हेमंत सोरेन ने झारखंड विधानसभा चुनाव में बीजेपी के दिग्गजों को कैसे मात दी?

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
झारखंड विधानसभा की 81 सीटों के चुनाव परिणाम ने एक बार फिर से हेमंत सोरेन को राज्य की कुर्सी सौंप दी है.
राज्य में जेएमएम नेता और मौजूदा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने तक़रीबन अकेले दम पर बीजेपी के तमाम दिग्गज़ों को मात दी है.
यह एकमात्र राज्य रहा है जहाँ विधानसभा चुनावों में विपक्ष के इंडिया गठबंधन के लिए अच्छी ख़बर आई है.
झारखंड में बीजेपी की तरफ से ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव जैसे नेताओं ने प्रचार किया था.

झारखंड में हुए विधानसभा चुनावों में हेमंत सोरेन की जेएमएम को 34 सीटें मिली हैं, जबकि उनके गठबंधन की प्रमुख पार्टी कांग्रेस को 16 और राष्ट्रीय जनता दल को 4 सीटें मिली हैं.
इसी साल हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर राज्य की 14 में से 8 सीटें जीतने में सफल रही थी, जबकि जेएमएम को 3 और कांग्रेस को 2 सीटें मिली थीं.
लोकसभा चुनाव में आजसू पार्टी के खाते में भी एक सीट आई थी.
सवाल यह भी है कि लोकसभा चुनावों के छह महीने के बाद हुए चुनावों में हेमंत सोरेन को इतनी बड़ी कामयाबी कैसी मिली और वो किस तरह से बीजेपी को बड़ी मात दे पाने में सफल हुए?
हेमंत सोरेन ने कैसे किया कमाल

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झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार बिनय कुमार कहते हैं, "हेमंत सोरेन ने साबित कर दिया है कि वो ही आदिवासियों के सबसे बड़े नेता हैं. उन्होंने झारखंड में आदिवासी-मूलवासी का मुद्दा उठाया और ख़ुद को धरतीपुत्र बताया, जिसमें वो सफल रहे."
बिनय कुमार का मानना है, "हेमंत सोरेन झारखंड के लोगों तक यह संदेश पहुंचाने में सफल रहे कि अगर बीजेपी की जीत होती है तो राज्य का शासन दिल्ली से चलेगा. झारखंड के आदिवासी स्वभाव से ही विद्रोही होते हैं, उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि राज्य का शासन दिल्ली से चले."
झारखंड की 81 विधानसभा सीटों में 28 सीटें ऐसी हैं जिन पर आदिवासी वोटरों का दबदबा है. इन सीटों पर तीन दशक से भी ज़्यादा समय से जेएमएम का वर्चस्व रहा है.
साल 2019 के पिछले विधानसभा चुनावों की बात करें तो इन 28 में से महज़ दो सीट पर ही बीजेपी की जीत हुई थी और इस बार वहां भी बीजेपी, झारखंड मुक्ति मोर्चा को चुनौती नहीं दे पाई है.
'मैया सम्मान' योजना का कितना असर?

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बीजेपी ने झारखंड में आदिवासियों को रिझाने की पूरी कोशिश की. उसने जेएमएम के पुराने नेता चंपई सोरेन को भी अपने पाले में खींच लिया, लेकिन फिर भी आदिवासी नेता के तौर पर हेमंत सोरेन को कोई चुनौती नहीं दे पाया.
हेमंत सोरेन की इस जीत में राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की भी बड़ी भूमिका मानी जाती है.
राज्य की हेमंत सरकार 18 साल से ज़्यादा उम्र की महिलाओं के लिए 'मैया सम्मान योजना' चलाती है, जिसके तहत महिलाओं को हर महीने एक हजार रुपये दिए जाते हैं.

इस योजना की घोषणा चुनाव के क़रीब 3 महीने पहले की गई. इसके तहत 16 लाख़ महिलाओं के खाते में पैसे भी आने शुरू हो गए.
हेमंत सोरेन ने चुनावों के ठीक पहले इसे ढाई हज़ार करने का वादा किया, जिसका असर वहां दिखाई दिया.
वरिष्ठ पत्रकार आनंद मोहन कहते हैं, "झारखंड की 81 सीटों में 31 सीटों पर महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत पुरुषों के वोटिंग प्रतिशत से ज़्यादा रहा है और इसका फ़ायदा जेएमएम और उसके सहयोगी दलों को मिला है."
कल्पना सोरेन का सियासी उभार

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झारखंड में जेएमएम की जीत और हेमंत सोरेन को मिली सफलता में उनकी पत्नी कल्पना सोरेन की भूमिका बहुत बड़ी मानी जाती है.
फ़ौजी परिवार से ताल्लुक रखने वाली कल्पना सोरेन के बारे में कहा जाता है कि उनकी सोच बहुत व्यापक है. वो अंग्रेज़ी, हिन्दी, संताली और उड़िया ज़ुबान जानती हैं.
कल्पना सोरेन ने विधानसभा चुनावों के दौरान क़रीब 100 सभाएं की और उनकी सभाओं में लोगों की बड़ी भीड़ देखी गई.

