क्या शी जिनपिंग चीन और वियतनाम के रिश्तों को नई शक्ल दे पाएंगे?

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    • Author, जोनाथन हेड
    • पदनाम, दक्षिण पूर्व एशिया संवाददाता

चीन के नेता शी जिनपिंग ने मंगलवार को वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख नुग्येन फु ट्रॉन्ग से मुलाक़ात की. जिनपिंग वियतनाम की राजकीय यात्रा पर हैं.

ट्रॉन्ग ने एक साल पहले चीन की यात्रा की थी और उन्हें विदेशी अतिथियों के लिए दिए जाने वाले चीन के शीर्ष मेडल से नवाज़ा गया था.

उस समय चीन के राष्ट्रपति ने दोनों देशों के बीच के रिश्तों को ‘कॉमरेड और भाइयों’ के बीच का रिश्ता बताया था.

उन्होंने कहा था कि ये दोनों देश पहाड़ों और नदियों के ज़रिये उसी तरह जुड़े हैं और उतने ही नज़दीक हैं जितने कि दांत और होंठ होते हैं.

उम्मीद है कि शी जिनपिंग के इस दौरे के दौरान वियतनाम ‘साझा नियति के समुदाय’ से जुड़ने का ऐलान कर सकता है.

ये एक चीन-केंद्रित और मोटे तौर पर प्रतीकात्मक अवधारणा है. इसे अमेरिका के नेतृत्व वाली मौजूदा विश्व व्यवस्था के लिए चुनौती की तरह देखा जाता है.

अगर ऐसा हुआ तो वियतनाम को अपने पाले में करने की होड़ में चीन अमेरिका पर बढ़त ले सकता है. क्योंकि सितंबर में हनोई की यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने वियतनाम का दर्जा बढ़ा कर उसे अपने देश का ''समग्र रणनीतिक पार्टनर'' घोषित कर दिया था.

इस ऐलान से अमेरिका भी चीन के साथ उस धरातल पर खड़ा हो गया है जहां वो अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों का क्रम तय कर रहा है.

चीन और वियतनाम के बीच विवादास्पद मुद्दे

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इस यात्रा के दौरान चीन वियतनाम को अत्याधुनिक रेलवे टेक्नोलॉजी की पेशकश करेगा,जिससे वो अपने ट्रांसपोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर को नई शक्ल दे सके.

इनमें दक्षिणी चीन से लेकर वियतनाम के हाईफोंग बंदरगाह तक रेल लिंक का निर्माण शामिल है. यह रास्ता एक ऐसे क्षेत्र से गुजरता है जिसमें वियतनाम के रेयर अर्थ धातुओं के बड़े भंडार हैं.

चीन रेयर अर्थ मैटेरियल का सबसे बड़ा रिफाइनर और निर्यातक है. इलेक्ट्रिक गाड़ियों के निर्माण और रिन्युबल एनर्जी के लिए ये एक अनिवार्य धातु है.

दोनों देशों के बीच एक चीज पर निश्चित तौर पर बातचीत नहीं होगी. कम से कम सार्वजनिक तौर पर तो इस विषय पर बात नहीं ही होगी. और ये मुद्दा है दक्षिण चीन सागर के द्वीपों को लेकर दोनों देश में चल रहा विवाद.

इसके अलावा 1970 और 1980 के दशक में दोनों देशों के बीच कलहपूर्ण रिश्तों पर भी बात नहीं होगी. उन विवादों की वजह से दोनों देश युद्ध लड़ चुके हैं और इनमें दोनों ओर के हजारों सैनिकों की मौत हो चुकी है.

चीन की ओर से वियतनाम को ऐतिहासिक तौर पर उपनिवेश बनाए रखने की भी चर्चा नहीं होगी.

इसे स्थानीय भाषा में 'नघिन नाम बाक थॉक' कहा जाता है. इसका मतलब होता है उत्तर का हजार साल का कब्जा.

मेकॉन्ग नदी पर चीन की ओर से बनाए गए डैम के प्रति वियतनाम की शिकायत पर भी शायद ही बात होगी.

लेकिन ऑनलाइन मीडिया में चीन और वियतनाम के बीच इन विवादों की चर्चा हो रही है. वियतनाम में इटंरनेट पर चीन की तुलना में सख्ती कम है.

एक वियतनामी फेसबुक यूजर ने लिखा,''अगर शी जिनपिंग ने नाइन-डैश लाइन को हटा दिया तो दोनों देश तुरंत भाई बन सकते हैं.''

उनका इशारा दक्षिण चीन सागर में चीन की विस्तारवादी नीतियों की ओर ओर था. चीन का कहना है कि पूरे दक्षिण चीन सागर पर उसका कब्जा है. इस मुद्दे पर वियतनाम समेत उसके पड़ोसी देशों से विवाद रहा है.

चीन का निवेश और वियतनाम की जरूरत

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वियतनाम के लोगों में चीन विरोधी भावनाएं किसी भी दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की तुलना में ज्यादा उग्र हो सकती हैं. इसे वहां के गर्वीले राष्ट्रवाद से भी हवा मिल सकती है.

वियतनाम ने फ्रांस और अमेरिका को अपना कर अपनी आजादी हासिल है. उसके अंदर अपने विशाल पड़ोसी देश के वर्चस्व के तहत दब जाने की भी आशंका है.

वियतनाम के कम्युनिस्ट नेताओं को यहां के लोगों की इन भावनाओं का ध्यान रखना होगा.

हाल के कुछ वर्षों में यहां कुछ मौकों पर चीन विरोधी प्रदर्शन भी हुए हैं. 2014 में तो दंगे तक हुए, जिनमें कई लोग मारे गए थे और दर्जनों विदेशी फैक्टरियां ध्वस्त कर दिए गए थे.

