ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के अधिकारों की लड़ाई पटरी से क्यों उतर गई? - दुनिया जहान

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21 मई 2022 को ऑस्ट्रेलिया के नये प्रधानमंत्री एंथनी एल्बानीज़ ने पद संभालने के बाद दिए पहले भाषण में जहां आर्थिक विकास और सुरक्षा के वादे किए वहीं एक ऐसा वादा भी किया जिसे सुन कर ऑस्ट्रेलिया के इंडिजिनस समुदाय यानि मूल निवासियों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई.

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एल्बानीज़ ने कहा कि ‘जिस ज़मीन पर यह देश बना है उसके पूर्व और वर्तमान मूल निवासियों के प्रति वो आदर व्यक्त करते हैं और देश के संविधान में उनके अधिकारों को जगह दी जाएगी.’

शुरुआत में इस प्रस्ताव को अच्छा समर्थन भी मिला. शुरुआती सर्वेक्षणों के अनुसार, 60% से अधिक ऑस्ट्रेलियाई लोग इस प्रस्ताव के पक्ष में थे.

लेकिन 18 महीने बाद इस साल अक्तूबर में मतदाताओं ने इस प्रस्ताव को नामंज़ूर कर दिया.

इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यही समझने की कोशिश करेंगे कि आख़िर ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के अधिकारों की लड़ाई पटरी से क्यों उतर गई?

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ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी

1788 में जब ब्रिटिश उपनिवेशवादी पहली बार ऑस्ट्रेलिया पहुंचे तो वहां पहले ही बड़ी संख्या में मूल निवासियों के अलग अलग समुदाय रहते थे.

उनके बारे में हमने बात की, इतिहासकार जॉन मेनार्ड से जो ख़ुद ऑस्ट्रेलियाई मूल निवासियों के समुदाय से हैं और ऑस्ट्रेलिया की न्यू कासल यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं.

उनके अनुसार, “उस समय ऑस्ट्रेलिया में 300 से 500 के बीच भाषा भाषी समूह थे. इस विविधता की तुलना यूरोप की विविधता से की जा सकती है. और ये समूह पूरे ऑस्ट्रेलिया में बसे हुए थे.”

“बीसवीं सदी तक, इतिहासकार मानते रहे कि उपनिवेशवादियों के पहुंचने से पहले ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की आबादी दो या चार लाख थी. लेकिन 1980 में यह अनुमान लगाया गया कि 1788 से पहले ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की आबादी लगभग 10 लाख थी."

"तो सवाल उठता है कि यह लोग गए कहां? क्योंकि 20वीं सदी के अंत तक उनकी तादाद 70,000 के करीब सिमट गई थी.”

ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को उपनिवेशवादियों की हिंसा ही नहीं बल्कि उनके साथ आई बीमारियों का भी सामना करना पड़ा. उनकी आबादी इतना घट गई कि वे लुप्त होने की कगार पर पहुंच गए.

जॉन मेनार्ड के अनुसार, “ब्रिटिश लोगों के 1788 में ऑस्ट्रेलिया पहुंचने के 60 साल के भीतर पूरे ऑस्ट्रेलिया में मूलनिवासियों की आबादी 60 से 90 % तक घट गई.”

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जो एबोरिजनल लोग यानि मूल निवासी बच भी गए उनको आने वाले 150 सालों तक उपनिवेशावादियों के हाथों हिंसा और शोषण का सामना करना पड़ा.

उपनिवेशवादियों ने उनकी अधिकाधिक ज़मीन हथिया कर उन्हें उनकी ही ज़मीन से खदेड़ दिया.

जॉन मेनार्ड कहते हैं, “मूलनिवासियों को खदेड़ कर ऐसे बंजर इलाकों में भेज दिया गया जहां वो कुछ भी उगा नहीं सकते थे. उनके लिए ना पर्याप्त रोज़गार था, ना पहनने को कपड़े और रहने के लिए मकान थे.”

