इस्लाम का स्वर्ण युग: इब्ने सीना,अरस्तु के बाद आने वाले महान दार्शनिक

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बीबीसी रेडियो थ्री की श्रृंखला, 'इस्लाम का स्वर्ण युग', में सन् 750 से 1258 तक का अध्ययन किया गया है, जिसमें उस समय की वास्तुकला, धार्मिक अनुसंधान, चिकित्सा, नई सोच और दर्शन का उल्लेख है.
इस कड़ी में, डॉक्टर टोनी स्ट्रीट हमें महान दार्शनिक और प्रभावशाली चिकित्सक इब्ने सीना (या अबू अली सीना) के बारे में बताएंगे, जो सन् 980 में बुख़ारा में पैदा हुए थे, जो वर्तमान में उज़्बेकिस्तान का शहर है.
इब्ने सीना फ़ारस के नागरिक थे. उन्होंने बेहतरीन दार्शनिक के तौर पर अरस्तू को भी पीछे छोड़ दिया था. वह आज भी मुस्लिम विद्वानों में एक विशेष स्थान रखते हैं.
'इस्लाम के स्वर्ण युग' में लगभग पांच सौ साल का दौर मध्य पूर्व में महत्वपूर्ण राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की वजह बना.
12वीं सदी के दौरान, पश्चिमी यूरोप ने प्राचीन ग्रीक दर्शन का दोबारा अध्ययन किया. शोधकर्ताओं ने अरस्तु को 'विवादास्पद बुत परस्त' से एक प्रतिष्ठित दार्शनिक के रूप में स्वीकार किया.
इस प्रक्रिया में, पश्चिमी शोधकर्ताओं ने अनुवाद करने के उस आंदोलन से लाभ उठाया, जिसमें अरबी में लिखे गए लेखन का लैटिन भाषा में अनुवाद किया गया था. यह प्रक्रिया 11वीं सदी के अंत में शुरू हुई थी.
अरबी दर्शन का प्रभाव
अरब दार्शनिकों ने अरस्तू का अध्ययन किया और यही अध्ययन लैटिन सभ्यता के काम आया और इसके बाद फिर लैटिन शोधकर्ताओं ने सीधे ग्रीक भाषा से अरस्तू के काम को समझने की कोशिश शुरू की. इब्ने सीना वो महत्वपूर्ण अरब दार्शनिक थे, जिसने लैटिन विद्वानों को बहुत प्रभावित किया.
लैटिन सभ्यता की तरफ़ से अरस्तु को समझने की प्रक्रिया में, इब्ने सीना हमेशा अपनी पुस्तकों के माध्यम से वहां उपस्थित रहे, ख़ास तौर पर अरस्तू के मेटा फ़िज़िक्स (तत्वमीमांसा) के दौरान.

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12वीं सदी के मध्य से इब्ने सीना की मेटा फ़िज़िक्स यूरोप में एकमात्र मेटा फ़िज़िक्स थी. 12वीं सदी में अरस्तु की मेटा फ़िज़िक्स के अध्ययन के दौरान हमेशा इब्ने सीना की मेटा फ़िज़िक्स का अध्ययन किया जाता था.
1250 ईस्वी के बाद इसका मूल्य कम हो गया, लेकिन इसके बावजूद अगले कई सालों तक अरस्तु के दर्शन को समझने के लिए इब्ने सीना को उद्धरत किया जाता रहा.
इब्ने सीना के एक लेखन में ख़ुदा और उसके बंदे के बीच के फासले को समझने का प्रयास किया गया था. फिर यही शोध तब इतालवी दार्शनिक सेंट थॉमस एक्विनस के धार्मिक दर्शन का हिस्सा बना. यह दर्शन प्राचीन ईसाई धर्म की बड़ी उपलब्धियों में से एक था.
इब्ने सीना का उल्लेख अक्सर अरस्तु के यूरोपीय अध्ययनों में आता है. अरबी में उनका नाम अबू अली इब्ने सीना है. वह एक महान दार्शनिक और प्रसिद्ध चिकित्सक थे. जो अपने समय में अरबी में किताबें लिखते थे.
