ब्राज़ील: जहाँ दुनिया में सबसे ज़्यादा लोग पुलिस के हाथों मरते हैं

मारे गए बच्चे

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    • Author, लिगिया गुइमेयर्स और क्लेयर प्रेस
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
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ब्राज़ील में पुलिस की हिंसा से हर साल हज़ारों लोगों की मौत होती है, लेकिन शायद ही कभी यह राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्ख़ियाँ बटोर पाता है.

जब पिछले साल दुनिया भर में ब्लैक लाइव्स मैटर का अभियान सड़कों पर दिखा, तब बीबीसी ने एक स्थानीय ग़ैर सरकारी संगठन ब्राज़ीलियन फ़ोरम ऑफ़ पब्लिक सिक्युरिटी (बीएफपीएस) के साथ मिलकर इन मौतों की पड़ताल की.

हमने इस पड़ताल में यह पता लगाने की कोशिश की है कि ब्राज़ील में पुलिस हिंसा किस स्तर पर होती है और इसकी चपेट में सबसे ज़्यादा कौन लोग आते हैं?

  • तीन किशोर, तीनों की हत्या. 14 साल के जोआयो पेड्रो की पीठ में तब गोली मारी गई थी, जब वे अपने चचेरे भाइयों के साथ घर में खेल रहे थे.
  • 15 साल के गुइलहर्मे गुइडेस अपनी दादी के घर के बाहर से ग़ायब हो गए थे उसके बाद उनके मुँह में गोली मार दी गई.
  • 16 साल के इग्योर रोचा रामोस की हत्या तब हुई, जब वे ब्रेड ख़रीदने के लिए घर से बाहर निकले थे और घर में उनकी माँ कोरोना संक्रमित होने के बाद ठीक होने की कोशिशों में जुटी थीं.

इन तीनों हत्याओं में कॉमन बात क्या है?

इन तीनों किशोरों की हत्या 2020 में कथित तौर पर ब्राज़ील के पुलिसकर्मियों ने की है. छह-सात महीने बीत चुके हैं और इनके परिवार वालों को अब भी न्याय मिलने में संदेह बना हुआ है.

पहला मामला: इग्योर रोचा रामोस, उम्र 16 साल, 2 अप्रैल, 2020 को हत्या

इग्योर की मां अना पाउला रोचा ने बताया, "जान बचाने के लिए वह दौड़ा था, पूरी गली में उसका ख़ून फैला हुआ था. गली में ऊपर वह गिर गया था, नीचे से भागकर वह यहाँ तक आया था."

अना ने यह भी बताया, "उन्होंने मुझे उसके क़रीब तक नहीं जाने दिया. वे मुझे पीछे की ओर धकेलते रहे. इसके बाद वे लोग उसे अस्पताल ले गए, मुझे एंबुलेंस में बैठने तक नहीं दिया."

अना पाउला ने अकेली माँ के तौर पर 300 डॉलर की अपनी मासिक पगार से चार बच्चों को पाला है. साओ पाउलो के उपनगरीय इलाक़े जारडिम साओ सावेरियो में उनका घर है, जिसमें वह अपनी तीन बेटियों ब्रूना, बारबारा और बेट्रिज़ और सबसे छोटे लड़के इग्योर के साथ रहा करती थीं. पास के इलाक़ों की बसों में वे कंडक्टर हैं.

जिस दिन इग्योर को पुलिस अधिकारी ने गोली मारी, उस दिन अना पाउला अपने घर पर ही थीं. वह कोविड संक्रमण से उबर रही थीं. बीमारी के गंभीर लक्षण और साँस लेने की तकलीफ़ के चलते उन्होंने घर में ही ख़ुद को 11 दिनों से आइसोलेट कर रखा था.

उस दिन इग्योर देर से उठा था और वह बेकरी से ब्रेड और चिप्स लाने गया था, ताकि दिन के लंच में लोग बचे हुए हॉट डॉग खा सकें. दोपहर 1.15 बजे वह अपने घर से निकला था और महज 10 मिनट के अंदर ही अना पाउला ने गली में चिल्लाने की आवाज़ सुनी.

अना ने बताया, "पड़ोसियों की आवाज़ आ रही थी कि उन लोगों ने उसे मार दिया. जिस लड़के को मारा है वह इग्योर जैसा दिख रहा है."

भयभीत अना चप्पल पहनकर सीढ़ियों से नीचे उतरीं और दरवाज़ा खोलकर गली में आ गईं. साँस लेने में तकलीफ़ हुई, तो अना ने मास्क उतार लिया.

