अमेरिका क्या ईरान में सैन्य कार्रवाई कर सकता है, भारत पर क्या होगा असर?

डोनाल्ड ट्रंप

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इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी दी है

ईरान में हो रहे देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों ने मध्य पूर्व में उथल-पुथल का माहौल बना रखा है. बीते दिसंबर में इन प्रदर्शनों की शुरुआत हुई थी. लोगों का कहना है कि वे महंगाई, बेरोज़गारी और अर्थव्यवस्था की ख़राब हालत से परेशान हैं.

ईरान के सुरक्षाबलों ने इन प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की है, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की ख़बरें सामने आई हैं, जबकि बहुत से लोग गिरफ़्तार भी हुए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान से जुड़े बयान दे रहे हैं.

ईरान ने अमेरिका और इसराइल पर आरोप लगाए हैं कि वे देश में लोगों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं. ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर देश में कोई सैन्य हस्तक्षेप हुआ तो क्षेत्र में व्यापक प्रतिक्रिया होगी.

यह भारत के लिए भी अहम है, क्योंकि भारत के लिए ईरान ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी का अहम हिस्सा रहा है. ख़ासकर चाबहार पोर्ट जैसी परियोजनाएं भारत को मध्य-पूर्व और अफ़ग़ानिस्तान तक पहुंच देती हैं.

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यह गतिरोध और तनाव भारत के सुरक्षा हितों के लिए चिंता का विषय बन गया है.

सवाल ये हैं कि इस बार के विरोध प्रदर्शन क्या पिछले प्रदर्शनों से अलग हैं? प्रदर्शनकारियों के पास कोई नेतृत्व न होना क्या उनकी बड़ी कमजोरी है? इस मामले में सख़्त कार्रवाई से जुड़ी बयानबाज़ी से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का असल मकसद क्या है? क्या अमेरिका ईरान में सैन्य कार्रवाई का चांस ले सकता है? भारत के लिए यह अस्थिरता अच्छी है या बुरी?

बीबीसी हिंदी के साप्ताहिक कार्यक्रम 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने विशेषज्ञों के साथ इन्हीं सवालों पर चर्चा की.

कार्यक्रम में शामिल हुए भारत के पूर्व राजनयिक महेश सचदेव, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में सेंटर फ़ॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ की प्रोफ़ेसर सुजाता ऐश्वर्य और ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में मध्य पूर्व मामलों के डिप्टी डायरेक्टर कबीर तनेजा.

इस बार के प्रदर्शन कितने अलग?

ईरान में विरोध प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, ईरान में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में सैकड़ों लोगों के मारे जाने ख़बरें सामने आई हैं
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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

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ईरान में बीते कुछ महीनों से लोग प्रदर्शन कर रहे हैं. लोगों का कहना है कि वे महंगाई, बेरोज़गारी और देश की बदहाल होती आर्थिक स्थिति को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं.

लेकिन यह कोई पहली दफ़ा नहीं है जब ईरान में लोग सड़कों पर उतरे हों या सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया हो, लेकिन इस बार के विरोध प्रदर्शनों पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय क़रीब से नज़र बनाए हुए है.

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ईरानी शासन को लेकर की गई बयानबाज़ियों ने इसे बड़ा मंच भी दे दिया है. लेकिन क्या इस बार के प्रदर्शन पहले हुए प्रदर्शनों से अलग हैं?

इस पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया में सेंटर फ़ॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ की प्रोफ़ेसर सुजाता ऐश्वर्य कहती हैं, "ये जो ईरान में हो रहा है, उसे सिर्फ़ एक तात्कालिक विरोध के रूप में नहीं समझना चाहिए. मेरा ख़्याल है कि यह गुस्सा वहां के लोगों की थकान और उनकी लंबे समय से जमा हुई मांगों का विस्फोट है."

प्रोफ़ेसर सुजाता कहती हैं, "महंगाई, बेरोज़गारी, करेंसी का गिरना और ईरान के लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर जो पाबंदियां लगी हैं, इन सबने आम लोगों को बहुत परेशान कर रखा है और उनकी सहनशक्ति को तोड़ दिया है. ईरान की सड़कों पर जो दिख रहा है, यह सिर्फ़ एक मुद्दे की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था से गहरे मोहभंग की अभिव्यक्ति है."

