
इस बार नीतीश कुमार का बीजेपी के साथ आना बहुत सामान्य नहीं है. नीतीश जब भी एनडीए में दोबारा आए हैं और ज़्यादा कमज़ोर होकर आए हैं.
कई लोग मानते हैं कि बिहार में बीजेपी की नई राजनीति और उसकी अपनी सरकार बनाने की मंशा नीतीश कुमार को असहज कर रही है. इससे दोनों सहयोगियों के बीच वह भरोसा नहीं बन पा रहा है जो पहले हुआ करता था.
नीतीश कुमार भले सीएम की कुर्सी पर हैं लेकिन उन्हें पता है कि ज़्यादा विधायक बीजेपी के पास हैं.
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव नीतीश कुमार को लेकर तीखे बयान देने से बच रहे हैं और लालू प्रसाद यादव नीतीश के लिए अपना दरवाज़ा हमेशा खुला बता रहे हैं.
लेकिन ऐसा नहीं है कि नीतीश कुमार को केवल इन असहज हालात ने मंत्रिमंडल का विस्तार करने से रोका है.

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‘लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव हो’
संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक़ बिहार सरकार में अधिकतम 36 मंत्री बनाए जा सकते हैं.
यानी राज्य में अभी 27 मंत्रियों की कुर्सी ख़ाली है. इसमें सरकार की सबसे बड़ी साझेदार यानी बीजेपी का भी बड़ा कोटा होगा और जेडीयू का.
वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी मानते हैं, “नीतीश मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं करेंगे. वो लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने का दबाव बना रहे हैं. उन्हें डर है कि बीजेपी लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें परेशान करेगी.”
कन्हैया भेलारी कहते हैं कि नीतीश का बीजेपी से इसी बात पर समझौता हुआ था कि बिहार विधानसभा भंग कर लोकसभा के साथ बिहार विधानसभा का चुनाव कराया जाएगा.
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माना जाता है कि नीतीश कुमार ने 'महागठबंधन' के सामने भी यही प्रस्ताव रखा था, जिसके लिए आरजेडी तैयार नहीं हुई थी.
तेजस्वी यादव अपनी ‘जन विश्वास यात्रा’ में भी इसका ज़िक्र कर चुके हैं कि नीतीश कुमार विधानसभा भंग कराना चाहते थे. तेजस्वी का दावा है कि कोई विधायक समय से पहले चुनाव कराने के लिए तैयार नहीं था.
दरअसल, नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी परेशानी विधानसभा में उनके दल की ताक़त है.
243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में नीतीश के पास महज़ 45 विधायक हैं. वो विधानसभा में अपनी ताक़त बढ़ाना चाहते हैं.
नीतीश कुमार को लगता है कि बिहार में पिछले साल जारी हुए जातिगत सर्वे की वजह से उनको जनता का समर्थन मिलेगा और विधानसभा में उनकी पार्टी की ताक़त बढ़ सकती है.
'जेडीयू में टूट की आशंका'

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वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण का मानना है कि बीजेपी को इसके उलट यह डर है कि नीतीश 20 साल से सत्ता में हैं और दोनों चुनाव एक साथ हुए तो कहीं बीजेपी को नीतीश के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर का नुक़सान लोकसभा चुनाव में न उठाना पड़े.
नीतीश कुमार ने महज़ 45 विधायकों की ताक़त के साथ बिहार की पिछली सरकार का नेतृत्व भी किया और अब एनडीए सरकार में भी वही मुख्यमंत्री हैं. नीतीश हमेशा अपनी शर्तों पर सरकार चलाने वाले माने जाते हैं.
ऐसे में नीतीश की ताक़त बढ़ने से सरकार में अन्य सहयोगी के लिए नीतीश को किसी बात पर राज़ी कर पाना आसान नहीं होगा. वहीं नीतीश के बार-बार पाला बदलने की वजह से कोई भी सहयोगी दल ख़ुद को कमज़ोर कर उनकी ताक़त नहीं बढ़ाना चाहेगा.
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नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के बारे में कहा जाता है कि इस पार्टी को नौकरशाह चलाते हैं. कई विश्लेषकों का मानना है कि जब तक नीतीश सत्ता में हैं तब तक जेडीयू है. सरकार से हटते ही उनकी पार्टी अस्थिर हो सकती है.
कइयों का मानना है कि नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं करने के पीछे एक बड़ी वजह उनकी पार्टी में टूट की आशंका भी है. नीतीश कुमार पर यह आरोप लगता है कि वो हर बार अपनी पार्टी के कुछ चुनिंदा चेहरों को ही मंत्री बनाते हैं.
ऐसे में जेडीयू के कई विधायक मंत्रिमंडल में जगह चाहते हैं. यह भी माना जाता है कि नीतीश कुमार अपनी सियासी पारी के अंतिम दौर में हैं और जेडीयू के विधायकों को मंत्री बनने का यह अंतिम मौक़ा दिखता है.