गली में दर्जनों पड़ोसी पहले से मौजूद थे, जो अपने अपने फ़ोनों से पुलिस वालों का वीडियो बना रहे थे. अना को याद है कि उन्होंने भयभीत ब्रूना की आवाज़ सुनी. ब्रूना ने तेज़ आवाज़ में बताया था, "सिर में गोली लगी है माँ. उन्होंने सिर में गोली मारी है." अना पाउला के मुताबिक़ यह सुनने के बाद वह घबरा गईं थीं.

कई प्रत्यक्षदर्शियों के मोबाइल फ़ोन में मौजूद फुटेज़ से पता चलता है कि इगयोर की बॉडी के आसपास मौजूद और लगातार बढ़ रहे पुलिसकर्मियों ने ब्रूना और अना-पाउला को पीछे धकेला था.

अना बताती हैं, "उसे उस तरह देखना काफ़ी सदमा पहुँचाने वाला था. मेरे शरीर का हिस्सा जा चुका था." यह बताते हुए अना की आँखों में आँसू आ जाते हैं.

इग्योर की मौत के बाद विरोध प्रदर्शन करते अना पाउला और उनका परिवार
इमेज कैप्शन, इग्योर की मौत के बाद विरोध प्रदर्शन करते अना पाउला और उनका परिवार

इस घटना को 10 महीने से ज़्यादा बीत चुके हैं, लेकिन अब तक इग्योर की हत्या के मामले में किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है. हालाँकि साओ पाउलो की मिलिट्री पुलिस का कहना है कि मामले की जाँच अभी भी चल रही है.

अना पाउला कहती हैं कि जब वह हादसे की जगह पर मौजूद थीं, तब एक पुलिस अधिकारी ने उनसे कहा था, "यह एक पुलिस मुठभेड़ है." पुलिस अधिकारी के मुताबिक़ इग्योर के हाथों में बंदूक थी, लेकिन अना ने ज़ोर देकर बताया कि उसके हाथ में कोई बंदूक नहीं थी और वह ब्रेड ख़रीदने के लिए निकला था.

प्रत्यक्षदर्शियों ने भी बीबीसी को बताया है कि उन लोगों ने इग्योर के हाथ में कोई बंदूक नहीं देखी थी. साओ पाउलो के पुलिस विभाग का कहना है कि वे अभी इग्योर के हाथों में बंदूक होने के पुलिस अधिकारियों के दावे की जाँच कर रहे हैं.

अस्पताल की रिपोर्ट से पुष्टि हुई है कि इग्योर की मौत सिर के पीछे एक गोली लगने से गली में हो गई थी. फुटेज़ और प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक़ वह बेकरी के नज़दीक गिर गया था.

अना पाउला का कहना है कि वह अपने बेटे को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ती रहेंगी, लेकिन उन्हें आशंका है कि न्यायिक प्रणाली भी शहर के ग़रीब गुरबों से भेदभाव करती है.

अना पाउला कहती हैं, "अगर मेरा बेटा एक अमीर आदमी का बेटा होता, तो पुलिस अधिकारी जेल में होते. उन्हें गिरफ़्तार किया जा चुका होता. लेकिन वह पुलिस अधिकारी बाहर घूम रहा है और सामान्य अधिकारियों की तरह ही काम कर रहा है."

पुलिस अधिकारियों ने भी उस अधिकारी के सामान्य तौर पर काम करने की पुष्टि की है.

अपने परिवार के साथ इग्योर

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इमेज कैप्शन, अपने परिवार के साथ इग्योर

काले युवाओं की मुश्किलें

2020 के पहले छह महीनों में ब्राज़ील में 3,148 लोग पुलिस के हाथों मारे गए. यानी हर दिन औसतन 17 लोग. ब्राज़ील के छोटे से राज्य रियो डी जेनेरो, जिसकी आबादी महज 1.6 करोड़ है वहाँ पहले छह महीनों के दौरान जितने लोग पुलिस के हाथों मारे गए, उतने लोग 32.8 करोड़ की आबादी वाले अमेरिका में नहीं मारे गए.

लेकिन ब्राज़ील में पुलिस की बेरहम हिंसा सामान्य बात है और इसके ख़िलाफ़ अमेरिका और नाइजीरिया की तरह कोई विरोध प्रदर्शन भी नहीं दिखता है. इसके अलावा यह भी अनुमान लगाया गया है कि पुलिस के हाथों मारे गए प्रति 10 लोगों में एक आपराधिक मामलों में लिप्त है.

ब्राज़ील में पुलिस अत्याचार की बात होती है- गलियों से लेकर मीडिया और अदालतों तक में- जिस तरह से आए दिन लोग जान गँवा रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि लोग उदासीन हैं और जवाबदेही से मुँह मोड़ना सीख चुके हैं.

