विलियम ऑफ ओकहैम का उस्तरा, जो मध्य युग से ही विद्वानों को राह दिखा रहा है

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सभी चीजें समान होने पर, सबसे सरल समाधान भी आमतौर पर सबसे अधिक संभावित होता है.
इसी तरह के अन्य कई जुमलों के साथ, 14वीं शताब्दी के फ्रांसिस्कन पादरी के कई सिद्धांत लोकप्रिय हो गए हैं. इन्हें विज्ञान से लेकर तर्कशास्त्र तक के क्षेत्र में लागू किया गया है. ये अभी भी मान्य हैं.
मध्ययुगीन यूरोप के सबसे महान दार्शनिकों में से एक पादरी को स्पेनिश में विलियम या गुइलेर्मो कहा जाता था. उनका जन्म इंग्लैंड के दक्षिण में ओकहैम के छोटे से गांव में हुआ था, इसलिए इतिहास में वे विलियम ऑफ ओकहैम के रूप में जाने गए.
विचारों की स्पष्टता

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स्वतंत्रता और वास्तविकता की प्रकृति के बारे में उनके विचारों ने राजनीतिक दार्शनिक थॉमस हॉब्स को प्रभावित किया. इससे प्रोटेस्टेंट सुधार को बढ़ावा देने में मदद मिली.
अपने करियर में उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के चांसलर को नाराज़ किया और स्वयं के चर्च संबंधी आदेश से असहमत रहे. उन्हें पोप ने बहिष्कृत किया था.
उन्होंने घोषणा की कि शासकों का अधिकार उन लोगों से प्राप्त होता है जिन पर वे शासन करते हैं, ऐसा करने वाले पहले वो उन्हीं लोगों में से एक थे.
उनका मानना था कि चर्च और राज्य को अलग कर देना चाहिए.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विज्ञान और धर्म का मिश्रण कभी नहीं होना चाहिए, क्योंकि विज्ञान तर्क पर आधारित है, जबकि धर्म आस्था पर आधारित है.
उन्होंने भगवान के अस्तित्व के लिए थॉमस एक्विनास के पांच तर्कसंगत प्रमाणों का खंडन करने के लिए वैज्ञानिक तर्कों का उपयोग किया.
उनका कहना था,"ईश्वर का अस्तित्व का पता केवल तर्क से नहीं लगाया जा सकता है."
लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका जीवन कितना उथल-पुथल भरा रहा. उनका काम दिलचस्प और मूल्यवान था. उनका नाम उस सिद्धांत से जुड़े होने के कारण सबसे अधिक उल्लेख किया जाता रहा है, जिसके बारे में हम बात कर रहे थे.
उनका मानना था कि दार्शनिक तर्कों को जितना संभव हो, उतना सरल रखना चाहिए. इस बात का वे खुद अपने और अपने पूर्ववर्तियों के सिद्धांतों के साथ गंभीरता से अभ्यास करते थे.
सदियों बाद, जब इसे कई प्रतिभाशाली लोगों ने इसे लागू किया गया तो उन्होंने इस विचार को ओकहैम का रेजर या ओकैम नाम दिया.
एक मानसिक शॉर्टकट

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दार्शनिक रेजर (उस्तरा) एक मानसिक शॉर्टकट है, जो अनावश्यक रूप से जटिल या असंभावित परिकल्पनाओं को खारिज कर किसी घटना की बेहतर व्याख्या करने में मदद कर सकता है.
कई लोग भी ऐसा ही कहते हैं, जैसे हिचेंच ने कहा, " जो बात बिना सबूत के कही गई है, उसे बिना सबूत के खारिज किया जा सकता है."
इसी तरह से हैनलॉन ने कहा, "कभी भी उसे द्वेष न मानें जिसे मूर्खता द्वारा पर्याप्त रूप से समझाया जा सकता है."
ओकहैम ने अपनी बात कुछ हद तक अपारदर्शी रूप से व्यक्त की, लेकिन अन्य लेखकों के ऐसे संस्करण भी हैं जो स्पष्ट विचार देते हैं.
ऐसे कई दार्शनिक हैं, इन्हीं में से एक अरस्तू ने ओकहैम से बहुत पहले 'एनालिटिकल सेकंड्स' में लिखा था, "जो काम कम से किया जा सकता है उसे अधिक से करना व्यर्थ है." या " तथ्यों की व्याख्या आवश्यकता से अधिक जटिल नहीं होनी चाहिए."
लेकिन यदि आप यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि ओकहैम का क्या था, तो उसने इसे तब दिया जब वह इस बात पर विचार कर रहे थे कि पृथ्वी से परे क्या है.
उन्होंने कहा, ''मुझे ऐसा लगता है... कि स्वर्ग का मामला उसी प्रकार का है जैसा यहाँ का मामला है. ऐसा इसलिए है क्योंकि बहुलता को कभी भी अनावश्यक रूप से पेश नहीं किया जाना चाहिए.''
ये बातें उनके रेजर को सबसे पहले अपनाने वालों में से एक निकोलस कोपरनिकस के दिमाग में भी थे.
उन्होंने 1543 के 'कमेंटेरियोलस' में घोषणा की कि खगोलीय पिंड पृथ्वी के चारों ओर घूमते हैं. उन्होंने कहा कि इस विचार की विशाल जटिलता को कम और बहुत सरल तरीके से हल किया जा सकता है.
प्राचीन यूनान के समय से प्रचलित ब्रह्मांड का भूकेंद्रित मॉडल तेजी से जटिल हो गया था.
ग्रहों की गति के अवलोकन के लिए बदलाव की जरूरत थी, जैसे कि परिधि पर परिधि जोड़ना और पृथ्वी को अन्य सभी पिंडों की कक्षाओं के केंद्र से थोड़ा दूर ले जाना.
सूर्य की परिक्रमा

