ताइवान के चुनाव में चीन और अमेरिका का क्या हित है?

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- Author, केली एनजी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
इस समय पूरी दुनिया की नजरें स्वशासित द्वीप ताइवान के चुनाव पर लगी हैं. वहां 13 जनवरी को मतदान होगा. इसमें करीब दो करोड़ 30 लाख मतदाता भाग लेंगे.
शनिवार को होने वाले चुनाव में जो भी व्यक्ति राष्ट्रपति चुना जाएगा वो अमेरिका और चीन के साथ रिश्ते को आकार देगा. इस भूभाग में अमेरिका और चीन के बीच जारी तनाव के केंद्र में ताइवान है.
इसका ताइवान के पड़ोसियों के साथ-साथ जापान जैसे सहयोगियों पर भी तगड़ा प्रभाव पड़ेगा, जो दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामक गतिविधियों से सावधान हैं.
ताइवान पर चीन का दावा

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चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने पिछले साल रिकॉर्ड संख्या में ताइवान में घुसपैठ की और उस पर दबाव बढ़ाया, इसे देखते हुए अधिकांश मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंताओं में से चीन एक है.
चीन काफी पहले से ही इस द्वीप पर दावा करता रहा है, लेकिन हाल के सालों में राष्ट्रपति साई इंग-वेन और उनकी डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) के शासन के दौरान दोनों देशों के संबंधों में खटास आई है.
साई इंग-वेन ने ताइवान की संप्रभु स्थिति को बचाने की सावधान कोशिशें कीं, इस वजह से चीन ने ताइवान के साथ औपचारिक संचार निलंबित कर दिया.
चीन ने कहा कि ताइवान ने 'वन चाइना' सिद्धांत को मानने से इनकार कर दिया, इस वजह से ऐसा हुआ. चीन का मानना है कि ताइवान उसका एक अभिन्न अंग है और एक दिन उसका चीन में विलय तय है.
साल 2022 में हालात और भी बदतर हुए, जब तत्कालीन अमेरिकी हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी ने ताइवान की यात्रा की.
उनकी इस यात्रा ने चीन को नाराज कर दिया. उसने ताइवान जलडमरूमध्य में विस्तृत सैन्य अभ्यास किया और ताइवान की करीब-करीब नाकेबंदी कर दी. उसी साल बाद में अमेरिका ने कहा कि शी जिनपिंग ने एकीकरण की समय सीमा बढ़ा दी है.
इस दौरान ताइवान अमेरिका के और करीब आ गया. उसने अमेरिका से अरबों डॉलर के नए हथियार हासिल किए.
चुनाव में कौन चल रहा है आगे

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डीपीपी के उपाध्यक्ष विलियम लाई को राष्ट्रपति पद की दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा है, चीन उन्हें पसंद नहीं करता है. वह उन्हें ताइवान की स्वतंत्रता के मुखर समर्थक के रूप में देखता है. लेकिन वो इसे खारिज करते हैं.
अगर इस चुनाव में डीपीपी लगातार तीसरी बार जीत दर्ज करती है तो चीन ताइवान जलडमरूमध्य में सैन्य दबाव बढ़ा सकता है. वह ताइवान के दूर-दराज के द्वीपों तक इंटरनेट केबल या सप्लाई रूट को काट भी सकता है.
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और विदेश मंत्री वांग यी ने बार-बार कहा है कि जरूरत पड़ने पर चीनी सेना के जरिए ताइवान पर कब्जा करने के लिए तैयार है. लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध की संभावना कम है, कम से कम अभी के लिए, चीन को इसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी, वह भी ऐसे समय जब उसकी अपनी अर्थव्यवस्था संकट में है.
ताइवाइन-चीन संबंध और खराब हुए तो क्या होगा?

चीन और ताइवान के बीच किसी भी तनाव के बड़ा और खतरनाक हो जाने का जोखिम है. इस क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना की बड़ी मौजूदगी है. दक्षिण में ऑस्ट्रेलिया से लेकर उत्तर में जापान तक उसके अड्डे हैं.
अमेरिका ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि चीनी हमले की स्थिति में उसका समर्थन किस रूप में होगा. यह भी साफ नहीं है कि इस क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की मेजबानी करने वाला जापान खुद युद्ध में लड़ेगा या नहीं.
अमेरिका को उम्मीद है कि उसकी भागीदारी की संभावना से चीन की आक्रामकता पर रोक लगेगी. कई विश्लेषकों का कहना है कि चीन भी शांतिपूर्ण एकीकरण के लिए संघर्ष से बचना चाहता है.
अमेरिका ने कहा है कि विपक्ष कुओमितांग (केएमटी) के जीतने पर ताइवान पर चीनी प्रभुत्व बढ़ सकता है. लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि लाई की जीत भी अमेरिका को चिंतित करेगी.
अगर ऐसा होता है, तो ताइवान में युद्ध विनाशकारी साबित होगा, दोनों रूपों में जानमाल के नुकसान और ताइवान के लोकतंत्र के लिए झटके के रूप में.
अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा
यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी बरबाद कर देगा. दुनिया के करीब आधे कंटेनर जहाज हर साल ताइवान जलडमरूमध्य से होकर ही गुजरते हैं. यह इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाता है.
दुनिया का अधिकांश सेमीकंडक्टर भी ताइवान ही बनाता है. ये सेमीकंडक्टर कारों और रेफ्रिजरेटर से लेकर फोन तक को आधुनिक बनाते हैं.
इसमें कोई भी व्यवधान अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन को पंगु बना देगा. वहीं चीन के खिलाफ प्रतिबंधों से वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा.
कुछ अनुमानों के मुताबिक चीन के व्यापार में व्यवधान से वैश्विक व्यापार में 2.6 ट्रिलियन डॉलर या विश्व के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3 फीसदी के बराबर का नुकसान होगा.

चीन ताइवान का सबसे बड़ा खतरा और उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है.
चीन के साथ संबंध सुधारना ताइवान पर शासन करने वाले किसी भी व्यक्ति का शीर्ष एजेंडा है. जीवनयापन की बढ़ती लागत और नौकरियों का संकट इस चुनाव में के प्रमुख घरेलू मुद्दे हैं.
विश्लेषकों को एक बंटी हुई सरकार आने की उम्मीद है, जहां कार्यपालिका और विधायिका पर अलग-अलग दलों का नियंत्रण होगा.
राजनीतिक गतिरोध की संभावना के बाद भी विश्लेषकों को उम्मीद है कि अनुभवी डीपीपी और कम ताकतवर केएमटी ताइवान की अर्थव्यवस्था को गति देने और चीन के साथ शांति बनाए रखने के बीच सही संतुलन बना सकते हैं.
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