नवीन पटनायकः भारत के दूसरे सबसे लंबे समय तक रहे सीएम की विदाई

नवीन पटनायक

इमेज स्रोत, ANI

    • Author, संपद पटनायक
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

बीते 24 साल तक चुनावों में अजेय रहने वाले नवीन पटनायक को ओडिशा में भारी हार का सामना करना पड़ा है.

वो उस बीजेपी से हार गए, जिसने 90 दशक में ओडिशा की राजनीति में उनके प्रवेश का समर्थन किया था.

ओडिशा में लोकसभा के साथ कराए गए विधानसभा चुनावों के नतीजों में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला है.

उसे विधानसभा की 147 सीटों में 78 और लोकसभा की 21 सीटों में 20 पर जीत मिली हुई है. अब पार्टी पहली बार इस प्रदेश में अपनी सरकार बनाएगी.

बीजेपी ने उन नवीन पटनायक को सत्ता से बेदखल किया है, जिन्होंने राज्य में 24 साल तक निर्बाध शासन किया और लगातार पाँच बार विधानसभा के चुनाव जीते.

नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल ने विधानसभा चुनावों में 51 सीटों पर जीत दर्ज की और लोकसभा में शून्य पर रही.

नवीन बाबू ख़ुद उन दो सीटों में से एक पर हार गए, जहाँ उन्होंने चुनाव लड़ा था. साल 2019 में बीजेडी ने 117 विधानसभा सीटें और 12 लोकसभा सीटें जीती थीं.

नवीन कैसे हार गए ओडिशा

ओडिशा चुनाव

इमेज स्रोत, ANI

साल 2008 में बीजेपी, बीजेडी से अलग हो गई थी और उसके बाद कई सालों तक उसे कोई ख़ास क़ामयाबी नहीं मिली. लेकिन 2019 में उसने ओडिशा में लोकसभा की 8 सीटें जीतीं.

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

जबकि एक साथ कराए गए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 23 सीटें मिलीं और कांग्रेस को तीसरे नंबर पर धकेलते हुए प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी.

इस बात को ध्यान में रखते हुए नवीन पटनायक ने अपने पांचवें कार्यकाल में सांस्कृतिक राजनीति का सहारा लेना शुरू किया.

इस बात का अहसास करते हुए कि छोटे कस्बों और शहरों में आकांक्षी और युवा मतदाताओं का एक वर्ग बीजेपी का समर्थन कर रहा है, नवीन ने कल्याणकारी स्कीमों से आगे देखना शुरू किया, जो कि उनकी राजनीतिक का केंद्र बन गया था.

मतदाताओं के इस नए वर्ग को साथ लाने के लिए, बीजेडी सरकार ने ओडिशा को भारत का एक स्पोर्ट्स कैपिटल के रूप में पेश करने की कोशिश की. क्रिकेट से परे अन्य खेलों को बढ़ावा दिया जैसे कि हॉकी वॉलीबाल और बैडमिंटन.

राज्य सरकार पुरुष और महिला नेशनल हॉकी टीमों को प्रायोजित करती रही है. इसने राज्य में बड़े धूमधाम और दिखावे के साथ दो हॉकी वर्ल्ड कप सिरीज़ का भी आयोजन किया.

अयोध्या में राम मंदिर निर्णाण के बाद बीजेपी के प्रति बढ़ते झुकाव का मुक़ाबला करने के लिए बीजेडी सरकार ने पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर के आसपास एक हेरिटेज कॉरिडोर का निर्माण कराया. साथ ही पूरे ओडिशा में सभी प्रमुख मंदिरों का जीर्णोद्धार और सौंदैर्यीकरण कराया.

इस साल के शुरू में राज्य सरकार ने राज्य के साहित्य और साहित्यकारों को सम्मानित करने के लिए पहला विश्व ओड़िया भाषा सम्मेलन आयोजित किया.

सरकार ने बड़े पैमाने पर सरकारी स्कूलों के इनफ़्रास्ट्रक्चर, बस सेवाओं, टर्मिनल और अस्पतालों के आधुनिकरण का काम भी शुरू कराया.

