महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने आदित्य ठाकरे के ख़िलाफ़ मिलिंद देवड़ा को ही क्यों उतारा?

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- Author, अंशुल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रविवार को जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की पार्टी शिवसेना ने अपनी दूसरी लिस्ट जारी की तो एक नाम ने सबका ध्यान खींचा.
इस लिस्ट में शिवसेना ने अपने राज्यसभा सांसद मिलिंद देवड़ा को मुंबई की वर्ली विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया है.
वर्ली अब हाई प्रोफाइल सीट बन चुकी है क्योंकि मिलिंद के सामने वर्ली से वर्तमान विधायक आदित्य ठाकरे की चुनौती है.
इस सीट पर तीन ''सेनाएं''- शिवसेना, शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना आमने-सामने हैं.

राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने यहां से संदीप देशपांडे को टिकट दिया है.
वर्ली से टिकट मिलने के बाद मिलिंद देवड़ा ने अपनी पार्टी शिवसेना को धन्यवाद दिया और वर्ली के हर निवासी की आवाज़ मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे तक पहुंचाने की बात कही है.
वहीं, आधिकारिक घोषणा के बाद उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) ने कहा कि मिलिंद देवड़ा वर्ली सीट पर अपनी ज़मानत नहीं बचा पाएंगे.
महायुति गठबंधन में भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता शाइना एनसी भी वर्ली से टिकट के लिए दावेदारी कर रही थीं लेकिन मिलिंद की उम्मीदवारी के बाद शाइना एनसी ने उनका समर्थन किया है.

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किसका पलड़ा भारी?
मुंबई में जन्मे मिलिंद देवड़ा जाने-माने कांग्रेस नेता मुरली देवड़ा के बेटे हैं और 2004 में पहली बार 27 साल की उम्र में उन्होंने मुंबई दक्षिण लोकसभा सीट से चुनाव जीता था.
मिलिंद ने इस सीट से दो बार की सांसद और बीजेपी नेता जयंतिबेन मेहता को हराया था.
2009 के लोकसभा चुनाव में भी मिलिंद जीते और यूपीए-2 सरकार में राज्यमंत्री बनाए गए.
मिलिंद जब मंत्री बने थे तब उनकी उम्र 34 साल थी और वो तत्कालीन केंद्र सरकार के युवा चेहरों में से एक थे.
आदित्य ठाकरे की कहानी भी मिलिंद देवड़ा से मिलती-जुलती है. जन्म, मशहूर ठाकरे परिवार में हुआ तो राजनीति विरासत में मिल गई.
2019 के विधानसभा चुनाव में 29 साल की उम्र में पहली बार चुनाव लड़ा और मुंबई दक्षिण की वर्ली सीट से चुनाव जीतकर महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बने.
वर्ली सीट, मुंबई दक्षिण लोकसभा क्षेत्र में आती है और मिलिंद यहां से दो बार सांसद रह चुके हैं.
वहीं आदित्य ठाकरे पिछले पांच से यहां विधानसभा प्रतिनिधि हैं. ऐसे में वर्ली के मतदाता का झुकाव किस ओर होगा?
वरिष्ठ पत्रकार और महाराष्ट्र की राजनीति पर पकड़ रखने वाले अनुराग चतुर्वेदी इस सवाल के जवाब में कहते हैं, "बीजेपी से वर्ली सीट पर बीजेपी प्रवक्ता शाइना एनसी के नाम की चर्चा थी. शाइना के नाम पर अंतिम मुहर इसलिए नहीं लग पाई क्योंकि उनकी उम्मीदवारी से ऐसा लग रहा था कि महायुति गठबंधन की तरफ़ से आदित्य ठाकरे को वॉकओवर मिल रहा है. लेकिन मिलिंद के आने से लड़ाई दिलचस्प ज़रूर हुई है."
अनुराग चतुर्वेदी का मानना है कि पिछले पांच साल में आदित्य वर्ली में सक्रिय हैं और इसलिए उनका पलड़ा भारी दिखाई देता है.