“पर्याप्त भोजन की कमी थी. उनके बच्चों को मां बाप से अलग करके खेत मज़दूरों की तरह इस्तेमाल किया जाता और लड़कियों को घर के काम के लिए रख लिया जाता था. कई दशकों तक यह चलता रहा. मेरे अपने परिवार के लोगों के साथ भी यही हुआ.”

2008 में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री पॉल रड ने मूल निवासियों से औपचारिक तौर पर देश की तरफ़ से माफ़ी मांगी थी. ख़ासतौर पर उस पीढ़ी से जिसे उनके मां बाप से अलग कर दिया गया था.

इस साल मौका था कि जनमत संग्रह में मूल निवासियों को उनके छीने गए अधिकार दिलाए जाते. जॉन मेनार्ड जनमत संग्रह के नतीजे से बेहद निराश हैं.

मेनार्ड ने कहा, “मैं बहुत दुखी हूं. यह अत्यंत निराशाजनक है कि जिन अधिकारों के मुद्दे को 100 साल पहले मेरे दादा ने उठाया था हमें आज भी उसके लिए लड़ना पड़ रहा है. कुछ भी नहीं बदला है.”

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मतदान

टिम सूपोमासान ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में मानवाधिकार और राजनीतिशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं. वो कहते हैं कि यह जनमत संग्रह काफ़ी महत्वपूर्ण था.

उनके मुताबिक, “इस जनमत संग्रह में ऑस्ट्रेलिया के संविधान में परिवर्तन करके एक राष्ट्रीय सलाहकार समिति का गठन करने के बारे में जनता की राय मांगी गई थी. यह समिति सरकार को उन क़ानूनों के बारे में सलाह देती जिनका सीधा प्रभाव मूल निवासी समुदाय पर पड़ता है.”

“इसके तहत देश की नीतियों और क़ानून बनाने की प्रक्रिया में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की राय को शामिल किया जाना था.”

टिम सूपोमासान कहते हैं कि जनमत संग्रह की भाषा और बयान 2017 में मूल निवासियों के प्रतिनिधियों की एक बैठक में पारित विज्ञप्ति पर आधारित था जिसे “यूलूरू स्टेटमेंट फ्रॉम दी हार्ट” के नाम से जाना जाता है.

टिम सूपोमासान ने कहा, “‘यूलूरू स्टेटमेंट फ्रॉम दी हार्ट’ का मक़सद देश के इतिहास में हुई ग़लतियों में सुधार के लिए ऑस्ट्रेलियाई जनता और उसके मूल निवासियों को आमंत्रित करना था ताकि संविधान में इस बात को स्वीकार किया जा सके कि मूल निवासियों की ज़मीन छीनी गई थी और उन्हें उनके अधिकारों से वंचित किया गया था.”

“मूल निवासियों की ज़मीन की वर्तमान मिल्कियत के बारे में बहस होनी चाहिए. फ़िलहाल इस बारे में संविधान में कुछ भी नहीं है.”

मूल निवासियों की पहले मांग थी कि संविधान में जातिगत भेदभाव विरोधी क़ानून को शामिल किया जाए लेकिन फिर उन्हें लगा यह हासिल करना मुश्किल होगा.

तब उन्होंने एक व्यावहारिक रास्ता चुनते हुए जनमत संग्रह में इस मामले में एक राष्ट्रीय सलाहकार समिति के गठन की मांग रखी.

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी एल्बानीज़ (बीच में)

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इमेज कैप्शन, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी एल्बानीज़ (बीच में)

इस साल मार्च में जब जनमत संग्रह कराने की घोषणा हुई तब सर्वेक्षणों से पता चला कि लगभग 60% लोग सलाहकार समिति के गठन के प्रस्ताव का समर्थन करते हैं. लेकिन फिर रुझान बदल गया.

टिम सूपोमासान ने बताया कि अप्रैल में विपक्षी नेता पीटर डटन ने कहा कि वो संविधान में बदलाव का विरोध करेंगे.