हालांकि उनके एक रणनीतिक चूक हो गई. कोई भी राजनेता इन परियोजनाओं की निगरानी करते हुए खुद श्रेय लेता लेकिन नवीन ने सब कुछ अपने प्रमुख सहयोगी और नौकरशाह वीके पांडियन को सौंप दिया, जो प्रशासन का चेहरा बन गए और अंत में सीएम से भी अधिक ताक़तवर दिखाई दिए.

बीबीसी
इमेज कैप्शन, बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

नवीन ऐसे राजनेता हैं, जो अपने आसपास किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की इजाज़त नहीं देते. उन्होंने हमेशा ही अपने प्रशासन का सार्वजनिक चेहरा बनने के लिए नौकरशाहों पर भरोसा किया.

जब वो पहली बार सत्ता में आए, नवीन के दाएं हाथ थे, पूर्व नौकरशाह प्यारी मोहन मोहपात्रा, जिन्होंने 12 साल तक वफ़ादारी से सेवा करते हुए सीएम के ख़िलाफ़ तख़्तापलट की कोशिश की थी.

तख़्तापलट की कोशिश फ़ेल हो गई और नवीन पटनायक ने उन्हें राजनीतिक वनवास में भेज दिया.

ये देखते हुए कि राजनीति में आया ओड़िया नौकरशाह भी उनकी गद्दी छीन सकता था, उन्होंने एक ग़ैर ओड़िया आईएएस अफ़सर वीके पांडियन को चुना.

इस फैसले ने छोटे छोटे असंतोषों की एक पूरी श्रृंखला की शुरुआत की, जिसकी क़ीमत नवीन को अपना मुख्यमंत्री पद गंवाकर चुकानी पड़ी.

पिछले एक दशक में सरकार और पार्टी में पांडियन का दबदबा बढ़ता रहा, जिसके कारण विपक्ष को ये कहने का मौका मिला कि वही प्रशासन के असली मुखिया हैं.

जब पांडियन ने सेवा से इस्तीफ़ा दिया, बीजेडी में शामिल हुए और 2024 चुनावों में प्रचार करना शुरू किया तो बीजेपी ने अपने प्रचार अभियान का उन्हें ही केंद्रीय मुद्दा बना दिया.

बीजेपी का कहना था कि तमिलनाडु के होने के बावजूद पांडियन संभवतः नवीन के बाद सीएम बनेंगे, यह ओड़िया अस्मिता का अपमान है.

यहां तक कि पीएम मोदी ने ओडिशा में अपने कुछ भाषणों में सीधे इस मुद्दे का ज़िक्र किया. नवीन को एक साक्षात्कार में स्पष्टीकरण देने पड़ा कि पांडियन उनके उत्तराधिकारी नहीं बनने जा रहे हैं.

लेकिन यह सफ़ाई थोड़ी देर से आई. नवीन पटनायक की हार का प्रमुख कारण केवल पांडियन नहीं हैं, बल्कि तमिल पहचान वो झटका था जिसने नवीन के ओडिशा के किले को ढहा दिया.

प्रशासनिक खामियां- शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोज़गारी

बीजू स्वास्थ्य कल्याण योजना के तहत स्मार्ट हेल्थ कार्ड का वितरण, नवंबर 2021.

इमेज स्रोत, ANI

इमेज कैप्शन, बीजू स्वास्थ्य कल्याण योजना के तहत स्मार्ट हेल्थ कार्ड का वितरण, नवंबर 2021.

शिक्षा और स्वास्थ्य में बीजेडी सरकार का रिकॉर्ड कथित रूप से बहुत अच्छा नहीं रहा.

संसद में केंद्र सरकार की ओर से पेश आंकड़ों के अनुसार, 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों के मामले में ओडिशा शीर्ष राज्य है. 2021-22 में राष्ट्रीय औसत 20.6% था जबकि ओडिशा की दर 49.9% थी.

हालांकि पिछले पांच साल में सरकार ने सरकारी स्कूलों को सुधारने की महात्वाकांक्षी शुरुआत की लेकिन स्मार्ट क्लासरूम और उपकरण अध्यापकों की कमी और शिक्षा की ख़राब गुणवत्ता की कमी को पूरा नहीं कर सकता.

