धर्म के लिए चीन जाने वाले अपने श्रद्धालुओं से क्यों डरा हुआ है ताइवान

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    • Author, टेसा वोंग और जॉय चांग
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हर साल चांग के-चुंग ताइवान में अपने घर से चीन की यात्रा करते हैं. ये यात्रा एक खास मकसद के लिए होती है. ये एक तीर्थयात्रा है.

वो समुद्र की देवी माज़ु की पूजा करते हैं. ताइवान और दुनिया भर में फैले चीनी मूल निवासी लोगों के बीच वो पूजी जाती हैं. उनके लिए दक्षिणी चीन में माज़ु देवी के गृह मंदिर की यात्रा एक अनिवार्य धार्मिक कर्म है.

ताइवान में एक माज़ु मंदिर का काम देखने वाले चांग कहते हैं, "हमारा मानना है कि हम माज़ु देवी के बच्चे हैं. इसलिए ये हमारे लिए अपनी मां से उनके पैतृक घर में मिलने के लिए की जाने वाली यात्रा है."

वो कहते हैं, "मैं कई बार चीन गया हूं और हर बार जब मैं वहां जाता हूं तो ऐसा लगता है कि अपने घर, अपने देश में हूं."

इस तरह की भावनाएं चीन को तो खुशियों से भर देती हैं लेकिन ताइवान को चिंतित कर देती हैं.

इसने ताइवानी भक्तों को राजनीतिक युद्ध के दो पाटों के बीच डाल दिया है. खास कर ऐसे वक़्त में जब ताइवान में राष्ट्रपति और संसदीय चुनाव महज दो हफ्ते दूर हैं.

ताइवान में बहुत सारे लोग माज़ु या दूसरी कई ऐसे लोक देवियों की पूजा करते हैं, जिनकी जड़ें चीन में हैं.

दोनों देश में कई धार्मिक समुदाय गहरे और भावुक रिश्ते साझा करते हैं. वे एक दूसरे देशों के मंदिरों में जाते हैं और साथ-साथ धार्मिक जुलूसों में हिस्सा लेते हैं.

चीन क्यों बढ़ावा दे रहा है इन यात्राओं को?

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इमेज कैप्शन, चेंग मिंग-कुन (बाएं) चीन में सोंग ताओ से मुलाकात के दौरान

चीन ताइवान को अपना क्षेत्र बताता है. उसका मानना है कि चीन और ताइवान के बीच ये भावनात्मक संबंध उसे फायदा पहुंचा सकता है क्योंकि आम ताइवानी नागरिक जितना अधिक चीन के साथ अपनी पहचान पर जोर देगा उसे ताइवान के 'शांतिपूर्ण एकीकरण' में उतनी ही मदद मिलेगी.

इसलिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी इस तरह के भक्तों की ऐसी यात्राओं को बढ़ावा दे रही है.

पार्टी अपने यूनाइटेड फ्रंट वर्क विभाग के जरिये ऐसी यात्रा को प्रोत्साहित कर रही है. ये विभाग धार्मिक मामलों और इस तरह के प्रभावित करने वाले आयोजनों पर नियंत्रित रखता है.

चीन का आधिकारिक रुख़ ताइवान से मजबूत रिश्तों का पैरोकार है. अधिकारियों ने दो देशों के बीच इस तरह की यात्राओं को बढ़ावा देने की बात की है.

चीनी अधिकारियों ने ताइवान के ऐसे समूहों का निजी तौर पर स्वागत किया है. इस साल फ़रवरी में जब ताइवानी माज़ु नेता चेंग मिंग-कुन ने चीन का दौरा किया तो उनकी मेजबानी चीन के ताइवानी मामलों के दफ्तर के चीफ सोंग ताओ ने की.

ताइवान के मंदिरों को चीन की फंडिंग?

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सोंग ने इस मौके पर चीन और ताइवान की आध्यात्मिक एकता की अपील की. साथ ही एकीकरण के लिए ऐसी और यात्राओं की पैरवी की.

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ताइवान में चीन का असर और ज्यादा बढ़ सकता है.

ताइवान में 12 हजार मंदिर आधिकारिक तौर पर रजिस्टर्ड नहीं हैं. कुछ ही मंदिर अपना हिसाब-किताब सार्वजनिक करते हैं. लिहाजा ये पता लगाना मुश्किल है इन्हें फंड कहां से मिलता है.

समाजशास्त्री मिंग-शो हो का कहना है कि ये चीन ओर से की जाने वाली कथित फंडिंग की ओर इशारा करता है.

इसलिए हाल में इन ताइवानी मंदिरों के कड़े नियमन और वित्तीय स्त्रोतों पर नजर रखने की मांग उठी थी.

ताइवान यूनिवर्सिटी में धर्म और राजनीति के विशेषज्ञ चांग कुई-मिन का कहना है कि धर्म अब ताइवान पर चीन की 'वृहद संयुक्त मोर्चा' की रणनीति का हिस्सा है.

वो कहती हैं,'' चीन ने एकीकरण के अपने नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए इस धार्मिक परंपरा का इस्तेमाल किया है.''

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चीन ऐसे सभी ताइवानी धार्मिक समुदायों का स्वागत करता है लेकिन माज़ु समुदाय पर खास ध्यान है क्योंकि उनकी संख्या काफी अधिक है. एक अनुमान के मुताबिक ताइवान के लगभग 60 फीसदी लोग माज़ु समुदाय के हैं.