साल 2019 के विधानसभा चुनाव में वर्ली से आदित्य ठाकरे ने एनसीपी के सुरेश माणे को 67,427 वोटों से हराया था. लेकिन लोकसभा चुनाव के आंकड़े आदित्य ठाकरे की चिंता बढ़ाने वाले हैं.
2024 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) के अरविंद सावंत ने इस सीट पर शिवसेना की यामिनी जाधव से 6,715 वोट ज्यादा हासिल किए थे.
इसके अलावा पांच सालों में पार्टी के स्तर पर भी बहुत कुछ बदल चुका है. पहले पार्टी में बगावत, फिर सरकार के गिरने से लेकर नई पार्टी बनने तक हर मोर्चे पर ठाकरे परिवार को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है.
वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार विनया देशपांडे कहती हैं, "वर्तमान विधायक होने के नाते आदित्य ठाकरे का पलड़ा भारी दिखता है. लेकिन वर्ली से लोकसभा चुनाव में मिली कम अंतर वाली लीड को अगर विधानसभा चुनाव का लिटमस टेस्ट माना जाए तो यह महाविकास अघाड़ी के लिए चिंता की बात है. "

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वर्ली में मराठी वोटरों की संख्या अच्छी-खासी है और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने पार्टी महासचिव और प्रवक्ता संदीप देशपांडे को टिकट दिया है. संदीप देशपांडे दादर इलाक़े से पार्षद रह चुके हैं और पिछले एक साल से भी ज़्यादा समय से वर्ली में सक्रिय हैं.
क्या संदीप देशपांडे के आने से लड़ाई त्रिकोणीय हो गई है?
विनया देशपांडे का कहना है, "इस विधानसभा सीट पर एमएनएस ने अभी तक अपने आप को साबित नहीं किया है. एक पक्ष यह भी है कि राज ठाकरे की पार्टी वोट काट सकती है क्योंकि यहां मराठी वोट बैंक काफ़ी ज़्यादा है. लेकिन त्रिकोणीय मुक़ाबला कहना अभी अतिशयोक्ति होगी."
मनसे ने आख़िरी बार 2014 में इस सीट से उम्मीदवार उतारा था तब उन्हें सिर्फ़ 5.68 फ़ीसदी वोट ही मिले थे. 2019 में राज ठाकरे ने आदित्य ठाकरे का समर्थन किया था और इस सीट पर मनसे का उम्मीदवार नहीं उतारा था.
'जीतने की नहीं बांधने की कोशिश'

