एकनाथ शिंदे क्या अब भी मुख्यमंत्री पद की रेस में शामिल हैं?

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- Author, अंशुल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"मैंने कभी भी अपने आप को मुख्यमंत्री नहीं समझा, मैंने हमेशा एक आम आदमी की तरह काम किया है. मेरे लिए सीएम का मतलब है कॉमन मैन."
एकनाथ शिंदे ने ये बात बुधवार को प्रेसवार्ता के दौरान कही.
शिंदे ने अपने कार्यकाल में किए गए कामों को गिनाते हुए प्रेसवार्ता के अंत में सीएम के चुनाव की ज़िम्मेदारी बीजेपी के ऊपर छोड़ दी.
शिंदे ने कहा, "मुख्यमंत्री पद को लेकर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता जो निर्णय लेंगे, उसका शिवसेना पूरी तरह से समर्थन करेगी."

शिंदे के इस बयान के बाद सबकी नज़रें भारतीय जनता पार्टी पर हैं कि बीजेपी मुख्यमंत्री पद के लिए किसे चुनती है.
प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान शिंदे ने ये स्पष्ट तौर पर नहीं कहा कि वो सीएम की दौड़ में शामिल हैं या नहीं.
शिंदे बार-बार अपने कार्यकाल के कामों को गिनाते रहे और इसका क्रेडिट लेने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी. इसमें लाड़ली बहना योजना और दूसरी योजनाएं शामिल हैं.

क्या शिंदे अब भी रेस में हैं?
शिंदे की प्रेस क्रॉन्फ़्रेंस से पहले शिवसेना की तरफ़ से उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की बात की जा रही थी.
शिंदे की प्रेस क्रॉन्फ़्रेंस से ठीक पहले पार्टी नेता संजय शिरसाट ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत की थी.
संजय शिरसाट ने कहा, "हम शिवसेना से मुख्यमंत्री चाहते हैं. हमने एकनाथ शिंदे के चेहरे पर चुनाव लड़ा और मुझे उम्मीद है कि टॉप लीडर भी उन्हें चुनेंगे."
एकनाथ शिंदे जब पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे तो उनसे बार-बार पत्रकारों ने पूछा कि आपकी सरकार में क्या भूमिका होगी? शिंदे बार-बार इस सवाल को टालते रहे और मोदी-शाह का नाम लेते रहे.
शिंदे मराठा समुदाय से आते हैं और चुनाव के नतीजों में मराठा मतदाताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है.
इसके अलावा लाडली बहन को कई जानकारों ने चुनाव में गेमचेंजर बताया और इसका क्रेडिट उन्होंने एकनाथ शिंदे को दिया.
लोकनीति सीएसडीएस के चुनाव बाद सर्वेक्षण में बताया गया कि 25 प्रतिशत मतदाता शिंदे को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, जबकि 18 फ़ीसद मतदाता उद्धव ठाकरे और 16 प्रतिशत मतदाता देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं.
तो क्या शिंदे मुख्यमंत्री के लिए एक विकल्प हो सकते हैं?
वरिष्ठ पत्रकार और 'चेकमेट: हाउ द बीजेपी वॉन एंड लॉस्ट महाराष्ट्र' किताब के लेखक सुधीर सूर्यवंशी कहते हैं, "शिंदे के पास अभी विकल्प नहीं है. लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर उन्होंने एक मैसेज दिया है कि उनके चेहरे पर चुनाव लड़ा गया था और जो नतीजे आए हैं उनमें उनका बड़ा योगदान है."
"इसलिए न तो शत-प्रतिशत यह कहा जा सकता है कि शिंदे सीएम नहीं बनेंगे और न ही यह कहा जा सकता है कि बनेंगे. वैसे भी राजनीति संभावनाओं का खेल है."

महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और उसने 132 सीटें जीतीं.
वहीं, महायुति गठबंधन में शामिल शिवसेना ने 57 और एनसीपी ने 41 सीटें जीती थीं. 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 145 है.
बीजेपी अगर अकेले सरकार बनाती है तो उसे सिर्फ़ 13 सीटों की ज़रूरत होगी.
चुनाव परिणाम आने के बाद से कयास लगाए जा रहे हैं कि मुख्यमंत्री बीजेपी का ही हो सकता है, क्योंकि उसके सबसे अधिक विधायक हैं.
वरिष्ठ पत्रकार विनया देशपांडे कहती हैं, "बीजेपी की लिए अब चीज़ें मुश्किल नहीं हैं. यह अमित शाह और मोदी के फ़ैसले पर निर्भर करेगा कि वे मौजूदा फॉर्मूले के साथ चलेंगे या राज्य में किसी अन्य फॉर्मूले के बारे में सोचेंगे."
बीजेपी असमंजस में या राह आसान हुई?
साल 2014 के विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे तब बीजेपी 122 सीटों पर जीत के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी.
चुनाव बाद शिवसेना-बीजेपी का गठबंधन और राज्य में देवेंद्र फडणवीस के रूप में बीजेपी का पहली बार मुख्यमंत्री बना.
फिर 2019 के चुनाव हुए और शिवसेना-बीजेपी के गठबंधन को बहुमत मिला.
लेकिन, उद्धव ठाकरे ने सीएम पद को लेकर गठबंधन तोड़ दिया और बीजेपी के हाथ से सत्ता चली गई. तब बीजेपी को 105 सीटें मिली थीं.
लगातार तीसरे चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और अब पिछले दो चुनाव की तुलना में परिस्थितियां भी अलग हैं.
बीजेपी के पास 132 सीटें हैं और अगर शिंदे को हटा भी दिया जाए तो अजीत पावर के साथ मिलकर आसानी से सरकार चल सकती हैं.
हालांकि, बीजेपी ने अभी तक अपने विधायक दल का नेता नहीं चुना है और न ही राज्य में पर्यवेक्षक भेजे हैं.
आंकड़ों से हटकर पिछले कुछ सालों में बीजेपी को सामाजिक स्तर पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है.
पिछले एक साल से भी ज़्यादा समय से राज्य में मराठा आरक्षण आंदोलन चल रहा था.
इसका नेतृत्व मनोज जरांगे पाटिल कर रहे थे. इस आंदोलन के विरोध में महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाक़ों में ओबीसी जातियों को एकजुट होते हुए भी देखा गया था.
इन बातों को ध्यान को रखते हुए क्या बीजेपी शिंदे की जगह एक ब्राह्मण देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाएगी?
विनया देशपांडे कहती हैं, "बीजेपी मराठा आरक्षण या मराठा चेहरा वाली बात ध्यान में रखेगी तब भी शिंदे की दावेदारी मज़बूत नहीं होगी. बीजेपी का एक बड़ा वर्ग देवेंद्र फडणवीस के नाम की चर्चा कर रहा है."
"अगर फडणवीस नहीं बनते हैं तो बीजेपी के पास भी मराठा चेहरे हैं. संभव है कि बीजेपी शिंदे को डिप्टी सीएम पद का ऑफ़र दे."
बीजेपी में मराठा चेहरों की बात करें तो पार्टी में राधाकृष्ण विखे पाटील, विनोद तावड़े और आशीष शेलार जैसे नेता हैं. विनोद तावड़े और राधाकृष्ण विखे पाटिल को अमित शाह का नज़दीकी माना जाता है.
शिंदे गुट दावा करता है कि जब तक एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हैं तब तक शिवेसना (यूबीटी) के प्रभाव को बेअसर किया जा सकता है.
मुंबई में अगले कुछ महीनों में नगर निगम के चुनाव होने हैं और अविभाजित शिवसेना ने 25 साल से ज़्यादा समय तक देश की सबसे अमीर मुंबई नगर निगम पर शासन किया है.
अगर शिवसेना (यूबीटी) नगर निगम में वापस आती है तो राज्य सरकार और नगर निगम के बीच कई प्रोजेक्ट्स पर टकराव देखने को मिल सकता है.
शिवसेना (यूबीटी) ने कुल 20 सीटें जीती हैं जिनमें उनकी 10 सीट अकेले मुंबई से हैं. ऐसे में बीजेपी शिंदे को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकती है.
वरिष्ठ पत्रकार सुधीर सूर्यवंशी कहते हैं, "बीजेपी ज़्यादा सीटों पर लड़ी तो ज़्यादा सीटें मिलीं. अगर शिंदे ज़्यादा पर लड़ते तो हो सकता उन्हें ज़्यादा सीटें मिलतीं. इस बात को अप्रत्यक्ष रूप से शिंदे और शिवसेना दोनों कह रहे हैं."
"अब बीजेपी के सामने दुविधा है. शिंदे की जगह बीजेपी अपना सीएम बनाएगी वो ठीक है, लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद जो मराठा टूटकर महायुति के पास आया उसमें तो नाराज़गी फैलेगी."
"उन्हें लगेगा कि सरकार तोड़ने में शिंदे का इस्तेमाल किया गया, उनके चेहरे पर वोट मांगे गए लेकिन दोबारा उन्हें सत्ता नहीं दी. विपक्ष भी इसको मुद्दा बनाएगा."