पुलिस अत्याचार की चपेट में आने का ख़तरा किन लोगों में सबसे ज़्यादा होता है, बीबीसी ने यह जानने के लिए ब्राज़ीली फ़ोरम ऑफ़ पब्लिक सिक्युरिटी के साथ मिलकर काम किया है. इस दौरान 2020 के पहले छह महीने में इग्योर के राज्य साओ पाउलो और रियो डी जेनेरो में पुलिस के हाथों मारे गए एक हज़ार से ज़्यादा लोगों के प्रोफ़ाइल का आकलन किया है.

साओ पाउलो ब्राज़ील का सबसे अधिक आबादी वाला और सबसे अमीर राज्य है. यहाँ की अधिकांश आबादी में गोरे लोग हैं. हमलोगों ने अपने आकलन में पाया है कि पुलिस के हाथों मारे गए 60 प्रतिशत लोग काले हैं. जो लोग मारे गए हैं, उनमें 99 प्रतिशत पुरुष हैं और क़रीब 30 प्रतिशत मृतकों की उम्र 24 साल से कम थी.

पुलिस के अत्याचार के मामले में रियो डी जेनेरो सबसे ख़तरनाक राज्य है- यहाँ मारे गए लोगों में 75 प्रतिशत लोग काले हैं. अगर रियो में आप काले युवा पुरुष हैं, तो गोरे युवा की तुलना में पुलिस के हाथों मारे जाने की आशंका पाँच गुना ज़्यादा होगी.

यहाँ यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि हमारे आकलन में जीवित लोगों ने अपनी नस्लीय पहचान ख़ुद बताई है, जबकि मृतक लोगों की नस्लीय पहचान वह ली गई है, जो पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज है. ब्राज़ील में पुलिस किसी की मौत के बाद के बाद उनकी पहचान जाँच अधिकारी करते हैं जो मोटे तौर पर काले, गोरे, अन्य और मालूम नहीं के तौर पर होती है. आम तौर पर काले और मिश्रित नस्ल वाले लोगों को काले कहा जाता है.

दक्षिण अमेरिका में दासता प्रथा को ख़त्म करने वाला ब्राज़ील सबसे आख़िरी देश था, इसलिए वहाँ अभी भी सामाजिक असमानता काफ़ी ज़्यादा है. काले और मिश्रित समुदाय के लोग कम समय तक जीते हैं, उनकी शिक्षा और रहन सहन का स्तर निम्न है.

Igor's mother Ana Paula Rocha
इमेज कैप्शन, इग्योर की माँ अना पाउला रोचा

दूसरा मामला: गुइलहर्मे गुइडेस, 15 साल की उम्र में अपहरण और हत्या, 14 जून, 2020

ब्राज़ील में 2020 में जो दो सबसे जघन्य हत्या हुई, उनमें एक है गुइलहर्मे गुइडेस की हत्या. वे अपने दादी के घर के बाहर से ग़ायब हो गए थे और बाद में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई.

उनकी माँ जोएस डा सिल्वा डोस सैंटोस कहती हैं, "जिस तरह मेरा बेटा मरा है, उससे तो अच्छा होता कि उसे कोविड-19 हो जाता. कई लोग मुझे कह रहे हैं कि ये भगवान की मर्ज़ी है. लेकिन मेरे लिए यह भगवान की मर्ज़ी नहीं हो सकती. क्या भगवान की मर्ज़ी यह होगी कि किसी की मौत सिर में दो गोलियाँ लगने से हो?"

जोएस ने अपने बेटे को अंतिम बार पारिवारिक आयोजन में देखा था. चूँकि यह देर तक चला था, तब गुइलहर्मे ने कहा कि वह दादी को घर तक छोड़ आता है. जोएस बताती हैं कि जाते-जाते उसने अपनी फ़ेवरिट चिकेन पेस्ट्री उठाई थी.

दादी माँ को बेड पर पहुँचाने के बाद वह वापस लौटा, लेकिन गली में अपने हमउम्र एक लड़के से मिलने चला गया. उस लड़के ने चेताते हुए कहा था कि सादे कपड़ों में दो पुलिस अधिकारी तुम्हारी तलाश में ही इधर आ रहे हैं.

विरोध प्रदर्शन

जोएस ने कहा, "लेकिन गुइलहर्मे ने कहा, 'मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ, क्योंकि मैंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है.' वह वहीं रुका रहा और तब वे दो लोग आए."

गुइलहर्मे की दादी के घर के बाहर लगे सिक्युरिटी कैमरे के फुटेज से ज़ाहिर होता है कि गली में दो लोग उसे घेर कर खड़े हैं.

