ब्राज़ील: इस 'अंतिम योद्धा' की विरासत को लेकर इतनी चर्चा क्यों है

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ब्राज़ील के अमेज़न के जंगल में आदिवासी जुमा समूह के अंतिम पुरुष सदस्य, अरुका की कोविड-19 से मौत हो गई है. उनकी मौत इस समुदाय के लिए एक बड़ा झटका है.
20वीं शताब्दी की शुरुआत में जुमा समूह के सदस्यों की संख्या क़रीब पंद्रह हज़ार थी, जो 1990 के दशक में घटकर सिर्फ़ छह रह गई.
अरुका इस आदिवासी समुदाय के अंतिम पुरुष सदस्य थे. बीबीसी ब्राज़ील सेवा की जूलियाना ग्रैगनानी की रिपोर्ट के अनुसार, अरुका के नातियों ने उनकी विरासत को संजोए रखने के लिए कुछ असामान्य क़दम उठाये हैं.
मौत के समय अरुका की उम्र कितनी थी, इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है. लेकिन जानकारों का अनुमान है कि उनकी उम्र 86 से 90 साल के बीच रही होगी.
अरुका ने अपने जीवनकाल में हज़ारों की आबादी वाले मज़बूत जुमा समूह को विलुप्त होते देखा. वे इस बात के गवाह बने कि कैसे अमेज़न के जंगल में मछलियाँ पालने, शिकार करने और खेतीबाड़ी के काम में लगे एक आदिवासी समूह की जनसंख्या ऊंगलियों पर गिनने लायक रह गई.
जुमा समुदाय ने रबर के तस्करों द्वारा किये गए नरसंहार का भी सामना किया. इस समुदाय पर कुछ घातक बीमारियों का प्रकोप भी देखा गया, और अंत में सिर्फ़ एक जुमा परिवार ही जीवित बचा. अरुका इस परिवार के प्रमुख थे.
फ़ोटोग्राफ़र गैब्रियल उचिडा ने लंबे समय तक जुमा समुदाय पर काम किया. वे कहते हैं, "अरुका बहुत परेशानी के साथ इस बारे में बात करते थे कि एक समय उनके समुदाय में हज़ारों लोग थे, लेकिन अब सिर्फ़ कुछ ही पुरुष बचे हैं."
अरुका की तीन बेटियाँ थीं, लेकिन जब तक वे जवान हुईं तब तक जुमा समुदाय में उनसे शादी करने के लिए कोई पुरुष नहीं बचा था. इसीलिए तीनों की शादी एक अन्य आदिवासी समुदाय उरु-वे-वाऊ-वाऊ में हुई.

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रिवाज़ के विपरीत
इन समुदायों की पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अनुसार, अरुका के पोते और उनके पर-पोते ही अपने नाम के साथ उनके नाम का प्रयोग कर सकते हैं. यानी उन्हें ही जुमा समुदाय का हिस्सा माना जाता है, ना कि उनकी मांओं के परिवार को.
लेकिन इन समुदायों में अब कुछ लोग रिवाज़ के विपरीत अपने नाम के साथ 'जुमा' लगा रहे हैं.
अरुका के नातियों ने तय किया है कि वे अपनी पहचान उरु-वे-वाऊ-वाऊ समुदाय के साथ-साथ जुमा समुदाय के सदस्य के तौर पर भी बनाए रखेंगे.
अरुका के नाती 20 साल के बिटाटे उरु-वे-वाऊ-वाऊ समझाते हैं, "हम अपने लोगों की परंपराओं को आगे बढ़ाने जा रहे हैं. वे (अरुका) हमारे साथ हैं. उनके साथ हमारी बहुत सारी यादें हैं. उन्होंने हमारे लोगों का नेतृत्व किया है और हमारे भविष्य को लेकर हमेशा चिंता की. हम उनके नाम को आगे बढ़ाना चाहते हैं."

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बिटाटे के छोटे भाई, 18 साल के कुआइंबू भी उनकी बात का समर्थन करते हैं. वे कहते हैं, "हम नहीं चाहते कि हमारे लोगों के संघर्षों को भुला दिया जाये. हम अपने दादा और हमारी परंपराओं पर गर्व महसूस करते हैं."
कुआइंबू ने अपने नाम में अपने दादा का सरनेम शामिल किया है. वे ख़ुद को कुआइंबू जुमा उरु-वे-वाऊ-वाऊ कहते हैं. वे जल्द ही अपनी आईडी पर भी यही नाम लिखवाने वाले हैं.
वे कहते हैं, "मैं जुमाओं का नाती हूँ और मुझे अपने नाम में जुमा लिखने का पूरा अधिकार है."

