अंडमान निकोबार: अमरीकी मिशनरी के कारण ख़तरे में है पूरी सेंटिनेल जनजाति

जॉन एलिन शाओ, सेंटिनेल

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इमेज कैप्शन, जॉन एलिन शाओ ने 21 अक्तूबर को यह तस्वीर अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर की और लिखा कि वे सेंटिनेल जा रहे हैं
    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

हाल में अमरीकी मिशनरी जॉन एलिन शाओ की मौत के बाद अंडमान निकोबार के सेंटिनेल द्वीप पर रहने वाली सेंटिनेल आदिम जनजाति काफ़ी चर्चा में रही.

पुलिस का कहना है कि 27 साल के जॉन ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए कई बार अंडमान आ चुके थे और वह इस द्वीप पर मौजूद आदिवासियों के धर्म परिवर्तन की कोशिश कर रहे थे.

इस मामले में सात मछुआरों को गिरफ्तार भी किया गया है, जिन्होंने जॉन एलिन को अवैध रूप से द्वीप तक पहुंचाया था.

जॉन एलिन शाओ की मौत हो चुकी है, मगर उनके अवैध ढंग से सेंटिनल द्वीप पर जाने से सेंटिनेल जनजाति और उन जनजातियों के भी अस्तित्व पर ख़तरा मंडरा रहा है, जिनके संपर्क में वह आए थे.

दरअसल, अंडमान की ये जनजातियां आदिम जनजातियां हैं और पूरी तरह से बाहरी दुनिया से कटी हुई है. इनके रहन-सहन और खान के तौर-तरीक़े हमारी आधुनिक दुनिया से एकदम अलग हैं.

उत्तरी सेंटिनेल द्वीप का एक दृश्य

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इमेज कैप्शन, उत्तरी सेंटिनेल द्वीप

सेंटिनेली और उनकी तरह की अन्य आदिम जनजातियां न तो बाहरी दुनिया की कई बीमारियों के संपर्क में हैं और न ही उनके अंदर इन बीमारियों के लिए प्रतिरोधक क्षमता है.

ऐसे में एक मामूली संक्रामक बीमारी भी पूरी की पूरी जनजाति को ख़त्म कर सकती है. इतिहास में इसके कई उदाहरण भी देखने को मिल चुके हैं.

आज हमारे यहां कई बीमारियों से लड़ने के लिए टीकाकरण होते हैं, मगर ये आदिम जनजातियां उन बीमारियों को लेकर बेहद संवेदनशील हैं.

यही कारण है कि इनसे किसी को भी संपर्क करने की इजाज़त नहीं है और उन्हें अपने में ही रहने के लिए छोड़ दिया जाता है. इसीलिए इन्हें 'अनकॉन्टैक्टेड ट्राइब्स' भी कहा जाता है.

सांकेतिक तस्वीर

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क्या है ख़तरा

उत्तरी सेंटिनेल द्वीप एक प्रतिबंधित इलाक़ा है और यहां आम इंसान का जाना बहुत मुश्किल है. यहां तक कि वहां भारतीय भी नहीं जा सकते.

साल 2017 में भारत सरकार ने अंडमान में रहने वाली जनजातियों की तस्वीरें लेने या वीडियो बनाने को ग़ैरक़ानूनी बताया था, जिसकी सज़ा तीन साल क़ैद तक हो सकती है.

अंडमान में चार तरह की आदिम जनजातियों की पहचान हुई है. पहली है 10 छोटी-छोटी जनजातियों को मिलाकर बनी ग्रेट अंडमानी. इसके अलावा जारवा, ओंग और सेंटिनेल जनजातियां भी इस द्वीप पर रहती हैं.

सेंटिनेल जनजाति के लोगों का बाहरी लोगों से संपर्क ग़ैरक़ानूनी है

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इमेज कैप्शन, सेंटिनेल जनजाति के लोगों का बाहरी लोगों से संपर्क ग़ैरक़ानूनी है

इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी अमरकंटक में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर प्रमोद कुमार जारवा जनजाति के जानकार हैं. उन्होंने इस जनजाति और उनकी भाषा पर शोध किया है.

वे बताते हैं कि अंडमान में रहने वाली चार जनजातियों में से दो अंग्रेज़ों के आगमन के समय में ही बाहरी दुनिया के संपर्क में आ गई थी. जारवा 1908 में अपने दोस्ताना व्यवहार रखने की वज़ह से संपर्क में आए.