उनका जन्म सन् 980 में आज के मध्य एशिया के बुख़ारा में हुआ था. उन्होंने मध्य एशिया और फ़ारस साम्राज्य में बड़े पैमाने पर यात्राएं की. वे अंततः आज के ईरान के एक शहर अस्फ़ाहान में बस गए. सन् 1037 में उनकी मृत्यु हो गई. मृत्यु के समय भी वह घर से बहुत दूर थे.
अरस्तु से आगे निकले
10वीं सदी के दौरान मध्य एशिया में फ़ारस का एक नागरिक, जो अरबी बोलना जानता था, ग्रीक दर्शन तक कैसे पहुंचा?
इसका जवाब भी अनुवाद के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने के एक आंदोलन में छुपा है, जो आठवीं सदी में शुरू हुआ था. इस आंदोलन का उद्देश्य ग्रीक भाषा में लिखी किताबों का अरबी में अनुवाद करना था. यह 12वीं सदी में अरबी से लैटिन भाषा में अनुवाद करने के आंदोलन से भी बड़ा था.
अब्बासिद साम्राज्य के इस आंदोलन की बुनियाद राजधानी बग़दाद थी. यहां प्राचीन यूनानी सभ्यता के विज्ञान और दर्शन के शोध का अवलोकन किया जाता था.
इस आंदोलन के आगमन और इब्ने सीना के एक महान दार्शनिक बनने में लगभग दो सदियों का फ़ासला है. इनसे पहले भी कई नामवर दार्शनिक हुए, जिनमें अल-फ़ाराबी एक बड़ा नाम है, जिनकी इब्ने सीना के जन्म से 30 साल पहले 950 ईस्वी में मृत्यु हो गई थी.
इब्ने सीना की नज़रों में अल-फ़ाराबी का बहुत सम्मान था. वे उन्हें अपना दूसरा शिक्षक मानते थे, यानी अरस्तू पहले शिक्षक और अल-फ़ाराबी दूसरे.
बग़दाद के अधिकांश दार्शनिक अरस्तू के लेखन से जुड़े रहते थे. साथ ही, अल-फ़ाराबी जैसे दार्शनिक अपने व्यक्तिगत काम भी जारी रखते थे. लेकिन 10वीं सदी का असली उद्देश्य अरस्तू के काम का अरबी में अनुवाद और समीक्षा करना था.
इब्ने सीना ने यह सब बदल कर रख दिया. अपनी मृत्यु के समय तक उन्होंने एक महान दार्शनिक बन कर अरस्तू को भी पीछे छोड़ दिया था. यह बात कम से कम मुस्लिम दार्शनिकों की हद तक सही साबित हुई.
इब्ने सीना का 57 साल का जीवन उस इस्लामी युग का हिस्सा है, जो उन सदियों के बाद शुरू हुआ, जब अरब सेना फ़ारस के क्षेत्रों पर विजय प्राप्त कर चुकी थी. इसके बाद फ़ारस के लोगों ने इस्लामी सभ्यता में बड़ी सांस्कृतिक उन्नति की.
यात्राएँ करने की आदत थी इब्ने सीना को

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इब्ने सीना ख़ुद फ़ारस के नागरिक थे, लेकिन उन्होंने अपनी दो सबसे महत्वपूर्ण किताबें अरबी में लिखी थीं. इस दौर की शुरुआत में, सन् 950 के आसपास, फ़ारस के लोगों ने अरबों से सांस्कृतिक नेतृत्व ले लिया था. लेकिन फिर इब्ने सीना के अंतिम वर्षों में ये नेतृत्व तुर्कों को मिल गया.
इब्ने सीना यात्राएं करते रहते थे. एक शहर से दूसरे शहर जाने की उनकी आदत थी क्योंकि वो क़रीब आती तुर्की सेना से बचना चाहते थे. अपने जीवन के दौरान वो फ़ारस साम्राज्य में कहीं न कहीं शरण ढूंढते रहते थे.
उन्होंने सिर्फ़ 20 साल की उम्र में अपना घर छोड़ दिया और बुख़ारा से उत्तर की ओर गुरुगंज चले गए. उन्होंने आज के ईरान के शहरों हमदान और तेहरान में भी समय बिताया और अंत में वो अस्फ़हान में बस गए. ऐसा लगता है जैसे वे एक तुर्की साम्राज्य में काम करने से डरते थे.
