देवेंद्र फडणवीस होंगे महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री, उनके राजनीतिक सफर पर नज़र

देवेंद्र फडणवीस

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इमेज कैप्शन, हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान 11 नवंबर को गोरेगांव सीट के पार्टी उम्मीदवार के पक्ष में भाषण देते देवेंद्र फडणवीस
    • Author, मयूरेश कोण्णूर और दीपाली जगताप
    • पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता

विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की ऐतिहासिक जीत और दस दिनों की बहस के बाद बीजेपी ने एलान कर दिया है कि फडणवीस भाजपा विधायक दल के नेता और राज्य के अगले मुख्यमंत्री होंगे.

मुख्यमंत्री पद के चुनाव के लिए दिल्ली से आईं केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज उनके नाम पर मुहर लगा दी. बीजेपी नेता चंद्रकांत पाटिल ने फडणवीस के नाम का प्रस्ताव रखा और पंकजा मुंडे ने प्रस्ताव का समर्थन किया.

ठीक चार महीने पहले जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए तो बीजेपी महाराष्ट्र में दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाई. ऐसे में इस चुनाव परिणाम के साथ देवेंद्र फडणवीस के भविष्य के बारे में कयास लगाए जाने लगे थे.

देवेंद्र फडणवीस का 2019 को वो बयान अक्सर सोशल मीडिया पर छाया रहता है, जिसमें उन्होंने कहा था, 'मैं समंदर हूं लौट कर आऊंगा.'

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पीएम मोदी और आरएसएस से क़रीबी संबंध

पीएम मोदी और देवेंद्र फडणवीस

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इमेज कैप्शन, लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद देवेंद्र फडणवीस ने उपमुख्यमंत्री का पद छोड़ने की पेशकश की थी

फडणवीस का रिश्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तो अच्छा रहा ही है, साथ में वो आरएसएस के भी चहेते रहे हैं. उनकी गिनती बीजेपी में राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेताओं में भी होती है.

लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मराठा आंदोलन का चेहरा मनोज जरांगे की नाराज़गी का नुक़सान उठाना पड़ा था.

'मराठवाड़ा' समेत बीजेपी राज्य में ज्यादातर अपनी सीटें गंवा बैठी और जीत का आंकड़ा दहाई तक भी नहीं पहुंच पाया.

लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में बीजेपी को मिली ये शिकस्त कई मायनों में फडणवीस के लिए बड़ी राजनीतिक हार थी. भले ही इस चुनाव के दौरान एकनाथ शिंदे सीएम थे, लेकिन फिर भी फडणवीस को महायुति के नेता की तरह देखा जा रहा था.

इस हार की ज़िम्मेदारी देवेंद्र फडणवीस ने ली भी. उन्होंने डिप्टी सीएम पद छोड़कर पार्टी के लिए काम करने की पेशकश की थी.

हालांकि, उस दौरान ये बातें भी कही जा रही थी कि वो इस बात से नाराज़ थे कि डिप्टी सीएम होने के बाद भी हार का ठीकरा उनके सिर मढ़ा जा रहा है. इसको लेकर उनके मन में नाराज़गी थी.

लोकसभा चुनाव के बाद भी बीजेपी ने फडणवीस को सरकार से बाहर नहीं जाने दिया और फडणवीस सरकार में बने रहे. लेकिन उसके बाद देवेंद्र फडणवीस ने अपना 'गियर शिफ्ट' कर लिया.

लोकसभा चुनाव की हार को पीछे छोड़ने के लिए फडणवीस हर दांव खेलना चाहते थे.

देवेंद्र फडणवीस और अमित शाह

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इमेज कैप्शन, देवेंद्र फडणवीस का प्रभाव विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों के चयन में दिखा
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पिछले कुछ महीनों में महाराष्ट्र की राजनीति ने कई बड़े बदलाव देखे हैं, ख़ासतौर पर बीजेपी की राजनीति में भी.