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सरलता की तलाश में, कोपरनिकस सूर्य की परिक्रमा करने वाले ग्रहों के मॉडल पर पहुंचे, जो अभी भी कुछ हद तक जटिल था लेकिन पिछले मॉडल जैसा कुछ भी नहीं था.
दिलचस्प बात यह है कि दूसरी शताब्दी के ग्रीक गणितज्ञ, खगोलशास्त्री और भूगोलवेत्ता क्लॉडियस टॉलेमी, जो अपने भूकेंद्रिक सिद्धांत के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसे कोपेरिन्चस ने उखाड़ फेंका था, उन्होंने ओकहैम के रेजर की ही तरह कुछ कहा था, "हम इसे सबसे सरल संभव परिकल्पना द्वारा घटना की व्याख्या करने के लिए एक अच्छा सिद्धांत मानते हैं."
किसी भी मामले में, कोपरनिकस रेजर का एकमात्र प्रसिद्ध भक्त नहीं था.
1632 में, गैलीलियो गैलीली ने सौर मंडल के टॉलेमिक और कोपरनिकन मॉडल की विस्तृत तुलना करते हुए तर्क दिया कि ''प्रकृति अनावश्यक रूप से चीजों को नहीं बढ़ाती है; अपना प्रभाव उत्पन्न करने के लिए सबसे आसान और सरल चीजों का उपयोग करता है; वह व्यर्थ कुछ नहीं करता...
आइज़ैक न्यूटन ने अपनी ओर से, अपनी किताब 'प्रिंसिपिया मैथमेटिका' में ओकहैम के सिद्धांत को दर्शनशास्त्र में तर्क के तीन नियमों में से एक बनाया.
एक सदी बाद, अपने "क्रिटिक ऑफ प्योर रीज़न" में, इमैनुएल कांट ने इस कहावत का हवाला दिया कि "अमूल तत्वों या सिद्धांतों को अनावश्यक रूप से गुणा नहीं किया जाना चाहिए" और कहा कि यह शुद्ध कारण का एक नियामक विचार था जो प्रकृति के बारे में वैज्ञानिकों के सिद्धांत को रेखांकित करता है.
इतिहास वैज्ञानिकों की ऐसी ही कहानियों से भरा पड़ा है जिन्होंने सादगी से उन्हें वास्तविकता की बेहतर समझ की दिशा में मार्गदर्शन दिया.
लेकिन आइए अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ इस बात को खत्म करते हैं, उन्होंने लिखा है, " सभी विज्ञानों का महान उद्देश्य... कम से कम संभव संख्या में परिकल्पनाओं या स्वयंसिद्धों से तार्किक कटौती द्वारा अनुभवजन्य तथ्यों की सबसे बड़ी संभव संख्या को कवर करना है."
क्या कहता है ओकहैम का रेजर
ओकहैम का उस्तार हमें किसी भी घटना के सबसे सरल स्पष्टीकरण चुनने की अपील करता है.
अगर आप आकाश में चलती हुई कोई रोशनी देखते हैं, तो यह संदेह करने से पहले कि यह एक उड़न तश्तरी है, यह सोचें कि इसके एक हवाई जहाज या उपग्रह होने की संभावना अधिक है.
या आप इतने भाग्यशाली हैं कि आपको टूटता तारा देखने को मिला.
उस सिद्धांत का पालन करते हुए, मेडिकल छात्रों को सलाह दी जाती है: "जब आप खुरों की आवाज़ सुनें, तो घोड़ों के बारे में सोचें, ज़ेबरा के बारे में नहीं,"
ये सिद्धांत छात्रों को लक्षणों के आधार पर सबसे सरल इलाज खोजने के लिए कहता है.
वैज्ञानिक इसे कोविड की उत्पत्ति से लेकर ब्रह्मांडीय डार्क मैटर तक के विषयों पर लागू करते हैं. लेकिन किसी भी उस्तरे की तरह, इसका उपयोग सावधानी से किया जाना चाहिए .
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