इस यात्रा के साथ वह उन ग़रीब राज्यों से छुटकारा पा सके जो दुश्मनों से घिरे हुए थे. इन शहरों के दरबारों में दार्शनिकों को प्रोत्साहित करने के ना तो संसाधन थे और ना ही इच्छा थी.
वह अब्बासिद साम्राज्य में 'बोया' वंश के द्वारा प्रशासित शहरों में शरण लेने लगे, जहां के दरबारों में दार्शनिकों का समर्थन किया जाता रहा था.
मेटाफिज़िक्स के करीब आए
हम इब्ने सीना के बारे में इतना कुछ इसलिए जानते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी जीवनी 1012 ईस्वी के आसपास लिखी थी. और इसलिए भी क्योंकि उनके एक छात्र ने उनके बारे में एक पुस्तक लिखी जिसमें 1012 ईस्वी के बाद के वर्षों के बारे में उनकी मृत्यु तक सभी जानकारी संरक्षित है.
अपनी जीवनी में, इब्ने सीना लिखते हैं कि उन्होंने ख़ुद शिक्षक के बिना दर्शन को समझा. लेकिन वह स्वीकार करते हैं कि अल-फ़ाराबी के एक लेखन ने उन्हें मेटाफिज़िक्स समझाया, जिसके बाद उन्होंने इसे छोड़ने का विचार छोड़ दिया.
पुस्तक में दोहराया गया है कि उन्होंने अरस्तू के काम का स्वतंत्र रूप से अध्ययन किया. दूसरे शब्दों में,बग़दाद में सीखने और सिखाने की परंपरा से मुक्त हो कर उन्होंने अपना शोध ख़ुद किया. वे कहते हैं कि उन्होंने 18 साल की उम्र में दर्शन के क्षेत्र में जाने का फ़ैसला कर लिया था.

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उनकी यह तटस्थता ही है जो उन्हें कई व्यक्तित्वों का दार्शनिक अध्ययन करने और उनमें किए गए दावों का सही आकलन करने में सक्षम बनाती है. भले ही ये दावे उस समय के किसी महान दार्शनिक द्वारा किए गए हों.
अपनी जीवनी में, उन्होंने बताया कि कैसे उनके विचारों ने आधुनिक दार्शनिक अनुसंधान को ठोस बनाया. निश्चित रूप से यह एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण है जिसने स्वयं से ज्ञान प्राप्त किया है. उन्होंने दर्शन की उस समय मौजूद परंपराओं को पढ़ा, उनकी समीक्षा की, कुछ को अस्वीकार किया और कुछ में सुधार किया.
इब्ने सीना ने अपनी जीवनी में यह सब क्यों लिखा?
ऐसा इसलिए है क्योंकि वे एक ऐसे वातावरण से आए थे जहां दर्शन की स्वीकृत परंपराएं मौजूद नहीं होती थीं. वे अब एक ऐसी जगह मौजूद थे जहां हर किसी ने बग़दाद में अपने सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त की हुई थी.
जैसे-जैसे इब्ने सीना पूर्व की ओर यात्रा करते गए, वैसे-वैसे उन्हें बग़दाद से शिक्षा प्राप्त लोग मिलते गए. वे उनके सामने ख़ुद को कमतर महसूस करते, तो वह यही सोचते थे कि बग़दाद में शिक्षित किसी व्यक्ति के दार्शनिक शोध को अस्वीकार करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है.
जीवनी लिखना और बग़दाद में शिक्षित दार्शनिकों पर अपनी श्रेष्ठता ज़ाहिर करना दो अलग बातें हैं. उनके ख़िलाफ़ तर्क जीतना बहुत मुश्किल होता होगा, लेकिन इब्ने सीना ज़ाहिरी तौर पर अपनी सभी जंगें जीते चुके थे.
