महाराष्ट्र में बीजेपी की 'अप्रत्याशित' जीत, गठबंधन की सियासत पर क्या होगा असर?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में महायुति के नाम से चुनाव लड़ रहे बीजेपी नेतृत्व के एनडीए गठबंधन ने ना सिर्फ़ स्पष्ट बहुमत हासिल किया है, बल्कि राज्य में अभी तक की सबसे बड़ी जीत में से एक दर्ज की है.
वहीं, झारखंड में कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही झारखंड मुक्ति मोर्चा पहले से अधिक सीटें हासिल कर अपनी सरकार बचाने में कामयाब रही है.
इस साल मई में हुए लोकसभा चुनाव के बाद ये सबसे बड़े राज्य के चुनाव थे. ख़ासकर नज़रें महाराष्ट्र पर थीं.
जहां आम चुनाव में कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार गुट) और शिवसेना (उद्धव ठाकरे) गुट के महाविकास अघाड़ी गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल कर बीजेपी गठबंधन की सत्ता में वापसी पर सवाल खड़े कर दिए थे.
लेकिन, 23 नवंबर को आए नतीजों ने सभी को चौंका दिया है. महाराष्ट्र के नतीजों ने शरद पवार और उद्धव ठाकरे जैसे दिग्गज नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.

बीजेपी को नहीं थी ऐसी उम्मीद

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बीजेपी प्रवक्ता सैयद जफ़र इस्लाम कहते हैं, "हमें 200 सीटें जीतने की उम्मीद थी, लेकिन हमारा स्ट्राइक रेट इतना बेहतर होगा, ये हमने भी नहीं सोचा था. जनता ने महायुति के काम पर एक बार फिर से मुहर लगा दी है."
आम चुनावों में जब बीजेपी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी थी और सरकार बनाने के लिए उसे गठबंधन सहयोगियों पर निर्भर होना पड़ा था.
तब ये कहा जाने लगा था कि दस साल से केंद्र की सत्ता पर क़ाबिज़ बीजेपी के ढलान का वक्त आ गया है.
लेकिन, उसके बाद हुए राज्य चुनावों में बीजेपी ने पहले हरियाणा में पहले से अधिक सीटें जीतकर वापसी की.
और अब महाराष्ट्र में अप्रत्याशित जीत हासिल कर साबित कर दिया है कि चुनाव प्रबंधन और जनता की नब्ज़ को समझने के मामले में अभी भी उसका का कोई मुक़ाबला नहीं है.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

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राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता कहते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने आम चुनावों में लगातार तीसरी बार वापसी की थी, लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष के गठबंधन ने जिस तरह से बीजेपी को अकेले बहुमत तक पहुंचने से रोका था, उसके बाद ये कयास लगाया जाने लगा था कि अब बीजेपी का ढलान शुरू हो जाएगा."
"हरियाणा के बाद अब महाराष्ट्र में ज़बरदस्त जीत हासिल कर बीजेपी ने साबित कर दिया है कि ये सिर्फ़ कयास ही था."
शरद गुप्ता कहते हैं, "अब से पहले ये देखा गया था कि जब किसी सरकार का ढलान शुरू होता था, तब वो रुकता नहीं था, चाहे वाजपेयी की एनडीए सरकार हो या उसके बाद की दूसरी यूपीए सरकार.”
"एक बार अगर सत्ताधारी दल का ढलान शुरू होता था, तो उसके बाद वापसी नहीं हुई, चाहे केंद्र में हो या फिर राज्यों में."
"बीजेपी को जब कर्नाटक और तेलंगाना में झटका लगा और फिर लोकसभा में सीटें कम हुईं तो कहा जाने लगा कि बीजेपी का अब ढलान शुरू हो रहा है, लेकिन फिर विधानसभा चुनावों में जिस तरह हरियाणा और महाराष्ट्र में बीजेपी ने असंभव से दिखने वाले नतीजे हासिल किए हैं, उससे ये स्पष्ट हो गया है कि अभी ना सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा बरक़रार है, बल्कि बीजेपी की भी लोकप्रियता वही है."
हरियाणा और महाराष्ट्र की जीत के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बीजेपी को मिले सहयोग की भी अहम भूमिका मानी जा रही है.