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विधान परिषद चुनाव
इसलिए मंत्रिमंडल में जगह पाने के लिए जेडीयू में ही कई दावेदार सामने आ सकते हैं. यह भी संभावना जताई जाती है कि मंत्रिमंडल के विस्तार के साथ ही जनता दल यूनाइटेड में बड़ी बग़ावत भी हो सकती है.
नीतीश कुमार को इस बग़ावत के संकेत इसी महीने 12 फ़रवरी को ही मिल गए थे, जब नीतीश सरकार का विधानसभा में फ़्लोर टेस्ट हो रहा था.
नचिकेता नारायण कहते हैं, “ऐसा नहीं है कि 9 मंत्रियों के सहारे सरकार नहीं चल सकती है. अब केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक में ताक़त शीर्ष नेतृत्व के पास होता है. केवल सम्मान देने के लिए अन्य मंत्री बनाए जाते हैं, कई बार तो उन्हें फ़ीता काटने तक का मौक़ा नहीं मिलता.”
नचिकेता नारायण का मानना है कि अगर ऐसी स्थिति में भी मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं हो पा रहा है तो ज़ाहिर है इसके पीछे कुछ वजहें हैं और नीतीश को जेडीयू में टूट का ख़तरा दिखता है.
बिहार में चल रही इस असमंजस के बीच चुनाव आयोग ने बिहार विधान परिषद की 11 सीटों के चुनाव के लिए अधिसूचना जारी कर दी है. इसमें ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सीट भी शामिल है.
इस चुनाव के लिए 21 मार्च को विधायकों को ही वोटिंग करनी है. माना जाता है कि बिहार में मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं होने के पीछे एक वजह यह भी है.
भले ही नीतीश की अपनी जीत सुनिश्चित हो लेकिन अगर कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी तो अन्य सीटों पर इसका असर हो सकता है.
संभावनाओं के बीच नीतीश कुमार

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नचिकेता नारायण का मानना है कि मंत्रिमंडल के विस्तार को टालकर नीतीश कुमार इस तरह के किसी भी ख़तरे को टालना चाहते हैं.
उनका कहना है, “इस ख़तरे को ऐसे समझ सकते हैं कि फ़्लोर टेस्ट के वक़्त ख़ुद जेडीयू के विधायक सुधांशु शेखर ने अपनी ही पार्टी के नेताओं पर हॉर्स ट्रेडिंग को लेकर एफ़आईआर करवाई थी. इसमें जेडीयू के विधायक डॉक्टर संजीव का नाम शामिल था.”
जेडीयू एमएलए बीमा भारती को लेकर लंबे समय से ख़बर है कि वो अपनी पार्टी से नाराज़ हैं, जबकि एक अन्य विधायक दिलीप कुमार राय तो फ़्लोर टेस्ट में पहुँचे ही नहीं थे. यानी मंत्रिमंडल के विस्तार की बात पर ऐसी नाराज़गी कुछ अन्य विधायकों में भी दिख सकती है.
हालाँकि अपने ही विधायकों की नाराज़गी का यह ख़तरा बीजेपी को भी दिखता है. बिहार विधानसभा में फ़्लोर टेस्ट के दिन ही तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था.
उस दौरान अपने अनुपस्थित विधायकों के लेकर बिहार बीजेपी के अध्यक्ष और नीतीश सरकार में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने यहाँ तक कहा था कि जो विधायक गायब हुए हैं, उनका एक-एक कर इलाज करूँगा.
इसी सियासी असमंजस के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो मार्च को बिहार के दौरे पर आ रहे हैं. ख़बरों के मुताबिक़ वो औरंगाबाद और बेगूसराय में जनसभा भी करेंगे.
बिहार में आसान नहीं हैं सीटों का बँटवारा

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वहीं तीन मार्च को राजधानी पटना में विपक्षी ‘महागठबंधन’ की रैली भी होनी है. इसमें आरजेडी के अलावा कांग्रेस और वाम दल भी शामिल होंगे.
वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी कहते हैं, “ख़बरे हैं कि नीतीश कुमार ख़ुद मोदी की सभा में शामिल नहीं होंगे. नीतीश कुछ भी कर सकते हैं. हो सकता है कि वो तीन तारीख़ की महागठबंधन की सभा में राहुल गाँधी के साथ पहुँच जाएँ और कहें कि ग़लती हो गई थी.”
बिहार में एनडीए में सियासी असमंजस के पीछे कही तरह की वजहें गिनाई जाती हैं. राज्य में एनडीए में बीजेपी और जेडीयू के अलावा जीतन राम मांझी की पार्टी, उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी, चिराग पासवान के नेतृत्व में एलजेपी एक धड़ा और पशुपति पारस के नेतृत्व में दूसरा धड़ा शामिल है.
इसके अलावा मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी की भी बीजेपी से बातचीत की भी ख़बरें हैं. लोकसभा चुनावों के लिए राज्य की 40 सीटों का बँटवारा इन सभी दलों के बीच होना है. जबकि यहाँ 17 सीटों पर बीजेपी और 16 पर जेडीयू का कब्जा है.
यानी बिहार में एनडीए के लिए सीटों का बँटवारा भी आसान नहीं होगा. लेकिन इस मसले पर सार्वजनिक तौर पर अब तक कोई भी ख़बर सामने नहीं आई है.
संभावना यह भी जताई जाती है कि सीटों के बँटवारे के मुद्दे पर एनडीए के छोटे दलों और ऐसे सांसदों की नाराज़गी भी सामने आ सकती है, जिनकी सीट किसी अन्य पार्टी के खाते में जा रही हो.
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