इस बीच, लोकसभा में हार के बाद भी देवेंद्र फडणवीस की आलोचना होती रही. ये भी चर्चा शुरू हो गई थी कि फडणवीस को दिल्ली भेजा जाएगा, उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाएगा या फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा. लेकिन इन सब के बीच देवेंद्र फडणवीस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों के साथ बैठक करते हैं.

ऐसा कहा जा रहा था कि लोकसभा चुनाव के दौरान संघ सक्रिय नहीं था. फडणवीस की बैठकों के बाद संघ की टीम सक्रिय हुई.

ये भी चर्चा शुरू हुई कि राज्य में नेतृत्व की ज़िम्मेदारी सामूहिक स्तर पर होगी. लेकिन आख़िरकार बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व और संघ के हस्तक्षेप के कारण बीजेपी की डोर देवेंद्र फडणवीस के हाथ में ही रही.

चुनाव प्रचार के दौरान अमित शाह के दौरे, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के साथ मेल-मिलाप, अजित पवार की कभी-कभी नाराज़गी और बीजेपी के भीतर ही फडणवीस के ख़िलाफ़ एक गुट की बढ़ती सक्रियता.

इन सब का सामना करते हुए, देवेंद्र फडणवीस खुद को विधानसभा चुनाव के केंद्र में रखने में सफल हुए.

देवेंद्र फडणवीस का प्रभाव ख़ास तौर पर उम्मीदवारों के चयन में देखा जा सकता है. वहीं बीजेपी महायुति के बीच बातचीत कर सबसे ज़्यादा सीटों पर भी चुनाव लड़ने में सफल रही.

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मराठा आरक्षण और ओबीसी का मुद्दा कैसे संभाला गया?

मनोज जरांगे और लक्ष्मण हाके

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इमेज कैप्शन, मनोज जरांगे (बाएं) और लक्ष्मण हाके

लोकसभा चुनाव में मराठा आरक्षण के मुद्दे पर बीजेपी को नुक़सान उठाना पड़ा था. बीजेपी के सामने विधानसभा में आरक्षण के मुद्दे को लेकर जब भी कोई बात निकली तो वो मनोज जरांगे पर जवाब देने से बचती नज़र आई.

लेकिन फडणवीस के क़रीबी नेता प्रसाद लाड़ और प्रवीण दरेकर ने ये सवाल उठाए कि जरांगे सिर्फ़ फडणवीस पर ही निशाना साध रहे हैं.

इस दौरान लक्ष्मण हाके का आंदोलन शुरू हो गया. एक तरफ़ जहां मराठा आरक्षण के लिए जरांगे आंदोलन कर रहे थे, वहीं, दूसरी ओर हाके इसके विरोध में 'ओबीसी हक' के लिए आंदोलन में बैठे थे.

फडणवीस ने मनोज जरांगे के ख़िलाफ़ कोई बयान नहीं दिया, लेकिन लक्ष्मण हाके ने आरक्षण का मुद्दा उठाया और कड़े शब्दों में मनोज जरांगे की आलोचना करनी शुरू की. जिस तरह से ये सवाल पूछा जा रहा था कि मनोज जरांगे के पीछे किसका हाथ है, अब ये सवाल उसी तरह पूछा जाने लगा कि लक्ष्मण हाके के पीछे किसका हाथ है. हालांकि अब भी इन दोनों सवालों के जवाब किसी ने नहीं दिए हैं.

लक्ष्मण हाके आंदोलन का असर विधानसभा चुनावों में देखने को मिला और अब कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र में कुछ हद तक ओबीसी वोटों का एकीकरण हुआ है.

इन सभी घटनाक्रमों का परिणाम यह हुआ कि देवेंद्र फडणवीस की कड़ी आलोचना के कारण भाजपा और फडणवीस समर्थकों के बीच उनके लिए कुछ सहानुभूति पैदा हुई. साथ ही मतदाताओं के मन में भी मनोज जरांगे की भूमिका को लेकर संदेह पैदा होने लगा.

विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान देवेंद्र फडणवीस के प्रचार के लिए कुछ अभियान चलाए गए थे. उनके प्रचार अभियान के दौरान ये नारे भी लगाए गए कि वो 'बहुजन हित के लिए आगे आए, इसलिए निशाना बनाए गए.'