केंद्र के आयुष्यमान भारत को काउंटर करने के लिए बीजेडी सरकार ने लगभग सभी के लिए बीजू स्वास्थ्य कल्याण योजना जैसी स्वास्थ्य बीमा प्रोग्राम की शुरुआत की.

हालांकि रिपोर्टों में यह योजना सफ़ल है लेकिन राज्य स्तर के अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में अच्छे डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को यह योजना पूरा नहीं कर सकती.

पूरे प्रदेश में प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य व्यवस्था की बुरी हालत है.

कम रोज़गार चिंता का विषय बना हुआ है. आईएलओ और इंस्टीट्यूट ऑफ़ ह्यूमन डेवलपमेंट की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में शिक्षित युवाओं में सर्वाधिक बेरोज़गारी है.

बीजेडी सरकार ने श्रम केंद्रित आर्थिक गतिविधियों के लिए सुविधा नहीं दी, जैसे कि टेक्सटाइल उद्योग और फ़ूड प्रोसेसिंग.

प्रशासन की इन ख़ामियों के अलावा खनन और चिट फ़ंड में भ्रष्टाचार के बढ़ते आरोपों, स्थानीय नेताओं की गुंडागर्दी और कल्याणकारी योजनाओं में निष्पक्ष आवंटन में विफलता ने बीजेडी के ख़िलाफ़ 24 साल से जमा हो रही सत्ता विरोधी लहर को और मजबूत किया.

हालांकि नवीन की निजी लोकप्रियता पार्टी और सरकार के ख़िलाफ़ असंतोष पर काबू पाने में कामयाब रही.

नवीनः ओडिशा में बीजेपी के प्रवेश की चाबी

इंदिरा गांधी के साथ बीजू पटनायक

इमेज स्रोत, BJDODISHA.ORG.IN

सन 2000 तक बीजेपी को ओडिशा में शासन का मौका नहीं मिला था. उसके बाद से लेकर 2009 तक उसने बीजेडी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार चलाई.

तब अटल बिहारी वाजपेयी और एलके आडवाणी की अगुवाई वाली बीजेपी ने कई कारणों से नवीन पटनायक को गठबंधन का पार्टनर बनाया. वो बीजू पटनायाक के बेटे थे, जिनका कद ओड़िया लोगों में एक कल्ट बन गया था.

पायलट के रूप में वो कई संघर्ष वाले देशों में बचाव मिशन पर जा चुके थे, जैसे इंडोनेनशिया. बीजू बाबू के प्रति लोगों में उत्सुकता थी.

औद्योगिकरण के मार्फ़त ओडिशा की अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाने की उनकी कोशिशों को शिक्षित ओड़िया लोगों की ओर से सराहना मिली.

केवल सात साल तक सीएम रहने के बावजूद बीजू बाबू के व्यवहार और दिलेरी ने लोगों के बीच प्यार और प्रशंसा दिलाई.

ओडिशा के इतिहास में उनके अलावा ऐसा कोई सीएम नहीं रहा जिसके किस्से आज भी जनता के बीच बड़े प्यार से सुनाए जाते हों.

बीजू पटनायक कांग्रेस के कद्दावर नेता थे. वो जवाहरलाल नेहरू के पसंदीदा थे. लेकिन इंदिरा गांधी के ज़माने में पार्टी से अलग हो गए और ओडिशा में कांग्रेस विरोधी राजनीति की धुरी बन गए.

उन्होंने कांग्रेस को हराया और 1990 से 1995 के बीच मुख्यमंत्री रहे. कुर्सी से हटने के दो साल बाद जब 1997 में बीजू बाबू का देहांत हुआ उनके अंतिम संस्कार में उमड़ी भीड़ को देख दिल्ली के राजनीतिक लोग हैरान रह गए.

जल्द ही बीजू जनता दल का गठन हुआ और नवीन पटनायक पार्टी का चेहरा बने. बीजू पटनायक ने अपनी ज़िंदगी में कभी भी अपने बच्चों को राजनीति में करियर बनाने को प्रोत्साहित नहीं किया.

साल 2008 में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के मारे जाने के बाद हुए कंधमाल दंगे में कई ईसाई लोग मारे गए थे, जिसके बाद बीजेडी-बीजेपी गठबंधन में दरार पड़ गई.