हमारे पास एक पत्र है. इब्ने सीना ने यह पत्र एक ऐसे समय में लिखा था जब उन्होंने शुरू में बोया वंश के शासन में शरण ली थी. उन्होंने यह पत्र बग़दाद के दार्शनिकों को लिखा और इसकी पृष्ठभूमि यह थी कि किसी विषय पर बग़दाद के एक पूर्व छात्र के साथ इब्ने सीना की बहस हो गई थी.

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इब्ने सीना ने अपने पत्र में कहा है कि बग़दाद से शिक्षा प्राप्त लोगों को ब्रह्मांड के बारे में ये बातें किसने सिखाई हैं और क्या वे वास्तव में इब्ने सीना के सवालों का जवाब दे सकते हैं. हमारे पास इस पत्र का जवाब नहीं है. लेकिन यह संभव है कि बग़दाद के दार्शनिकों ने इब्ने सीना के पत्र को फेंक दिया होगा. वो फ़ैसला कर चुके थे कि वे इब्ने सीना को नज़रअंदाज़ करेंगे. लेकिन इतिहास ने उन्हें ग़लत साबित किया.
कुछ साल बाद, इब्ने सीना बग़दाद के एक दार्शनिक की पुस्तक ख़रीदना चाहते थे ताकि उनके निष्कर्षों की समीक्षा और आलोचना कर सकें. इस समय तक वह प्रसिद्ध हो चुके थे और लोग उनसे डरते थे. कहीं इब्ने सीना उनकी किताब न ख़रीद लें. इसलिए यह दार्शनिक ख़ुद अपनी सभी किताबें खरीदने के लिए मजबूर हो गया, ताकि इब्ने सीना ये किताब पढ़ कर इसकी आलोचना न कर सकें.
इब्ने सीना ने कई किताबें लिखीं लेकिन उन्हें संरक्षित करने में लापरवाही की. वर्ष 1020 में, यह महसूस किया गया कि उनके शुरुआती लेखन की कोई भी प्रति नहीं बचाई जा सकी.
यह अरस्तु के शोध पर उनकी टिप्पणी थी. इसलिए उनके छात्रों ने उन्हें इसका विकल्प लिखने के लिए कहा. इब्ने सीना ने मना कर दिया. उस समय, वह केवल अपने दार्शनिक विचारों पर एक किताब लिखना चाहते थे.
यह इस्लामी इतिहास का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक क्षण था. कई प्रसिद्ध हस्तियों को इस्लामी सभ्यता में उद्धृत किया जाता था, लेकिन यह वह क्षण था जब सब कुछ बदल जाना था.
इब्ने सीना के बाद के लेखन में अरस्तु का उल्लेख तो होता था, लेकिन सिर्फ़ संदर्भ के तौर पर और उनके दर्शन और तर्कों को गंभीरता से नहीं लिया जाता था.
इब्ने सीना का लेखन अब अरबी दर्शन या धार्मिक साहित्य में संदर्भ का केंद्र बन चुका था. वह एक ऐसे स्थान पर पहुंच गए, जहां लोग या तो उनकी बात से सहमत होते या फिर उनसे असहमत होते और उनके कहे गए शब्दों में कुछ और जोड़ते. यह कहना ग़लत नहीं होगा कि वह दर्शन शास्त्र के विशेषज्ञ बन गए थे.
चिकित्सा में सेवाएं और भगवान की अवधारणा

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इब्ने सीना की इतनी सारी किताबों के बारे में क्या कहा जा सकता है. जो लोग चिकित्सा के इतिहास में रुचि रखते हैं वे आश्चर्यचकित हो सकते हैं कि चिकित्सा के क्षेत्र में उनकी सेवाओं का उल्लेख बहुत कम किया गया है.
उनकी एक पुस्तक वह भी है जो 14वीं सदी से 1715 तक यूरोप के हर मेडिकल कॉलेज के पाठ्यक्रम में किसी न किसी रूप में शामिल होती थी. उनकी अन्य वैज्ञानिक सेवाओं का उल्लेख भी यहां नहीं किया गया है. इसकी वजह यह है कि इन सेवाओं का मूल्य दार्शनिक लेखन की तुलना में कुछ भी नहीं है.