हिंदुत्व का मुद्दा वो चुपचाप उठाते रहे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत और देवेंद्र फडणवीस

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इमेज कैप्शन, देवेंद्र फडणवीस को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का करीबी माना जाता है

देवेंद्र फडणवीस ने आरएसएस और हिंदू संगठनों के साथ मिलकर हिंदुत्व के मुद्दे को ख़ासतौर पर ग्रामीण इलाकों में फिर से चर्चा का विषय बनाया.

हालांकि, नितेश राणे और हिंदू जागरूकता मार्च को रोका गया, लेकिन फडणवीस ने हिंदू संगठनों का इस्तेमाल कर ये मुद्दे उठाए, जिसका ग्रामीण इलाकों के वोटरों पर असर भी हुआ.

चुनाव प्रचार के दौरान फडणवीस ने कई बार 'वोट जिहाद' का भी मुद्दा उठाया. वो इसके बारे में लगातार बात करते रहे. उन्होंने कहा कि जब मुसलमान एकजुट होकर वोट कर सकते हैं तो हिंदुओं को भी एकजुट होकर वोट करना चाहिए. महायुति को चुनाव में इसका भी फ़ायदा हुआ.

इसके अलावा सरकार लाडकी बहिन और कई अन्य योजनाएं लेकर आई. फडणवीस ने इस योजना के जरिए अपनी छवि पूरे राज्य में 'देवाभाऊ' की बनाने की कोशिश की.

संघ की मदद से उन्होंने लोकसभा के दौरान वोट न देने वालों को मतदान केंद्रों तक लाने और पार्टी के पक्ष में वोट कराने की भी कोशिश की.

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पार्षद, महापौर, विधायक, प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री

देवेंद्र फडणवीस

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इमेज कैप्शन, देवेंद्र फडणवीस 1999 में पहली बार विधानसभा पहुंचे

बता दें कि देवेंद्र फडणवीस 30 साल से अधिक समय से राजनीति में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने समकालीन राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में कम उम्र में अपना करियर शुरू किया और दूसरों की तुलना में पहले कई पद हासिल किए. वो एक राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं.

उनके पिता गंगाधर फडणवीस बीजेपी के प्रमुख नेता थे. वे कई वर्षों तक विधान परिषद के सदस्य रहे. उनके निधन के समय फडणवीस की उम्र 17 साल थी. उनकी मौत के बाद खाली हुई विधान परिषद सीट पर नितिन गडकरी निर्वाचित हुए.

पहली गठबंधन सरकार में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री रहीं शोभाताई फडणवीस, देवेंद्र फडणवीस की चाची हैं.

देवेंद्र अपने छात्र जीवन के दौरान 'अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद' से जुड़े थे. लेकिन जल्द ही वो गडकरी के नेतृत्व में राजनीति में सक्रिय हो गये. 1992 में, वह पहली बार 22 साल की उम्र में नागपुर नगर निगम में पार्षद बने.

वहीं से उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई. उनके कार्यकाल के बारे में बात करते हुए, महाराष्ट्र टाइम्स के नागपुर के संपादक श्रीपाद अपराजित कहते हैं, "देवेंद्र फडणवीस का राजनीति में प्रवेश अन्य नेताओं की तुलना में आसान था. लेकिन राजनीति में उनकी यात्रा कठिन रही है."

"वो 1992 में पार्षद निर्वाचित हुए. दरअसल ये चुनाव 1989 में होना था और उस समय उनकी उम्र भी चुनाव लड़ने की नहीं हुई. वो इस मामले में भाग्यशाली रहे कि ये चुनाव 1992 में हुआ."

फडणवीस जल्द ही नागपुर के मेयर हो गए. लेकिन फडणवीस का लक्ष्य इससे बड़ा था. 1999 में, जब शिवसेना-बीजेपी गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा था, तब फडणवीस पहली बार विधानसभा पहुंचे.