इसके बाद बीजेडी ने अकेले दम पर 2009, 2014 और 2019 में सरकारें बनाईं.

बीजेडी की राजनीति

नवीन पटनायक

इमेज स्रोत, Getty Images

नवीन पटनायक की राजनीति में एक चीज अनोखी है, वो ये कि महिलाओं और आबादी के हाशिये पर रहने वाले लोगों पर फोकस. पहली बार सत्ता में आने पर उन्हें दो चीजें लगीं.

पहली, ओडिशा ऐतिहासिक रूप से एक ग़रीब राज्य था, जहां ग़रीबी की जड़ें गहरी थीं. इसे सिर्फ औद्योगिकरण करने और नीचे तक इसके प्रभाव के जाने का इंतज़ार करते हुए हल नहीं किया जा सकता.

दूसरे, उन्होंने समझा कि ग़रीब घरों में महिलाओं और बुजुर्ग लोगों को सरकारी मदद की ज़्यादा ज़रूरत है.

24 सालों में नवीन बाबू ने सबसे ग़रीबों लोगों के लिए कल्याणकारी नीतियों का एक सुरक्षा चक्र बनाया.

इसका सबसे अच्छा उदाहरण है ममता स्कीम, जिसमें कथित रूप से 60 लाख गर्भवती महिलाओं और माओं को 2,900 करोड़ रुपये के बैंक ट्रांसफ़र से लाभ मिला. इस स्कीम ने बाल मृत्युदर की उच्च स्तर को कम करने में काफ़ी मदद की.

एक और सफल स्कीम है मधु बाबू पेंशन योजना, जो वरिष्ठ नागरिकों के अलावा, विधवाओं, अनाथों, ट्रांसजेंडर समुदाय, एड्स और लेप्रोसी के मरीजों को भी कवर करती है.

कोई आश्चर्य नहीं कि ग्रामीण ओडिशा में महिलाएं और बुज़ुर्ग लोग पटनायक को प्यार से ‘बूढ़ा बेटा’ कहते हैं.

बीजेडी शायद भारत में एकमात्र राजनीतिक पार्टी है, जिसने लंबी अवधि में ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक हालात सुधारने के लिए व्यवस्थित रूप से ध्यान दिया.

मिशन शक्ति 2001 में शुरू की गई, अब यह राज्य में 70 लाख महिलाओं को रियायती लोन और अन्य आजीविका परियोजनाओं की पेशकश करती है.

इसकी सफलता ने नवीन पटनायक को ओडिशा के इतिहास के किसी भी नेता के मुकाबले महिला वोटरों का सबसे प्रिय बना दिया. क्योंकि पहली बार किसी ने उनकी हालत सुधारने के लिए इतना व्यवस्थित तरीक़े से काम किया था.

बीजेडी ने राष्ट्रव्यापी रियायती दरों वाले चावल को नवीन पटनायक की ख़ुद की पहलकदमी के रूप में प्रचारित किया और इसका फ़ायदा उसे मिला.

सब्सिडी का भार केंद्र सरकार भी उठाती थी लेकिन बड़ी चतुराई से उसका नाम नहीं लिया जाता था.

मिशन शक्ति के राजनीतिकरण और महिलाओं का पार्टी काडर के रूप में इस्तेमाल का विपक्ष का आरोप पूरी तरह आधारहीन नहीं है.

इस बीच पटनायक ने लोकसभा टिकट बँटवारे में महिलाओं को 33 प्रतिशत कोटा लागू करने का वादा करके महिला वोटरों में अपनी स्थिति को और मजबूत किया.

इस कोटा को 2019 में शुरू किया गया और 2024 में भी इसे दुहराया गया. पार्टी नीति के तौर पर महिला कोटा लागू करने वाली बीजेडी देश की एकमात्र पार्टी है.

नवीन की राजनीतिक स्टाइल

ओम प्रकाश चौटाला, अटल बिहारी वाजपेयी के साथ नवीन पटनायक. तस्वीर सन् 2000 की.

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ओम प्रकाश चौटाला और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ नवीन पटनायक. तस्वीर सन् 2000 की.

