ताइवान के नए राष्ट्रपति के शपथ लेते ही, चीन अचानक हुआ आक्रामक

इमेज स्रोत, Getty Images
ताइवान में नए राष्ट्रपति विलियम लाई के शपथ ग्रहण के बाद चीन ने ताइवान के आसपास सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है.
ये युद्धाभ्यास इस बात की पुष्टि करता है कि आख़िर असल मुद्दा क्या है, वो है- चीन का ताइवान पर दावा.
चीन ने ताइवान को हमेशा से एक ऐसे प्रांत के तौर पर देखा है, जो उससे अलग हो गया है. चीन मानता रहा है कि ताइवान, चीन का हिस्सा बन जाएगा. इसके लिए वो बल प्रयोग से भी इनकार नहीं करता है.
लेकिन ताइवान के बहुत से लोग ख़ुद को अलग राष्ट्र के तौर पर देखते हैं. हालांकि, ज़्यादातर लोग यथास्थिति बनाए रखने के पक्ष में हैं. मतलब ये है कि न तो वो ये चाहते हैं कि ताइवान, चीन से आज़ादी की घोषणा करे और न ही चीन के साथ जाए.
चीन और ताइवान के विवाद का इतिहास

इमेज स्रोत, Getty Images
ताइवान के इतिहास के मुताबिक़, यहाँ के पहले ज्ञात निवासी, ऑस्ट्रोनिशयन आदिवासी लोग थे. इन लोगों के बारे में माना जाता है कि ये दक्षिणी चीन से आए थे.
चीन के रिकॉर्ड में पहली बार ताइवान का ज़िक्र 239 ईसवी में हुआ था. जब एक सम्राट ने यहां अभियान दल भेजा था. ये एक ऐसा तथ्य है, जिसका इस्तेमाल चीन, ताइवान पर अपने दावे के लिए करता है.
कुछ समय तक डच उपनिवेश रहने के बाद ताइवान पर चीन के चिंग राजवंश का शासन रहा. लेकिन बाद में जापान के हाथों चीन की हार के बाद ताइवान, जापान के हिस्से में आ गया.
दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार हुई और जापान ने चीन के क़ब्ज़े वाले हिस्से को छोड़ दिया. फिर, ताइवान को आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ़ चीन (आरओसी) का हिस्सा मान लिया गया. चीन ने अपने सहयोगी देशों अमेरिका और ब्रिटेन की सहमति के बाद इस पर शासन शुरू कर दिया.
लेकिन अगले कुछ ही सालों में चीन में गृहयुद्ध छिड़ गया. उस वक़्त के चीन के बड़े नेता और मिलिट्री कमांडर चांग काई शेक की सेना को माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट सेना ने हरा दिया.
तब राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी के चांग काई शेक, उनकी पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक क़रीब 15 लाख लोग साल 1949 में चीन छोड़कर ताइवान पहुंचे.
चांग ने ताइवान में तानाशाही शासन शुरू किया और 1980 तक उनका यहां प्रभुत्व रहा. उनकी मौत के बाद ताइवान में लोकतंत्र के लिए बदलाव शुरू हुए और साल 1996 में यहाँ पहली बार चुनाव हुए.

इमेज स्रोत, CENTRAL PRESS
ताइवान को मान्यता कौन देता है?
एक राष्ट्र के तौर पर ताइवान की स्थिति को लेकर असहमति है.
ताइवान का अपना संविधान है, लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेता हैं और क़रीब 300,000 सैनिकों वाली सक्रिय सेना है.
चांग की निर्वासित आरओसी सरकार ने तो पहले पूरे चीन पर नियंत्रण का दावा किया था, जिस पर दोबारा क़ब्ज़ा करने का उनका इरादा था.
इसके पास संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन की सीट थी. कई पश्चिमी देशों ने इसे एकमात्र चीनी सरकार के रूप में मान्यता दी थी.
लेकिन 1970 के दशक में कई देशों ने ये तर्क देना शुरू कर दिया कि ताइवान की सरकार को मेनलैंड चीन में रहने वाले लोगों का वास्तविक प्रतिनिध नहीं माना जा सकता.
साल 1971 में संयुक्त राष्ट्र ने बीजिंग को राजनयिक मान्यता दे दी. जब साल 1978 में चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को खोलना शुरू किया तो अमेरिका को वहां व्यापार का मौक़ा दिखा. अमेरिका ने राजनयिक संबंधों की ज़रूरतों को पहचानते हुए साल 1979 में बीजिंग के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध शुरू किए.
तब से आरओसी सरकार को मान्यता देने वाले देशों की संख्या तेजी से गिरी और मौजूदा वक़्त में सिर्फ 12 देश ही ताइवान को मान्यता देते हैं. चीन दूसरे देशों पर ताइवान को मान्यता नहीं देने का कूटनीतिक दबाव डालता है.

