ताइवान ने बताया- अगर चीन ने किया हमला तो वो कैसे करेगा मुक़ाबला

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- Author, रूपर्ट विंगफील्ड-हेयस
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हमले का पहला संकेत, ज़मीन से बेहद क़रीब उड़ते अटैक हेलिकॉप्टरों के ज़रिए मिलता है. इनके पीछे गहरे हरे रंग से बड़े हेलिकॉप्टर हैं जिनमें सैनिक सवार हैं.
और फिर समुद्र की बीच के पीछे, पानी से बाहर निकलती हुए जल और ज़मीन पर चलने वाली बख़्तरबंद गाड़ियां चौंका देने वाली गति से आगे बढ़ती हैं.
ये गाड़ियां अपने पीछे रेत का ग़ुबार छोड़ती जा रही हैं. जल्द ही इन गाड़ियों से कई सैनिकों ने उतरना शुरू कर दिया.
पल भर को तो लगा कि ताइवान के रक्षक अचानक हुए हमले से सकपका गए हैं.
फिर एक सायरन बजता है लेकिन समुद्र की बीच के किनारे बने मोर्चे में से भारी हथियारो से सुसज्जित सैनिक दौड़ते हुए नज़र आते हैं. और फिर शुरू होती है मशीन गनों की ज़बरदस्त फ़ायरिंग.

ताइवान का युद्धाभ्यास
पास की झाड़ियों से बैटल टैंक निकल कर आते हैं. और फिर बख़्तरबंद गाड़ियां.
गोलीबारी की आवाज़ तेज़ होती जाती है. पीछे पहाड़ी पर अटैक हेलिकॉप्टरों की आवाज़ गूंजनी शुरू होती है. हमला करने आए सैनिकों पर गोलियों की बौछार होती है.
बीच पर कई ज़बरदस्त विस्फोट होते हैं. हमलावर पूरी तरह से घिर जाते हैं और उनके पास वापस लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता है.
ताइवान अब सुरक्षित है. ये पूरा घटनाक्रम महज़ 20 मिनट में पूरा हो गया है.
एक छत पर मौजूद मिलिट्री कमांडर वहाँ मौजूद पत्रकारों से कहते हैं, "आज हमने दिखा दिया कि हम अपने देश की सुरक्षा के लिए क्या-कुछ कर सकते हैं. हमें यक़ीन है कि इन अभ्यासों के ज़रिए हम किसी भी हालात से निपटने के लिए चौकस रहेंगे."
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जीत का एलान
पर क्या वाकई ताइवान चीनी हमले से ऐसे अभ्यासों के ज़रिए पार पा सकता है?
इस सैन्य अभ्यास को देखकर कोई ये कह सकता है कि ये वास्तविकता से बहुत दूर था.
हमलावर सेना की संख्या बहुत कम थी और ताइवान की रक्षा करने के लिए आई सेना को पहले से ही पता था कि हमला होने वाला है.
सब कुछ एक तय स्क्रिप्ट के तहत हुआ था. और छोटे-मोटे संघर्ष के बाद, तुरंत जीत का एलान कर दिया गया.
लेकिन ये आकलन एकदम दुरुस्त तो नहीं ही होगा.
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हान कुआंग मिलिट्री अभ्यास
मुझे याद है कि 25 साल पहले ताइवान के सालाना हान कुआंग मिलिट्री अभ्यास के लिए ले जाया गया था. उस वक़्त सब कुछ सिर्फ़ कैमरे के लिए ही था.
लंदन के किंग्स कॉलेज में वॉर स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर अलेसियो पालाटानो कहते हैं, "मुझे लगता है कि अब वो घड़ी आ गई है. पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये धारणा थी कि ताइवान अपनी सेना को बेहतर बनाने को लेकर काफ़ी सुस्त था. लेकिन इस हफ़्ते आपको वाकई ये अहसास होता है कि वो अब इस मुद्दे पर गंभीर हैं और अपने काम करने के तरीके में महत्वपूर्ण परिवर्तन कर रहे हैं."
ये भी साफ़ है कि ताइवान, यूक्रेन में चल रहे युद्ध से सीख रहा है.
रूस की यूक्रेन पर चढ़ाई के पहले दिन रूसी सेना राजधानी कीएव के पास एक एयरपोर्ट पर कब्ज़ा कर लिया था और उस हवाई अड्डे का इस्तेमाल कीएव पर हमले की कोशिश में किया गया था.
लेकिन ये कोशिश विफल रही थी.