उसके बाद से क़ानून बनाने की प्रक्रिया में मूल निवासियों की राय शामिल करने के प्रस्ताव पर आम जनता का समर्थन घटता चला गया. और अंतत: जनमत संग्रह में यह प्रस्ताव नामंज़ूर हो गया.

“इस प्रस्ताव का समर्थन करने वालों को इस बात पर भरोसा था कि मूलत: देश के लोग विवेकपूर्ण और अच्छा फ़ैसला करेंगे. मगर सच्चाई यह है कि ऑस्ट्रेलिया में मूल निवासियों की आबादी कुल आबादी का केवल 4% ही है.”

“ज़्यादातर लोगों के दोस्त और पड़ोसी तक मूल निवासी समुदाय के सदस्य नहीं हैं. इसलिए उनके लिए मूल निवासियों के लिए आवाज़ उठाने वाली समिति के गठन के महत्व को समझना मुश्किल था.”

“जब जनमत संग्रह के नतीजे आए तो मूल निवासियों के हाथ निराशा लगी. इस जनमत संग्रह में जीत के लिए आम बहुसंख्यक ऑस्ट्रेलियाई जनता का वोट ज़रूरी था. साथ ही देश के छ: में से चार राज्यों में इसे बहुमत हासिल करने की ज़रूरत थी. मगर चार राज्यों और 60% लोगों ने इस प्रस्ताव को नामंज़ूर कर दिया."

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दो अभियान

जनमत संग्रह के दौरान दो प्रचार अभियान शुरू हुए थे.

एक यस कैंपेन यानि सरकारी नीति और क़ानून बनाने में मूल निवासियों की राय शामिल करने के लिए संविधान में बदलाव कर के राष्ट्रीय सलाहकार समिति बनाने के पक्ष में चला अभियान और दूसरा नो कैंपेन यानि संविधान में बदलाव के ख़िलाफ़ चला अभियान.

जैसा हमने सुना, पहले यस कैंपेन को समर्थन मिल रहा था. फिर यह समर्थन कैसे घट गया?

यह समझने के लिए हमने बात की एंड्रिया कारसन से जो मेलबर्न की लाट्रोब यूनिवर्सिटी में राजनीतिक सूचना और संचार की प्रोफ़ेसर हैं.

उनका कहना है कि एक समस्या यह हुई की यस कैंपेन के ज़रिए कई अलग संदेश लोगों में गए.

“यस कैंपन में दो गुट थे और उनके बीच शायद सही समन्वय की कमी थी जिस वजह से दोनों गुट अलग अलग संदेश दे रहे थे. दूसरी तरफ़ नो कैंपेन के लोगों में अच्छा समन्वय और अनुशासन था इसलिए वो अपना संदेश प्रभावी तरीके से जनता तक पहुंचा पाए.”

यस कैंपेन की तुलना में नो कैंपेन का संदेश बहुत साफ़ था कि संविधान में बदलाव को मंज़ूरी देने से देश विभाजित हो जाएगा और मूल निवासियों को अन्य ऑस्ट्रेलियाई लोगों से ज़्यादा अधिकार मिल जाएंगे.

उनकी जनता से यही अपील थी कि अगर आप क्या करना है इसे लेकर आश्वस्त नहीं हैं तो प्रस्ताव के विरोध में वोट दें. उनका नारा था ‘इफ़ यू डोंट नो, से नो’.

एंड्रिया कारसन ने कहा कि जनमत संग्रह से एक महीने पहले यस कैंपेन ने 33 अलग अलग संदेश भेजे जबकि नो कैंप ने केवल 6 संदेश जनता को भेजे. जो बहुत स्पष्ट थे.

एक वजह यह भी है कि नो कैंप ने अपने प्रचार के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल, यस कैंपेन से बेहतर किया.

60 प्रतिशत लोगों ने मूल निवासियों को अधिकार देने वाले प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

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इमेज कैप्शन, 60 प्रतिशत लोगों ने मूल निवासियों को अधिकार देने वाले प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

एंड्रिया कारसन कहती हैं कि, “नो कैंपेन ने अलग अलग सोशल मीडिया के हिसाब से अपने संदेशों को ढाला. जबकि यस कैंपेन ने एक ही सामान्य संदेश एक ही तरह से सभी सोशल मीडिया के लिए बना कर जारी किए.”