हमेशा सफेद कुर्ता और पायजामा में रहने वाले नवीन पटनायक पुराने समाजवादी राजनेता की याद दिलाते हैं. वो ओड़िया भाषा अच्छी तरह समझ लेते हैं लेकिन धारा प्रवाह नहीं बोल पाते हैं. उनकी यह अक्षमता उनके पूरे मुख्यमंत्रित्व काल में तीखी आलोचना की वजह बनी रही.

हालांकि आलोचना से उनकी शानदार चुनावी जीत या उनकी अभूतपूर्व लोकप्रियता धूमिल नहीं हुई. हरेक के लिए वो अलग शख़्सियत हैं. बुज़ुर्गों के लिए वो एक तेज़तर्रार बीजू पटनायक के सज्जन पुत्र हैं.

शिक्षित लोगों के लिए उनकी अच्छी एशियाई अंग्रेज़ी लहजा और राजनीतिक सहयोगियों और प्रतिद्वंद्वियों के प्रति उनका विनम्र व्यवहार सबसे आकर्षक है.

आजीवन अविवाहित रहते हुए उन्होंने साधारण जीवन शैली अपनाई और व्यक्तिगत तौर पर बेदाग़ छवि का भी उन्हें लाभ मिला.

प्रभावी राजनीतिक नेतृत्व दो में से एक रास्ता चुन सकता है. एक वो, जहां राजनेता एक नए राजनीतिक समूह की पहचान करता है और उसे लामबंद करता है. जैसे, जाति आधारित दलों में भारतीय राजनेताओं ने दलित और ओबीसी वोटरों को एकजुट किया.

और दूसरा है, सुलह समझौते का रास्ता, जहां नेता प्रतिद्वंद्वी धड़ों के बीच सफलतापूर्वक रास्ता बना सकता है. नवीन दूसरे किस्म के हैं.

आठ सालों तक राज्य में बीजेपी के साथ मिलकर सरकार चलाने और कांग्रेस विरोधी राजनीति के बावजूद दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व से उनका कभी शत्रुतापूर्ण संबंध नहीं था.

लेकिन सबके साथ ‘समान दूरी’ रखने के उसूलों के चलते नवीन बीजेपी या कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबंधनों में शामिल होने से हमेशा इनकार किया.

बीजेडी का भविष्य

ओडिशा

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, नवीन पटनायक के साथ वी. कार्तिकेयन पांडियन.

अटल बिहारी वाजपेयी की तरह ही नवीन पद छोड़ने के बाद भी ओडिशा में और बाहर विभिन्न राजनीतिक दलों के समर्थकों के बीच अभी भी लोकप्रिय हैं.

अधिकांश नेताओं से अलग उनकी शालीनता और शांत व्यवहार ने उनके कई प्रशंसक बनाए. नवीन पटनायक ने भारत के सबसे सफल मुख्यमंत्री के तौर पर इतिहास में एक जगह बनाई है.

हालांकि विपक्षी पार्टी के रूप में बीजेडी का अस्तित्व देखा जाना बाकी है.

जो पार्टी ने अपने गठन के बाद से ही लगातार 24 साल तक निर्बाध शासन किया, हो सकता है कि बिना सरकारी संसाधनों के कैसे खुद को बचाए रखा जा सकता है, न जानती हो.

पिछले दो दशकों और उससे अधिक समय से बीजेडी का वोटरों से कनेक्शन किसी न किसी स्कीम के मार्फ़त बना रहा. हालांकि पार्टी को अब ये आसानी नहीं रहेगी.

पार्टी को उत्तराधिकार के मुद्दे पर स्पष्टता लानी होगी, जो ओडिशा के लोगों को स्वीकार्य हो.

फिर भी ये कहा जा सकता है कि ओडिशा में, जोकि अपनी क्षेत्रीय भाषा और ऐतिहासिक भाषाई पहचान के आंदोलन के आधार पर औपनिवेशिक शासन में गठित होने वाला पहला प्रांत था, एक क्षेत्रीय राजनीतिक दल की जगह हमेशा रहेगी.

चाहे बीजेडी इस जगह को भरना जारी रख सकती है या उसे खुद को विघटित कर नए सिरे से खुद को स्थापित करना होगा, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता.

(संपद पटनायक ओडिशा के एक राजनितिक विश्लेषक और स्तंभाकार हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)