ताइवान और चीन के बीच के संबंध कैसे हैं?
1980 के दशक में जब ताइवान ने चीन की यात्रा और निवेश से जुड़े नियमों में ढील दी तब दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार होने लगा.
साल 1991 में आरओसी ने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के साथ युद्ध के ख़त्म होने की घोषणा की.
चीन ने 'वन कंट्री टू सिस्टम' के तहत ताइवान के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर वो अपने आपको चीन का हिस्सा मान लेता है तो उसे स्वायत्ता प्रदान कर दी जाएगी.
इस सिस्टम के तहत 1997 में कुछ आज़ादी के साथ हॉन्ग कॉन्ग की चीन में वापसी हुई थी. हाल के दिनों में चीन ने हॉन्ग कॉन्ग पर अधिक नियंत्रण की कोशिश की है.
ताइवान ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, जिसकी वजह से बीजिंग ने और ज़ोर देकर कहा कि ताइवान की आरओसी सरकार अवैध है. लेकिन चीन और ताइवान के अनऔपचारिक प्रतिनिधियों के बीच अब भी सीमित बातचीत है.
साल 2000 में चेन श्वाय बियान ताइवान के राष्ट्रपति चुने गए, जिन्होंने खुलकर चीन के ख़िलाफ़ बोला. चेन और उनकी पार्टी डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) ने ताइवान की ''आज़ादी'' का पुरजोर समर्थन किया.

साल 2004 में चेन दोबारा राष्ट्रपति चुने गए. इसके ठीक एक साल बाद चीन ने अलगाव-विरोधी क़ानून पारित किया. इस क़ानून में ऐसे प्रावधान थे कि ताइवान को चीन से अलग होने से रोकने के लिए चीन ग़ैर-शांतिपूर्ण साधनों का इस्तेमाल कर सकता है.
चेन श्वाय बियान के बाद ताइवान में केएमटी पार्टी का शासन आया, जो कि पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना से घनिष्ठ संबंधों की पक्षधर थी.
साल 2016 में डीपीपी की साई इंग-वेन ने राष्ट्रपति पद संभाला. इसके बाद चीन के साथ ताइवान के संबंधों में और खटास आई. साई के पदभार संभालने के बाद चीन ने ताइवान के साथ संचार माध्यमों को बंद कर दिया. चीन ने कहा कि ताइवान ने 'वन चाइना' सिद्धांत को मानने से इनकार कर दिया, इस वजह से ऐसा हुआ.
साई इंग वेन ने ये कभी नहीं कहा कि वो औपचारिक तौर पर ताइवान की स्वतंत्रता की घोषणा करेंगी, बल्कि उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ताइवान तो पहले से ही स्वतंत्र है.

इमेज स्रोत, Reuters
साई के कार्यकाल के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का ताइवान को लेकर दावा आक्रामक हो गया. वो बार-बार ये कहते नज़र आए कि ताइवान का चीन के साथ फिर से एकीकरण होकर ही रहेगा. उन्होंने ''चीनी सपने को साकार करने'' के लिए साल 2049 का लक्ष्य रखा है.
जनवरी 2024 में ताइवान ने साई के उप-राष्ट्रपति विलियम लाई को राष्ट्रपति के तौर पर चुना. चीन ने उन्हें ''अलगाववादी'' क़रार दिया है.
गुरुवार को चीन की तरफ़ से हुए युद्धाभ्यास विलियम लाई के कार्यकाल के पहले हफ़्ते में हुआ है. बीजिंग ने इसे ''अलगाववादी हरकतों'' की ''सख़्त सज़ा'' बताया है. साथ ही चीन ने लाई को अब तक का सबसे ख़राब डीपीपी राष्ट्रपति बताया है.
चीन-ताइवान के संबंधों का अमेरिका से क्या नाता है?

इमेज स्रोत, REUTERS
अमेरिका का चीन से राजनयिक संबंध है. अमेरिका ''वन चाइना पॉलिसी'' के तहत चीनी सरकार को मान्यता देता है. लेकिन अमेरिका ताइवान का भी सबसे अहम सहयोगी है.
ताइवान को रक्षात्मक हथियार मुहैया कराने के लिए अमेरिका प्रतिबद्ध है और राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि अमेरिका सैन्य तौर पर ताइवान की सुरक्षा करेगा.
ताइवान लंबे समय से अमेरिका और चीन के बीच सबसे विवादास्पद मुद्दों में से एक रहा है. अमेरिका जब भी ताइवान के समर्थन की कोई बात करता है, चीन उसकी निंदा करता है.
साल 2022 में अमेरिकी स्पीकर नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद चीन ने जवाबी कार्रवाई के तौर पर बड़े पैमाने पर ताइवान के चारों ओर सैन्य अभ्यास किया था.
राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कार्यकाल में चीन ने 'ग्रे ज़ोन युद्ध' को और तेज़ कर दिया है. चीन, ताइवान के पास रिकॉर्ड संख्या में फाइटर जेट्स भेज रहा है. साथ ही अमेरिका और ताइवान के बीच किसी राजनीतिक बातचीत के जवाब में सैन्य अभ्यास कर रहा है.
'ग्रे ज़ोन' का मतलब है कि कोई देश सीधा हमला नहीं करता है लेकिन इस तरह का डर हमेशा बनाए रखता है.
साल 2022 में ताइवान के एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन ज़ोन में चीनी युद्धक विमानों की संख्या दोगुनी हो गई.
अब चुनाव के ये नतीजे अमेरिका-चीन के संबंधों की दिशा तय करेंगे. जीत किसी को भी मिले इसका असर अमेरिका, चीन और ताइवान के संबंधों पर पड़ेगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)


