जब देवेंद्र फडणवीस ने नागपुर में अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था, तब नितिन गडकरी नागपुर और विदर्भ में बीजेपी के दिग्गज नेता थे. फडणवीस ने राजनीति में गडकरी की उंगली पकड़कर चलना शुरू किया.

बाद में बीजेपी में बदलते समीकरणों में फडणवीस ने गडकरी का साथ छोड़कर गोपीनाथ मुंडे का हाथ थाम लिया. इसी ग्रुप के साथ रहकर फडणवीस 2013 में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष का पद पाने में कामयाब रहे.

नागपुर के रहने वाले देवेंद्र फडणवीस को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वफादार माना जाता है. ये उनके लिए एक अच्छा पक्ष साबित हुआ. दूसरी बात यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी का नेतृत्व मोदी-शाह के हाथ में था न कि नितिन गडकरी के पास.

साथ ही उन राज्यों में जहां बीजेपी चुनाव जीत रही थी. वहां बीजेपी अलग तरीके से चेहरा चुन रही थी.

हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर जो गैर-जाट हैं, झारखंड में रघुबर दास जो गैर-आदिवासी हैं उन्हें मुख्यमंत्री पद मिला और देवेंद्र फडणवीस जो गैर-मराठा हैं, उन्हें महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पद मिला.

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क्या 2019 के बाद बदल गए हैं देवेंद्र फडणवीस?

देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे

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इमेज कैप्शन, 'महायुति' गठबंधन की सरकार में एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री रहे

नवंबर 2019 में, जब पूरी बीजेपी और महाराष्ट्र की राजनीति देवेंद्र फडणवीस के आस-पास केंद्रित थी, तब एक बड़ा राजनीतिक मोड़ आया. फडणवीस महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसा बदलाव लाए, जो पांच साल बाद भी चर्चा का विषय है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या इस घटना से फडणवीस और उनकी राजनीति में बदलाव आया?

बीजेपी और शिवसेना ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन मुख्यमंत्री पद के मुद्दे पर सहमति नहीं बनी. इसके बाद शिवसेना ने बीजेपी के साथ सरकार बनाने से इनकार कर दिया.

उद्धव ठाकरे ने शरद पवार और कांग्रेस के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी का गठन किया, जो महाराष्ट्र में पहले कभी नहीं हुआ था. 105 विधायकों और गठबंधन के साफ बहुमत के बाद भी ये लगभग तय हो गया था कि बीजेपी सत्ता से बाहर रहेगी.

इस स्थिति में, देवेंद्र फडणवीस ने, जो पहले लगातार पांच साल तक मुख्यमंत्री रहे थे, अचानक 23 नवंबर 2019 की सुबह मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उनके साथ अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

इस पूरी प्रक्रिया में कौन-कौन शामिल था? बीजेपी की ओर से मोदी और अमित शाह की क्या भूमिका थी? क्या शरद पवार पहले इस योजना पर सहमत थे? अजित पवार ने इतनी दूर तक जाने का फैसला क्यों किया? इन सवालों के जवाब आज भी अधूरे हैं. लेकिन इन घटनाओं के केंद्र में देवेंद्र फडणवीस थे.

बाद में फडणवीस ने कई मौकों पर कहा कि 'उद्धव ठाकरे ने समर्थन देने से इनकार करके उनकी पीठ में छुरा घोंपा' और 'शरद पवार पहले बीजेपी-राष्ट्रवादी गठबंधन के लिए सहमत थे, लेकिन बाद में पीछे हट गए.'

उनके समर्थकों का मानना है कि राजनीति में ताकत दिखाने के लिए ऐसे कदम उठाए जाते हैं. लेकिन उनकी ये सरकार केवल 80 घंटे चली, जिसके बाद फडणवीस और बीजेपी पर सत्ता के लिए किसी भी हद तक जाने की आलोचना हुई.

इसके बाद उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने और फडणवीस विपक्ष के नेता. उनकी आक्रामक राजनीति ने राज्य सरकार को कई बार मुश्किल में डाला.