“इससे हुआ यह कि नो कैंपेन जनता का ध्यान आकर्षित करने में अधिक सफल रहा. नो कैंपेन के कुछ टिकटॉक वीडियो संदेशों को 10 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा.”

“जहां यस कैंप ने अपना संदेश पहुंचाने के लिए न्यूज़ क्लिप का इस्तेमाल किया वहीं नो कैंप ने आम लोगों की राय, उनके अनुभव और किस्सों का इस्तेमाल करके वीडियो क्लिप बनाये जिसमें हास्य और व्यंग भी था, जो कहीं अधिक लोगों ने देखे.”

मगर इसके अलावा जनमत संग्रह से पहले दोनों गुटों के प्रचार में बड़ी मात्रा में फ़ेक न्यूज़ या ग़लत ख़बरों और साज़िश की अफ़वाहें फैलाई गईं, ख़ासतौर पर नो कैंपेन की ओर से.

एंड्रिया कारसन ने कहा, “ख़ासतौर पर नो कैंपेन ने, जनमत संग्रह के उद्देश्य को लेकर कई तरह की भ्रांति फैलाई. उसमें से सबसे हास्यास्पद संदेश यह था कि जनमत संग्रह दरअसल, सुंयक्त राष्ट्र की साजिश है जिसके बाद वह पूरे ऑस्ट्रेलिया पर अपना दावा ठोक देगा और लोगों के संपत्ति के अधिकार छीन लिए जाएंगे.”

“साथ ही नो कैंपेन ने चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए जबकि ऑस्ट्रेलियाई चुनाव आयोग एक प्रतिष्ठित और विश्वसनीय संस्था रही है. यह अत्यंत चिंताजनक बात थी कि चुनाव आयोग पर साज़िश में शामिल होने के आरोप लगाए गए.”

यस कैंपेन की हार का एक कारण यह भी था कि उन्हें इस बात पर ज़रूरत से ज़्यादा विश्वास था कि सभी लोगों की नज़र में मूल निवासियों के अधिकार महत्वूर्ण होंगे.

लेकिन यह आत्मविश्वास ग़लत साबित हुआ. एंड्रिया कारसन कहती हैं कि ऑस्ट्रेलिया के लोग नस्लवादी नहीं हैं लेकिन बड़े शहरों से बाहर रहने वाले लोगों के लिए मूल निवासियों के अधिकार का मुद्दा इतना महत्वपूर्ण नहीं था.

एक कारण यह भी था कि मूल निवासी समुदाय के कुछ बड़े राजनेताओं ने भी यह कह कर नो कैंपेन का साथ दिया कि किसी भी विशेष समुदाय को विशेष अधिकार नहीं मिलने चाहिए और उनके साथ विशेष बर्ताव की ज़रूरत नहीं है.

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मूल निवासियों के लिए भविष्य की राह

थॉमस मेयो एक मूल निवासी हैं और लंबे समय से मूल निवासियों के अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं.

वो कहते हैं, “जनमत संग्रह के नतीजे से वो बेहद मायूस हुए हैं. वो मूल निवासियों की उस बैठक में शामिल थे जहां ‘स्टेटमेंट फ़्रॉम दी हार्ट’ विज्ञप्ति जारी हुई थी. उससे जो आशा की किरण उपजी थी उसे जनमत संग्रह के नतीजे ने धूमिल कर दिया.”

“हमें लगा था कि इस बारे मे आम सहमति बन गई है कि ऑस्ट्रेलियाई जनता मूल निवासियों की आवाज़ को सुनेगी, उनकी संस्कृति को स्वीकार करेगी. इसलिए इस नतीजे पर विश्वास करना मुश्किल हो रहा है.”

