महाराष्ट्रः 237 सीटों पर महाविकास अघाड़ी के वोट शेयर में गिरावट

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- Author, जैस्मिन निहलानी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में महायुति गठबंधन ने 288 सीटों वाली विधानसभा में 234 सीटें जीतकर विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी को बड़ा झटका दिया है.
लोकसभा चुनाव में कमज़ोर प्रदर्शन के बाद राज्य में महायुति के सामने मराठा आरक्षण आंदोलन, किसानों से जुड़े मुद्दे जैसी अहम चुनौतियां सामने थी, लेकिन आख़िर में महायुति को जीत मिली.
इस जीत की खास वजह 'मुख्यमंत्री- मेरी लाडली बहन योजना' बताई जा रही है, जिसमें आर्थिक रूप से पिछड़ी महिलाओं को 1,500 रुपये हर महीने मिलते हैं.
भाजपा इस चुनाव में 132 सीटें जीत कर अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. पार्टी बहुमत से सिर्फ़ 13 सीटें दूर थी. वहीं, एकनाथ शिंदे की शिवसेना 57 सीटें और अजित पवार की एनसीपी 41 सीटें जीती हैं.

कांग्रेस का स्ट्राइक रेट घटा
महायुति की जीत राज्य के केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी.
इस गठबंधन ने खानदेश, कोंकण, मराठवाड़ा, पश्चिम महाराष्ट्र और विदर्भ समेत सभी पांचों क्षेत्र में क़रीब 50 फ़ीसदी या उससे ज़्यादा वोट शेयर हासिल किया है.
कांग्रेस के गढ़ विदर्भ में बीजेपी ने 62 सीटों में से 38 पर जीत दर्ज की है.
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अब तक का सबसे ख़राब प्रदर्शन किया है. पार्टी ने केवल 16 सीटों पर जीत हासिल की है.
कांग्रेस के पृथ्वीराज चव्हाण और बालासाहेब थोराट जैसे प्रमुख नेता भी अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव हार गए.
80 के दशक में कांग्रेस का स्ट्राइक रेट (जिन सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से जीती गई सीटें) 50 फ़ीसदी था. वो 2019 में 30 फ़ीसदी पर पहुंच गया था. और 2024 में क़रीब 16 फ़ीसदी तक आ पहुंचा है.
वहीं बीजेपी के स्ट्राइक रेट में बढ़ोतरी देखने को मिली है. यह साल 2019 में 64 फ़ीसदी था, जो साल 2024 में बढ़कर 88.6 फ़ीसदी पर पहुंच गया है.
विपक्षी गठबंधन को कितना नुकसान?

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उद्धव ठाकरे की शिवसेना 20 और शरद पवार की नेशनल कांग्रेस पार्टी 10 सीटें जीत पाई. इस स्थिति में दोनों ही पार्टियां "असली" पार्टी का टैग हासिल करने में पिछड़ गई.
छह महीने पहले लोकसभा चुनाव हुए थे. तब लोकसभा की 48 सीटों में 30 पर महाविकास अघाड़ी ने जीत हासिल की थी.
इनमें कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें पार्टी ने 76 फ़ीसदी के प्रभावशाली स्ट्राइक रेट के साथ 13 सीटों पर जीत हासिल की थी.
वहीं, शरद पवार की एनसीपी ने 10 सीटों में से 8 पर जीत दर्ज़ की, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा और 9 सीटें जीती थी.
इस जीत को अगर विधानसभा क्षेत्रों में बदल दिया जाए, तो ये 153 सीटें होती हैं, मगर इस विधानसभा चुनाव के दौरान महाविकास अघाड़ी सिर्फ़ 41 सीटें ही बरकरार रख सका.
यानी जब विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव के वोट शेयरों की तुलना की जाए, तो यह सामने आता है कि महाविकास अघाड़ी को 237 विधानसभा सीटों पर वोट शेयर का नुक़सान हुआ है.

इसके विपरीत, लोकसभा के मुक़ाबले ''महायुति'' ने 201 निर्वाचन क्षेत्रों में अपना वोट शेयर बढ़ाया है.

कहां-कहां कम हुआ कांग्रेस का वोट शेयर?
महाविकास अघाड़ी के वोट शेयर में सबसे बड़ी गिरावट सेंट्रल मालेगांव में देखी गई, जो धुले संसदीय क्षेत्र का एक हिस्सा है.
इस संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार शोभा बच्चव ने 96 फ़ीसदी वोट शेयर से जीत हासिल की थी.
इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन ने इस सीट पर चुनाव लड़ा, लेकिन 5 फ़ीसदी वोट शेयर भी हासिल नहीं हुआ.
इस सीट पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के मुफ़्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल ख़ालिक ने 162 वोटों के बहुत ही कम अंतर से जीत दर्ज की है.
दूसरी सीट जहां महत्वपूर्ण गिरावट देखी गई, वो है वरोरा, जो चंद्रपुर संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है.
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार प्रतिभा धानोरकर ने इस सीट पर 57 फ़ीसदी वोट शेयर के साथ जीत दर्ज़ की थी.
मगर, हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में इस सीट पर क़रीब 33 फ़ीसदी वोट शेयर के साथ बीजेपी उम्मीदवार करण देवताले ने जीत हासिल की.
यानी लोकसभा चुनाव के मुकाबले 45 फ़ीसदी की गिरावट के बाद 12 फ़ीसदी वोट शेयर के साथ कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही.
कांग्रेस का गढ़ कहलाने वाले इलाक़ों में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. ऐसी 18 सीटों में से 11 पर कांग्रेस हार गई.
इनमें से 7 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली, जबकि शिवसेना (एकनाथ शिंदे) और एनसीपी (अजित पवार) ने दो-दो सीट पर जीत हासिल की.
संगमनेर विधानसभा सीट, जहां 39 सालों तक बालासाहेब थोराट का कब्ज़ा था, वह शिवसेना के अमोल खटाल से चुनाव हार गए. इस सीट पर 46 फ़ीसदी वोट शेयर के साथ थोराट दूसरे स्थान पर आए.
इसके साथ ही कांग्रेस देवली विधानसभा सीट भी बीजेपी के राजेश बकाने से हार गई. इस सीट पर रंजीत कांबले का 1999 से कब्ज़ा था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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