ईरान में विरोध प्रदर्शन

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में मध्य-पूर्व मामलों के डिप्टी डायरेक्टर कबीर तनेजा इसी सवाल के जवाब में कहते हैं, "हम एक साल पहले की बात करते हैं... ईरानी सरकार जो एक गारंटी अपने लोगों को देती थी, वह थी सुरक्षा की गारंटी. लेकिन अमेरिका ने ईरान पर बमबारी की, इसराइल ने भी बमबारी की. इसराइल और अमेरिका ने ईरान के टॉप कमांडर्स को भी ऐसे निशाना बनाया, जैसे उन्हें पता था कि वे कहां खा रहे हैं और कहां सो रहे हैं."

तनेजा कहते हैं, "कुछ महीनों पहले तेहरान में जब पानी की समस्या आई, तब लोग ऐसी बातें कर रहे थे कि शायद हमें अपनी राजधानी कहीं और बनानी पड़ेगी. ईरान के लोग कहते थे कि पानी की बहुत समस्या है, लेकिन ईरान के जो एलीट हैं, जो आईआरजीसी में हैं या जो आयतुल्लाह के लोग हैं, उनके पास पानी की कोई कमी नहीं है. अभी तक आधारभूत चीज़ों को लेकर जो लड़ाई थी, वह इस मुकाम तक नहीं पहुंची थी, जितनी पिछले पांच-छह महीने में पहुंच गई है."

"लोग अपनी सरकार से पूछ रहे थे कि न आप हमें नौकरी दे पा रहे हैं, न पैसा दे पा रहे हैं, न पानी दे पा रहे हैं और अब ऐसा लग रहा है कि सुरक्षा भी नहीं दे पा रहे हैं. ईरान के अंदर विचारों का जमाव था, असंतोष था, जो काफ़ी समय से उबल रहा था, वह बाहर आया है."

ख़ामनेई के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई

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इमेज कैप्शन, ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई का कहना है कि उनकी सरकार विदेशी ताकतों के लिए काम करने वाले लोगों को बदार्शत नहीं करेगी

ईरान के मौजूदा हालात पर ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने कहा था कि सरकार पिछले 15 साल में हुए इन सबसे बड़े प्रदर्शनों के बाद भी पीछे नहीं हटेगी.

प्रदर्शन होने के बाद पहली बार सार्वजनिक तौर पर ख़ामेनेई ने कहा था कि उनकी सरकार विदेशी ताक़तों के लिए काम करने वाले लोगों को बर्दाश्त नहीं करेगी.

लेकिन ईरान में लगातार हो रहे प्रदर्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से ईरान को लेकर की जा रही बयानबाज़ी, सैन्य हस्तक्षेप की धमकी और अमेरिका की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों ने ईरान के लिए चुनौतियां बढ़ा दी हैं.

भारत के पूर्व राजनयिक महेश सचदेव का कहना है, "ईरान में हालात काफ़ी जटिल हैं. इसको सिर्फ़ एक घरेलू समस्या के तौर पर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि इसमें ईरान पर अन्य देशों की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों का भी बहुत बड़ा हाथ है."

वह कहते हैं, "इन परिस्थितियों को देखते हुए ख़ामेनेई के सामने पहली समस्या यह है कि कैसे वह अपने पक्षधरों को (चाहे वे रिवोल्यूशनरी गार्ड हों या फिर इस्लामिक रिपब्लिकन पार्टी के लोग) इकट्ठा रखते हैं. उनमें आंतरिक तनाव या टूट-फूट को कैसे दूर रखते हैं."

"ख़ामेनेई को आर्थिक परिस्थितियों को जनसामान्य के लिए सुधारना चाहिए. विदेशों में जो लोग ईरान की सत्ता के पक्षधर हैं, उन्हें अपने साथ जोड़े रखें और उनका सहयोग हासिल करें."

क्या अमेरिका के पास ईरान में सैन्य कार्रवाई का विकल्प है?

अमेरिका

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इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में सैन्य कार्रवाई करने की धमकी दी है (प्रतीकात्मक फोटो)

ईरान में प्रदर्शनकारियों के सुरक्षाबलों के हाथों मारे जाने की ख़बरों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा था कि अगर ईरानी शासन निर्दोष लोगों को मारेगा तो उन्हें बचाने के लिए अमेरिका आएगा.