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क्या है अजित पवार का भविष्य

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पिछले साल 2023 जब इंडिया गठबंधन बनने की सुगबुगाहट हो रही थी, तब अजित पवार अपने चाचा शरद पवार से बग़ावत करके महायुति गठबंधन का हिस्सा बने थे.
उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई और सुप्रीम कोर्ट उन्हीं की पार्टी को सिंबल भी दे दिया.
चार साल के भीतर यह दूसरा मौक़ा था जब अजित पवार बीजेपी के साथ आए थे. 2019 में अजित पवार ने बीजेपी के साथ दो-तीन दिनों की सरकार बनाई थी.
दूसरी बार सरकार का हिस्सा बनने के बाद अजित पवार उपमुख्यमंत्री बने और उनके सहयोगियों को भी अहम मंत्रालय दिए गए.
महाराष्ट्र में चुनाव परिणाम आने के बाद अजित पवार की पत्नी और राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार ने अजित पवार को मुख्यमंत्री बनाने की बात कही थी.
हालांकि, इस बयान के बाद एनसीपी के तेवर ठंडे पड़ गए, लेकिन वो सीएम के चेहरे को लेकर खुलकर बीजेपी के साथ नहीं दिखे.
विनया देशपांडे कहती हैं, "अजित पवार मुख्यमंत्री की रेस में नहीं हैं. अजित पवार को केंद्र में मंत्री पद के लिए वादा किया जा सकता है और हो सकता है कि वो यहां डिप्टी सीएम बने रहें."
सुधीर सूर्यवंशी का मानना है कि जब तक बीजेपी केंद्र में सत्ता में है, तब तक अजित पवार और एकनाथ शिंदे उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे.
बीजेपी और कांग्रेस ने क्या कहा?
प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान एकनाथ शिंदे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की खूब तारीफ़ की.
शिंदे ने कहा, “मैंने कल पीएम मोदी को फ़ोन किया और कहा- अगर सरकार बनाते समय निर्णय लेने में मेरी वजह से कोई दिक्कत या परेशानी है तो यह बात कभी मन में न लाएं. आपने ढाई साल मौका दिया, तो आप फै़सला करें."
"हर क्षेत्र के विकास के लिए पीएम मोदी और अमित शाह मेरे साथ पहाड़ की तरह खड़े रहे. ये आम जनता की सरकार है. मैं ख़ुद को मुख्यमंत्री नहीं समझता था, मैंने ढाई साल कार्यकर्ता के रूप में काम किया है.”
कांग्रेस एकनाथ शिंदे के इस बयान पर सवाल उठा रही है.
कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले ने कहा, "बीजेपी की लीडरशिप क्या चीज़ है इसकी एकनाथ शिंदे को समझ नहीं है? बीजेपी के आकाओं का इतिहास देखिए."
"जिन राज्यों में चेहरे चुनकर आते हैं, उन्हें ग़ायब कर दिया गया. जो मामला लेट हुआ उसके पीछे भी बहुत बड़ा गणित है."
लेकिन महाराष्ट्र बीजेपी के अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले ने एकनाथ शिंदे के बयान को महायुति को मज़बूत करने वाला बताया है.
चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा, "महायुति के महत्वपूर्ण नेता एकनाथ शिंदे ने आज सारी अफ़वाहों पर विराम चिन्ह लगा दिया है."
"उन्होंने साफ़ कहा है कि जो पीएम मोदी और अमित शाह निर्णय लेंगे वो उन्हें मंज़ूर है. यह महाराष्ट्र के साथ देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है."
अभी बीजेपी के विधायक दल की बैठक होनी हैं और संभव है कि इस बैठक के बाद सीएम के चेहरे को लेकर तस्वीर साफ़ हो जाएगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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