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शरद गुप्ता कहते हैं, "चुनाव प्रबंधन को लेकर बीजेपी और आरएसएस के बीच तनातनी की बातें की जा रहीं थीं, लेकिन हाल के चुनाव नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि बीजेपी और आरएसएस के बीच कोई तनाव नहीं है. आगामी दिल्ली चुनावों के लिए भी आरएसएस कमर कस रही है."
सोमवार से संसद का शीतकालीन सत्र भी शुरू हो रहा है. महाराष्ट्र चुनाव नतीजों के बाद सदन में बीजेपी के सामने अब पहले से कमज़ोर विपक्ष होगा. विश्लेषक मान रहे हैं कि ये भी बीजेपी के लिए राहत की बात है.
शरद गुप्ता कहते हैं, "अगर बीजेपी महाराष्ट्र में हार जाती तो सदन में भी उसे दिक्कतों का सामना करना पड़ता, लेकिन अब बीजेपी खुलकर ये कह पाएगी कि विपक्ष के पास ना मुद्दे हैं, ना जनता का समर्थन हैं."
विश्लेषक मान रहे हैं कि बीजेपी को महाराष्ट्र में मिली इस प्रचंड जीत से पार्टी और भी मज़बूत होगी.
वरिष्ठ पत्रकार समर खडस कहते हैं, "महाराष्ट्र, ख़ासकर राजधानी मुंबई देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है. इस जीत से निश्चित रूप से बीजेपी पहले से अधिक ताक़तवर होगी."
बीजेपी ने अपने दम पर 133 सीटें हासिल की हैं, जो बहुमत के आंकड़े से कुछ ही कम हैं. ऐसे में विश्लेषक ये मान रहे हैं कि महाराष्ट्र में अब मुख्यमंत्री बीजेपी का ही होगा.

हालांकि, बीजेपी से जुड़े लोग अभी मुख्यमंत्री के नाम पर यही कह रहे हैं कि पार्टी की बैठक के बाद रविवार, 24 नवंबर को ये फ़ैसला लिया जाएगा.
लेकिन, कयास लगाए जा रहे हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में सबसे आगे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार समर खडस कहते हैं, "ये माना जा रहा है कि देवेंद्र फडणवीस ही मुख्यमंत्री होंगे, लेकिन बीजेपी में कई बार बिलकुल अलग फैसले भी ले लिए जाते हैं."
"अगर देवेंद्र फडणवीस को सीएम नहीं बनाया जाता है, तो उन्हें बीजेपी का अध्यक्ष बनाया जा सकता है. ऐसे में बीजेपी की अंदरूनी राजनीति में देवेंद्र फडणवीस मज़बूत हो जाएंगे."
जानकारों के मुताबिक देवेंद्र फडणवीस को एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क़रीबी माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ अमित शाह से उनके रिश्ते बहुत बेहतर नहीं हैं.
ऐसे में विश्लेषक ये मान रहे हैं कि महाराष्ट्र की ये बड़ी जीत बीजेपी की अंदरूनी राजनीति को भी प्रभावित कर सकती है.
समर खडस कहते हैं, "देवेंद्र फडणवीस का परिश्रम और उनकी रणनीति का असर इन नतीजों में साफ़ दिखा है."
"बीजेपी की अंदरूनी राजनीति में देवेंद्र फडणवीस, अमित शाह के चलते कमज़ोर हो गए थे, लेकिन इन नतीजों के बाद अब देवेंद्र फडणवीस पहले से मज़बूत हुए हैं. उनकी भूमिका आगे अहम हो जाएगी."
विपक्ष का क्या हाल?