जून 2022 में विधान परिषद के चुनाव के बाद शिवसेना में बगावत हुई. एकनाथ शिंदे और 40 विधायक पार्टी छोड़कर चले गए..उनके इस कदम से उद्धव ठाकरे की सरकार गिर गई. लेकिन सबकी नजरें फडणवीस पर टिकी थीं.

जब यह साफ हुआ कि शिंदे और बीजेपी मिलकर सरकार बनाएंगे, तब माना गया कि फडणवीस मुख्यमंत्री बनेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. फडणवीस ने खुद घोषणा की कि एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बनेंगे. इसे फडणवीस की राजनीति के लिए बड़ा झटका माना गया.

हालांकि, उन्होंने कहा कि पार्टी और संगठन का फैसला सबसे ऊपर है लेकिन यह भी साफ दिखा कि उनकी उम्मीदें कुछ और थीं.

मोदी और अमित शाह के कहने पर फडणवीस उपमुख्यमंत्री बने. हालांकि, नए गठबंधन में भी सत्ता का केंद्र बने रहे शिवसेना के टूटने के कुछ महीनों बाद एनसीपी में भी विभाजन हुआ, और अजित पवार इस गठबंधन में शामिल हो गए. अब फडणवीस को अपनी ही सरकार में एक और प्रतिद्वंद्वी मिल गया.

अजित पवार, देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे

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इमेज कैप्शन, बीजेपी, अजित पवार की एनसीपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना गठबंधन 'महायुति' का हिस्सा हैं

महाराष्ट्र की राजनीति में पार्टियों के बीच ऐसा विभाजन पहले कभी नहीं देखा गया था. हालांकि शिंदे और अजित पवार ने अपनी-अपनी पार्टियों में बगावत की, लेकिन सभी की नजरें बीजेपी और फडणवीस पर रहीं.

एकनाथ शिंदे ने विधानसभा में मजाकिया अंदाज में कहा कि इस पूरे नाटक के असली अभिनेता देवेंद्र फडणवीस हैं. फडणवीस के उस बयान ने भी काफी चर्चा बटोरी, जब उन्होंने कहा, 'मुझे ढाई साल लगे वापस आने में, लेकिन मैं आया और दो पार्टियां तोड़ दीं.'

इन घटनाओं ने महाराष्ट्र के मतदाताओं पर गहरा असर डाला. बीजेपी और फडणवीस की छवि में बदलाव साफ दिखा. अजित पवार और शिंदे जैसे मराठा नेताओं को साथ लेने से बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक पर भी असर पड़ा.

राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे कहते हैं, "2019 से पहले के फडणवीस और बाद के फडणवीस में एक सीधा फर्क किया जा सकता है. पहले के फडणवीस की छवि एक अच्छे प्रशासक और संवेदनशील नेता की थी. लेकिन जैसे-जैसे 2019 के चुनाव करीब आए, दूसरे दलों के नेता बीजेपी में आने लगे और उनकी ये छवि बदल गई. जिनके खिलाफ फडणवीस ने राजनीति की, उन्हीं को पार्टी में शामिल करने से यह बदलाव शुरू हुआ,"

वो कहते हैं, "पिछले एक साल में मराठा राजनीति में फडणवीस को विलेन के रूप में देखा गया. मराठा और ओबीसी विवादों के केंद्र में रहे. असल में, इसमें सिर्फ उन्हीं पर उंगली उठाने का कोई ठोस कारण नहीं था. लेकिन सही या गलत जो भी हो, उनकी मुश्किलें जरूर बढ़ गईं.''

मराठा आरक्षण का बड़ा असर बीजेपी पर 2024 के लोकसभा चुनावों में पड़ा. हर जगह पार्टी को पीछे हटना पड़ा. इन नतीजों की जिम्मेदारी लेते हुए देवेंद्र फडणवीस ने सरकार से बाहर आकर संगठन में काम करने की सार्वजनिक घोषणा की. लेकिन सच्चाई यह भी है कि फिलहाल महाराष्ट्र में बीजेपी या महागठबंधन के पास फडणवीस जैसी ताकत का कोई और नेता नहीं है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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