दरअसल ये हिंसा तेल के एक कुएं को लेकर विवाद की वजह से हुई थी. चीन इसे अपना बता रहा था कि जबकि वियतनाम का दावा था कि ये उसके जल क्षेत्र में था.

कुछ साल पहले हनोई में ऐसे दुकान खुलने शुरू हुए थे जो सिर्फ वियतनामी सामान बेचने का दावा कर रहे थे. इनमें चीन का कोई सामान नहीं बेचा जाता था.

हालांकि बाद में दोनों ओर की सरकारों ने इस बात का ध्यान रखा है कि 2014 के तेल कुएं जैसा विवाद न हो. और लोगों की भावनाएं न भड़के. लेकिन इस तरह के विवाद से भड़का रोष बहुत ज्यादा ठंडा नहीं हुआ है.

नाइन डैश लाइन विवाद पर लोगों की भावनाएं इस कदर भड़की हुई थीं कि इस साल अधिकारियों को बार्बी फिल्म का प्रदर्शन रोक देना पड़ा था.क्योंकि इसमें जो नक्शा दिखाया गया था उस पर चीन का दावा बताया जा रहा था. जबकि वियतनाम इसका विरोध करता रहा है.

वियतनाम बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत किए जा रहे निवेश हासिल करने में भी हिचकिचाता रहा है. इसकी एक वजह ये है कि इससे वियतनाम में चीन के बढ़ते आर्थिक दखल को लेकर देश में नाराजगी फैल सकती है.

हालांकि ये भी सच है वियतनाम में चीन का काफी आर्थिक असर है. यहां उसका खासा निवेश है. वियतनाम के लोग चाहे कुछ भी सोचें लेकिन इसके नेता इस निवेश को नुकसान पहुंचाने का जोखिम नहीं लेंगे.

वियतनाम की दुविधा

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चीन वियतनाम का सबसे बड़ा कारोबारी साझीदार है. दोनों देशों के बीच 200 अरब डॉलर का द्विपक्षीय कारोबार है.

ये निवेश अमेरिका के निवेश से भी ज्यादा है.चीन वियतनाम में सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक है.

ये तब है जब वियतनाम को अमेरिकी कंपनियों के वैकल्पिक हब के तौर पर खड़ा करने की कोशिश हो रही है. अमेरिकी कंपनियां मैन्युफैक्चरिंग के मामले में चीन पर अपनी निर्भरता घटाने की कोशिश कर रही हैं.

वहीं चीनी कंपनियां भी अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए अपना प्रोडक्शन वियतनाम शिफ्ट कर रही हैं.

इन तमाम चीजों के अलावा सबसे बड़ी बात ये है कि अभी भी चीन और वियतनाम के नेतृत्व की वैचारिक करीबी बरकरार है.

शी जिनपिंग और ट्रॉन्ग दोनों कट्टरपंथी माने जाते हैं. दोनों अपनी पार्टियों के अधिनायकवादी विचारों को अपना चुके हैं.

दोनों में पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति एक दुर्भावना है. दोनों नेता अपनी-अपनी पार्टियों पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना चाहते हैं.

इसके बावजूद दोनों नेताओं के रणनीतक नजरिये में खासा अंतर होगा.

चीन एक उभरता हुआ सुपरपावर है, जो शीत युद्ध के बाद की दुनिया में अमेरिका के नेतृत्व में एक ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था को को चुनौती देना चाहता है.चीन खुद इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व चाहता है.

रिश्तों में संतुलन की कोशिश

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वियतनाम एक मझोली शक्ति है, जो चीन और अमेरिका की प्रतिद्वंद्विता में संतुलन बिठाते हुए उनके साथ अपने रिश्तों से ज्यादा से ज्यादा हासिल करने की कोशिश में है. वियतनाम की रूस से भी ऐतिहासिक करीबी है. और वो रूस के साथ अपने रिश्तों को अभी भी अहमियत देता है.

ट्रॉन्ग इसे ''बैम्बू डिप्लोमेसी'' कहते हैं. ये लचीली कूटनीति है, जो चार ‘नहीं’ पर टिकी है. 1986 में सोवियत समर्थक अपनी नीतियों को छोड़ते हुए वियतनाम ने किसी से सैन्य गठबंधन न करने का फैसला किया.

इसके साथ ही इसने किसी एक देश के ख़िलाफ़ पक्ष न लेने,वियतनामी जमीन पर कोई मिलिट्री बेस न बनने देने और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ताकत का इस्तेमाल न करने का फैसला किया.

इस नीति के तहत वियतनाम सभी से दोस्ताना संबंध चाहता है. वो किसी से दुश्मनी नहीं चाहता. इसके बावजूद चीन को वियतनाम की ओर से अमेरिका से नजदीकी बनाने की उसकी कोशिश को लेकर कोई भ्रम नहीं है.

वो ये जानता है कि इस साल उसने अमेरिका से संबंध मजबूत कर इस क्षेत्र में उसका वर्चस्व कम करने की कोशिश की है.

भले ही वियतनाम के लोग इससे इत्तेफाक न रखते हों लेकिन वहां के नेताओं को लगता है कि उसके दोस्तों में चीन अगली पंक्ति में होना चाहिए.

लेकिन वियतनाम और चीन का रिश्ता कई मामलों का बंधक रहेगा. चाहे वो दक्षिण चीन सागर में दोनों के बीच बढ़ा विवाद हो या फिर कोई ऐसा मामला जिसे वियतनाम के लोग चीन का दबदबा कायम करने की कोशिश मानेंगे.

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