थॉमस मेयो के लिए सबसे अविश्वसनीय यह है कि मूल निवासियों के अधिकार संबंधी प्रस्ताव को बहुत भारी बहुमत से ठुकरा दिया गया.

“मैं राजनीति के दांव पेंचों और ज़रूरतों को समझता हूं. जानता हूं यह संघर्ष मुश्किल होता है. लेकिन जितनी बड़ी संख्या में लोगों ने इसका विरोध किया उस स्तर को देख कर मुझे धक्का ज़रूर लगा.”

“इस देश में यह अद्भुत फैसला था. प्रचार के दौरान हमारे दादा परदादाओं की तस्वीरों के मीम बनाए गए. यह बहुत दुखद और नुकसानदेह था. इसका अभियान में शामिल रहे मूल निवासियों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ा. लोगों के दिल टूट गए.”

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थॉमस मेयो मानते हैं कि यस कैंपेन के संदेश सही और प्रभावी नहीं थे जिससे ग़लतफ़मियां फैली.

थॉमस मेयो ने कहा, “यह बात मैं मानता हूं. लेकिन हम कई मोर्चों पर लड़ रहे थे. लेकिन यस कैंपेन की हार का मुख्य कारण यह था कि विपक्षी दल ने इसका विरोध किया था. इस देश में बिना दोनों पक्षों के समर्थन के कोई भी जनमत संग्रह में जीत हासिल नहीं कर पाया है. विपक्षी दल ने इसे नस्ल से जुड़ा मुद्दा बताकर पुरज़ोर विरोध किया.”

“जबकि हम अलग नस्ल के लोग नहीं हैं बल्कि सदियों से इस ज़मीन से जुड़े हुए हैं. हम चाहते थे कि इस बात को स्वीकार किया जाए. हम एक ऐसा देश बन गए हैं जो समय में पीछे ठहर गया है. यहां मेरे बाप दादा को नागरिक तक नहीं माना जाता था. कुछ भी करने के लिए उन्हें सरकार से इजाज़त लेनी पड़ती थी. यह हमारे देश के हित में नहीं है.”

जनमत संग्रह के नतीजे के बावजूद थॉमस मेयो इसे सकारात्मक ढंग से देखना चाहते हैं.

वो कहते हैं कि इस बहाने मूल निवासियों की समस्याएं और परेशानियां लोगों के सामने तो आयीं.

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थॉमस मेयो ने कहा, “आमतौर पर लोग मूल निवासियों के बारे में ख़ास नहीं सोचते. लेकिन जनमत संग्रह और प्रचार अभियान की वजह से मूल निवासियों के दुख दर्द लोगों के सामने आये. घर घर में उस पर चर्चा हुई.”

“40% ऑस्ट्रेलियाई लोगों ने यानि 55 लाख लोगों ने हमारे प्रस्ताव का समर्थन किया जो हमारे लिए एक सकारात्मक बात है. मैं मूलनिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ता रहूंगा. हो सकता है मेरे जीवन काल में यह संभव ना हो लेकिन नयी पीढ़ी इसे हासिल कर लेगी. हमने देखा कि युवाओं ने यस कैंपेन का समर्थन किया. कभी ना कभी हमें ज़रूर न्याय मिलेगा.”

ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के अधिकारों की लड़ाई पटरी से उतरने की बड़ी वजह राजनीति थी.

ऑस्ट्रेलिया में दोनों दलों के समर्थन के बिना जनमत संग्रह में विजय पाना मुश्किल है. मगर इस जनमत संग्रह की वजह से मूल निवासियों की समस्याएं और अधिकारों की मांग ऑस्ट्रेलिया की पूरी जनता के सामने आ गई. उस पर चर्चा हुई.

अब बहुत कम ऑस्ट्रेलियाई लोग यह कह पाएंगे कि उन्हें नहीं पता देश के मूल निवासी क्या चाहते हैं.

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मूल निवासी देश की कुल आबादी का केवल 4% हैं. इस अल्पसंख्यक गुट की मांग अब सबके सामने है.

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