बिनय कुमार कहते हैं, "कल्पना सोरेन ने हेमंत की जीत में बड़ी भूमिका निभाई है. हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद पहली बार वो सियासत के मैदान में उतरी थीं और पहली बार उन्होंने चुनाव प्रचार किया."
हेमंत सोरेन को इसी साल जनवरी महीने में ईडी ने गिरफ़्तार किया था. गिरफ़्तारी के क़रीब 5 महीने बाद झारखंड हाई कोर्ट ने सोरेन को ज़मानत दी थी.
इस दौरान हेमंत सोरेन ने जेएमएम के वरिष्ठ नेता चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री पद की ज़िम्मेदारी दी थी. हालाँकि जेल से बाहर आने के बाद हेमंत फिर से मुख्यमंत्री बन गए और चंपई सोरेन ने इसे अपमान बताकर पार्टी छोड़ दी.
जेल जाने के बाद क्या बदला?

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हेमंत सोरेन ने ख़ुद के जेल जाने को भी अस्मिता से जोड़ा और जेल से बाहर आने के बाद कहा, "आज मैं फिर अपने राज्य की जनता के बीच हूं."
"जो संकल्प हमने लिया है उसे हम मकाम तक ले जाने का काम करेंगे. आज मुझे लगता है कि ये पूरे देश के लिए एक संदेश है, किस तरह से हमारे ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचा गया."
झारखंड हाई कोर्ट ने हेमंत सोरेन को ज़मानत देते हुए कहा था, "किसी भी रजिस्टर/रेवेन्यू रिकॉर्ड में उक्त ज़मीन के अधिग्रहण और कब्ज़े में याचिकाकर्ता की प्रत्यक्ष भागीदारी का कोई ज़िक्र नहीं है."
अदालत ने पाया है कि पीएमएलए की धारा 45 की शर्त पूरी करते हुए ये मानने के कारण हैं कि याचिकाकर्ता कथित अपराध का दोषी नहीं है.
हेमंत सोरेन के जेल में रहते हुए उनकी पत्नी कल्पना सोरेन राजनीतिक तौर पर पहली बार सक्रिय दिखी थीं. वो विपक्षी नेताओं से मिल रही थीं.
कल्पना सोरेन ने अपने पति के जेल जाने को मुद्दा बनाया और विपक्ष की रैलियों में भी जेएमएम का प्रतिनिधित्व किया.
आनंद मोहन बताते हैं, "जेएमएम के पास अपना वोट तो था ही, कल्पना सोरेन आदिवासी, मुस्लिमों और कुछ अन्य वोटों को जोड़ने में सफल रही हैं. बीजेपी झारखंड में अपना वोट बढ़ाने में नाकाम रही है और इसका फायदा हेमंत सोरेन को मिला है."
वो मुद्दे जो चुनावों में रहे अहम

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आनंद मोहन कहते हैं, "बीजेपी ने झारखंड में बांग्लादेशी घुसपैठ को मुद्दा बनाने की कोशिश की लेकिन यह काम में नहीं आया. दूसरा राज्य में उसके सहयोगी दलों ने भी काफ़ी अच्छा प्रदर्शन किया है, जिससे हेमंत सोरेन और जेएमएम को मदद मिली है."
झारखंड में साल 2019 में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 25 सीटों पर जीत मिली थी. जबकि जेएमएम को 30, कांग्रेस को 16 और आरजेडी को महज़ एक सीट मिली थी.
इसके अलावा सीपीआई(एमएल) को उन चुनावों में एक सीट, आजसू पार्टी को 2 सीट और बाबूलाल मरांडी की जेवीएम को 3 सीटें मिली थीं.
जेवीएम के बीजेपी में शामिल होने के बाद भी इस बार बीजेपी को कोई बड़ा फायदा नहीं मिला है, जबकि जेएमएम और उसके सहयोगी दलों का प्रदर्शन इस बार बेहतर हुआ है.
माना जाता है कि हेमंत सोरेन की जीत में महिलाओं के लिए 'मैया सम्मान योजना', सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन स्कीम का वादा अहम रहा है.
इसके अलावा राज्य में 200 यूनिट मुफ़्त बिजली और पुराने बिजली के बकाया बिल की माफ़ी ने भी हेमंत को मिली जीत में योगदान दिया है.
यह भी माना जाता है कि बीजेपी के पास हेमंत सोरेन को चुनौती देने वाला कोई चेहरा नहीं था.
बिनय कुमार कहते हैं, "बीजेपी जो भी नैरेटिव सेट करना चाह रही थी वो यहां के जनमानस के अनुकूल नहीं था, उसे यहाँ के नेताओं को आगे करना था. बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा या रघुवर दास जैसे नेताओं को आगे करने से परिणाम कुछ अलग होते."
जबकि इसके विपरीत माना जाता है कि हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने झारखंड और यहां के लोगों से जुड़े मुद्दों को उठाया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