ताइवान में लोक धर्मों के विशेषज्ञ वेन शुंग-हान कहते हैं, ''मूल रूप से चीन ताइवानी लोगों को आकर्षित करने के लिए ताइवानी देवी का इस्तेमाल कर रहा है.''

वो कहती हैं,''आप मां से खुद को जोड़ते हैं. इसका मतलब आप माज़ु देवी से खुद जोड़ कर रहे हैं. यानी आप खुद को चीन से भी जोड़ रहे हैं.''

चीन के साथ का ये रिश्ता ताइवानी सरकार को लंबे समय से परेशान करता रहा है.

इस संबंध में पहला बड़ा विवाद 1987 में उठा था जब एक माजु़ मंदिर से जुड़ा एक प्रमुख ताइवानी समूह चुपचाप चीन के मिझाऊ पहुंच गया और उस वक्त चीन और ताइपे के बीच कोई औपचारिक संपर्क नहीं था. मंदिर और ताइवानी संसद दोनों में ये मामला जोर-शोर से उठा था.

जैसे-जैसे चीन और ताइवान के बीच आर्थिक संबंध बढ़ते गए वैसे-वैसे यात्राओं पर प्रतिबंध हटते गए. चीन के सरकारी मीडिया के मुताबिक़ अब हर साल तीन लाख ताइवानी श्रद्धालु मिझाऊ पहुंचते हैं.

इन बढ़ती यात्राओं से ताइवानी सरकार को और सशंकित कर दिया है. खास कर डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के तहत चलने वाली सरकार इसे लेकर सशंकित है.

पिछले आठ साल से सरकार चला रही डीपीपी का कहना है कि ताइवान एक संप्रभु देश है. ये चीन का हिस्सा नहीं है.

चीन के उलट ताइवान में लोकतंत्र है. इसलिए सरकार इस तरह की धार्मिक यात्राओं पर अंकुश लगाने से हिचकती है. लेकिन जनवरी में होने वाले चुनाव से पहले उसने चीन के इस तरह के प्रभाव पर चेतावनी देना शुरू कर दिया है.

ताइवान के चुनाव और श्रद्धालु

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ताइवान भले ही अपने यहां चीन के प्रभाव से लड़ने की कोशिश कर रहा है, लेकिन डीपीपी सरकार को डर है कि इस पर ज्यादा जोर दिया गया तो उसके वोटरों का अच्छा-खासा हिस्सा उससे छिटक सकता है.

ताइवान में मंदिर ऐसे सार्वजनिक जगह हैं जहां बड़ी तादाद में श्रद्धालु नागरिकों की मौजूदगी रहती है. यहां दो तिहाई लोग लोक धर्मों, बौद्ध और ताओ धर्म का पालन करते हैं.

चुनावी मौसम में राजनीतिक नेताओं के लिए ऐसे धार्मिक जगहों पर जाना जरूरी होता है. पिछले राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने एक ही महीने में 43 मंदिरों का दौरा किया था.

लेकिन डीपीपी सरकार लोगों की आलोचनाओं की शिकार हो रही है. डॉ. चांग कहते हैं,'' धार्मिक समुदाय के लोग ये महसूस कर रहे हैं कि उन्हें निशाना बनाया जा रहा है. कुछ मंदिरों को लग रहा है कि उनकी धार्मिक भावनाओं के बारे में गलतफहमी फैल रही है.''

ताइवान के लोग क्या कहते हैं?

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चीन के प्रभाव और माजु़ देवी के लिए यहां की यात्रा जैसे मामलों ने मिलकर एक ऐसा माहौल बनाया है जिससे ताइवान के लोगों का अपनी सरकार के प्रति शक बढ़ रहा है. उन्हें बदला लिए जाने का डर भी सता रहा है.

कुछ श्रद्धालुओं के लिए उनकी जांच की जा रही है. लेकिन ये एक तरह की हिप्पोक्रेसी है.

ताइपे में सोंगशान सियु माज़ु मंदिर के बाहर खड़े ली चिन-चेन कहते हैं, ''चीन जाने वाले हम जैसे लोगों को वो ये कह रहे हैं कि हम चीन के साथ एकीकरण के लिए जा रहे हैं. लेकिन नेता लोग भी मंदिरों के कार्यक्रम में जाते हैं. वे इन मंदिरों की गतिविधियों में भी हिस्सा लेते हैं. एक तरफ तो आपको वोट चाहिए लेकिन पीठ पीछे आप चीन जाने वाले श्रद्धालुओं की आलोचना भी करते हैं.''

लेकिन वांग यु-चिआओ जैसे लोग इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है, ''ये हर कोई जानता है कि चीन ताइवान के चुनाव को प्रभावित करने के लिए चालाकी करेगा. वो चाहते हैं कुओमिन्तांग जीत जाए. हमें सतर्क रहने की जरूरत है.''

लेकिन वो ये भी कहती हैं कि डीपीपी सरकार के दौरान पिछले आठ साल में अर्थव्यवस्था की स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं रही है, "मुझे लगता है कि दोनों ओर को इस तरह लोगों के आने-जाने के अभियानों की जरूरत है. इससे ताइवान की अर्थव्यवस्था को भी फायदा होगा.''

वहीं ली जैसे लोगों का कहना है कि अगर आपका आत्मविश्वास कमजोर है तभी आपको डर लगेगा.''

वो कहते हैं, ''चीन और ताइवान के बीच दशकों से ऐसी आवाजाही जारी है. आप इस पर हमेशा निगरानी नहीं बनाए रख सकते. आपको खुद को मजबूत बनाने की जरूरत है. अगर आप बेहतर बनते हैं तो डरने की कोई जरूरत नहीं है.

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