इसके छह घंटे के बाद उसका शव बरामद होता है, वह भी छह किलोमीटर दूर पड़ोस के शहर में. फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट के मुताबिक़ उसे दो बार गोली मारी गई थी, एक मुँह में और एक सिर के पीछे.

जोएस बताती हैं, "इसके अगले दिन मेरी बहन मुर्दा घर गई थी. उन लोगों ने पूछा था कि क्या गुई के शरीर पर कोई टैटू था, फिर कंफ़र्म किया कि टैटू कहाँ है. फिर उन्होंने कहा यह गुई ही है."

इस घटना को भी सात महीने से ज़्यादा हो गए हैं. साउ पाउलो के सार्वजनिक सुरक्षा विभाग का कहना है कि वीडियो के दोनों संदिग्धों की पहचान हो गई है. इनमें से एक सार्जेंट एड्रियानो फर्नांडीज डि कैंपोस फ़िलहाल जेल में है और ट्रायल शुरू नहीं हुआ है. वे सभी आरोपों से इनकार करते हैं. पुलिस दूसरे संदिग्ध और पूर्व पुलिस अधिकारी गिल्बर्टो इरिक रोड्रिगेज़ को अभी भी तलाश रही है.

जोएस बताती हैं, "बचपन से गुइलहर्मे पुलिस से डरता था और मैं उसे कहती थी कि डरने की कोई ज़रूरत नहीं है. मैं उसके अंदर से डर निकालना चाहती थी लेकिन आज मैं अपने बच्चों को पुलिस से डरना सिखाना चाहूँगी, उनके लिए उपनगरों में रहने वाला हर कोई अपराधी है. वे सोचते हैं कि 15,16 या 17 साल का कोई लड़का ब्रैंडेड जूते या जर्सी नहीं पहन सकता."

कोरोना वायरस के दौरान सड़क पर खेलते युवा

हिंसा का इतिहास

ब्राज़ील की पुलिस इतनी आक्रामक क्यों है? इसका जवाब ब्राज़ील के अतीत से छिपा है. दो दशकों के सैन्य तानाशाही के दौरान देश भर में हज़ारों लोगों को सताया गया, सैकड़ों लोगों की हत्या की गई. ब्राज़ील में दो तरह की फ़ोर्स हैं- एक तो मिलिट्री और दूसरी सिविल पुलिस.

ब्राज़ील की मिलिट्री पुलिस को सेना के जवानों की तरह ही ट्रेनिंग दी जाती है, लेकिन उन्हें हर दिन की स्ट्रीट पुलिसिंग का काम करना होता है, जबकि सिविल पुलिसकर्मियों की तैनाती न्यायिक और प्रशासनिक कामों के लिए होती है.

रियो डी जेनेरो के पूर्व पुलिस प्रमुख रहे रॉबसन रोड्रिगेज डा सिल्वा के मुताबिक़ ब्राज़ील के पुलिस अधिकारियों पर काफ़ी ज़्यादा दबाव है. उन्होंने बताया कि एक तरफ़ तो दुनिया भर में अपराध की सबसे ज़्यादा दर ब्राज़ील में है, वहीं दूसरी तरफ़ पुलिसकर्मियों को मामूली वेतन पर काम करना होता है और उन्हें कोई मदद भी नहीं मिलती.

उनके मुताबिक़ समय के साथ अनिश्चितता और नौकरी की अस्थिरता के चलते कई अधिकारियों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है. रॉबसन कहते हैं, "किसी भी पुलिसकर्मी को यह लग सकता है कि कोई भी बंदूक के साथ है. इसकी वजह ये है कि इस इलाक़े में बंदूकें सहजता से यह उपलब्ध है. ऐसी व्यवस्था नहीं है, जो इन्हें अपराधियों के हाथों तक पहुँचने से रोके. इस स्थिति के चलते तनाव और डर पैदा होता है. जब एक पुलिस अधिकारी को ऐसी स्थिति का सामना करना होता है, तो वह आसानी से ऐसी स्थिति का सामना नहीं कर पाते हैं."

रियो डी जेनेरो के पूर्व पुलिस अधिकारी रॉबसन के मुताबिक़ दुनिया की कोई भी जगह पुलिसकर्मियों के लिए उतनी ख़तरनाक नहीं होगी, जितनी रियो शहर की झुग्गी झोपड़ियाँ हैं.

रियो शहर के चारों तरफ पहाड़ी ढलान में ये स्लम बसे हुए हैं, जिसमें हज़ारों तरह के समुदाय रहते हैं. इन इलाक़ों में पुलिस की स्थायी मौजूदगी नहीं होती और स्कूल और अस्पताल भी नहीं होते. इनमें से कई स्लम तो सीधे तौर पर संगठित अपराधी गिरोह के नियंत्रण में होते हैं, इसके चलते यहाँ रहने वाले सभी लोगों के लिए यह जगह ख़तरनाक हो जाती है.

