प्लेटो ने क्यों कहा था, "लोकतंत्र से ही तानाशाही जन्म लेती है"

प्लेटो

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इमेज कैप्शन, लोकतंत्र के बारे में अच्छी राय नहीं रखते थे प्लेटो
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अगर आप समुद्र के बीच एक नाव पर हों तो क्या करेंगे? -

1 - आप नाव चलाने का तरीका तय करने के लिए एक चुनाव करवाएँगे?

2 - आप ये तलाश करेंगे कि क्या नाव पर ऐसा कोई व्यक्ति मौजूद है जो नाव चलाने में माहिर है?

अगर आप दूसरा विकल्प चुनते हैं तो संभवतः ये आप मानते हैं कि इस तरह की स्थितियों में विशेषज्ञता अहमियत रखती है.

आप नहीं चाहेंगे कि कोई नौसिखिया व्यक्ति जन्म और मरण वाली स्थिति में ये कयास लगाता रहे कि उसे आगे क्या करना है?

अब ये बताएं कि आप उनके बारे में क्या सोचते हैं जो कि एक बड़ी नाव, जिसे राज्य कहते हैं, उसे चलाते हैं?

क्या ये बेहतर नहीं होगा कि चुनाव के माध्यम से नेता तय करने की जगह राज्य का नेतृत्व करने के लिए किसी अनुभवी व्यक्ति को तलाश किया जाए?

ये बात लोकतंत्र का पालना कहे जाने वाले एथेंस के दार्शनिक प्लेटो ने अब से 2400 साल पहले अपनी किताब 'द रिपब्लिक' के छठवें अध्याय में ये दावा किया था. ये न्याय, मानव स्वभाव, शिक्षा और पुण्य जैसे विषयों पर सबसे पहली और प्रभावशाली किताब है.

इस किताब में सरकार और राजनीति को लेकर भी बात की गई है. बातचीत के रूप में लिखी गई इस किताब में सुकरात और प्लेटो एवं उनके दोस्तों के बीच राजसत्ता को लेकर बातचीत है. गुरु और शिष्यों के बीच बातचीत में बताया गया है कि एक सरकार दूसरे से अच्छी क्यों है?

इस किताब में डेमोक्रेसी पर उनके विचार में साफ दिखाई देता है - ग्रीक भाषा में लिखा है, "लोगों की सरकार, फैसले लेने के मामले में मुफ़ीद नहीं है."

यहां तक कि किसी नेता के लिए मतदान करना उन्हें काफ़ी जोखिम भरा लगा क्योंकि उनके मुताबिक़ मतदाता अप्रासंगिक बातों जैसे कि उम्मीदवार के रूपरंग आदि से प्रभावित हो सकते हैं. उन्हें ये अहसास नहीं रहेगा कि शासन करने से लेकर सरकार चलाने के लिए योग्यता की ज़रूरत होती है.

बीबीसी की हिस्ट्री ऑफ़ आइडियाज़ सिरीज़ में दार्शनिक नाइजल वारबर्टन बताते हैं, "प्लेटो सत्ता के शीर्ष पर जिन विशेषज्ञों को चाहते थे, वे विशेष रूप से प्रशिक्षित दार्शनिक होने चाहिए. उन्हें उनकी ईमानदारी, वास्तविकता की गहरी समझ (आम लोगों से कहीं ज़्यादा) के आधार पर चुना जाना चाहिए."

सत्ता का स्वरूप

इस तरह की सरकार का स्वरूप एरिस्टोक्रेसी (अभिजात्य वर्ग का शासन) था जिसका ग्रीक में मतलब "बेहतरीन लोगों की सरकार" है. इस स्वरूप में कुछ लोग अपनी पूरी ज़िंदगी नेता बनने के लिए तैयारी करते हैं. इन पर गणतंत्र को चलाने की ज़िम्मेदारी होती है ताकि ये लोग समाज के लिए बुद्धिमतापूर्ण फ़ैसले ले सकें.

बीबीसी आइडियाज़ कार्यक्रम में शामिल हुईं दार्शनिक लिंड्से पोर्टर कहती हैं, "हालांकि, उनके विचार बेशक ख़ास थे. प्लेटो का मानना था कि ये एरिस्टोक्रेट निःस्वार्थ भाव और बुद्धिमत्ता से शासन करेंगे."

हालांकि, ये आदर्श समाज हमेशा पतन की कगार पर खड़ा रहेगा.

पोर्टर कहती हैं, "उन्होंने आशंका जताई कि पढ़े लिखे और बुद्धिमान लोगों के बच्चे आख़िरकार आराम और विशेषाधिकारों की वजह से भ्रष्ट हो जाएंगे. इसके बाद वे सिर्फ अपनी संपत्ति के बारे में सोचेंगे जिससे एरिस्टोक्रेसी एक ओलिगार्की (सीमित लोगों में निहित सत्ता वाला शासन) में तब्दील हो जाएगी. ग्रीक में इसका मतलब 'कुछ लोगों का शासन' होता है."

ये अमीर और क्षुद्र शासक बजट के संतुलन को लेकर परेशान रहेंगे. इससे बचत करने पर ज़ोर होगा और असमानता बढ़ेगी.

समृद्धि

प्लेटो लिखते हैं, "जैसे जैसे अमीर और अमीर होता जाएगा, वह और दौलत बनाने पर विचार करेगा और मूल्यों के बारे में कम सोचेगा."

जैसे असमानता बढ़ती है, अशिक्षित ग़रीबों की संख्या अमीरों की संख्या से बढ़ने लगती है. और आख़िरकार ओलिगार्क की सत्ता ख़त्म हो जाएगी और राज्य एक डेमोक्रेसी में तब्दील हो जाएगा.