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शरद पवार और उद्धव ठाकरे की पार्टी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा है. लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र से उद्धव ठाकरे की शिवसेना के 9 और शरद पवार की एनसीपी के 8 सांसद जीते थे.
लेकिन, विधानसभा चुनाव के नतीजों ने दोनों ही नेताओं की पार्टियों को बेहद कमज़ोर स्थिति में ला दिया है. ऐसे में इन दलों के लिए अपने सांसदों को साथ बनाए रखने की भी चुनौती होगी.
समर खडस कहते हैं, "शरद पवार ने अपनी पार्टी के कांग्रेस में विलय के संकेत दिए थे, अब आगे ये संभावना बन सकती है."
"अगर राजनीति आगे और कोई करवट लेती है तो उद्धव ठाकरे के लिए अपने सांसदों को साथ बनाए रखना आसान नहीं होगा."
अगले कुछ महीनों में दिल्ली में विधानसभा चुनाव होना है. साथ ही अगले साल अक्तूबर में बिहार में चुनाव होंगे.
महाराष्ट्र की हार ने इंडिया गठबंधन के लिए स्थिति को बेहद मुश्किल कर दिया है और गठबंधन के सामने सभी दलों को साथ रखने की चुनौती भी आ सकती है.
दिल्ली में बीजेपी अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ेगी. यहां उसे गठबंधन सहयोगी की ज़रूरत नहीं हैं.
लेकिन, विश्लेषक मान रहे हैं कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के लिए साथ आना राजनीतिक मजबूरी हो सकता है.
सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार कहते हैं, "अगर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी साथ नहीं आते हैं, तो इसका निश्चित रूप से बीजेपी को फ़ायदा मिलेगा."
"राजनीतिक नज़रिए से देखें, तो दोनों दलों को साथ आना ही चाहिए. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और आप साथ मिलकर लड़े थे, लेकिन सातों सीटें हार गए."
"दिल्ली की जनता के लिए लोकसभा चुनाव के मायने अलग हैं और विधानसभा चुनाव के मायने अलग हैं."
बीजेपी पर ये आरोप लगते रहे हैं कि वह अपने गठबंधन सहयोगियों की राजनीतिक ज़मीन खींच लेती है.
लेकिन, विश्लेषक मान रहे हैं कि अब बीजेपी ये संकेत दे रही है कि उसके लिए गठबंधन सहयोगी अहम हैं, भले ही वह सबसे बड़ी पार्टी क्यों ना हो.
संजय कुमार कहते हैं, "बीजेपी इन चुनावों के नतीजों के बाद आत्मविश्वास से भरी हुई है. बड़ी जीत के बावजूद संकेत साफ़ है कि बीजेपी अपने गठबंधन सहयोगियों को साथ लेकर चलना चाहती है."
"बीजेपी पर ये आरोप लगाया जाता है कि वह गठबंधन सहयोगियों का इस्तेमाल करके छोड़ देती है. ऐसे में बीजेपी इस धारणा को तोड़ना चाहेगी."
"अगले साल बिहार में होने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी के लिए गठबंधन को बनाए रखना अहम होगा."
गठबंधन की राजनीति का क्या होगा?