पिछले साल ब्राज़ील में जितने लोगों की मौत पुलिस के हाथों हुई, उनमें लगभग एक चौथाई मामला रियो डी जेनेरो में था. ऐसे में सवाल उठता है कि रियो इतना ख़तरनाक क्यों है?

इसका जवाब है ड्रग्स के चलते पुलिस की छापेमारी. इन अभियानों में दर्जनों पुलिस अधिकारी शामिल होते हैं, कई बार तो हेलिकॉप्टर और सशस्त्र वाहनों के साथ ये छापेमारी होती है ताकि संगठित आपराधिक गिरोहों को पकड़ा जा सके. पुलिस और ड्रग्स का कारोबार करने वाली गैंगों में होने वाली मुठभेड़ों में सबसे ज़्यादा नुक़सान निर्दोष लोगों को उठाना होता है.

हिंसा और कोरोना के बीच फँसे

रियो के स्लम इलाक़े में रहने और काम करने वाले पत्रकार ब्रूनो इतान, को जब पुलिस और अपराधी गिरोह के बीच झड़प की ख़बर मिलती है, आमतौर पर वे वहाँ पहुँचने वाले पहले शख़्स होते हैं.

लेकिन बीते साल कोरोना महामारी के दौर की एक घटना ने उनके समुदाय को काफ़ी प्रभावित किया था. उन्होंने बताया, "जब मैं वहाँ पहुँचा, तो गली में कई शव पड़े हुए थे. यह इतना भयावह था कि मुझे लगा कि लोग एकबारगी कोरोना के डर को भूल गए हैं. युद्ध जैसी स्थिति थी, हर ओर ख़ून और कारतूस के खोखे बिखरे हुए थे."

यह शुक्रवार की दोपहर थी, जब दर्जन भर से ज़्यादा पुलिसकर्मी ड्रग डीलरों की तलाश में डो एलेमाओ कांप्लैक्स पहुँचे थे. दो घंटे बाद स्थानीय लोगों के मुताबिक़ कम से कम 12 लोग मारे गए थे और पाँच शव पुलिसकर्मी छोड़ गए थे. पुलिस की हिंसा और कोरोना वायरस के बीच आम लोगों को कई बार क्वारंटीन के नियमों का उल्लंघन करना होता है, क्योंकि रियो की चिलचिलाती गर्मी में कुछ ही घंटे में शवों से बदबू आने लगती है.

ब्रूनो इतान ने बताया, "हर कोई एक दूसरे की मदद कर रहा था. कुछ लोग ख़ून के धब्बों को साफ़ कर रहे थे, तो कुछ लोग कपड़े ले आए थे. कुछ लोग कार ले आए थे और दूसरे लोग शवों को हटाने में जुटे थे. इन्हें एक दूसरे की मदद की ज़रूरत भी होती है. कोई माँ अपने बेटे के शव को अकेले कैसे ले जा सकती है?"

ब्रूनो इन्हीं स्लम में पले बढ़े हैं, तो उन्हें मालूम है कि किस तरह हिंसा के बीच रहना होता है. जब सामुदायिक व्हाट्सऐप ग्रुप में पुलिस की रेड की जानकारी मिलती है, तो क्या करना है, यह भी उन्हें मालूम है. कहाँ छिपना है, बाथरूम में जाना है या दरवाज़े के पीछे खड़ा होना है- ये सब तरीक़े लोग अपनाते हैं, कोई कभी भी खिड़की या ग्लास के पीछे नहीं छिपता.

ब्रूनो अब तक सैंकड़ों पुलिस रेड देख चुके हैं, लेकिन उन्हें भी लगता है कि पिछले साल कोरोना संक्रमण के दौर पुलिस की हिंसा के मामले निंदनीय हैं.

उन्होंने बताया, "हिंसा तो हमेशा होती थी, लेकिन एक सुबह में 12 लोगों की मौत जैसा पहले नहीं हुआ था. एक या दो लोग मरते थे. यह आपको विचित्र लग सकता है, लेकिन हम सबलोगों के लिए दुर्भाग्य यह है कि ये सामान्य बात है, लेकिन 12 लोगों की मौत?"