उनके मुख्य विचारों में से एक विचार आत्मा की अवधारणा का है. इस तर्क की तुलना अक्सर फ्रांसीसी दार्शनिक रेने डेकार्टेस के काम से की जाती है. इसका केंद्रीय विचार यह है: 'मैं सोचता हूं. शायद इसलिए मैं मौजूद हूं."
यहां मेटा फ़िज़िक्स में उनकी सेवाओं पर बहुत ध्यान दिया गया है. इनमें 'किसी की विशेषता और किसी के अस्तित्व के बीच अंतर' का विचार है. उनसे पहले भी दार्शनिकों ने इस विषय पर बात की थी. लेकिन किसी ने भी इसे इतने बड़े पैमाने पर अपने मेटा फ़िज़िक्स का आधार नहीं बनाया था.
इब्ने सीना का दर्शन
इब्ने सीना के लिए, किसी की विशेषता और किसी के अस्तित्व के बीच का अंतर सबसे महत्वपूर्ण विषय था.
उनके अनुसार "कोई भी चीज़ अपनी विशेषताओं पर पूरी उतरती है, जैसे एक इंसान,बिल्ली या एक पेड़." इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि यह वस्तु क्या है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि क्या इसका अस्तित्व है भी या नहीं. किसी चीज़ से संबंधित अगर आप निर्णय किये बिना ये समझ जाएं कि यह क्या है तो यह वही चीज़ है."
उनका मतलब था कि हर चीज़ अपनी विशेषताओं के आधार पर पहचानी जाती है. लेकिन यह भी संभव है कि यह चीज़ अपना अलग अस्तित्व भी रखती हो. इस अंतर को क़ायम रखने पर इब्ने सीना सवाल करते हैं कि फिर इस चीज़ को क्या समझा जाना चाहिए कि यह क्या है. यानी क्या इसकी विशेषताएं इस चीज़ को अर्थ देती हैं या इसका अस्तित्व.
उनके अनुसार, केवल वो चीजें अपना अस्तित्व रखती हैं जिनका वर्णन किया जा सके. यह वाक्य अपने तरीक़े से महत्वपूर्ण है. इब्ने सीना उन दार्शनिकों में से एक हैं जो वर्तमान स्थिति के आधार पर किसी मामले पर फ़ैसला करते हैं. वह कारण और प्रभाव (यानी अंग्रेजी में कॉज एंड इफेक्ट) पर विश्वास रखते थे.

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उनके अनुसार, चूंकि इस दुनिया को ख़ुदा ने ज़रूरत के तहत बनाया है, इसलिए अगर एक दूसरी दुनिया होती, तो उसकी हर चीज़ में इसी दुनिया की चीज़ों की तरह समानता होती. दुनिया में हर चीज़ किसी दूसरी चीज़ के आधार पर अपने अंदर एक ज़रूरत रखती है.
वे हर चीज़ से संबंधित इसकी विशेषताओं और इसके अस्तित्व के आधार पर बात करते हैं. उनके अनुसार, अगर दुनिया के निर्माण के पीछे कोई बड़ी वजह नहीं होती, तो इसका अस्तित्व नहीं होता.
अगर यह साबित हो जाता है कि दुनिया के निर्माण के पीछे कोई कारण है, तो यह भी विशेषताओं और अस्तित्व के दर्शन के अनुसार होगा. यानी कोई चीज़ क्या है यही उसका अस्तित्व है.
यह बात इस तरह भी कही जा सकती है, कि "ख़ुदा क्या है? इसका उत्तर ख़ुदा के अस्तित्व में है."
इब्ने सीना के बाद, धर्म शास्त्र का ज्ञान बदल कर रह गया, चाहे बात पूर्व की हो या पश्चिम के बारे में हो. जिस तरह इब्ने सीना को यूरोप में उद्धृत किया जाने लगा, इसी तरह उनका कार्य पूर्व में भी अहम रहा. जैसा कि ख़ुदा के अस्तित्व के लिए यह तर्क मदरसों में बताया जाता है, या जिस तरह विद्वान ईश्वर के गुणों के बारे में बात करते हैं.
आप यह समझें कि जब एक युवा ईसाई चर्च जाता है और एक मुस्लिम धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए मदरसे में जाता है, तो वह उसी समय इब्ने सीना का ऋणी हो जाता है.
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