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विश्लेषक ये भी मान रहे हैं कि इन चुनाव नतीजों ने इंडिया गठबंधन की अंदरूनी कमज़ोरियों को एक बार फिर उजागर कर दिया है.
शरद गुप्ता कहते हैं, "माना जा रहा था कि इंडिया गठबंधन एक मज़बूत फ्रंट पेश करेगा, उसकी संभावना अब कमज़ोर हो गई है."
"महाराष्ट्र के नतीजों के बाद ये धारणा मज़बूत हुई है कि इंडिया गठबंधन सहयोगी आपसी विवाद में उलझे रहते हैं और मज़बूत विकल्प पेश नहीं कर पाते."
"इंडिया गठबंधन के दल सीटों के बंटवारों को लेकर उलझे रहते हैं और चुनाव बेहद क़रीब आने तक कोई स्पष्ट रणनीति पेश नहीं कर पाते हैं."
वहीं, कांग्रेस को लग रहा है कि महाराष्ट्र चुनाव नतीजों का एक संकेत ये भी है कि बीजेपी में केंद्रीय नेतृत्व कमज़ोर हो रहा है और क्षेत्रीय क्षत्रप उभर रहे हैं.
कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक महाराष्ट्र में मिली अप्रत्याशित हार पर कहती हैं, "महाराष्ट्र के नतीजे हैरान करने वाले हैं, जो ज़मीनी हक़ीक़त हमें समझ आ रही थी नतीजे उससे बिलकुल अलग हैं."
"लेकिन इन नतीजों का ये संकेत भी है कि बीजेपी में केंद्रीय नेतृत्व के मुक़ाबले क्षेत्रीय नेता मज़बूत हो रहे हैं."
"लोकसभा चुनावों में बीजेपी प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ी और अपने हिस्से की 28 सीटों पर लड़कर 19 सीटों पर हार गई."
"लेकिन, अब जब देवेंद्र फडणवीस, एकनाथ शिंदे और अजित पवार चेहरा थे, तब प्रचंड बहुमत मिला है."
महाराष्ट्र चुनावों से पहले ‘एक हैं तो सेफ़ हैं’ और ‘बटेंगे तो कटेंगे’ जैसे नारे दिए गए.
यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘बटेंगे तो कटेंगे’ जैसे नारे देकर हिंदुत्व की राजनीति को और धार देने की कोशिश की.
क्या ध्रुवीकरण भी कारण था?
विश्लेषक मान रहे हैं कि इन चुनाव नतीजों का एक स्पष्ट संकेत ये भी है कि महाराष्ट्र में वोटों का ध्रुवीकरण हुआ और हिंदुत्व की राजनीति और मज़बूत हुई है.
हालांकि, अजीत पवार समेत महायुति के कई नेताओं ने ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ जैसे नारे को खारिज भी किया.
विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी महाराष्ट्र जैसे राज्य में नियंत्रित सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही.
समर खडस कहते हैं, "बटेंगे तो कटेंगे, एक हैं तो सेफ़ हैं और वोट जिहाद जैसे नारों से एक तरफ़ बीजेपी ने नियंत्रित सांप्रदायिकता फैलाई, वहीं दूसरी तरफ़ अजित पवार जैसे गठबंधन सहयोगियों ने ख़ुद को ऐसे नारों से दूर रख अपने समर्थकों के वोट हासिल किए."
"यानी बीजेपी सहयोगी को साथ रखकर अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने में कामयाब रही."

विश्लेषक मान रहे हैं कि यदि हिंदुत्व की राजनीति आगे और भी मज़बूत हुई तो भारतीय राजनीति में मुसलमान और हाशिए पर होंगे.
शरद गुप्ता कहते हैं, "बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति ने मुसलमानों को राजनीतिक रूप से पहले से ही कमज़ोर कर दिया था."
"लेकिन, अब 'बंटेंगे तो कटेंगे' जैसे नारों से लगता है कि मुसलमान राजनीतिक रूप से और कमज़ोर होंगे."
"लेकिन, इसका मतलब ये नहीं है कि मुसलमानों का हक़ मारा जा सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद कहते हैं कि लाभकारी योजनाओं का सबसे अधिक फ़ायदा मुसलमानों को ही हुआ है."
"डेटा भी इसकी पुष्टि करता है. लेकिन, जहां तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल है, मुसलमान लगातार कमज़ोर हो रहे हैं."
"बीजेपी की आक्रामकता की वजह से विपक्षी दल भी मुसलमानों को उतना प्रतिनिधित्व नहीं दे पा रहे हैं जितना उन्हें मिलना चाहिए."
"अब योगी आदित्यनाथ को भी महाराष्ट्र की जीत का श्रेय दिया जा रहा है. यदि योगी राजनीति में और मज़बूत होते हैं, तो इसका असर मुसलमानों पर पड़ सकता है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