जोआयो पेड्रो की माँ राफेला मातोस
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तीसरा मामला: जोआओ पेड्रो मैटोस पिंटो, 18 मई, 2020

पिछले साल की शुरुआत में, रियो डी जेनेरो में पुलिस के हाथों मारे गए लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी देखी गई. यह सिलसिला ऐसा चला कि 2020 बीते 20 सालों में पुलिस अत्याचार के लिहाज से सबसे ख़राब साबित हुआ. लेकिन मई में यहाँ हत्या के मामले का ऐसा असर हुआ कि सभी पुलिस रेड पर रोक लगानी पड़ी.

18 मई को सोमवार का दिन था. लंच के बाद का समय था. मिलिट्री पुलिस अधिकारियों का एक दस्ता बिना वारंट, ग़ैर क़ानूनी ढंग से 14 साल के जोआओ पेड्रो के घर में घुस आया. पेड्रो उस वक़्त अपने कजिन के साथ खेल रहा था. घर के अंदर पुलिसकर्मियों ने 70 राउंड से ज़्यादा गोलियाँ चलाईं. पीठ में गोली लगने से पेड्रो की मौत हुई.

पेड्रो की 36 साल की माँ राफ़ेला क्यूटिन्हो मैटोस एक टीचर हैं. उन्होंने कहा, "जोआओ एकदम घरेलू बच्चा था. वह जहाँ भी जाता था, हमारे साथ ही जाता था. वह घर से स्कूल, चर्च ही जाता था. यही उसका रुटीन था."

जिस दिन उनका बेटा पुलिस के हाथों मारा गया, उस दिन वह रियो के उपनगर साओ गोंकैलो के घर में थीं. जोआओ इस घर के बगल में अपने कजिन के घर पर खेलने गया था. दोपहर ढाई बजे राफ़ेला ने पुलिस हेलिकॉप्टर की आवाज़ सुनी.

इसके बाद उन्होंने अपने बेटे को बुलाया. राफ़ेला बताती हैं, "मैं काफ़ी चिंतित हो गई थी क्योंकि हेलिकॉप्टर से गोलियाँ चलाने की आवाज़ आ रही थी. लेकिन मेरे बेटे ने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि हमलोग घर के अंदर खेल रहे हैं." ये आख़िरी मौका था, जब राफ़ेला ने अपने बेटे से बात की थी.

पुलिस की आधिकारिक रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही में इस बात की पुष्टि होती है कि दो बम फेंकने के बाद पुलिस घर में घुस आई और फ़ायरिंग शुरू कर दी. अधिकारियों के मुताबिक़ पुलिस को इस बात की सूचना थी कि उस घर में कई सशस्त्र ड्रग्स डीलर छिपे हुए थे, जो दीवार कूद कर भागने में सफल रहे थे.

जोआओ के कजिन ने बाद में उसकी माँ को बताया कि वे सब लोग गोलियों से बचने के लिए इधर उधर भागे थे, फ़र्श पर लेट कर सभी बच्चों ने अपने हाथ से सिर को पकड़ा हुआ था. ये बच्चे डर से जम चुक थे और इन्हें बाद में जाकर पता चला कि जोआओ की पीठ में गोली लग चुकी है.

राफ़ेला ने सुबकते हुए बताया, "मैं एसाल्ट राइफ़ल की कल्पना नहीं कर सकी, लेकिन उसके जख़्म की कल्पना की थी."

गोलियों से जोआओ के जख़्म का जब पता चल गया, तो उसे पुलिस हेलिकॉप्टर से ले जाया गया. अधिकारियों ने कहा कि उसके शव को कैसे ले जाया गया, इसकी जाँच की जा रही है. लेकिन जोआओ के दोस्तों और कजिन ने बताया कि वह चलकर कार तक पहुँचा था, फिर उसे हेलिकॉप्टर पर चढ़ाया गया.

जोआओ को कहाँ ले जाया गया, इसके बारे में अगले 17 घंटों तक राफ़ेला को कुछ पता नहीं चला. परिवार के सदस्य पूरी रात स्थानीय अस्पतालों में उसे तलाशते रहे. मध्यरात्रि में उन्हें बताया कि जोआओ का शव स्थानीय मुर्दाघर में रखा हुआ है.

ब्राज़ील की मीडिया में यह घटना सुर्ख़ियाँ बटोरने में कामयाब हुईं. बावजूद इसके राफ़ेला को अपने बेटे की हत्या के मामले में किसी की गिरफ़्तारी या दोषी ठहराए जाने की कोई उम्मीद नहीं है. राफ़ेला के मुताबिक़ उनके समुदाय में इस तरह जान गँवाने वाला उनका बेटा ना तो पहला है और ना ही आख़िरी होगा.