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ब्राज़ील के आदिवासी समुदायों पर काम करने वाली कार्यकर्ता इवानइडे बानदेरा कहती हैं कि अंतिम जुमा पुरुष की मौत के बाद, किसी अन्य समुदाय के पुरुषों द्वारा जुमा सरनेम का इस्तेमाल, इन पितृसत्तात्मक समुदायों में अब से पहले कभी नहीं देखा गया. वे कहती हैं कि यह एक बड़ा बदलाव है.
उनके अनुसार, "यह इन बच्चों द्वारा एक संदेश है कि वे अपनी ज़मीन पर टिके रहेंगे, अपनी परंपराओं को ज़िंदा रखेंगे और जंगलों को बचाने का उनका संघर्ष जारी रहेगा."
मौत की दास्तां
बानदेरा कहती हैं कि जुमाओं की कहानी, अमेज़न में बसे अन्य आदिवासी समुदायों की ही तरह, एक 'मौत की दास्तां' है.
फ़ेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्टर्न पारा के प्रोफ़ेसर लूसियाना फ़्रैंका के अनुसार, 1940 के दशक से ही जंगल की ज़मीनों पर नज़र रखने वाले लोग इन समुदायों के पीछे लगे हैं.
जानकार कहते हैं कि 1964 में रबर के तस्करों ने दर्जनों जुमा पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया था. ऐसी कई घटनाएं सरकारी रिकॉर्ड्स में भी दर्ज हैं.
बानदेरा जुमा समुदाय के अंतिम पुरुष सदस्य की मौत को बेहद दुखद घटना बताती हैं. वे ब्राज़ील सरकार पर इसका आरोप लगाती हैं. उनका कहना है कि "नाकाम सरकार कोविड-19 को महामारी को अरुका के गाँव तक पहुँचने से नहीं रोक पायी."
उनके अनुसार, "गाँव में जाने वाले हर सदस्य का कोविड टेस्ट होना चाहिए था और महामारी के प्रसार को रोकने के लिए क्वारंटीन जैसी सावधानियाँ भी बरती जानी चाहिए थीं."
अरुका के नाती बिटाटे, बानदेरा के आरोपों को सही ठहराते हैं. वे कहते हैं, "हम शहरों से दूर रहते हैं. यहाँ पहुँचने के लिए यात्रा करनी पड़ती है. ऐसे में महामारी को यहाँ तक पहुँचने से रोका जा सकता था. लेकिन सरकार ने इस बात का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा. यह निश्चित रूप से सरकार की नाकामी है."

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लेकिन अरुका की मौत, आदिवासी समुदायों में कोविड-19 से होने वाली मौत का अकेला मामला नहीं है.
ब्राज़ील सरकार के अनुसार, कुल 8 लाख 96 हज़ार 900 आदिवासी लोगों में से 572 लोगों की मौत अब तक कोविड-19 से हुई है.
ब्राज़ील में आदिवासी समुदायों की एक स्वतंत्र संस्था एपिब के अनुसार, कोविड-19 से मरने वाले आदिवासी लोगों की असल संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं ज़्यादा है. उनके अनुसार, क़रीब एक हज़ार लोग इस महामारी से मारे जा चुके हैं.
इस संस्था के अनुसार, कोविड-19 से मरने वाले अधिकांश वो बुज़ुर्ग थे, जिन्हें अपने समुदायों की परंपराएं, कहानियाँ और इतिहास ज़ुबानी याद था.
बिटाटे कहते हैं कि उनके नाना अरुका ने मरने से पहले बहुत सारी बातें अपने बच्चों का बताईं. वो कहते हैं, "उनका एक सपना था कि हम एक बड़ी कुटिया बनाएं. हमने दो साल पहले, उनके नेतृत्व में उसका काम पूरा किया. उन्होंने हमें समझाया कि इसे कैसे बनाया जाता है. अब मैं जानता हूँ कि जुमा समुदाय की पारंपरिक बैठक की जगह कैसे बनाई जाती है."

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अरुका ने अपने बच्चों को यह भी बताया कि मछलियाँ पकड़ने का सही तरीका क्या है. साथ ही ये भी कि उनके समुदाय के रिवाज़ क्या रहे हैं.
फ़ोटोग्राफ़र गैब्रियल उचिडा याद करते हैं, "वो एक शानदार शख़्स थे. वो एक योद्धा थे. उन्होंने हमें भी बहुत सारी कहानियाँ सुनाई थीं. वो सुनाते थे कि कैसे उनके समुदाय के लोगों ने रबर के तस्करों से लंबे संघर्ष किए. कैसे उन पर हमले हुए और कैसे जुमा समुदाय हमेशा अपनी जड़ों को बचाने में लगा रहा."
बानदेरा भी अरुका का वर्णन 'प्रतिरोध के प्रतीक' के रूप में करती हैं जिनकी विरासत को अब उनके नाती जीवित रखेंगे.
वे कहती हैं, "अरुका की बेटियाँ और उनके नाती यहाँ रहेंगे और उनकी विरासत को जारी रखेंगे."


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