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मिलिंद देवड़ा ने इस साल की शुरुआत में लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को छोड़कर शिवसेना का दामन थाम लिया था.
फिर अप्रैल के महीने में शिवसेना ने मिलिंद को राज्यसभा भेजा. जब आदित्य ठाकरे के सामने पार्टी ने मिलिंद देवड़ा का नाम फ़ाइनल किया तो यह सवाल स्वाभाविक तौर पर उठा कि मिलिंद को राज्यसभा से महाराष्ट्र विधानसभा में क्यों उतारा जा रहा है?
आदित्य वर्ली से विधायक है लेकिन मिलिंद देवड़ा भी वर्ली के लिए नया चेहरा नहीं है. लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान मिलिंद ने वर्ली विधानसभा में बतौर प्रभारी काम किया था.
इसके अलावा मिलिंद मुंबई दक्षिण से दो बार सांसद रह चुके हैं. इस लोकसभा क्षेत्र में कुल छह सीटें आती हैं और वर्ली उनमें से एक है.
शिवसेना के इस क़दम पर विनया देशपांडे का कहना है, "वर्ली में मराठी, दलित के अलावा पिछले कुछ सालों में उच्च वर्ग और सोसाइटी में रहने वाले अमीर लोगों का वोट बढ़ा है. इस वर्ग में मिलिंद देवड़ा की अपील निश्चित तौर पर देखी जाएगी. मिलिंद के करियर तो देखें तो आप पाएंगे कि इस वर्ग के साथ अतीत में मिलिंद के संबंध अच्छे रहे हैं."
आदित्य ठाकरे पार्टी के युवा चेहरा हैं और उनकी मांग पूरे महाराष्ट्र में होती है लेकिन मिलिंद देवड़ा जैसे मज़बूत प्रत्याशी के उतरने से उन्हें वर्ली में अब ज़्यादा समय देना होगा.
साथ ही कोंकण क्षेत्र जिसमें मुंबई और पुणे आते हैं, उसे शिवसेना (यूबीटी) का गढ़ माना जाता है.
एकनाथ शिंदे पूरी कोशिश कर रहे हैं कि इस क्षेत्र में शिवसेना (यूबीटी) को रोका जाए और वर्ली सीट पर मज़ूबत उम्मीदवार का चयन ठाकरे को सिर्फ़ इसी सीट पर उलझाने की कोशिश से जोड़कर देखा जा रहा है.
अनुराग चतुर्वेदी शिवसेना के इस फ़ैसले को इसे जीतने की नहीं बांधने की कोशिश से जोड़कर देखते हैं.
अनुराग चतुर्वेदी कहते हैं, "एकनाथ शिंदे के इस फ़ैसले का सीधा असर उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे पर पड़ेगा. दोनों को वर्ली पर ज़्यादा ध्यान देना होगा और पूरे महाराष्ट्र के लिए उतना समय नहीं निकाल पाएंगे. शिवसेना की ओर से यह जीतने से ज़्यादा ठाकरे परिवार को बांधने की कोशिश है."
आदित्य अगर हारे तो क्या होगा?
शिवसेना (तब उद्धव ठाकरे की) ने साल 2019 में जब वर्ली सीट से आदित्य ठाकरे को उम्मीदवार बनाया तो इस फ़ैसले ने जमकर सुर्खियां बटोरी थीं.
यह पहला मौक़ा था जब ठाकरे परिवार का कोई सदस्य सीधे चुनावी मैदान में उतरने वाला था. इससे पहले बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे सत्ता के केंद्र में तो रहे लेकिन कभी भी न तो कोई चुनाव लड़ा और न ही किसी संवैधानिक पद पर रहे.
इस चुनाव में जीत के बाद आदित्य ठाकरे महाविकास अघाड़ी की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने और उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. अगर वर्ली में चुनावी नतीजे ठाकरे परिवार के पक्ष में नहीं रहते हैं तो क्या होगा?
विनया देशपांडे कहती हैं,"यह सीट अब शिवसेना और शिवसेना (यूबीटी) के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुकी है. अगर आदित्य ठाकरे हारते हैं तो उनके राजनीतिक करियर पर तो प्रश्नचिन्ह लगेगा ही, असली शिवसेना जैसी बातों को भी फिर से हवा मिलेगी. अब ठाकरे परिवार का यहां बहुत कुछ दांव पर लग चुका है."
इस चुनाव से पहले मिलिंद दो लोकसभा चुनावों में हार का सामना कर चुके हैं. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने मुंबई दक्षिण की सीट पर शिवसेना (उद्धव गुट) के अरविंद सावंत ने हराया था. ऐसे में अगर शिवसेना के इस दांव में मिलिंद देवड़ा की हार होती है तब क्या होगा?
अनुराग चतुर्वेदी मानते हैं कि इस हार का मिलिंद देवड़ा के राजनीतिक करियर पर कोई ख़ास असर नहीं होगा.
चतुर्वेदी कहते हैं,"मिलिंद अगर हारते हैं तो उनकी छवि एक आज्ञाकारी नेता के रूप में उभरेगी. यह दांव मिलिंद देवड़ा राजनीतिक रूप से तो नहीं लेकिन व्यक्तिगत रूप से उन्हें फ़ायदा पहुंचाएगा. शिंदे की सहयोगी बीजेपी की नज़रों में उनकी छवि अच्छी बनेगी और संभव है कि उन्हें केंद्र में फ़ायदा मिले."
अनुराग चतुर्वेदी कहते हैं कि अगर आदित्य ठाकरे हारे तो ठाकरे परिवार के लिए यह एक शर्मनाक हार होगी.
वर्ली के सामाजिक समीकरण और महत्व
वर्ली की सीट पर मराठी, कोली और उच्च वर्ग के लोगों का दबदबा है.
इसके साथ ही दलित और गुजराती मतदाताओं की संख्या भी अच्छी खासी है. मुंबई की मशहूर बीडीडी चॉल भी इसी इलाक़े में पड़ता है जिसमें दस हज़ार से ज़्यादा परिवार रहते हैं. धारावी की तर्ज़ पर इस इलाक़े का भी पुनर्निर्माण हो रहा है.
1962 से लेकर 1972 तक इस सीट पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी और 1978 में कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस को इस सीट पर रोक दिया था.
इसके बाद 1980 में कांग्रेस और 1985 में निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत दर्ज़ की.
1990 के दशक में बाल ठाकरे की शिवसेना ने इस सीट पर जीत दर्ज़ की और 2004 तक यहां शिवसेना का कब्जा रहा.
2009 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सचिन अहीर इस सीट पर जीते और पिछले दो चुनावों में शिवसेना इस सीट पर बनी हुई है.
2024 में एक बार फिर आदित्य ठाकरे मैदान में हैं लेकिन ऐसी चुनौती उन्होंने अपने करियर में कभी नहीं देखी है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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