राफ़ेला ने बताया, "मैंने जोआओ से कभी नस्लीय भेदभाव की बात नहीं की थी. हालाँकि मैंने कभी इस पर सोचा नहीं था, क्योंकि मैं आज जहाँ हूँ, वहाँ तक पहुँचने की कभी कल्पना भी नहीं की थी, लेकिन मुझे लगता है कि भेदभाव होता है. क्योंकि पुलिस सोचती है कि स्लम में रहने वाले सभी लोग अपराधी हैं. हर कोई अपराधी नहीं होता है और जो लोग मारे जाते हैं वो अमूमन काले लोग होते हैं."

रियो के गवर्नर विल्सन विटज़ेल ने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार किया कि जोआओ निर्दोष था और उसकी मौत की पूरी जाँच होगी. लेकिन आठ महीने बीत जाने के बाद अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि इस मामले में अब तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है.

ब्राज़ील की मीडिया ने इस घटना को प्रमुखता से जगह दी, इससे वहाँ के सुप्रीम कोर्ट को एक अभूतपूर्व फ़ैसला लेना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने अस्थायी तौर पर सभी पुलिस रेड को लंबित कर दिया है ताकि आम लोग कोरोना महामारी के दौरान अपने अपने घरों में क्वारंटीन रह सकें.

हमारे आकलन के मुताबिक़ पुलिस रेड पर रोक लगाने से पहले रियो में पिछले साल हर महीने 150 लोग पुलिस के हाथों मारे जा रहे थे. जून, 2020 में जब पुलिस रेड पर रोक लगाई गई तब उस महीने में केवल 34 लोग पुलिस की हिंसा का शिकार हुए.

यह जून, 2019 की तुलना में 80 प्रतिशत कम था. हालाँकि महीने में 34 से ज़ाहिर है कि रोज़ाना एक से ज़्यादा लोगों की मौत हुई, लेकिन यह स्पष्ट है कि पुलिस रेड पर रोक लगाने से महीने में 100 से ज़्यादा लोगों की जान बचाई जा सकती है.

बीबीसी ने जब रियो के पुलिस विभाग से यह पूछा कि क्या क्वारंटीन के बाद पुलिस रेड की शुरुआत हो जाएगी, इसके जवाब में पुलिस विभाग ने बताया, "सभी छापे खुफ़िया जानकारी के बाद किए जाते हैं और उसमें सख़्त क़ानूनी प्रावधानों का पूरा पालन किया जाता है और हमेशा लोगों की जान बचाना प्राथमिकता होती है."

रियो के पूर्व पुलिस प्रमुख रॉबसन रोड्रिगेज डा सिल्वा, शहर के पुलिस प्रमुख रहते समय ऐसी पुलिस रेडों की देखरेख किया करते थे. रेड पर रोक के बाद मरने वाले लोगों की संख्या में कमी उनकी उम्मीदों के मुताबिक ही है.

उन्होंने कहा, "इस दुष्चक्र पर रोक से हमें ऐसी ही उम्मीद थी. पुलिस अधिकारी और वैसे लोग जो पुलिस के द्वारा मारे जा रहे थे- दोनों की संख्या काफ़ी कम हुई है. इससे यह ज़ाहिर होता है कि दुश्मनों के ख़िलाफ़ जो युद्धनीति है, वह ग़लत है और हमें इस रणनीति को बदलने की ज़रूरत है."

रॉबसन बताते हैं कि पुलिस रेड पर रोक के चलते ना केवल आम लोगों की जान बच रही है, बल्कि पुलिस वाले ख़ुद भी अपनी जान बचाने में कामयाब हुए हैं.

ब्राज़ील के कुल पुलिस बल में काले और मिश्रित समुदाय के लोगों की संख्या 34 प्रतिशत ही है, लेकिन ऐसी मुठभेड़ों में मरने वाले पुलिसकर्मियों में उनकी संख्या 50 प्रतिशत तक पहुँच जाती है. यानी गोरे पुलिसकर्मियों की तुलना में काले और मिश्रित पुलिसकर्मियों के इस हिंसा की चपेट में आने का ख़तरा ज़्यादा होता है.

रॉबसन समाज में मौजूद नस्लीय भेदभाव को इसकी वजह बताते हैं.

रॉबसन ने कहा, "हमारे देश में काले लोगों को जो समस्याएँ समाज में झेलनी होती हैं, वही समस्याएँ पुलिस व्यवस्था के अंदर भी मौजूद हैं. पुलिस व्यवस्था में कई काले अधिकारी मौजूद हैं लेकिन वे बड़े पदों पर मौजूद नहीं हैं. यह हमारे समाज एक पहलू है, जो ग़लत है और भेदभाव भरा है. हमारे यहाँ दास प्रथा लंबे समय तक मौजूद रही और हम इससे अब तक उबर नहीं पाए हैं. हमें स्थिति को बेहतर बनाने का रास्ता तलाशना होगा."