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हमले की हिम्मत
तो अब ताइवान का फ़ोकस इस बात पर है कि संभावित चीनी हमले में चीन उनके किन स्थानों पर शुरुआत में कब्ज़ा करना चाहेगा.
उन्हें लगता है कि चीन उत्तरी ताइवान के समुद्री किनारों के अलावा उसके प्रमुख इंटरनेशनल हवाई अड्डे और मुख्य बंदरगाहों पर कब्ज़ा करना चाहेगा.
लेकिन प्रोफ़ेसर पलाटानो कहते हैं कि यूक्रेन एक और ढंग से भी ताइवान को सीख देता है.
यूक्रेन पर रूसी हमले ने ताइवान की उस धारणा को धराशायी कर दिया है जिसमें उसे लगता था कि चीन हमले की हिम्मत नहीं करेगा.
वे कहते हैं, "यूक्रेन युद्ध ने उस मौलिक धारणा को ध्वस्त कर दिया जिसमें कहा जाता था कि चीन हमला ही नहीं करेगा. और एक बार ऐसी धारणा तार-तार होती है तो आपको अपनी हर तैयारी को दोबारा चुस्त-दुरुस्त करना होता है."
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बीते कई वर्षों में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कहते रहे हैं कि ताइवान पर हमला कर उसे वापस चीन में शामिल करने का विकल्प हमेशा खुला है.
और चीन इसे संभव बनाने के लिए हवाई और नोसैनिक ताक़त भी लगातार बढ़ा रहा है.
राष्ट्रपति शी के पास इस काम के लिए एक टाइम टेबल है. वर्ष 2027 तक चीन के पास इस क्षेत्र में जंग जीतने की ताक़त होगी. वर्ष 2035 तक चीन के पास एक वर्ल्ड क्लास सेना होगी.
और वर्ष 2049 तक चीन का पुनर्जागरण संपूर्ण हो जाएगा.
लेकिन ताइवान के पास अधिक वक़्त नहीं है.
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डराने-धमकाने की डिप्लोमेसी
प्रोफ़ेसर पलाटिनो कहते हैं, "हम जानते हैं कि चीन ने एक समय सीमा तय की है. हालांकि ताक़त का प्रयोग पहला विकल्प नहीं है. ये विकल्प तभी आएगा जब बाक़ी सारी कोशिशे विफल हो जाएंगी. उद्देश्य ताक़त का प्रयोग न करके, ताइवान को डरा-धमका कर अपने साथ करने का है."
इस डराने-धमकाने की डिप्लोमेसी के जरिए ताइवान के लोगों और सरकार को ये बताना है कि चीन के साथ विलय अपरिहार्य है. और इसका विरोध करना बेकार है.
और ये डिप्लोमेसी शुरू भी हो चुकी है. इस वर्ष के पहले छह महीनों में ताइवान के हवाई क्षेत्र चीन के अतिक्रमण की तादाद में 60 प्रतिशत बढ़ी है. चीन लगातार अपनी सीमाओं को आज़मा रहा है.
फ़िलहाल ताइवान को अब भी बहुत कुछ करना है.
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ताइवान अनिवार्य मिलिट्री सर्विस को चार महीने से बढ़ाकर एक साल कर रहा है. वो अपने द्वीप को सुरक्षित बनाने के लिए साइबर अटैक से निपटने की रणनीति बना रहा है.
तैयारियां वास्तविक हमले से निपटने की भी हैं.
यूक्रेन की नकल करते हुए ताइवान बहुत से छोटे लेकिन जल्द डेप्लॉय किए जा सकने वाले मिसाइल सिस्टम भी खरीद रहा है.
इनका इस्तेमाल टैंकों, समुद्री जहाज़ों और हवाई जहाज़ों के ख़िलाफ़ किया जा सकता है.
साथ ही ताइवान जल्द ही एक पनडुब्बी भी अपने नौसैनिक बेड़े में शामिल करने जा रहा है.
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शक्तिशाली चीन
लेकिन ताइवान के कई सैनिकों को अब भी पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं मिली है.
उसके हथियार और सैन्य सोच भी पुरानी हो चुकी है.
एक बात है जो काफ़ी अहम है. चीन की अर्थव्यवस्था और मिलिट्री ताक़त के बावजूद ताइवान पर पड़ने वाला मनोवैज्ञानिक दवाब काम करता नज़र नहीं आ रहा.
अब 70% ताइवान के लोग कह रहे हैं कि चीन के हमले से लड़ने के लिए तैयार हैं.
ये लोग अब नहीं मानते कि शक्तिशाली चीन से युद्ध करना बेकार है.
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