हमारे लिए जो कि लोकतंत्र की तारीफ़ सुनने के अभ्यस्त हैं, ये सुनना कि डेमोक्रेसी, एरिस्टोक्रेसी और ऑलिगार्की के बाद तीसरे दर्जे की शासन व्यवस्था है, थोड़ा अजीब लगता है.

सिर्फ यही नहीं, 'रिपब्लिक' में प्लेटो के ज़हन से उपजे सुकरात इशारा करते हैं कि लोकतंत्र "अराजकता का एक सुखद रूप है," और ये भी अपने विरोधाभास की वजह से दूसरी शासन व्यवस्थाओं की तरह ख़त्म हो जाता है.

और जिस तरह ऑलिगार्की, एरिस्टोक्रेसी से निकली थी. डेमोक्रेसी (लोगों का शासन) से निरंकुशता निकलेगी.

इसकी वजह ये है कि जब लोग संपत्ति हासिल करने के लिए एक अंधी दौड़ में लग जाते हैं तो समाज में समानता की एक माँग उठने लगती है, समानता की एक भूख पैदा होता है. और इसी तरह तृप्त न होने वाली आज़ादी की प्यास एक निरंकुशता की मांग पैदा करती है.

आज़ादी की अधिकता

ये एक ऐसा विचार है जिसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल है. बात ये है कि जब लोगों को आज़ादी मिलती है तो वे और ज़्यादा आज़ादी चाहते हैं.

अगर हर कीमत पर आज़ादी पाना लक्ष्य है तो आज़ादी की अधिकता गुटों और मत-भिन्नता को जन्म देती है. इनमें से ज़्यादातर तत्वों को संकीर्ण हितों की वजह से कुछ दिखाई नहीं देता.

ऐसे में जो भी नेता बनना चाहेगा है, उसे इन गुटों को संतुष्ट करना पड़ेगा. इनकी भावनाओं का ध्यान रखना पड़ता है और ये किसी भी तानाशाह के फलने-फूलने के लिए मुफीद स्थिति है. क्योंकि वह लोकतंत्र पर नियंत्रण करने के लिए जनता को भ्रमित करता है.

यही नहीं, असीम आज़ादी एक तरह से उन्मादी भीड़ को जन्म देती है. ऐसा होने पर लोगों का शासक में भरोसा कम होता है. लोग परेशान होने लगते हैं. और उस शख़्स को अपना समर्थन देते हैं जो कि उनके डरों को पालता - पोसता है और स्वयं को उनके रक्षक के रूप में पेश करता है.

हालांकि, प्राचीन एथेंसवासियों के यहां प्रत्यक्ष लोकतंत्र था. ऐसे में मतदाता लगभग हर चीज पर मत देते थे जो कि एक कभी न ख़त्म होने वाला जनमत संग्रह जैसा था.

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इमेज कैप्शन, द रिपब्लिक का एक अंश

दार्शनिक लिंड्से पोर्टर कहती हैं, "आज कई ऐसी संस्थाएं हैं जो कि प्लेटो के दौर में नहीं थीं - इनमें प्रतिनिधित्व वाला लोकतंत्र, सुप्रीम कोर्ट, मानवाधिकार क़ानून, सर्वशिक्षा. ये वो बचाव उपकरण हैं जो अविवेकी भीड़ के शासन को नियंत्रित करते हैं."

हालांकि, हाल के सालों में डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं के उदय ने 'द रिपब्लिक' की चेतावनियों को एक बार फिर अहम बना दिया है.

कई विश्लेषक और राजनीतिक टिप्पणीकार जैसे एंड्रयू सलिवान जिन्होंने बीबीसी न्यूज़नाइट के कार्यक्रम में प्लेटो के इन विचारों को रखा था.

प्लेटो को केंद्र में रखते हुए वह कहते हैं, इस तरह के नेता "सामान्य रूप से उच्च वर्ग से आते हैं लेकिन वर्तमान समय से तालमेल बनाकर रखते हैं. वह एक आज्ञाकारी भीड़ पर अधिकार जमा लेते हैं और उस भीड़ में से धनी लोगों को भ्रष्टाचारी कहने लगते हैं."

"आख़िरकार वह अकेले खड़े होते हैं और भ्रमित, विचलित और अपने में डूबी जनता को अनगिनत विकल्पों में से किसी एक को चुनने और लोकतंत्र की असुरक्षाओं से आज़ादी देते है. ऐसा व्यक्ति स्वयं को हर समस्या का हल बताता है. और जैसे ही जनता इस शख़्स को एक समाधान के रूप में देखकर उत्साहित हो जाती है, ऐच्छिक लोकतंत्र स्वयं को जल्दबाज़ी में ख़त्म कर लेता है."

लेकिन यहां एक बात और है. दार्शनिक पॉर्टर किसी अन्य चीज को भी रेखांकित करना चाहती हैं.

हालांकि, एरिस्टोक्रेट्स द्वारा शासित किये जाने का विचार ये बताता है कि वह ये चाहते थे कि ऐसे लोगों का नेतृत्व हो जो कि अस्पष्ट सुखों से दूर हो क्योंकि ऐसा नेतृत्व भ्रष्ट नहीं होगा और उनकी शिक्षा की वजह से वह अच्छे और बुद्धिमत्तापूर्ण फ़ैसले लेंगे.

वे लोग जो कि लगातार स्वयं से पूछते हैं कि "सबसे उचित और विवेकपूर्ण कदम क्या होगा?"

ऐसे में प्लेटो की यही मुख्य बात है - "उचित, विवेकपूर्ण और बुद्धिमत्तापूर्ण फ़ैसले करें. मूल्यों का राज हो न कि भावनाओं का."

बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द इयर अवॉर्ड

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