ब्राज़ील की सामाजिक व्यवस्था में मौजूद नस्लीय भेदभाव का असर ब्राज़ील की पुलिस व्यवस्था में देखने को मिलने वाले रॉबसन के तर्क को ब्राज़ीली फ़ोरम ऑफ़ पब्लिक सेफ़्टी के डेविड मर्केज़ ख़ारिज़ करते हैं. ब्राज़ील में पुलिस हिंसा में मारे गए लोगों की संख्या पर अध्ययन करने वाले मर्केज़ के मुताबिक ऐसी हिंसा में दूसरे फ़ैक्टरों की भी अहम भूमिका है.

उन्होंने कहा, "हिंसक नस्लीय असमानता के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए पुलिस बल के लिए ज़रूरी है कि वह सार्वजनिक सुरक्षा पर नस्लीय असर वाले बहस के दायरे को बढ़ाए और इस बहस से पुलिस अधिकारियों को गलियों में रोज़ाना की कार्रवाईयों में बदलाव के लिए प्रेरित करना चाहिए."

डेविड मर्केज़ के मुताबिक, "इसके अलावा पुलिस की समस्याओं पर भी बहस बढ़ाने की ज़रूरत है. ड्यूटी के समय के बाद और आत्महत्या से कई पुलिस अधिकारियों की मौत होती है. पुलिस की कामकाज की स्थिति में सुधार की ज़रूरत है."

2020 के पहले छह महीनों में जिन पुलिसकर्मियों की मौत हुई है, उन पर रिसर्च करने वाले मर्केज़ ने बताया कि 103 पुलिसकर्मी की मौत हुई, जिसमें 70 प्रतिशत पुलिसकर्मी की मौत उस वक़्त हुई, जब उनकी ड्यूटी का समय ख़त्म हो चुका था. अपनी आमदनी को बढ़ाने के लिए ब्राज़ील में कई पुलिस अधिकारी सिक्यूरिटी गॉर्ड के तौर पर दूसरी नौकरी भी करते हैं. लेकिन यूनिफॉर्म और विभागीय मदद के अभाव में उनके हिंसा की चपेट में आने की आशंका ज़्यादा होती है.

जोआओ पेड्रो मैटोस पिंटो की माँ

न्याय

तीनों मामलों में- इग्योर रोचास रामोस, गुइलहर्मे गुइडेस और जोआओ पेड्रो मैटोस पिंटो- के परिवार वालों को इंतज़ार है कि क्या उन्हें न्याय मिलता है. जोआओ पेड्रो के हाई प्रोफ़ाइल मामले में भी परिवार के वकील डेनिएल लोज़ोया को किसी गिरफ़्तारी की उम्मीद नहीं है.

लोज़ोया ने कहा, "जोआओ के मामले यह बात महत्वपूर्ण क्योंकि मीडिया में यह मामला छाया रहा था. दूसरे मामलों की तुलना में इसमें जाँच भी गंभीरता से हुई है. ऐसी जाँचों में केवल पुलिस का पक्ष सुना जाता है. कई बार मामला निरस्त होने से पहले सालों तक चलता रहता है."

लोज़ोया ने कहा, "पिछले साल कई मामले सामने आए. जिसे सामान्य नहीं कहा जा सकता वैसी स्थिति हर दिन देखने को मिल रही है. समाज में एक तरह की उदासीनता देखने को मिल रही है, जो मामले सबसे जघन्य होते हैं, उस पर लोगों का थोड़ा बहुत ध्यान जाता है."

जोआओ पेड्रो की मां राफ़ेला बताती हैं कि बेटे को खोने से पहले ना तो वह कभी पुलिस से डरीं और ना ही अपने बच्चों को गलियों में खेलने से रोका, लेकिन अब अपनी बेटी रेबेका के लिए उनकी राय बदल चुकी है.

राफ़ेला कहती हैं, "हम नहीं जानते हैं कि हम कैसे आगे बढ़ेंगे. कई बार लोग मुझसे कहते हैं कि आपके पास तो रेबेका है." लेकिन एक बच्चा दूसरे बच्चे की जगह नहीं भर सकता.

राफ़ेला बताती हैं, "हमने रेबेका को नहीं बताया था कि क्या हुआ है, यही कहा था कि उसका छोटा भाई अब भगवान के पास है. लेकिन वह अपने कजिन के साथ खेल रही थी, तो कजिन ने उससे पूछा कि तुम्हारा भाई जोआओ कहाँ है, तो रेबेका ने कहा था, 'तुम नहीं जानती? उन लोगों ने मेरे भाई को मार डाला."

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