हालांकि सेंटिनेल इन सबसे दूर हैं और वे अपने आप में ही रहते हैं. डॉक्टर प्रमोद कुमार बताते हैं कि हर कोई इन जनजातियों के संपर्क में नहीं आ सकता और इसके लिए विशेष शर्तों को पूरा करना पड़ता है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "जब मुझे जारवा भाषा पर शोध करना था स्थानीय प्रशासन के ज़रिये केंद्रीय गृह मंत्रालय से मंज़ूरी मिली थी. इसके बाद मेरा मेडिकल चेकअप हुआ कि कहीं मैं किसी संक्रामक बीमारी से पीड़ित तो नहीं. चेकअप में कोई बीमारी न मिलने के बाद बाद शर्त यह थी कि मुझे अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति (AAJVS) के स्टाफ़ के साथ ही आना-जाना होगा, मैं अकेला उनसे संपर्क नहीं कर सकता था."

अंडमान

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कितना ख़तरनाक है ऐसे ही चले जाना

डॉक्टर प्रमोद कुमार बताते हैं कि संक्रामक बीमारियों के वायरस जब उन लोगों के संपर्क में आएंगे तो पूरा समुदाय इसकी चपेट में आ सकता है.

उनके लिए ख़तरा इसलिए ज़्यादा है क्योंकि वो पूरा समुदाय एक साथ रहता है.

प्रमोद कुमार बताते हैं चूंकि आदिम जनजातियों के अंदर कई बीमारियों के लिए प्रतिरोधक क्षमता नहीं है, इस कारण पहले भी दुनिया भर से कई जनजातियां ख़त्म हो चुकी हैं.

वह बताते हैं, "औपनिवेशिक दौर में जब ब्रितानी यहां ग्रेटअंडमानियों के संपर्क में आए तो वे बीमार हो गए और इलाज नहीं हो पाया. बड़ी संख्या में उनकी मौत हुई और संख्या बहुत कम रह गई. लेकिन भारत की बात नहीं है, औपनिवेशिक दौर में कई जगह ऐसा हुआ है. पहले ये जनजातियां आराम से रह रही थीं, मगर बाहर के लोग उनके संपर्क में आए तो उन्हें ख़तरा हो गया. फ़िलीपीन्स, ब्राज़ील और अमरीका में कई जनजातियां इसी कारण ख़त्म हो गईं."

ब्राज़ील

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इमेज कैप्शन, ब्राज़ील की कई जनजातियां औपनिवेशिक दौर में पुर्तगालियों के संपर्क में आने से ख़त्म हो गई थीं

यह पूछे जाने पर कि क्या जॉन एलिन शाओ के संपर्क में आने से सेंटिनेल जनजाति को ख़तरा हो सकता है, डॉक्टर प्रमोद कुमार कहते हैं, "शाओ ही नहीं, कोई भी व्यक्ति अगर सेंटिनल के संपर्क में जाता है तो वह पूरे के पूरे समुदाय के लिए ख़तरा है."

ग़ौरतलब है कि सेंटिनेल जनजाति के लोगों की संख्या मात्र 50 से 150 के क़रीब ही रह गई है. ऐसे में अगर वे किसी ख़तरनाक बीमारी की चपेट में आते हैं तो उनका अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ सकता है.

दुनिया भर में इस तरह की और भी कई आदिम जनजातियां हैं जिनसे संपर्क करने की कोशिश नहीं की जाती.

उदाहरण के लिए ब्राज़ील की सरकारी एजेंसी फ़ुनाई ने अमेज़न के जंगल में रहने वाली ऐसी 27 जनजातियों की पहचान की है और उनसे दूर से ही नज़र रखी जाती है.

सवाल उठता रहा है कि इन आदिम जनजातियों को मुख्य धारा में लाने की कोशिश क्यों नहीं होती. इस संबंध में डॉक्टर प्रमोद कुमार का कहना है कि ऐसा करने के बारे में सोचना भी ख़तरनाक है.

वह बताते हैं, "हमारे भी पूर्वज कई हज़ार साल पहले जंगल में रहते थे, गुफाओं में रहते थे. लेकिन हमें आज की स्थिति में आने के लिए कई हज़ार साल लगे. अगर हम इन आदिम जनजातियों को आज के दौर में लाना चाहेंगे तो यह उन्हें किसी खाई में कूदवाने जैसा है. उदाहरण के लिए जारवा लोग जब पहली बार इंसानों के संपर्क में आए और कपड़े पहनने लगे तो उन्हें स्किन डिजीज शुरू हो गई थी."

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