इसके बाद से यह कयास लगाए जा रहे थे कि क्या अमेरिका ईरान में सैन्य कार्रवाई कर सकता है. लेकिन बाद में ट्रंप ने यह साफ़ किया कि वह सैन्य कार्रवाई करेंगे, लेकिन इसका मतलब ईरान में सैनिकों को भेजना नहीं है.

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर ईरान में विरोध प्रदर्शन और बढ़ते हैं और लोग मारे जाते हैं तो क्या अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप का कदम उठा सकता है.

इस पर महेश सचदेव कहते हैं, "मेरा ऐसा मानना है कि अमेरिका के पास ऐसा कोई वास्तविक विकल्प नहीं है, क्योंकि अमेरिका ने पहले अपने लोगों से यह वादा किया है कि वह कहीं भी अमेरिकी सैनिक नहीं उतारेगा. दूसरी तरफ़ वह अमेरिका के पहले के राष्ट्रपतियों की कड़ी आलोचना कर चुके हैं कि उन्होंने अमेरिका को कभी न ख़त्म होने वाली जंग में उलझाए रखा है, जिससे अमेरिका को ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है. चाहे वह इराक हो या अफ़ग़ानिस्तान, वहां अमेरिकी लोगों की जानें गईं और अमेरिकी विकास को धक्का लगा."

प्रोफ़ेसर सुजाता ऐश्वर्य कहती हैं, "यहां पर जो अमेरिका की भूमिका है, वह ज़्यादातर पाबंदियों और दबाव के रूप में दिखती है. वह सीधे मैदान में उतरकर नहीं, बल्कि आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक हथियारों से असर डालना चाहते हैं."

"दूसरी तरफ़ अगर हम यह कहें कि अमेरिका सीधा हमला करेगा, जैसा उसने वेनेज़ुएला में किया, तो आपको जियो-पॉलिटिकल सच्चाई को देखना होगा. वेनेज़ुएला उसके पड़ोस में था और ईरान बहुत दूर है. हालांकि अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी, लेकिन मेरे ख़याल से यहां दबाव राजनीतिक और कूटनीतिक तरीके से डाला जाएगा."

ईरान में अस्थिरता का भारत पर क्या असर?

ईरान में लोगों का विरोध प्रदर्शन

भारत और ईरान कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण साझेदार हैं. एक समय पर भारत ईरान से काफ़ी मात्रा में तेल की ख़रीद करता था.

ईरान में भारत की ओर से विकसित किया जा रहा चाबहार पोर्ट इसी साझेदारी का नतीजा है. इस पोर्ट के ज़रिए भारत को अफ़ग़ानिस्तान और सेंट्रल एशिया में पहुंच मिलती है.

ऐसे में अगर ईरान अस्थिर रहता है या ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है तो भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है.

इस पर कबीर तनेजा कहते हैं, "भारत ईरान को कैसे देखता है, हमें यह भी देखना पड़ेगा. भारत का रुख़ ईरान के लिए एक पड़ोसी देश के तौर पर ज़्यादा है."

भारत-ईरान संबंध

तनेजा कहते हैं, "ईरान संयुक्त राष्ट्र में हमेशा कश्मीर मुद्दे पर भारत का समर्थन करता आया है. भारत और ईरान के द्विपक्षीय रिश्तों को बनाए रखने के लिए भारत काम करेगा. मेरे ख़याल से ईरान में जो भी सत्ता में आएगा, भारत उनके साथ काम करने के लिए तैयार रहेगा."

भारत के पूर्व राजनयिक महेश सचदेव का कहना है, "अगर ईरान पर पश्चिमी देशों का दबाव जारी रहता है या और बढ़ाया जाता है, तो अपने समर्थन को स्थिर और स्थायी करने के लिए ईरान के लिए पाकिस्तान, चीन, अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया और रूस का सहयोग ज़्यादा ज़रूरी हो जाएगा."

"अगर ज़्यादा प्रतिबंध लगते हैं तो ईरान फिर अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के ज़रिये ज़मीनी रास्ते का इस्तेमाल कर चीन से व्यापार और सामरिक संबंध बढ़ा सकता है. ईरान कैस्पियन सागर के रास्ते रूस से व्यापार कर प्रतिबंधों को तोड़ना चाहेगा."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.