ऑस्ट्रेलिया में आग के चलते लाल हुआ आसमान, करोड़ों जीव भस्म

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ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में बीते तीन महीने से जारी आग में पचास करोड़ से ज़्यादा जानवरों की मौत हो चुकी है.

ये आग कितनी भयावह है, इसका अंदाज़ा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि इस आग से अब तक 1 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जलकर राख हो चुका है.

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इस आग में अब तक अठारह सौ से ज़्यादा घर तबाह हो चुके हैं और मरने वालों की संख्या दो दर्जन से अधिक हो चुकी है.

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सवाल उठता है कि आख़िर इस आग की वजह क्या है और इस बार ऑस्ट्रेलिया की आग ने इतना भयावह रूप क्यों ले लिया है?

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ऑस्ट्रेलिया के लिए जंगलों में आग लगना कोई नई बात नहीं है. लेकिन बढ़ते तापमान और सूखे की वजह से ऑस्ट्रेलिया के अलग-अलग हिस्सों के जंगलों में आग भड़क चुकी है.

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कई इलाक़ों में तापमान पचास डिग्री सेल्सियस के आसपास है और कहीं-कहीं इससे भी ज़्यादा हो जाता है. ऐसे में सूखे जंगलों में आग लगना काफ़ी सामान्य है.

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लेकिन साल 2019 में तापमान में बढ़ोतरी की वजह से साल के अंत में लगी आग के अब तक बुझने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं.

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ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स और विक्टोरिया पर एक बार फिर ज़्यादा तापमान और तेज हवाओं के चलते आग लगने का ख़तरा मंडरा रहा है.

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ऑस्ट्रेलिया के कुछ इलाकों में आग बुझने के बाद दूसरे संकट सामने आ रहे हैं. इन समस्याओं में पानी की कमी, हवा का प्रदूषित होना शामिल है.

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पानी की कमी का असर इंसान और जानवरों के बीच संघर्ष के रूप में सामने आ रहा है.

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दक्षिण ऑस्ट्रेलिया में हज़ारों ऊंटों का क़त्ल किया जा रहा है. भीषण गर्मी और सूखे की वजह से ये क़दम उठाया जा रहा है. इस इलाक़े में रहने वाले लोगों का कहना है कि ये ऊंट कस्बों और इमारतों को नुक़सान पहुंचा रहे हैं.

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ऊंट पानी की तलाश में गलियों में घूम रहे हैं जिससे छोटे बच्चों और दूसरे लोगों के लिए ख़तरा पैदा हो रहा है. इसके साथ ही घोड़ों को मारे जाने की भी आशंका जताई जा रही है.

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लेकिन इनके अलावा जंगल में आग से बचने वाले जानवरों के लिए भी आने वाले दिन ख़तरनाक साबित होने की आशंका जताई जा रही है.

विशेषज्ञों के मुताबिक़, इतने समय से जारी आग के कारण जानवरों को पेट भरने के लिए घास और पेड़-पौधों आदि की कमी हो सकती है.

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क्या जलवायु परिवर्तन वजह है

ऑस्ट्रेलिया में कई लोग ये सवाल पूछ रहे हैं कि यह सब जलवायु परिवर्तन के कारण तो नहीं हो रहा.

वैज्ञानिकों ने कई बार चेतावनी दी है कि गर्म और शुष्क मौसम के कारण लगने वाली आग के मामले और ज़्यादा बढ़ेंगे. ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों में कुछ सालों से सूखे के हालात हैं, जिससे आग पकड़ना और फैलना आसान हो जाता है.

आंकड़े दिखाते हैं कि ऑस्ट्रेलिया का तापमान 1910 के बाद से एक डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है. ब्यूरो ऑफ मेटिअरोलजी के मुताबिक़ 1950 के बाद से तापमान ज़्यादा गर्म होना शुरू हुआ है.

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ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर में दो बार अपने तापमान का रिकॉर्ड तोड़ा था. 17 दिसंबर को औसत अधिकतम तापमान 40.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था.

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इसके अगले दिन (18 दिसंबर) तापमान 41.9 डिग्री सेल्सियस था. दोनों दिन 2013 के 40.3 डिग्री सेल्सियस तापमान का रिकॉर्ड टूटा था.

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दिसंबर के अंत में हर राज्य में 40 डिग्री से ऊपर तापमान दर्ज किया गया था. इसमें तस्मानिया राज्य भी शामिल है जो आमतौर पर अन्य इलाक़ों के मुक़ाबले ठंडा रहता है.

गर्म हवाओं के पीछे प्राकृतिक कारण

गर्म हवाओं के पीछे का प्राकृतिक कारण हिंद महासागर द्विधुव्र की स्थिति है. इसमें समुद्र के पश्चिमी आधे हिस्से में समुद्र का सतही तापमान गर्म है और पूर्व में ठंडा है.

इन दोनों तापमानों के बीच का अंतर पिछले 60 सालों में सबसे ज़्यादा शक्तिशाली है.

इसके कारण पूर्वी अफ़्रीका में औसत से ज़्यादा बारिश हुई है और बाढ़ आई है. वहीं दक्षिण-पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ा है.

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मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि ऑस्ट्रेलिया में गर्म तापमान और आग का ख़तरा आग भी बना रहेगा.

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